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Full text of "Prathvi Raj Raso Ke Patro Ki Etihasikta"

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प्रकाकश्षक- 
विश्वविद्यालय हिन्दी प्रकाशन, 


नखनकऊ विश्वविद्यालय, 
नखनऊ ॥ 


प्रथम संस्करण; सं० २०२५ घि० 
ल्य़्‌ हर ९-)5 रुपये 
दर्थित बुर १५, 


ढखचऊ विश्व विद्या छय हिन्दी अर्कीशिन 
्॑ 


मुद्रक-- 
स्टेन्डड प्रिन्टर्स, ८६, न्यू माडल हाउस, 
लखनऊ 


पूज्य पिता 
स्वर्गीय बांबू जयप्रसाद जी अग्रवाल 
की पुण्य स्मृति को 
सादर, सविनय समर्पित । 


कतज्ञता-प्रकाश 


श्रीमाम सेठ शुभकरन जी पैकसरिया ने लखनऊ विश्वविद्यालय की रजत-जयंत्री के 
अवसर पर बिसवाँ सुगर फैक्टरी की ओर से वीस सहस्त्र रुयये का दान देकर हिन्दी-प्रिभाग 
की सहायता की है। सेठ जी का यह दान उनके विशेष हिन्दी अनुराग का बद्योतक है । इस 
घन का उपयोग हिन्दी में उच्चकोटि के मौलिक एवं गवेपणात्मक ग्रन्थों के प्रकाशन के लिए 
किया जा रहा है जो श्री सेठ शुभकरत सेकसरिया जी के पिता के नाम पर सेठ भोलाराम 
सेकसरिया ग्रन्थ माला से संग्रन्थित हो रहे हैं। हमें आशा है कि यह ग्रन्थ माला हिन्दी 
साहित्य के भंडार को समृद्ध करके ज्ञान वृद्धि में सहायक होगी । श्री सेठ शुभभरन जी की 
इस अनुकरणीय उदारता के लिए हम अपनी हादिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं । 


दीनदयाहु गुप्त 
भूतपूर्व प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, 
हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, 
लखनऊ विएवविद्यालय 


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महाराज पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) 


अध्ययन क्रम 


आमुण्ठ १-६ 
संक्षिप्त रूप ु ७ 
पहला अध्याय १-२३ 
राजपूत : शब्द तथा इत्तिहास १-७ 
राजपूतों के ३६ वंश तथा उनका इतिहास ह ु ७-२३ 
दूसरा अध्याय २४-१५० 


हिन्दू पान्न : शासक वर्ग 


राजा--२४, अजयसिंह--२६, अनंगपाल--२७, अरिमंत- ३४, अस्थूलनंद-३५, आनन्द- 
देव--३५, आानन्दराज-३६, आानलराज अथवा आना--३६, उद्दारहार-३९, क्रिस्तराज अथवा 
कृष्णराज-३९, चतुरवाहुमाण, चाहुवान, चौहान-४०, चदराय--४२, चन्द्रगुप्त-४२, 
चन्देलराज परमद्विदेव-४३, जोगसुर-४४, जयचन्द गाहड़वाल-४५, जयसिंह-६३, ध्रमसार 
अथवा घधमंसार-६४, धर्माधिराज-६४, नागहस्त-६४, प्रतापसिह-६६, प्रथवराई-६६, 
पृथ्वीराज चौहान--६७, बालप्लराइ-९८, विन्दसूर अथवा विन्दसार-९९, बिवुघसिह-९९, 
वीरसिह-१००, भोलाराय ( भीमदेव ) चालुक्य-१०१, मह॒देव क्षयवा महादेव--११४, 
महासिह-११४ मानिक्यराय--११४५; मोहन्त-११७, मोहसिह-११८+ रामसिह--११८, रैससी 
अथवा र॑नसिह-११९, -लोहधीर अयवा लोहसार--१२१, विजयपाल-१२२, वीरदण्ड-१२५, 
वीरसिह--१२५, वीसलदेव-१२६, वेरसिह-१३७,' संकाविड़ार-१३८, संग्रामसिह-१३८, 
सम्प्रतिराय-१३९, सामन्तदेव-१४०, सारंगदेव--१४०, सेनराय अथवा सेनराज-१४४, 
सोमेश्वर-१४४, हरिहरराय-१४९ । 


तीसरा अध्याय १५१-२७६ 
हिन्दू पात्र : सामन्त वर्गं 


मचलेस चौहान-१५१, अमरसिह सेंवड़ा-१५२, अल्हणकुमार १५६, आरज्जपिह-१५८५, 
आल्हा-ऊदल-१५९, फचराराय-१६५, कनकराय बड़गुज्जर-१६७, कन्ह (कर्नाटक नरेश)-१६८, 
कन्ह चौहान-१६९, कान्ह कमघज्ज-१७ १, काशी नरेश-१७२, कुम्भा जी--१७३, कुमोदमनि-- 
१७४, क्रंभराय-१७५, केहरि कण्ठीर-१७६, कैमास दाहिम-१७७, खेमकरन खंगार, वीरसिह 
तथा जराधिह--१८३, गोविन्दराय गहलौत-१८३, चण्डपुण्डीर-१८५, चामण्डराब दाहिम- 
पृ, छग्गनराय-१९१, जंघाराभीम-१९२, जसवन्त सिह--१९३, जेसिंह कमघज्ज-१९४, 
जैतप्रमार--१९४, जोबनराय-१९७, तिरहुत नरेश-१९७, देवराज वग्गरी अथवा वग्गरीराव- 
१९९, प्रमाइन कायस्थ-१९९, घोर पुण्डीर--२००, नरपाल ( नैपाल नरेश )-२०३, 


रे 


नरसिह दाहिम-२०४, नाहरराय-२०६, निदुदुरराय--२०७, पंचाइन ( चन्देरी नरेश )- 
२०९, पज्जूतराव कूर म-२११, प्रतापविह-२१३, परवंतराय-२१४, प्रसंगराय खींची-२१४, 
पल्हन कुमार-२१५ परहांडराय तोमर-२१५, परावस पुण्डीर-२१६, वखरेत-२१७, वलभद्र 
कमधज्ज-२१७, वलिमद्र तथा उसका भाई-२१८, वालराय-२१९, वालुकाराय- कमधज्ज- 
बिल्लराज-२२१, वेनीदत्त ब्राह्मफ-२२२, मकवाना-२२३, मर्ल सिह-२२४, महादेव राय- 
२२४५, मंगल मेवातपति-२२५, रतनसिह-२१८, रनघीर राय-२२८ रयसलल्‍लराय कंमघज्ज- 
१, रावन-२३१,_ रावल समर सिह-२३५, लापन बधेल-२४५, लंगालंगरीराय-२४६, 
लापनविह-२५०, लोहाना आजानवाहु-२४२, विजयपाल-२५४, वीरचन्द कमघज्ज-२५५, 
वोर्मराय--२५५, सजमराय--२५७, सलपराय प्रमार-२५९, सारगढेव जाट--२६०, सारंग- 
देव सोलंकी--२६१, पथिंह प्रमार-२६२, सुमंत--२६३, सुलपपर्वार--२६७, हरिसिह-२६८, 
#ड़ा हम्मीर--२६९, हाहुलीराय--२६९, हैजमकुमार प्रतिहार-२७५। 
चौथा अध्याय २७७४-३४ १ 
मुसलमान पात्र ु ह 
भरवरखा-२८०, आलमखाँ-२८१, उजवकखाँ--२८२, कलीखाँ कुंजरी-२८२, खाँ पैदा 
महमूद -२८२, खानखाना-२८३, खानखाना हजरतखा-२८४, खिलचीखा--२८५, खुरासानखाँ- 
२८६, गाजीखाँ-२८६, जलाल जलूस-२५७, जहाँगीर खाँ-२०७, तातारखाँ-२८५, तातार 
निमुरत्तवा--२९३, दुष्तमखा--२९५, घरिखाँ--२९६, निमुरत्तवा-२९६, नू रमुहम्मद-२९७, 
पश्चिमी खाँ--२९८, पहाड़ोखाँ गोरी-२९८, वलीखाँ एवं अलीखाँ-२९८, बाहवलखाँ--२९९, 
भट्ट! महनगंखा-२०० मगोल लल्लरी-३१०१,. महमूद्खाँ--३०२, मियां मनसूर रूहिल्‍ला-- 
३०३२, भिर्याँ मुस्तफा-३०३, मोर कम्मोद्खा-३०४, रूमीखाँ तथा वहरामखाँ--३०४, शाह- 
शह बुद्दीन मुईजुहीन सुल्तान गोरी--३०५, सहवाजखाँ--३३०; सुभानखा--३३०,' हवाशखा-- 
३३१, हिन्दूबाँ--३३१ हुजावनूरोखाँ-३३२, हुस्सेन खाँ-३३२, हस्सेत--३ ३४ । 


पांचवाँ अध्याय भा ३४२-३६२ 
काह्पनिक पात्र 


लिंग पर्वितं--३४३, सकेतिक भाप ---३४३, पूर्व. जन्म की, स्मति--३४४४, फलादि द्वारा 
सन्‍्तानोत्यति-३४५, अप्राकृत जन्म--३४४५., राजा का दंची चनाव--३४६, भत्ताताई--३५० 
वावन वीर--३५४, अन्य काल्पनिक पात्र-३५४, ऋषि-मुनि--३५४, काजी, फकीर, बौलिया 
आदि ५१९. * 
छठा अब्याय ह  ३६३-४०९ 
स्त्री-पात्र हु 
ड्धिन--३६३ इन्द्रावती--३६६., कमला (पृथ्वीराज की माता)--३६९, करनाटी-- 


डरे 


३७३, कूअर पद मस्रेन -“-३७६, चित्ररेखा-_३७६, जुन्हाई--३७८, सुन्दरी--३८०, दाहिमी- 
३८, ढूती अथव) योगनी--३८४, पदमावती--३८५, पृथाबाई-..३८९, पुण्डरनो-..३८९, 
लाले (खतन्राणी बाला ), ३९०, स्योगिता--३९०, सुरसुन्दरी--४००, शशिवत्ता--४०१, 
हसावती--४०७ । दर 


सातवाँ अध्याय ४१०-४३ १ 
राज्य कवि एवं पुरोहित वर्ग 


कमल भट्ट ४११, कविचन्द-..४११, गृरुराम-..४२०, जगदेव भाट-...४२३, . दुर्गा- 
केदार 7४२४ भानु-_४२७, माघों भाट--४२८; श्रीकंठ--४३०, हाज़ीखाँ काजी--४३१ | 
उपसंहार ४३२-४३५ 
परिशिष्ट ४३७-४९० 
१. प्रबन्ध चिन्तामणि._(अ) वीसल विग्रहराज-_४३७; 
(ब) परम सेवक-_४३७; 
(स) पृथ्वीराज वधघ-.४३८; 
पृथ्वीराज विजय महाकाव्य--चाहमान वंश कीतृंनम्‌-.४३९, 
बिजोलिया का शिलालेख-..४४४५, 
सुर्जन चरित-... (१) चाहमान उत्पत्ति--४४८, 
(२) चाहमान वशावली-_४४९, 
(३) कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द की कन्या कान्तिमती--४५२, 
(४) वाण वेघ--४५३, 


हम्मीर महाकाव्य-...४५४५, 
हपंनाथ के मंदिर का शिलालेख-४५६, 
सुृजान चरित--४५९, 
गाहड़वाल-वश--४६०, 
महाकवि चन्द वरदायी का वंशं-वृक्ष--४६१, 
१०. दिल्‍ली के तंवरों की वंशावली (१)--४६३, 
दिल्‍ली के तंवरों की वंशावली (२)--४६४, 
११. देवगिरि के यादवों की वंशाचली-- ४६५, 
१२, चौहानों की घंशावली- न 
१. हर्षनाथ के मंदिर की प्रशस्ति के अनुसार-४६६, 
२. बिजौलिया के शिलालेख के अनुसार-.-४६७, 
३. पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के अनुसार--४६९, 


४१ ही ढ 20 रद 


४ 


प्रबन्ध कोश में दी हुई चौहानों की वंशावली के अनुसार--४७१, 
हम्मीर महाकाव्य के अनुसार--४७३, 
« सुर्जनचरित के अनुसार....४७५, 
«  रासो के विभिन्न संस्करणों के अनुसार 
८. पं० सदाशिव दीक्षित के अनुसार-...४७७, 
१३. भीमदेव चालुक्य फा वंशवृक्ष-.. 
१. चालुक्य वंश- श्री के० एमं० मुंशी के मनुसार-४८5०, 
२. चालुक्‍्य वंश--डाँ वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार--४८१, 
१४, मुइज्जुद्दीन मुहम्मद गोरी का वंश वृक्ष--४८२, 
१५. सहायक ग्रन्थ सूची---४८३-४९० 


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आमुख 


आदि कालीन हिंन्दी साहित्य में पृथ्वीराज रासो का स्थान निविवाद रूप से अन्यतम 
है। इस महत्व पूर्ण कृति के एक अंश को पढ़ने का सर्वप्रथम अवसर मुझे एम० ए० (प्रथम 
वर्ष) में प्राप्त हुआ। क्ृति की महत्ता से प्रभावित होकर मैंने एम० ए० ( द्वितीय वर्ष ) 
में भी 'चन्द वरदायो” का अध्ययन घिशेष कवि के रूप में किया । मेरी रुचि देखकर श्रद्ध॑य 
गुरुवर डॉ० विपिनविहारी त्रिवेदी जी ने मुझे पृथ्वीराज रासो के पान्नों की ऐतिहासिकता 
पर शोध-कार्य करने का भादेश दिया। अतः उनकी श्ाज्ञा तथा तत्कालीन विभागाषध्यक्ष 
डॉ दीनदयालु जी गुप्त की सहमति से मैं पृथ्वीराज रासो के पात्रों की ऐतिहासिकता' के 
अध्ययन से प्रवृत्त हुआ। सन्‌ १९६१ में इसी प्रवन्ध पर लखनऊ विश्वविद्यालय से 
पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त हुई । 


इतिहास- के अनेक. स्थल इतने अंधकार पूर्ण हैं. कि निरन्तर खोज होते रहने पर भी 
मजी तक उन: पर सम्यक््‌ प्रकाश: नहीं डाला जा सका है-। भारत-की केन्द्रीय राजसत्ता का 
अन्‍्तः होने के: उपरान्त लगभग १३वीं शताब्दी, के.पूर्व: तक उत्तरी भास्त का इतिहास ऐसा 
ही अंधकारमय है । 

राजा हर्ष के. उपरान्त प्रायः. सभी राज्यों ने अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया । 
१० वीं शताब्दी के.अन्तिम चरण.-में उत्तरों भारत में पाल, गाहड़वाल, चालुक्य, चन्देल 
तथा चौहानः राज्यों के. अतिरिक्त युजरात; तथा, मालवा के दो ओर स्वतंत्र राज्य स्थापित 
हो. चुके थे । ११: वीं-१२वीं शताब्दी में उत्तर भारत की शक्तियों का प्रायः ह्ाव्व हो चुका 
था । वहाँ, सात. प्रमुख स्वतंत्र राज्य-थे जिनमें कोई भी किसी एक बड़े. राज्य के भाघीन 
रह. कर कार्य- करने को. प्रस्तुत: न था; । 

इस युग' की। राजनीतिक पृष्ठभूमि देखने से. स्पष्ट' होः जाता है कि सातवी-आठवी 
शताब्दी में बाह्य शक्तियाँ प्रबल- न थीं।। ९वीं शताब्दी तक सजवीतिक सगठन' इतना बमशकक्‍्त 
हो गया-था कि उसका. सामत्ा कर, कोई. भी सफलता" की आशा नहों कर सकता था। 
परस्पर- विरोध एवं शक्ति के छिन्नःभिन्न हो जाने-के कारण विदेशी अशक्रमणकयरियों को 
मात्तों. खुला: निमंत्रणः प्राप्त हो गया था । | 


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तत्कालीन साहित्य में भारत के राज्यों के पारस्परिक झगड़ों पर अच्छा प्रकाश पड़ता 
है । पृथ्वीराज रासो सामथिक राजनीतिक बवस्था का जीता-जागता प्रमाण है। दिल्ली- 
अजमेर के अन्तिम हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान (तृतीय), कन्नौजपति जयचन्द गाहड़वाल, 
गुर्जरेश्वर भीमदेव चालुक्य, चन्देलराज परमदिदेव के पारस्परिक संघर्ष एवं गजनीपति शाह 
शहावुद्दीन गोरी के आक्रमणों का 'रासो' में रोचक चित्रण हुआ है । 

अपनी विकसनशील प्रवृति के कारण रासो का अस्तित्व भी शका की दृष्टि से देखा 
जाने लगा, इसका मूल कारण था एंतिहासिक व्यक्तियों का चित्रण । इतिहास वैेत्ताओं ने 
चरित्रों के विवरणों को ताम्रपत्रों एवं शिला लेखों से मिलना प्रारम्भ किया और फिर 
हुई जमकर ग्रन्थ की कटु आलोचना । इतिहासकारों ने रासो को अप्रामाणिक एवं अनैतिहा- 
सिक घोषित कर दिया किन्तु साहित्यिक विद्वानों ने रासो का साथ न छोड़ा तथा कतिपय 
तथ्यों से, जो इतिहास की कसौटी पर भी पूरे उतरते थे, प्रेरणा ग्रहण कर अन्वेषण कार्य 
प्रारम्भ रखा तथा रासो की प्रामाणिकता एवं संभावित प्रक्षेपों को विज्ञजनों ने एक मत से 
स्वीकार किया । पृथ्वीराज रासों की विविध वाचनाओं के विवरणों को देखने से स्पष्ट 
होता है कि मुख्यतः पृथ्वीराज रासो के चार-संस्करण प्राप्त होते हैं-- 


(१) लघुतम, 
(२) जघु, 
(३) भध्यम तथा 
(४) वृहद्‌ 


उक्त सभी रूपान्तरों पर दृष्टिपात करने से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारंम्भ में मूल 
रासों का परिमाण निश्चित रूप से पर्याप्त कम रहा होगा,'किन्तु जैसे-जैसे समय व्ययतीत होता 
गया तथा यह्‌ ग्रन्थ जनता के मध्य प्रसिद्ध होता रहा, वंसे-वैसे इसमें विकासात्मक परिवर्धन 
होता गया होगा । ह 


मूल रासो के परिमाण का ठीक-ठीक पता लगाना अत्यन्त कठिन कार्य है । किन्तु 
रासो के चारों सस्करणों को देखने से इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि इसमें कम से कम 
प्रारम्भ में नीन कथानक अवश्य रहे होंगे । इस काव्य ग्रन्थ का 'सयोगिता स्वयंवर” मुख्य भाग 
होगा । वास्तव में संयोगिता के कारण ही रासो ग्रन्थ प्राणवान है। 'कईमास वध” प्रकरण 
भी मूल रासो का एक अंश अवश्य रहा होगा, क्योंकि कमास बध विपयक अपकच्रश के तीन 
पद्यों में इसकी प्रामाणिक्रमा में अब किसी को सन्देह नहीं रह गया है तथा तृतीय और 
अन्तिम प्रकरण जिसके विपय में निश्चित रूप से कहा जा सकता है बढ़ शाहशह्दाबुद्दीन गोरी 
में युद्ध तथा पृथ्वी रःज द्वारा णब्द वेधी वाण चलाकर उसका वध हैं । 


सासो के लघूतम रूपान्तर की धघारणोज की प्रति संवत्‌ १६६७ की है। गेयकाव्य 
होने के कारण इममें स्वतः ही परिवतंन एवं परिवर्धन होता रहा होगा। यह संस्करण 


डे 


तो बीकानेर के श्री अगरचन्द नाहटा तथा दूसरी दिल्‍ली के डॉ० दशरथ शर्मा के पास है । 
लेखक को डॉ शर्मा वाली प्रति की फोटो कापी देखने का सौभाग्य प्राप्त है। उक्त प्रति 
की एक फोटो कापी लखतऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षित है। सम्भव है मूल रासो की कया 
इसी प्रति की कथा के आस-पास रही होगी । कालानन्‍्तर में इसमें विकास हुआ होगा भौर 
परिणाम स्वरूप रासो का लघु झूपान्तर सम्मुख आया होगा । 


इस रूपान्तर में पर्याप्त परिवर्धन हुआ । अनेक नए-नए प्रकरणों को जोड़कर कथा को 
बढ़ाया गया । परिणाम स्वरूप बन तिहासिक तत्वों का समावेश भी होते लगा । इस रूपान्तर 
में लगभग उच्चीस सर्ग अथवा समय हो गए जिनमें दो हजार पद तथा ३५ सौ ए्लोक हैं। 
इस रूपान्तर की अभी तक केवल ५ प्रत्तियों की सूचना प्राप्त हो सकी है जो बीकानेर तथा 
लह्दौर के पुस्तक स ग्रहालयों में सुरक्षित है । 


मध्यम रूप।न्तर की कथा में मोर भी अधिक विकास हो गया है लघु रूपान्तर से इसका 
परिमाण लगभग दूने से भी कुछ अधिक हो गया है इसमें कुछ ऐसे प्रकरण जोड़ दिए गए 
हैं जिनका अस्तित्व लघुतम एवं लघु खूपान्तरों में नहीं है, यह खरूपान्तर भी लघु के समान 
सर्गों अथवा समयों से विभाजित हैं तथा इनकी सख्या ४० से ४७ तक कही जाती है, सम्पूर्ण 
संस्करण में लगभग ९ से १९ हजार तक श्लोक संख्या है तथा इसकी कुल ११ प्रतियाँ 
बीकानेर, अवोहर, लाहौर, पूना तथा कलकत्ता के पुस्तकालयों में विद्यमान है । 


रासो के वृहद्‌ रूपान्तर में अत्यधिक पाठ वृद्धि हुई है। इस संस्करण में कुछ ऐसी 
कथाओं को भी स्थान दे दिया गया है जिनका पृथ्वीराज के चरित्र से कोई सीधा सम्बन्ध 
हीं है । यदि इन प्रकरणों को ग्रन्य से निकाल भी दिया जावे तक भी मूल कथा में किसी 
प्रकार का व्यवधान उपस्थित नहीं होता । रासो के पाठ वृद्धि पर विचार करते हुए डॉ० 
नामवर सिंह से अपना विचार व्यक्त किया है कि-'बाद के परिवर्धन काल में लोहाना 
भाजानवाहु, पद्मावती विवाह पातिसाह ग्रहण, होली कथा, दीपमाला कथा तथा पृथ्वीराज 
विवाह जीड़े गए। असम्भव नहीं है कि इनमें से कुछ स्वतंत्र काव्य रूप में प्रसिद्ध रहे हों 
तथा १७ वीं-१८वीं शताष्दी में ही किसी ने इन्हें रासो के अन्तगंत मानकर लिपि घद्ध कर 
लिया हो ।' वास्तविकता कुछ भी हो, पर इतना निविवाद रूप से सत्य है कि बृहद्‌ ससकरण 
में प्रक्षिप्त अंश बहुत अधिक वढ़ गया जिससे सम्पूर्ण रासो ग्रन्थ शंका की दृष्टि से देखा जाने 
लगा । रासो के वृहद रूपान्तर में ६४ से ६९ तक समय अथवा सर्ग तथा १३ से १७ हजार 
त्तक पद अथवा अनुष्टुप की ३१ मात्रा के हिसाब से ३० से ३६ हजार तक श्लोक संठ्या 
विद्यमान है। इस खूपान्तर की अभी त्तक ३३ प्रतियों की सूचना श्राप्त हुई है जो यूरोप, 
चस्वई, कलकत्ता, आगरा, काशी, बीकानेर आदि स्थानों में सुरक्षित है । 


उपयुक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समय-समय पर मूल रासो में अवश्य ही परिव्धन 
होता रहा है । नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा प्रकाशित पृथ्वीराज रासो वृहृद्‌ रूपान्तर 


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के अन्त्गंत आता है। इसी रासो का अध्ययन करने के उपरान्त, उसकी प्रमाणिकता के 
सम्बन्ध में विदाद उठ खड़ा हुआ । अधिकतर विद्वानों का यह मत हैं कि वर्तमान प्रकाशित 
पथ्वीराज रासो, भर्न हाप्तिक, अप्रामाणिक एवं काल्पनिक है। अन्य तीन रूपान्तरों पर दुष्टि- 
,पात्त करने से स्पप्ठ हो जाता है कि कुछ स्थल ऐसे भवश्य है जिसके सम्बन्ध में तीनों सस्करणों 
में कोई उल्लेख तक प्राप्त नहीं होता । अतः निश्चित है कि बहुद्‌ रूपान्तर में कुछ क्षेपक 
होने के कारण ही वह आज-कल इतने विकृत रूप में मिलता है तथा उसकी ऐतिहासिकता 
भी शंका का विपय वन गई है। आज समस्त रूपान्तरों के आधार पर रासो का वैज्ञानिक 
एव संशोधित पाठ प्रस्तुत करने की नितान्त आवश्यकता है, जिससे साधारण पाठक भी रासो 
की वास्तविकता का थानन्द ले सके। डॉ० विपिनबिहारी तिवेदी जी ने लखबऊ विश्व- 
विद्यालय के तत्वावधान में रासो के सम्पादन का कार्य प्रारम्भ किया था किन्तु उनके असा- 
मयिक निघन से यह कार्य अधूरा पड़ा है। 

प्रस्तुत अध्ययन क्रम में पृथ्वीराज रासो के सभी संस्करण तथा वाचनाएं उपलब्ध 
नहीं हो सकीं किन्तु फिर भी पृथ्वीराज रासो का अप्रकाशित रॉयल एशियाटिक प्तोसाइटी 
लन्दन का मध्यम, और लघु रूपान्तर तथा घारणोज का लघुतम रूपान्तर, डॉ त्रिवेदी जी 
की कृपा से मिल गया । लेखक ने प्रवंध का मूल भाधार नागरी प्रचारिणी सभा काशी से 
प्रकाशित वृहद्‌ पृथ्वीराज रासों को ही बनाया है, किन्तु साहित्य सस्यान उदयपुर से 
प्रकाशित पृथ्वीराज रासो से भी प्रबन्ध को पूर्ण बनाने के लिए पर्याप्त सहायता ली गई है.। 

प्रस्तुत मध्प्यन की रूप रेखा निर्धारित करने में कोई एक ग्रन्थ निश्चित पथ प्रदशन 
नहीं कर सका है । फलतः कुछ स्थलों को छोड़कर लगभग सम्पूर्ण प्रवन्ध का विपय विभाजन 


निजी मान्यताओं के अधार पर किया गया है। यहाँ प्रस्तुत अध्ययन क्रम के विभाजन की 
रांक्षिप्त रूप रेखा देना अनुपयुक्त न होगा । ह 


प्रस्तुत प्रवग्ध सात अध्यायों में विभक्त है जिनमें पृथ्वीराज रासो .में आए हुए प्रमुख 
पात्रों को ऐतिहासिक कसौटी पर परखने का प्रयास किया गया है| प्रथम अध्याय में राजपूत 
शब्द की ब्युत्पत्ति-विवेचना के साथ-साथ राजपूत जाति के प्रमुख वशों का संक्षिप्त परिचया- 
त्मक इतिहास वर्णित है । 
दूसरे अध्याय में शासक वर्ग के अन्तर्गत आने वाले हिन्दू पात्रों की ऐतिहाधप्विकता पर 
विचार किया गया है | ऐतिह।सिकता को अधिकाधिक प्रामाणिक बनाने के उद्द श्य से इतिहास 
ग्रन्यों के अतिरिक्त संस्क्ृत, प्राकृत तथा अपभ्रश साहित्य और डिगल साहित्य की ख्यात 
तथा बातों एवं घिला लेखादि का भी -उपयोग लेखक ने किया है । 
तीसरे अध्याय में शासित वर्ग के अन्तर्गत भाने वाले मुख्य हिन्दू पात्रों की चर्चा है। 
जिन पात्रों के सम्बन्ध में इतिहास सर्वथा मौन है, उनके विपय में मध्ययन की आधारभूत 
सामग्री रूप में साहित्यिक कृतियों से सहायता ली गई है। 


4 


पौधा अध्याय प्रमुख मुसलमान पात्रों से संवन्धित है। इस अध्याय में मुसलमान शासक 
एवं शासित दोनों वर्मों के पात्रों को एक ही साथ अध्ययन का आधार बना लिया 
गया है । 

पाँचवाँ अध्याय काल्पनिक पात्रों से संबन्धित है। इस अध्याय में कवि कल्पना 
भसूत पान्नों के विवेचन के साथ साथ कथा घिकास में उनके योगदान की चर्चा भी कर दी 
गई है । 

छठे अध्याय में स्त्री पात्रों की विधेचना है । पृथ्वीराज रासो जैसे वीर काव्य में स्त्री 
पात्रों करा चित्रण प्राय: कम ही हुआ है किन्तु जो भी प्रसंग वश आ गई है, उनकी प्रामा- 
णिकता भी देखने का प्रयास किया गया है। 


सातवां अध्याय विभिन्न राज्यों के राज कवि एवं पुरोहित वर्ग से सम्बन्धित है। इस 
' कोटि के पान्नों की संख्या भी बहुत कम है । इसी अध्याय में उन पात्रों की भी चर्चा हुई है जो 
सामान्य स्तर के है किन्तु कथा-विफास की दृष्टि से महत्व पूर्ण हे । 


भस्तुत प्रबन्ध में पृथ्वीराज रासो के लगभग सभी प्रमुख पात्रों का ऐतिहासिक विवेचन 
प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है । किसी भी युग के पातन्नों की ऐतिहासिकता खोजना 
मत्यन्त दुरूह काये है । यह जान सकना सरल नहीं हैँ कि आज से लगभग २०-२१ वर्ष पूर्व 
भारत के स्वतत्नता संग्राम में किन-किन पृण्मात्माओं ने अपने अमूल्य प्राणों की आहुति दी 
थी, न जाने कितने नाम ऐसे होंगे जिनके विषय में आज हम जानते तक नहीं, किन्तु फिर 
भी उनके साथ एक इतिहास सम्बद्ध है। रासो तो हिन्दी साहित्य का आदि महाकाव्य हैँ । 
इसके समस्त पानों को ऐतिहासिक प्रन्‍्थों में खोजना भारी भूल होगी । तत्कालीत मुसलमानों 
में ही इतिहास लिखने की प्रथा थी, वह पक्षपात के कारण हिन्दुओं की उपेक्षा तथा मपने 
आश्रयदाता मुसलमान शासकों की अतिशयोकक्‍्ित पूर्ण प्रशंसा किया करते थे । यह भी अत्युक्ति 
म होगी कि प्रायः वह अपने इस प्रकार के ग्रन्थों द्वारा विपक्षियों के विषय में भ्रास्ति पूर्ण 
प्रचार ही अधिक करते थे । ऐसी पक्षपात॒ पूर्ण स्थिति में उनके भ्रन्थों में कुछ प्रामाणिक 
सामग्री खोजना मृग-तुषणां के अतिरिक्त कुछ नहीं | फिर भी पात्रों के विषय में अधिक से 
अधिक प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक सामग्री जुटाने का प्रयत्व किया गया है। वास्तविकता 
यह है कि बिना मूल रासो का पता लगाए हुए, उसके पात्रों के विषय में भो अधिकार पूर्ण 
एवं प्रामाणिक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है । रासो में अत्यधिक क्षेपक होने के कारण 
घहुत से काल्पनिक नामों का भी समावेश हो गया है, जिसके कारण ऐतिहासिक पापों का 
विवरण भी विकृत होकर रह गया है। ऐस्वी विषम स्थिति से पात्रों का वास्तविक मूल्यॉकन 
फरना अत्यन्त कठिन है, फिर भी लेखक का यही प्रयत्न रहा है कि रासो के पात्रों का 
घास्तविक स्वरूप पाठकों के समक्ष रक्खा जा सके । 

इस प्रबन्ध लेखन-काल में अन्‍य अनेक महानुभावों से समय-समय पर वहुमूल्य चुझाव 


ट्‌ 
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प्राप्त होते रहे, उन सभी के प्रति लेखक हृदय से आभार मानता है। सर्व प्रथम लेखक 
हनदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के रीडर तथा हिन्दी विभाग, ब्रेंडोद। विश्वविद्यालय 
के अध्यक्ष स्वर्गीय ड्रॉ० विपिनविहारी त्रिवेदी के प्रति अपनी हादिक कृतज्ञता प्रकट करता 
है, जिनके स्नेह पूर्ण पथ प्रदर्शन एवं सतत प्रोत्साहन से ही यह काय॑ पूर्ण हो सका। प्रस्तुत 
कृति में प्रकाशित पृथ्वीराज चौहान तथा चन्दवरदायी के चित्र लेखक को उन्हों से प्राप्त 
हुए थे । इसके अतिरिक्त वह सर्व क्षी मुनिराज जिनविजय डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ० दशरथ 
शर्मा, डॉ० माताप्रसादगुप्त, डॉ० केसरीनारायण शुक्ल अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, लखनऊ 
विश्वविद्यालय, डॉ० भगी रथ मिश्र तथा डॉ० सरयूप्रसाद अग्रवाल का भी क्वनन्न हैँ, जिन्होंने 
अपने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सुन्नावों से प्रस्तुत प्रवन्ध को अधिकाधिक सारगर्भित बनाने में हाथ 
बटाया हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ० 
दीनदयालु जी गुप्त का लेखक हृदय से ऋणी हैं, जिनकी सदभावना उसे सर्देव उपलब्ध रही 
हैं। मैं अपने अग्नज एवं सहयोगी डॉ० प्रेमनारायण टण्डन तथा डॉ प्रभाकर शुक्ल का भी 
अत्यन्त आभारी हो जिन्‍्होंने प्रवन्ध के प्रकाशन में पग्-पग पर प्रेरणा तथा सभी प्रकार की 
सहायता एवं सुविधा प्रदान की हूँ । 


“ऊेण्णचन्द्र अग्रवाल 


उ०्स० 

उ० 

ए० बी० ओ० भआर० आई० 
गौ० ही० औ० 

छं० 

ज० आर० ए० एस० बी० बी० 
जें० आर० ए० एस० एल० 
जें० आर० ए० एस० बी० 
डॉं० 

घा० 

ना० प्र० प्‌० 

त्ा० पभ्र० स० 

ता» श्र० सं० 

प्‌ृ० 

प्‌० रा० 

मण० मर 

रा० ए० सो० ल० 

स० 

स० सं० उ० 


संक्षिप्त रूप 


उदयपुर संस्करण । 

उदाहरणार्े ॥ 

एनल्स आव दि भंडारकर भोरियंटल रिसच इंस्टिट्यूट। 
गौरीशंकर हीराचन्द ओझा । 

छ्न्द । 

जनेल आव दि रायल एश्यरिटिक सोसाइटी वाम्वे प्रांच । 
जनंल आव दि रायल एशियाटिक सोसाइटी लंदन । 
जनेल आव दि रायल एशियाटिक सोसाइटी बंगाल ॥ 
डॉक्टर 

घारणोज । 

नागरी प्रचारिणी पत्रिका । 

नागरी प्रचारिणी सभा । 

नागरी प्रचारिणी संस्करण । 

पृष्ठ 

पृथ्वी राज रासो । 

महामहो पाध्याय । 

रायल एशियाटिक सोसाइटी लन्दन। 

समय । 


--- साहित्य संस्थान उदयपुर । 





ध 


५ 
राजपूत : शब्द तथा इतिहास 


राजपूताने में यों तो अनेक छोटी-बड़ी जातियाँ हैं किन्तु जो स्थान वहाँ राजपूतों को 
प्राप्त है वह अन्य को नहीं । राजपूत 'शासक' जाति है। प्रमादवरश चाहे कोई इन्हें हृण, तुर्क, 
यूनानी, शक्र आदि अनारयों की-जिन्होंने भारतवर्ष में आकर हिन्दू धर्म तथा सभ्यता को ग्रहण 
कर लिया था-सन्तान लिख दें, किन्तु यह शुद्ध आये नस्ल के प्राचीन क्षत्रियों के ही वंशज हैं । 
प्राचीन काल में इस जाति का प्रभृत्व न केवल उत्तर भारत में, अपितु दक्षिण भारत में भी 
था, किन्तु अब इनकी प्रधानता केवल राजपूताने में ही रह गई है । 


'राजपूत' शब्द एक जाति या वर्ण-विशेष के लिए मुसलमानों के इस देश में आने के 
उपरान्त प्रचलित हुआ है। यह शब्द संस्कृत के 'राजपुन्र! का अपभ्रश रूप है। आदि काल 
में 'राजपुत्र' शब्द किसी जाति विशेष के लिए प्रयुक्त नहीं होता था, अपितु यह शब्द क्षत्रिय 
राजकुमारों अथवा राजवंशियों का सूचक था | इसका एक मान्न कारण यह था कि आादि काल 
से ही भारतवषं क्षत्रियों के आधीन था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र”! कालिदास फे काव्य भर 
नाटकों", अश्वंघोष के ग्रन्थों, महाकवि वाणभट्ट के प्रसिद्ध ग्रन्ध 'हपंचरित' तथा 'कादम्बरी" 


१. जन्मप्रभृति राजपुत्नानृक्षेत्‌ कर्कटफसघर्माणोहिजनकर्मक्षा: राजपुत्रा: । 

-अर्थंशास्त्र पृ० ३२ । 

राजसूयदी क्षितेन मया राजपुत्रशतपरियृ्‌ त वसुमित्र॑ ग्रोप्तारमादिश्य । 

>मालविकास्तिमिन्न अंक ४, १० १०४ । 

३. अथ तेजस्विसदन तपः क्षेत्रं तमाश्रयम्‌ । 

केचिदिक्वाकर्दी जग्भू राजपुत्रा विवत्सव: ॥८॥  --सौन्दरानन्द काव्य, सर्ग १॥ 

४.  केसरिकिशोरकेरिव विक्रमंकरसेरपि विनयव्यवहारिपिरात्मन: प्रति- 

बिम्बरिव राजपुत्रो: सह रसमाणः प्रथमे वयसि सुखमतिचिंरमुवारू । 

“-फादम्बरो, पू० १४-१५। 


रे 


[२ ] 


० 


बादि पुस्तकों एवं प्राचीन शिलालेखों' तथा दानपत्रों' में राजकुमारों और राजधराने के अन्य 
व्यक्तियों के लिए 'राजपुत्र' शब्द का प्रयोग हुआ है । चीमी यात्री ह्व नसांग ने वि० सं० ६८६ 
से ७०२ (६२९-६४५ ई०) तक भ।रतवर्प का भ्रमण किया तथा अपनी यात्रा का विस्तृत वर्णन 
लिखा । उस वर्णन में तत्कालीन युग के भूगोल, इतिहास, धर्म, रहन-सहन आदि का बड़ा 
ही महत्वपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया गया है। अपने ग्रन्थ में उसने कई स्थानों पर राजाओं का 
तामोल्लेख कर उनको क्षत्रिय' ही लिखा है और राजपूत' शब्द का प्रयोग कहीं भी नहीं किया । 
अतः स्पष्ट है कि छू नसांग के समय तक क्षत्रियों को राजपुत कहने का प्रचार न हुआ था। 
मुसलमानों के शासनकाल में क्षत्रियों के राज्य क्रशः तिरोहित होते गए तथा बचे खुचों को 
उनकी आधीनता स्वीकार करनी पड़ी अर्थात्‌ वह स्वतत्र राजा न रह कर मुसलमानों के 
सामन्‍्त बन गए । ऐसे अवसर पर राजवंशी होने के कारण उनके लिए “राजपूत! शब्द का 
प्रयोग होने लगा । कालान्तर में शरनेः शर्ने: यदहो शब्द जातिसूचक बन कर जन साधारण 
में प्रचार पा गया । 


क्षत्रिय वर्ण भारतवर्ष पर वैदिक काल से शासन कर रहा था और आर्यों की वर्ण 
व्यवस्था के अनुसार प्रजा का रक्षण करना, दान देना, यज्ञ करना, बेदादि शास्त्रों का अध्ययन 
करना तथा विपयासक्ति में न पड़ना आदि क्षत्रियों के मुख्य धर्म माने जाते थे ।' मुसलमानों 
के भारत में आने के उपरान्त से यही क्षत्रिय जाति 'राजपूत” कहलाने लगी । 


राजपूत सुडौल, कद्दावर तथा पौरुपवान होते हैं । इनमें दाढ़ी रखने का भाम रिवाज 
है। प्रायः यह सीधे-सादे तथा मिलनसार प्रवृत्ति के हुआ करते हैं। राजपूत अपनी स्त्री का 
बड़ा सम्मान करते हैं। वह अपनी मर्यादा के लिए हर समय अपनी जान हथेली पर रक्खे 
रहते हैं । राजपू््तों के अपने देश, जाति तथा मान-मर्यादा की रक्षा करने के लिए कंसरिया 





« मालिमाप्प्रभुतिग्रामेषु संतिष्ठमानश्री प्रतीहारवशीय सब्वेराजपुर्न॑श्त 
“-आदबू पर तेजपाल के मंदिर का वि० सं० १२८७ का शिलालेख, एु० इ० जि० ८+ 
पु० २२२ । 


न्ग0 


२. सब्यनिव राजराजनकराजपुत्रराजामसात्यसेनापति । 
नलाखिमपुर से मिला हुआ राजा: घर्ंपाल का दानपत्र, ए० इ० जि०८, पृ० २४९। 
३. द्लनत्सांग ने महाराष्ट्र के राजा पुलकेशी वलमभी के राजा प्ू चपट ( प्र वभट ) आदि 
कई राजाओं को क्षत्रिय हो लिखा है। वि० बु० रे० चे० व० जि० २, पृ० ६४५६-६७ । 
४. “पृय्वीराज रासो' में रजपुत (राजपुत) शब्द मिलता है- 
लग्गो सुजाय रजपुूत्त सीस । घायो सुतेग करि फरियरीस | 
पृ० रा०, पृ० २५०८७, नागरी प्रचारिणी सभा काशी ! 
५. प्रजानां रक्षणं दानमिन्याष्ययनमेव लव । ह 
विषयेष्वप्रसक्तितश्च क्षत्रियत्य समासत्ः ॥ मनुस्मृति ११०९ ॥॥ 


६. के ४ | 


वाना घ रण कर शात्नर्‌ू के साथ मर मिटने के अनेक उदाहरण प्रसिद्ध हैं। इस वीरोचित 
भाव को देखकर ही वीर कवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने वीर सतसई में लिखा है-- 


हूं बलिहारी रानियां जाया वंश छत्ोस । 
सेर सलूनो चुन ले, मोल समप्प॑ं सीस ॥ १०० ॥॥ 


अर्थात्‌ हे राजपूत क्षन्नाणियों ) तुम घन्‍्य हो जिनकी कोख से यह ३६ वंश उत्पन्न 
हुए हैं । जो वीर सुधुत्र सेर भर आठा लेकर अर्थात्‌ उदर पालनार्थ अत्यन्त अल्प वेतन लेकर 
भो अपना सब्र कुछ समर्पण करन को सदा तत्पर रहते हैं तथा रणक्षेत्र में सदा अपना सिर 
हथेली पर रक्‍्खे रहते हैं । 


प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड ने राजपूत जाति का चित्रण करते हुए लिखा है-- 
महान शूरता, देशभक्ति, स्वामिधमं, प्रतिष्ठा, अतिथि सत्कार तथा सरलता, यह गुण सर्वाश 
में राजपुतों में प्राप्त होते हैं!" । 

यही नहों, प्रसिद्ध मुगल सम्राट अकवर के प्रधान मंत्री मौलवी बबुलफ़ज्ल ने भी 
राजपूरों को अशसा इस प्रकार की है-विपात्तिकाल में राजपूतों का असली चरित्र जाज्वल्य- 
सान प्रकाोशत होता है | राजपूत सेनिक रणक्षेत्र से भागना जानते ही नहीं हैं, वल्कि जब भी 
युद्ध की दशा सन्देहजनक हो जाती है तब वे लोग अपने घोड़ों से उतर जाते हैं और शूर- 
वरत के साथ अपन प्राण न्यौछावर कर देते हैं । 


अंग्रेजी यात्री वरनियर भी अपनी 'भारत यात्रा! पुस्तक में लिखता है कि राजपूत. 
लोग जब युद्ध क्षत्र में जाते हैं तव भापस में गले मिलते हैं गोया उन्होंने मरने का पूरा निश्चय 
कर लिया है। स्पार्टा देश (योरप) के वीर लोग भी ऐसे अवसरों पर अपने वाल सुलझ्ाते 
थे । इसी प्रकार राजपूत लोग केसरिया कसूमल वाना पहिनते थे । ऐसं। वीरता के उदाहरण 
ससार की अन्य जातियों में कहाँ पाये जाते हैं! किस देश और जाति ने.इस अकार को 
सभ्यता, साहस और अपने पूर्वजों के रिवाजों को इतनी शताब्दियों तक अनेक संकट सहते 
हुए कायम रखा है ।* 


राजपूतों की वीरता से प्रभावित होकर विदेशियों ने भी उनकी प्रशसा की ओर 
भारतीय काव्यों में भी इनकी वीरता का मुक्तकंठ से गान किया गया है-रासो ऐसा ही काव्य 
है-मुख्यतः रासो युद्ध-प्रधान कण्ठप होने के कारण इसमें उस समय की आदडें वीरता का 
चित्रण मिलता है। डॉ० विपिनविहारी त्रिवेदी ने भी इनकी वीरता से प्रभावित होकर लिखा 
है-क्ष।त्र धर्म और स्वामि-धर्म निरूपण करने वाले इस काव्य में तेजस्वी क्षत्रिय वीरों के 
युद्धोत्वाह तथा तुमुल नाद और वेजोड़ युद्ध दर्शनीय है । असार-संसार यश की श्रेप्ठता और 





.. नह ००ण०९९, 9०प्रंणांशा, ॥0एथे६9, ध०्मणण, वष्णूअंफ्ा।ए ग्यत अंग्रजॉति0 
276 चुष्धांप९5 एटा ग्रए५ 2००४ 76 एणा०्टवै८ए ६० पीला. 
--रिशुुं४87 9. 78. 


(5 ३ 2] 


प्रघानता को दृध्टिगत करके उसकी प्राप्ति स्वामि-धर्म पालन में निहित की गई है। स्वामि- 

धर्म की अनुवतिता का बर्थ है प्रतिपक्षी से युद्ध में तिल-तिल करके कट जाना, परन्तु मुह न 

मोड़ना । इस प्रकार स्वामि-घधर्म में शरीर नष्ट होने की वात को भौण रूप देकर यश सिरमौर 

कर दिया गया है; भौर भी एक महान प्रलोभन तथा इस संसार और सांसारिक वस्तुओं से 

भी अधिक आकर्षक मित्र-लोक वास तथा अनन्य सुन्दरी - अप्सराओं की प्राप्ति हे । धर्मभीर 

ओर त्यागी योद्धा के लिए शिव की मुण्डमाला में उसका सिर पोहे जाने तथा तुरन्त मुवित 

प्राप्ति आदि की व्यवस्था है ।/? पृथ्वीराज रासो इसी प्रकार की भावनामों से ओत-प्रोत है । 

एक स्थान पर डॉ० त्रिवेदी वीरों के अनुशासन तथा स्वामि-धर्मं के विपय में लिखते है कि ह 
'उस युग की वीरता का यह आदर्श कि स्वामि-ध्रमं ही प्रधान है, कोरा आदर्श मात्र न था। 

उसका संस्थापन सेना की सामूहिक दृढ़ता गौर स्थायित्व तथा विशेषरूप से उसकी युद्धोचित 

प्रवृत्ति की जागरूकता को ध्यान में रखते हुए अति आवश्यक अनुशासन (0:८[!7८) 

को लेकर हुआ था । अनुशासन ही सेना और युद्ध की प्रथम आवश्यकता है। आदि काल से 

लेकर आज तक सेना मे अनुशासन की दृढ़ता रखने के लिए नाना प्रकार के नियमों का 

विघान पाया जाता है । यहाँ आज्ञाकारिता को दासता से जोड़ना ठीक नहीं है क्योंकि उस 

युग में किराए के टट॒टुओनों (/८८८४०77८5) से भारतीय सम्राटों की सेनाए नहीं सजाई 

जाती थीं | युद्ध क्षत्रियों का व्यवसाय था और स्वामि-धम्म हेतु प्राणोत्सर्ग करना उनका कतंव्य 

था । यहाँ दासता ओर घन के लोभ का प्रश्व उठाना तत्कालीन वीरयुग की भावना को 

समझने में भूल करना है । सम्राट या सेनापति की आज्ञापालन के अनुशासन को चिरस्थायी 
भौर ब्रतस्वरूप बनाने के लिए स्वामि-धर्म का इतना उत्कट प्रचार किया गया था कि वह 
सामान्य सैनिकों की नसों में कूट-कूट कर भर गया था गौर इसी भादर्श की रक्षा में उनके 
कट मरने का कार्य दुहाई दे रहा है | दार्शनिक जामा पहने हुए स्वामि-धर्म योद्धा का परम 
माभूपण बा ।* 


इस प्रकार के वातावरण में पल्ते हुए वीर क्षत्रियों की वृत्ति असार-संसार में यश को 
अमरता तथा स्वामि-धर्म के प्रति सजग हो जाती होगी तभी तो इन योद्धाओों के लिए युद्ध 
अनिवंचनीय आनंद के क्षण उपस्थित करदा है । युद्ध-क्षेत्र में तिल-त्तिल कर-मर मिटने वाले 
क्षत्रियों के उद्गार कितने प्रभावशाली हैं, साथ ही इनके वीरोचित उत्साह को देखकर हैरान 
होना पड़ता है- 


(१९). मरना जाना हवक हैं। जुग्ग रहेगो गल्हां। 
सा पुरुसाँ का जीवन थोड़ाई है' भक्लां ॥ 





१. रेवातट, भूमिका भाग, पु० २० ४ 
२. वही, पुृ० २०-२१॥ 


[ * ] 


(२) जाणणी जणण न बार वार थिर रहे न काया | 
सापुरसां का जीवणा थोड़ा ही फुरभाया ॥ 
(३)  जीविते सभ्यते लक्ष्मी मृते चापि सुरांगणा। 
-क्षणे विध्चंसिनी काया का चिन्ता मरणे रणें ॥ 
(४). जीवंतह की रति सुलभ । मरन अपच्छर हूर । 
दो हथान लड्डू उमले | न्याय करें वर सूर ॥ 
करीब ७०० वर्षों से उत्तरीय भारत को जनता का कण्ठहार जगनिक विरचित 'बाल्हा 
खण्ड' भी ऐसी ही भावनाओं से ओतप्रोत है। 


उस समय के राजपूत योद्धा जैसे वीर थे वैसी ही धीरता से परिपूर्ण उनकी पत्नियाँ, 
माताएं, बहनें तथा वेटियाँ भी थीं। अपभ्र श-साहित्य ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है । यदि 
शत्रु की सेना परास्त हो गई है तो निश्चय ही उसके पति के द्वारा और यदि पति फी सेना 
भग्न हुई है तो निश्चय ही मेरा पत्ति युद्ध भूमि में मारा गया है । कितना दृढ़ विश्वास है 
उसे अपने पति की घीरता पर-- 
जप्द भग्गा पारबकड़ा तो सहि मज्मु पिएण । 
महु भग्गा अम्हहं . तणा तो तें मारिअडेण ॥* 
और भी, पीररागना को अपने पति फी मृत्यु पर शोक के स्थान पर हर्ष अधिक होता 
है । वह अपनी प्रिय सखी से कहती है कि-हे बहिन ! अच्छा हुआ, थदि मेरा पत्ति युद्ध भूमि 
सें मारा गया। यदि वह भागा हुआ घर पर आता तो मैं समवयस्काओं ( सखियों ) 
में लजाती-- 
भलला हुआ जु मारिआ बहिणि महारा कंतु । 
लज्जेज्जतु वयंसिअहु जद भग्गा घर एतु।' 
रमणियाँ कायर पति को युद्ध-भूमि से भागने पर मरा हुआ ही -समझती हैं । उनके 
जीवित रहने पर भी श्वगार भहीं करतों, विधवाओं का वेप घारण किए रहती हैं। एक 
चीरांगना, मनिहारी से जो उसे चूड़ियाँ पहनाने भाई है, फहती है-हे सखि सनिहारिन * चली 
जा, फिर इस मकान पर त आता । पति मरे हुए घर आआा गए हैं (युद्ध से भाग कर आना .. 
मरण तुल्य है) फिर मुझ जैसी विधवाओं के -लिए श गार कंसा-- 
सणिहारी जा री सद्यी ,,अब न - हवेली: आवब । 
पीव मुवा घर आबिया , विधवा किसा बर्ताव ॥' 


१. हेमचन्द्र, सिद्ध हेमशब्दासुशात्तनम्‌, ११४। 
२. वही, ९२ 
३... वियोगी हरि, वीर सतसई, ८ ॥ 


[ & . ] 


और भी-उस पुत्र की उत्पत्ति से क्या लाभ तथा मृत्यु से क्‍या हानि जिसके पिता की 
भूमि दूसरे से आक्रान्त हो अर्थात्‌ दूसरे द्वारा अपहरण कर ली गई हो-यह है उस समय की 
वीर माता की उक्तियाँ- करे 
पुत्ते जाएं कवणु गुण अवगुणु कवणु मुएण । 
जा बप्पी की मुहंडी चम्पिज्जद अवरेण ॥" 
इसी प्रकार की उक्ति राजस्थानी कवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने भी प्रस्तुत की है । वीर 
माता अपने कायर पुत्र को रणभूमि से भागा हुआ देखकर उसे सम्बोधित करते हुए कहती है- 
हां पुत्र ! आयु क्षीण कराने वाला स्तन पान कराके जब महाकष्ट से तेरा पालन-पोषण 
किया था तब मैंने यह नहीं जाना था कि तू अपनी जननी का दूध लजा कर आ खड़ा होगा । 
पूत महा दुख पालियो बय खोबण थन पाय 
एम न जाएयो आवही, जायण दूध लजाय ॥* 
इसी प्रकार के विचार महाकवि भत हरि ने अपने “वेराग्य शतक' तथा श्री वियोगी 
हरि जी ने वीर सतसई में व्यक्त किए हैं यहाँ पर उन्हें क्रमशः उद्धुत किया जाता है-- 
मा: तु केवलमेवयोवनवनच्छेदे कुठारा वयम्‌। 
कह्यौमाय. भुख चूमिक कर गहाय करवाल । 
जनि लजवयों बृध मो परयोधरनु कौ लाल । 
जणणी जणे कपुत मत, चंगो जोंवन खोय । 
जण तू बेर विहड़णों, के कुलमडंण होय ।॥' 
उसी युग की रमणियाँ ही गोरी से वर मांग सकती हैं कि इस जन्म में तथा अन्य जस्मों 
में भी हमें ऐसा पति देना जो अंकुशों द्वारा व्यक्त मदांध हाथियों से हँसता हुआ भिड़ जावे- 
मार्याह जार्माह अन्नहिं वि गीरि सु दिज्जहि कनन्‍्तु । 
गय मत्तहें चत्तद्ू सहूं जो अब्मिडई  हसन्तु ।* 
और भी, युद्ध-मदिरा में झूमता हुआ वीर क्षत्रिय योद्धा उस प्रिय देश को जाना चाहता 
है जहाँ खड़्ग के खरीदार हैं, रण के दुर्भिक्ष ने उसे भग्न कर रक्‍्खा है और बिना जूझे हुए 
वह रह नहीं सकता- 


खग्ग विसाहिड जहि लहहु पिय तहि देसहि जाहूं॥ 
रण दुबव्भिकर्खे भग्गाइ . विणु जुज्में न बलाहुं ॥ 
१. हेमचन्द्र, सिद्धहेमशब्दानुशासन, १२९ । 
वियोगी हरि, घीर सतसतई, ११५१ 
३. बही; छं० ८७ । ह 
४. हेमचन्द्र, सिद्धहेमशब्दातुशासन; रेघरे । 
४. बही; र२८६॥ 


(8:- 


अंत में डा० तिवेदी के शैब्दों में 'जाति गौरव के लिए निजी हित्त-अहित की अवमानना 
फरने वाले, भारतीय मान-मर्यादा के रक्षक, हिन्दू-शासन का आदशे रूप से पालन करने वाले, 
प्राचीन संस्कृति के पोषक राजपूत योद्धाओं ने शत्रुओं को पीठ नहीं दिखाई, जातीय सम्मान 
के लिए प्राण होम दिए, वचन का निर्वाह किया, सब कुछ उत्सर्ग करके शरणागत की रक्षा 
की, निशशस्त्र, आहत, निरीह और पलायन करने वाले शत्रु पर हाथ नहीं उठाया, धोखा नहीं 
दिया, प्रतारणा नहों की, झूठ वहीं बोले, विश्वासधात नहीं किया, और युद्ध में स्प्री-बच्चों 
पर हाथ नहीं उठाया । वे-मिट गए, उन्तके विशाल सःम्राज्य घ्वस्त हो गए परन्तु राजपूती 
आन, बान और शान भारतीय इतिहास में सदा के लिए स्वर्णाक्षरों में लिख गई ।' 


शजपूर्तों के ३६ वंश तथा उनका इतिहास 


राजपूर्तों के चार वंश त्तथा मनेक राजकुल अथव, राजवंश मिलते हैं, किन्तु मुख्य 
राजकुल (८७०) १६ ही हैं जो प्रायः राजपूताने म पाए जाते हूँ। कवि चंद वरदाई 
विरचित “पृथ्वीराज रासो” सें श्री हमें ३६ राजकुल होने की सूचना श्राप्त होती है- 


रवि ससि जादवबंश, ककुथ परमार स्‌ तोमर । 
चाहुधान चालकुक, छंव सीलार अभीवर ॥ 
दोय मंत्त (दोपंभत) मकचान, गरुम गोहिल गोहिलपुत 9 
चापोरफटत परिहार, राव राठोर रोसजुत॥। 
देवरा टांक सैधब अनिर्ग (अनग ) यौतिक प्रतिहार दधिपट्‌ 
कारदुपाल कोटपाल हुब | हरितट गोर कला (मा) ष भट ॥ 
घत्य (घान्य) पालक निकुंभचर। राजपाल कवि मोस ॥ 
फालच्छुरक॑ आदि दे । बरते वंश छत्तीत ॥* 


घिक्रम सभ्वर्त की १९ वीं शताछ्दो में काश्मीरी पं० कल्हण ने राजतरंगिणी नामक 
पफ्ाश्मीर फा इत्तिहास' लिखा था । उसके ७वें त्तरंग से एक इलोक से ज्ञात होता है कि उस 
समय भी क्षत्रिथों के ३६ कुल सभझे जाते थे ।' आज भी राजपूताने में राजवंशों के विषय 
में एक प्राचीन लोकोक्सि प्रचलित है फि+ 


दस रंवियों दस चन्द फो द्वादंस ऋषि प्रमांणें । 
चार हुतासन से भये वंश छंत्तीस बखान ॥ 





१. रेबातद, भुमिका भाग॑ १० रे३। 
२. पथ्वीराज रासो, सभा संस्करण, छं० । २७७ । रू० । परेश-रे रे 
३... प्रस्यापेयन्तः समृति षटठनिशति कुनेण्ये | 

ज्लेज ध्विनों भास्वतोषि सहस्ते नोधकेः शिशितियः ॥१६%७॥ 


[ ८5 ] 

किन्तु समस्या तव उत्पन्त होती है जब इतिहास में विभिन्न स्थानों पर एक ही वंश 
के सूर्य, चन्द्र अथवा अग्नि स्ले उत्पन्न होने की कथा मिलती हैं। संभवत: यह सब झमेला 
पौराणिक-कथाओं के अनुकरण के कारण ही उत्पन्न हुआ होगा ।. 

एक और. . वंशावली वि० सं० १९७० ( ई०सं० १९१३ ) में बंगाल एशियाटिक 
सोसाइटी के उपाध्यक्ष महापहोपाध्याय पं० हरप्रसाद शास्त्री को जोघपुर में मिली थी", | 
जो प्राय: एक शताब्दी पूर्व वघेलखण्ड में मिली हुई बताई जाती है | वंशावली इस प्रकार हैं- 

चन्द्रवंशी-- (१) यादव । (२) गौड़ | (३) कावा। (४) कौरव (चंदेल) | (५) 
भाटी । (६) केवरा | (७) तंवर | (८) सोरठा। (९) कटारिया | (१०) सोमवंशी । 

ऋषिवंशी-(१) सेंगर । (२) गौतम | (३) विसेन । (४) चमर गौड़ । (५) 
ब्रह्मनगौड़ | (६) मट गौड़। (७) राजगौड़ । (८) दीन दीक्षित । (९) दीक्षित । (१०) 
विलकेता। (११) विलखरिया । (१२) कनपुंरिया। 

यज्ञवंशी (अग्निवंशी)-(१) पड़िहार । (२) सोलंकी । (३) प्रमार । (४) चौहान । 

सूर्यवंशी--(१) गोहिल (सिसोदिया)। (२) सिकरवार। (३) गड़गूजर । (४) कछवाह। 
(५) बनाफर | (६) गहरवार (राठोड़, वर डेल, वुन्देल) । (७) व्घेल (5५) सरनेत । (९) 
निकुंभ। (१०) छीड़ो | 

आजमगढ़ के स्वर्गीय राजा रणजोरसिह विरचित "क्षत्रकुल वंशावली' में ३६ राज- 
वंशों का उल्लेख निम्न प्रकार से किया गया है- | 

सुयंबंशी-- (१) सूर्यवंशी । (२) रघुवशी । (३) दागी । (४) कछवाहा। (५) 
चड़गूजर । (६) सरस्वार । (७) दिखत । (5) सिरनेत । (९) सीसादिया | (१०) गृहंवार 
(वर्देला) । (११) करछुली । (१२) वोदा। (१३) कन्नोजिया । (१४) विलकंत | (१५/ 
चंवरगौर । (१६) राठौर | ह 


चंद्रवंशी--(१) गहरवार (बुन्देलों से भिन्न)। (२) चन्देल | (३) सोमवशी । (४ तौर । 
नागवंशी-(१) पायक । (२) वेस । 

ऋषिवंश्षी-(१) गौतम । (२) सेंगर । (३) विसेन | 

अग्निवंशी-(१) चोहान । (२) सुलंकी । (३) नाहर । (३) व्घेल। (५) गुहोलत । 


(६) नदवान । (७) खागर। (८) परहार । (९) पमार । (१०) खडेत । (११) भदौरी | 
राजा रणजोर सिंह ने एक छठवाँ वंश असुर (दैत्य) वंश माना है-- 


देत्यवंशो-(१) निकुंभ । (२) निवार | (३) कटोच । (४) कटियार । (१) अमेठिया । 
(६) काठो। (७) जेठवा | (5) ठोठ। (९) सिकरवार | (१०) दहिमा। (११) मोहिल | 





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[ ६ |] 


३६ राजवंशों की पाचवीं तालिका हेमचन्द्र कृत कुमारपाल चरित (सं० १२१७ वि० ) 
में दी हुई है-(१) इक्ष्वाकु । (२) सोम । (३) यदु । (४) परमार। (५) चौहान। (६) 
चालुक्य । (७) छिन्दक । (८5) सिलार (राजतिलक) । (९) चापोटकट । (१०) प्रतिहार 
(११) करक । (१२) कूरपाल (कूपंट) | (१३) चन्देल। (१४) मोहिल | (१५) पौलिक । 
(१६) मोदी । (१७) धान्यपालक । (१८) दहिमा । (१९) तुरुन्दलीक । (२०) निकुम्प । 
(२१) हुण | (२२) हरियड़ | (२३) मोरवर । (२४) पौरवर । (२५) सूर्य |(२६) सँधव । 
(२७) चदुक | (२८) राट। (२९) शक । (३०) करट। (३१) पाल। (३२) वाउल। 
(३२) चदुयाणक | (३४) अभंग । (३५) नठट (जट) । (३६) राज्यपालक । 


छठ्वीं वंशावली, कनेल टॉड कृत राजस्थान” ( प्रथम भाग ) में मिलती है। उसमें 
३६ राजवशों' का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-(१) सूर्य । (२) चन्द्र । (३) गहलोत । (४) यदु । 
(५) तवर । (६) राठोर | (७) कछवाहा । (5) पंवार। (९) चौहान । (१०) सोलंकी । 
(११) परिहार | (१२) चाबवड़ा । (१३ टांक । (१४) जाट । (१५) हुण । (१६) काठी । 
(१७) वलल्‍ला। (१८) झाला। (१९) जेंठण । (२०) गोहिल । (२१) सरवेगा। (२२) 
सिलार । (२३) डाभी । (२४) गौड़ । (२५) डोड | (२६) गहरवार | (२७) बड़गूजर । (२८) 
सेंगर । (२९) सिकरवार । (३०) वैंस । (३१) दहिमा | (३२) जोहिया । (३३) मोहिल । 
(३४) निकुम्भ ॥ (३५) राजपाली । (३६) दाहिमा। इनके अतिरिक्त (३७) हुल तथा 
(३२८) डाहरिया । 

प्रसिद्ध इतिहासकार श्री जगदीशासह गहलोत क्षत्रियों के ३६ राजवंशों के विपय में 
अपना मत इस प्रकार निर्धारित करते है--'तुलना गौर खोज करते हुए पूर्व व पश्चिम के 
३६ राजवंशों का समावेश किया है। जिसका आधार पुरानी पुस्तकें व वयोवृद्ध जानकर 
लोग और दन्त कथाएं हैं। इन ३६ राजवशों के सिवाय अन्य भी कई राजवंश हुए होंगे 
परन्तु क्योंकि इससे अधिक संख्या लोक प्रसिद्ध नहीं है। इसलिए हम भी छत्तीस संख्या 
परिमित रखते हैं। हमारी सम्मति में वास्तव में नामावली इस प्रकार होनी चाहिए-- 


सुयंबशी-(१) गहलौत । (२) कछवाहा । (३) राठोड़ । (४) बड़गूजर । (५) 
निक्रुम्थ । (६). केठेरिया काठी । (७) मौर्यवस । (८५) जोहिया । 

चन्द्रवंशी - (१) यादव । (२) गौड़ । (३) तंवर । (४) नागवशी । (५) झाला। (६) 
कलचुरी ( हैहय वंशी ) । (७) मौखरी (गुप्तवंशी ) । (८5) कटोच । (९) पलवार । 
(१०) अग्निवशी । (११) परमार । (१२) चौहान । (१३) सोलकी । (१४) पडिहार | 


ऋषिवशी--(१) पडिहारिया ( देवल आदि ) । (२) सेंगर । (३) दाहिमा। 
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छ]067 & ००, 65, (४०४7॥. 829, 7,07609- 


[ १०] 


(४) गौतम । (५) उदयनिया। (६) वाण | (७) पल्‍लव । (८) गर्ग । (९) दईया। (१०) 
भुगवंशी | (११) जेठवा । (१२) कदम्व 


इतना ही नहीं लोकोक्तियों में भी राजपूतरों के ३६ वंश ही प्रचलित हैं। वीर रसावतार 
महाकवि सूर्यमल मिश्रंग विरचित 'बीर संतसई' के निम्न छन्‍्द से भी राजपूतों के ३६ वंश' 
होना ही प्रकठ होता है । 


हूँ वलिहारी राणियाँ जाया वंस छतीस | 
चून सलूणों सेर ले, मोल समप्ये सीस ॥१००। 
वीर सतसई के सम्पादक त्रय ने अपनी टिप्पणी में ३६ वंश इस प्रकार गिमाएं हैं ।* 
(१) झाला । (२) हाला । (३) ऊभंट । (४) बाघेला । (५) सरवहिया | (६) 
सोलंकी । (७) मौलिह। (5) मांगलिया। (९) राठौड़ | (१०) चावड़ा | (११) दहया। 
डावी । (१३) बला । (१४) गौड़ । (१५) सीसोदिया। १६) टाक। (१७) चाहिल ! 
(१८) चाचिक | (१९) पहिहार । (२०) वालेसा । (२१) दाहिमां। (२२) सोनगरा । (२३) 
वारड़ । (२४) खींचीं। (२५) वरड़ा। (२६) बीरूपा । (२७) कछवाहा। (२८) हाड़ा । 
(२९) देवड़ा | (३०) जाडेचा । (३१) परमार | (३२) सिकरवाल। (३३) भादी । (३४) 
काठी । (३५) तोमर भौर | (३६) चंन्देल । 


विभिन्‍न ग्रन्थों के आधार पर हमने राजवंशों कौ गिनाने का प्रयत्न किया है । उपयु क्त 
समस्त ३६ वंशों का इतिहास का वर्णन करना यहाँ पर अप्रासंगिक होगा, अ्रतः प्रमुख वशों 
का ही विस्तृत विवरण नीचे दिया जा रहा है । 
चोहान-'पृथ्वीराज रासो' में लिखा है कि' अर्वुदगिरी पर अनेक ऋषियों को यज्ञ करते 
देखकर' राक्षसों ने नाना प्रकार के उपद्रव करना प्रारंभ कर दिया, यह देखकर सब मुनिगण 
वशिष्ट जी के पास गए और उनसे राक्षसों का अन्त करने की प्रार्थना की' तब ग्रुढ-वशिप्ट ने 
ध्यान लगाकर हवन किया, जिससे प्रतिहार, चालुवय तथा प्रमार क्रमश: ये तीन वीर पुरुष 
उत्पन्न हुए जिन्होंने राक्षसों से युद्ध किया :-- 
तव सु रिप्प॑ वाचिष्ट । कुण्ड रोचन रचि तामह। 
धरिय ध्याव जजि होम । मध्य वेदी सुर सामह ॥॥ 





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3925 8. 2. 

'घीर सतसई सम्पादक प्रौ० कन्हैयालाल सहगल, प्रो० पत्तराम गौड़ तथा ठा० ईश्वरदीन 
आशिया, पृ० ५६, बंगाल हिन्दी मंडल, ८, रायल एक्सचेंज प्लेस, कलकत्ता, प्रथम 
आवृत्ति, वि० सं० २००५। 

३. पु० रा० रा०, सप्ता संस्करण, सं० १, छ० २४४ | ४. वही, छं० २४४५-४७ 

५. बही, छ० २४८! 


र्‌ 


हर 


[ ११ ] 


तब प्रग्ट्योँ प्रतिहार। राज तिन ठौर सुधारिय । 
फुनि प्रगटयो चाुक्क। ब्रह्मचारी न्रत घारिय॥ 
पांचार प्रगट्या वीर वर। कह्यो रिष्प परमार घन। 
न्य पुरष जुद्ध कीनो अतुल । यह रष्पस पुहत तन ॥ २५०७" 
किन्तु इतने पर भी दानवों का उपद्रव शान्त न हुआ ।' उनका निरन्तर उपद्रव बढ़ता 
देखफर गुरुवर वश्चिष्ट ध्यान लगाकर फिर से यज्ञ कुण्ड की विधिवत रचना कर पुनः यज्ञ हेतु 
वंठ तथा उसके प्रभाव से देवताओं का अंश ग्रहण करने वाले, असुरों का विनाश करने वाले 
महाशक्तिशाली प्रुरुष को उत्पन्न करने का विचार फिया' तथा फिर ब्रह्मा की स्तुति करके 
मंत्रों के प्रभाव से अग्नि-कुंड से एक शक्तिशाली पुरुष उत्पन्न किया, जिसका शरीर ऊँचा, 
पुख रक्तवर्ण तथा जो चारों भुजाओों में खडग धारण किए हुए था, इसी कारण उसे चाहुबान 
(चतुर्वाहुमाण) कहा गया 
अनल कुंड किय अनलहू । सज्जि उपगार सार सुर॥ 
कसलासन आसनह्‌ । मंडि जग्योपवीत जुरि॥ 
चतुरानन स्तुत सद्ध । मंत्र उच्चारसार किया।॥। 
सुकरि फ्ंडल वारि। जुजित आह्वान थान किय ॥। 
जा जन्नि पानि श्रव आहुति जजि । सजि सु दुष्ट आह्वान करि ॥। 
उप्पज्यां अबल चहुबान तब । चच सु वाहु असि वाह घरि ॥२५४॥।' 
अग्नि से उत्पन्न हीने वाले चारों प्रतिहार, चालुक्य, परमार तथा चाहुवान वीरों ने 
मिलकर ऋषियों का यज्ञ निविष्त समाप्त कराया । 


कवि जोधराज कृत 'हम्मीर रासो" में भी पृथ्वीराज रासों से ही मिलती-जुलती कथा 
प्राप्त होती है। उसमें भी चाहुआनों की उत्पत्ति के विषय में लिखा है कि--'इधर सृक्टि के 
शासन कर्ता क्षत्रियों के समूह उन्मूलन हो जाने से जब परस्पर अन्याय आचरण के कारण 
प्रजा पीड़ित हो उठी तथा दैत्यों के उपद्रव से ऋषिगणों के यज्ञादि कर्मों में भी विध्न पड़ने 
लगा तब ऋषिगण संसार की रक्षा और उसके उचित शासन के निमित्त फिर क्षत्रियों के 
उत्तन्न करन की अभिलापा से यज्ञ करना विचार कर उर्वुदगिरि मर्थात्‌ भाबू पर्वत पर गए । 
बहाँ पर सब ऋषियों ने शिव की आराधना की । तब शिव ने भी वहाँ आकर मुनियों की 
प्रार्थना स्वीकार की और वे उक्त पर्वत पर अचल रूप से विराजमान हुए; अस्पु तब मुनिवरों 
ने भी सुन्दर वेदिका रचकर यज्ञकर्म आरम्भ किया। इस यज्ञ में दं पायन, वशिष्ट, लोम, 
दालिम, जैमिसी, हर्षन, धौम्य, भूगु, घटयोनि, कौशिक, वत्स, मुद्गल, उद्दालक, मातग, पुलह 





१. पु० रा० रा०, समा संस्करण, स० १, छ० २५०१ २. वही, छ० २५१। 

३. यही; छ० २५३। ४. वहो; छं० २५५१ 

५. कवि जाधोराज, हम्मीर रासो, छ० ५४-७०, सम्पादक श्याम सुन्दर दास, वी० ए०, 
काशी नागरी प्रचारिणी सभा, द्वितीय संस्करण, १९२९ | 


[ १२ | 


अश्रि, गौतम, गर्ग, सांडिल्य, भरद्वाज, जावालि, मारकंडेय, जरतकालं, ज.जुल्ये, पराशर, 
च्यवन और पिप्पलाद आदि मुनियों का समारोह हुआ था । इसके अतिरिक्त शिव और ब्रह्मा 
भी स्वयं वहां उपस्थित थे । इस प्रकार समुचित प्रकारे से जिस समय यज्ञ हो रहां था और 
वेदिका से उत्पन्न हुई अग्नि शिखाएं आकाश का स्पश कर रही थीं, उसी समय उस वेदिका 
में से चालुक्य, प्रमार और परिहार क्षत्रिय क्रम से उत्पन्न हुए। इन्होंने मुनिवरों की आज्ञा 
पाकर दैत्यों से युद्ध भी किया; किन्तु उन्हें परास्त करने में वे समर्थ न हो सके । तब ऋषियों 
ने उक्त यज्ञ स्थल को त्यागकर उसी पहाड़ पर नैकन दिशा में दूसरा अग्नि कुड निर्माण 
किया । इस बेर के यज्ञ में ब्रह्मा ने ब्रह्म, भुग मुनि ने होता, वश्िष्ट ने आचार्य, वंत्स नें 
ऋत्विक और परशुराम ने यजमान का कार्य संपाटन किया। निदान इस यज्ञ से जौ अग्नि 
के समान तेजवाला पुरुष उत्पन्न हुआ उत्तका नाम चहुवान जी हुआ, वयोंकि इनके चार वाह 
थे और प्रत्येक वाहु खडग, घनुप, शुल भौर चक्र इन चारों आयुधों को धारण किए हुए था । 
इस पुरुष ने ऋषियों के आशीर्वाद और निज कुल देवी आशापुरा के प्रसाद से सम्पूर्ण द॑त्याँ 
का वध कर ऋषि और देवताओं को प्रसन्न किया ।* 


वर्तमान काल में निर्दिष्ट चारों वर्ण के क्षत्रिय अपने को अरिनि वंशी ही मानते है । 
वाल्मीक रामायण के सर्ग ५४ तथा ५५ में लिखा है कि एक बार.विश्वाभित्र, आवू पव॑त 
पर निवास करने वाले वशिध्ट जी की गाय नदिनी को हर कर ले गए। इस पर वशिप्ट नें 
अग्नि कुंड से एक वीर पुरुप को प्रकट किया, जो शत्रु से युद्ध कर गाय छीन लाया | अग्नि” 
वंशियों की उत्पत्ति का मूल श्रोत सभवतः रामायण की यही कथा रही है । इस विपय में 
डॉ० दशरथ णर्मा का कथन युक्ति सगत प्रतीत होता है->'भाज से हजारों वध पूर्व जक 
शकादि की उत्पत्ति का समझना एथं समझाना आवश्यक हुआ तब वशिप्ट एवं कामघेनु की 
कंथा की कल्पना की आवश्यकता हुई । लगभग एक हजार वर्ष बाद जब पह्ुवादि भारतीय 
जन-समाज के अंग बन गए और परमारादि कई अन्य जातियों की उत्पत्ति को समझना 
आवश्यक हुआ तव इन जातियों के असली इतिहास को न जानते हुए कई कवियों ने उसी 
पुराने रामायण के कथानक पर परमारादि की उतत्ति कथा हम,रे पूर्वजों के सम्मुख रखी ।* 


म० म० पं० गौरीशंकर हीराच॑न्द ओझा के मतानुसार चौहान अग्निवंशी नहीं, वरन्‌ वें 
सूर्येवंशी थे । “राजपूर्ता को क्षत्रिय न॒ मानने वालों की एक दलील यह भी है कि राजपूतों 
में चोहान, सोलंकी, प्रतिहांर और परमार ये चार कुल अग्नि वंशी है और उनके मूलपुरुपों 
का आवबू पर वशिष्ट के अग्नि कुंडे से उत्पन्न होना वेतलाया जाता हैं । अग्नि से उत्पत्ति 
मानने का तात्पयं यही है कि वे क्षर््रिय नहीं थे, जिससे उनको अग्नि की साक्षी से संस्कार 
कर क्षत्रियों में मिला लिया । इसका उत्तर यह है कि इन चार राजवंशों को अग्निवंशी होना 





१. अग्नि वंशियों और पछुवादी की उत्पत्ति की कथा में समानता, राजस्थानी, माग-+ 
ह/ अंक २; पृ० ४५ ४ | 


५ छा आ २] 


फैल पृथ्वीराज रासो' में लिखा है, परन्तु उसके कर्ता को राजपूतों के प्राचीन इतिहास का 
कुछ भी ज्ञान न था, जिससे उसने मन माने झूठ सम्बत्‌ और बहुधा अप्रामाणिक घटनाएं उसमें 
भर दी हैं | ऐसे ही वह पुस्तक वि० सं० की १६वीं शत्ताव्दी के पूर्व की वनी हुई भी नहीं 
है। जो विद्वान 'ृथ्बीराज रासो' को सम्राट पृथ्वीराज के समय का वना हुआ मानते हैं 
उनमें से किसी ने भी उसकी पूरी जाँच नहीं की । 4दि वह प्राचीन शोंघ की कसौटी पर 
कसा जाता तो उसकी घास्तविकता प्रकट हो जाती । जब से भ्रसिद्ध विद्वान बूलर को कश्मीर 
से कश्मीरी पंडित जयानक का बनाया हुआ और पृथ्वीराज के समय में ही लिखा हुआ 
पृथ्वीराज विजय महाकाव्य' प्राप्त हुआ तब से शोधक वृद्धि के विद्वानों की श्रद्धा पृथ्वीराज 
रासो' पर से उठ गई ।” पृथ्वीराज रासो के निर्माण क ल के पूत्र उक्त क्षत्रिय वंश अग्निवंश 
के नाम से विख्यात न थे जैसा कि निम्नलिखित विधरण से भ्रत्यक्ष होता है- 


पृथ्वीराज चौहान के दरबार में आने वाले कश्मीरी कवि पडित जयानक ने पृथ्वीराज 
विजय महाकाण्य' में अनेक स्थलों पर चौहानों को सूयंवशी लिखा है। 'यथा जिस प्राचीन 
रंघु के श्रेष्ठ काकृत्त््य कुल में इकवाकु और रघु को धारण किया भर्थात जो काकुत्स्य कुल 
इृक्ष्वाकु और रघुकुल के नाम से प्राचीन काल में चला वही छुल कवियुग में चाहमान को 
प्राप्त करके अपने चौथे प्रवर में आया अर्थात्‌ उसी का चौथा नाम कलियुग में चाहमान से 
उत्पन्न हुआ । * अपने वंश गुरू सूर्य के प्रताप को उन्नति का विस्तार करते हुए राजा का पुत्र 
जन्मा-इसका पुत्र भी दूसरे भीष्म के समान हुआ जिसके कि सूर्य पुत्र पृम्वीराज के देखते- 
देखते सूर्य वंश को उन्नत किया! ।* 


पृथ्वीराज से पूर्व अजमेर के चौहानों में पृथ्वी राज (वीसलदेव चोथा) बड़ा विद्वान 
और वीर राजा हुआ, जितने अंजमेर में एक सरस्वती मंदिर स्थापित किया यथा। उसमें 
उसने अपना रचा हुआ 'हरकेलि नाटक॑ तथा अपने राजकवि सोमेश्वर रचित “ललित विग्रह- 
राज नाटक” को शिलाओं पर खुदवा कर रखवाया था। चहों से मिली हुई एक बहुत बड़ी 
शिला पर किसी भज्ञात कवि के बनाए हुए चौहानों के इतिहास फे किसी काव्य का प्रारभिक्त 
अंश खुदा है। इसमें भी चोहानों को सूर्य वंशी ही लिखा है |" 


५, गौरोशंकर होराचन्द ओकझा+राजपुूताने का इंतिहास, भाग १, पृ० ७२ 

४२. काकुत्स्थमिक्ष्वाकुरघू च पछघत्युराम व-त्त्रिप्रवंर रघोः कुल । 
कलूावपि प्राप्प सचाहमानतां अरूढ़ वुर्देघवर वभूव तत्‌ता शा७१॥ 
७००००९००००७७' ९, 0० २१७७०००००००००००१०००००००३५००+१००००००००००००+१+०००१००० आानो: अतापोन्नतति |] 
तन्वस्गौन्न गुरोनिजेन नृपतेजेंसे सुतो जन्मना ॥ ७१५० ॥। 
सुतोप्यपरगाज्धा यो निनन्‍येस्प रवि सूनुमा । 
उन्नति रविवंशस्प पृथ्वीराजेन पश्यता ॥८ा१४ ॥ 

--प्रृथ्वीराज॑विजय महकाव्य । 
४. “देवों : रवि : पातुवः ॥३३॥ 





[ ४] 


राजा हर्ष के शिलालेख में चाहमानों को गुयक्त का वंशधर लिखा है। शिलालेख से 
विदित होता है कि दशवीं शताब्दी तक चौहान अपने को सू्ंवशी ही मानते थे, यथा- 
तन्युवतयर्थ मुपागता रघुकुले भू चक्रवर्ती स्वयं ॥' 
अर्थात्‌ उसकी मुक्ति हेतु रघुवंशी चक्रवर्ती राजा स्वयं आया । 


वि० सं० १४५० के आस-पास ग्वालियर के तोवर राजा वीरम के दरबार में प्रतिप्ठा 
पाए हुए जैन विद्वान नयचंद सूरि ने . हम्मीर महाकाव्य' नामक चौहानों के इतिहास ग्रन्थ में 
भी चौह्टानों को सूर्य वंशी कहा है ।' बूंरी के स्वर्गीय महाराज रामसिंह जी बहादुर के दरबारी 
कवि सूर्य मल्‍्ल मिश्रण ने अपने ग्रन्थ 'वश्भास्कर” में आबू के साथ-साथ संक्षेप में चौहानों की 
उलत्ति का भी उल्लेख किया है ! 
अनल अन्ववाय हि किले वरनत सौर सानि। 
तेज तत्व एकत्व करि, तहि विरोधि तह जानि ४ 


अर्थात्‌ कितने ही लोग अग्नि वंश को सूर्यवंश कह कर वर्णन करते हैं उसमें भी तेज 
तत्व की एकता के कारण विरोध नहीं समझना चाहिए । 

पडित झावर मलल्‍्ल शर्मा ने “राजस्थानी” पत्रिका में 'चौहानों के अग्नि वशी कहलाने 
का आधार' नामक शीर्षक से एक लेख में लिखा है कि “मुझे भी चौहानों को अन्यतम शाखा 
अ्दौरियों के इतिहास की खोज करने के प्रसंग में कुछ विचार करने का अवसर मिला है। 
भरी राय में पृथ्वीराज रासो के रचग्रिता का अपने काव्य ग्रन्थ में चौहानों की उत्पत्ति के 
सम्बन्ध में अपनी कल्पना से कम लेकर अर्वृदगिरि के यज्ञ की कथा रच डालना सब्भव है 
भौर यह भी सम्भव हैं कि परवारों की उत्पत्ति की कथा ही इसकी कल्पना का आधार हो । 
मैं भी श्री ओज्नञा जी के उपस्थित किए हुए प्रमाणों के विचार से चौहानों का मह॒पि वशिष्ट से 

तत्यात्समालंव (व) नंदडयोनिर भुझदनस्य रखलत: स्वमार्गों । 

चंशः स देवोढरसो नृपाणा मनुद्गतंदों घुण कीट रंधन्र: था 

सुमुत्यितों कदिनरण्प योनिरूत्पन्न पुन्नाग कंदव (व) शाखः। 

आइचर्यमंतः प्रसरत्कुशोनं वंशोथियां श्री फलतां प्रयाति ॥३५॥ 

जआधिव्याधिकुवृत द्वर्ग्वातिपरित्यक्यप्रजात्र ते। 

सप्तदोपभुजो नुपा: सममचन्निदव:कुराम:दयः 705/*«* ॥३६॥। 

तस्मिन्नयारिविजयेन विराजमानो राजोनुरंजित जनोजनि चाहमान ॥३७॥ 
१. हिस्ट्री जाव भेडिविल हिन्दू इंडिया, माग २, पृ० १३-१४, ९७। - 
२. अवातस्मंडल तोक्ष्मासां पुत्यु: पुमानुप्तात मंडलाग्रः । 
त॑ चानि पिच्याइव दसीय रज्ञाविधो वधदिष मुश्ध॑ सुखेन ॥ 

-हम्मीर महाकाव्य, १-१६ । 

सूर्यमल्ल मिश्रग-वंशनास्कर, प्रयम राशि, दशम मयूछ । 


नम 


(.. “१5. -॥ 


फोई संबंध नहीं मानता परन्तु उनका वत्स गोन्नी होता केवल टॉड साहव ने ही नहीं. बल्कि 
शिलालेख के आधार पर भोक्षा जी ने पी रवीकार किया है भौर स्वय चौहान भी अपने 
को अग्नि वंशी गोत्री मालते हैं । यह बत्स गोचर ही बतलाता है कि चौहानों का अग्नि वश 
से आदि भौर अविष्छिन्न सम्बन्ध है | अब इसके कारण पर विधार कीजिए | हिन्दुओों के यहां 
८ बड़े गोत्र प्रवतंक ऋषि हो गये हैं-विश्वामिभ, भूगु भारद्वाज, यौत्म, अन्नि, वणशिप्ट, 
फश्यप और अगस्त्य | इनमें से भूगु गोत्र की ७ शाखाओं (वक्त विद्‌, अ,प्टिषण, यास्‍्क, 
मित्रधुव, वेन्‍्य और शुनक गोत्र प्रवर निवन्ध कदस्वम धृगू काव्डंम-पृष्ठ २३-२४) में से एक 
पत्स शाखा है। तब वत्स गोत्र के आदि पुरुष महपि भूग बतलाए गए हैं। तब यह देखना 
चाहिए कि भृयू किस वश के है। इसके लिए सनुस्मृति का चचन है-- 


इृदमचुर्महात्मांन अनल प्रमाव भूगुम ।' 


इसमें भृगु का विशेषण अनल प्रभव स्पष्ट है। इस सम्बन्ध में केवल मनुस्मृति ही नहीं 
श्रुति भी साक्षो देती है-- 


तस्य भद्र तसः प्रथम देदीप्यते तदसावादित्यों भचन। यदुवीनीय मासीद भुगु । 

भर्थात्‌ उसकी शक्ति (रेतस वीयं) से जो पहला प्रकाश (अग्नि) हुआ, वह सू्य बन गया 
और जो दूसरा हुआ उसी का भूगू । इसी प्रभाव से भूग को अनल प्रभव कहा गया है ' ध्स 
धकार भूगु अग्नि वशी हुए औौर भूयु वेंशी हुए वत्स । वत््स योत्री हैं चौहान । अवएच चौहानों 
के अग्नि वंशी कहलाने में कोई तात्विक आपत्ति दिखलायी नहीं देती' ।* 


डॉ० विपिनंबिहारी त्रिवेदी ने भो उपयुक्त मत फा समर्थन इस शब्दों में क्रिया है- 
“चन्द, ने चोहाभों को अस्नि वशों बताफर चस्तुतः सत्य का अधिक प्रकाश किया है जबकि 
(संस्कृत ) पृथ्वीराज विजय” के कर्ता जयानक ने ही केवल नही वरन्‌ उसके पू्व॑वर्तों (रक्त ) 
शिलालेखकार कवियों तथा परवर्ती (संस्कृत) 'हम्मीरमहझकाव्य' कर्ता नयचम्द सुरि और 
(संस्कृत) सुजेनचरिध्र महाकाध्य (सर्ग ७, श्लोफ ५८-६१) के रच(यिता चमद्रशेखर ने उन्हें 
सूयंवंशी बतल;कर एक भोर जहयँ मरिन और सूर्य मे सैज रूप के कारण तत्वतः समामता का 
भाव होने से [सूर्य द्वारा चाहमान की उत्पत्ति अशिक परिवर्तन सहित प्रस्तुत पस्चे ) सत्य 
से विरत न होने का दाचा किया, चहाँ दूसरी ओर उनका भारत के सुप्रस्क्ि ध्ूब्कृबृल 
चाले रघुवंशियों से गौरवपूर्ण और महिमामय सम्बन्ध भी अनाय-स ही स्थापित कर दिया । 
धास्तव में चौहानों को सूर्यवंशी ववाकर संस्कृत-कवियों की एक पत्थ दा काज सिद्ध कर लेने 
की कल्पना परम सराहनीय है । परन्तु इसके बावजूद लोक में चोहानों की ख्याति न्ञाज तक 
अग्निवंशी होने की ही चले जा रही है भर स्वव यह जाति भी यही वात गत से स्वीकार 
करती है| देश्य भाषा की कृति 'पृथ्वीराज रासो' में चौहानों का अग्नि कुलीन उल्लेख 





१ भनुस्मृति, अध्याय ४, इलोक १।॥ ] 
२. चौहानों के अग्निवंशी कहुलाने का आधार, राजस्थानो, नाग्र ऐे, अंके २ पु० छ८ । 


[ १६ ै 
अधिक ऐतिहासिक है | सस्कृन ग्रन्थों में. ऐसा भी उल्लेख प्राप्त होता हैं कि, वह पुरुष सूर्य 
मडन से अवतरित होकर यज्ञ कुण्ड से प्रगट हुआ । संभव है विद्वानों ने श्रमवश उसे सूर्य से 
उत्तन्न ही मान लिया हो जब्रकि वास्तव में वह प्रगट अग्नि से ही हुआ। अतः स्पष्ट है कि 
चौहानों को अग्नि वशी ही मानना अधिक न्याय संगत होगा । वशिष्ट द्वारा आवू शिखर पर 
किए गए यज्ञ से, परमार, प्रतिहार, चालुक्य, तथा चाहुमान क्षत्रियों की उत्पत्ति के विषय में 
भविष्य, पुराण” भी मौन नहीं है-- ह 


एतस्सिश्नंव काले सु कान्यऊुठ्जो द्विनोतमः । 
अबु द॑ शिखर प्राप्य ब्रग्म होममथाकरोत्‌ ॥४५॥ 
देदमंत्र प्रभावाच्य. जाताइचत्वारक्षत्रिया:। 
प्रमर: सामत्रदी च चपदानिर्यनुविदः ॥४६॥ 
त्रिवेदी च तथा शुक्लो5्थर्वा स परिहारक: । 
ऐराबत कुले जातान्‌ गजानारुहा ते पृथक ॥४७ा। 


परमार-पृथ्वी राज रासों में परमारों की उत्पत्ति के विपय में लिखा हुआ है कि “अर्वुदगिरि 

पर अनेक ऋषियों को यज्ञ करते दखकर' राक्षसों ने नाना प्रकार के उपद्रव॑ करना प्रारम्भ 
बार दिया । यह देखकर सब मुनिगण वशिप्ट जी के पास गए तथा उनसे राक्षसों के विनाश 
करने की प्रार्थना की । तब गुह #शष्ट ने ध्यान लगाकर हवन किया, जिससे प्रतिहार, 
चालुतय तथा प्रमार (परमार) क्रमशः ये तीन वीर पुरुष उत्पन्न हुए, जिन्होंन राक्षसों स 
युद्ध क्रिया- 

तब सुरिष्प वाचिष्ट। कुण्ड रोचन रखचि तासमह। 

घरिय ध्यान जजि होम । मब्य वेदी सुर सामह। 





१. डॉ० तिदेदी, रेवातट समय, मुमिका भाग, पु० २०५-६। 

2. ८“फठ्लसटा, पीट ६९४४ जांटसा व85 जार वैठशा (005 वा गर्माप४८०० पाते 
घाट ध९, ड्रिग्रंश्राएक फृपाबा9, 35. सथावीगीए ॥0 फढ शाला ४0०7६ रद 
45 चृषण€त व) पार /एक्शबा।ंफव जिक्षात8 5003, [ 96 फब्रंड0ए७ शिता७79, 
दा 2एएच्थल्ते वंत्त छिठाशी9ए एच 897 ॥7 फढ $5एए८ए:४५३ 7ट55, 935 9९८७ 
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जगत 5 250 0प्रीषष्ाइट गिव्वृपला।]ए एचशवे, पृल्नढ छल्याटा एव 06 जठपे 
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छण्ते 50 697 # प्ीडठाए णए [फर्गयृन्त ॥/(८००0७७५८,  शांताल्मआर, ४०), ।, (09). 
एक, 927. छ. 567. 

३. नागरों प्रचारिणों समा संस्करण, छ० रथ४ड, सं० १। 

४... चही, छं० २४४५-४७, सं० १॥ 

प्र बहो, छं० २८८, सं० २१। 


[ १७ ] 


तब प्रग्दयो प्रतिहार। राज तित ठौर सुधारिय | 
फुनि प्रग्टयो चालुवय। ब्रह्मचारी ब्रत धारिय। 
पावार प्रगट्या वीर वर। कह्मौं रिण्प परमार घन । 
शन्नय पुरुष जुद्ध कीनो अतुल । यह रष्पस पुहंत तन ॥२५०॥" 


कवि जोधराज कृत 'हम्मीर रासो” में पृथ्वीराज रासो के समान ही कथा प्राप्त होती 
है-सृष्टि के शासन कर्ता क्षत्रियों के समुल उन्मूलन हो जाने से जब परस्पर अन्याय आचरण 
के कारण प्रजा पीड़ित हो उठी तथा दैत्यों के उपद्रव से ऋषिगणों के यज्ञादि कर्मों में भी 
विध्न पड़ने लगा तब ऋषिगण संसार की रक्षा और उसके उचित शासन के निमित्त फिर 
क्षत्रियों को उत्पन्न करने की अभिलाषा से यज्ञ करना विचार कर अवुंदगिरि अर्थात्‌ आवू 
पवेत पर गए 5४४ समुचित प्रकार से जिस समय यज्ञ हो रहा था और वेदिका से 
उत्पन्न हुई अग्नि शिखाएं आकाश को स्पशं कर रही थीं, उसी समय उस वेदिका में से 
चालुक्य, प्रमार और परिहार क्षत्रिय क्रम से उत्पन्न हुए । इन्होंने मुनिवरों की आजा पाकर 
दैत्यों से युद्ध किया, किन्तु उन्हें परास्त करने में समर्थ न हो सके ।! 


ऋषि वशिष्ट वेदिय विमल सामवेद स्वर॒ साधि। 
प्रगटभ कियनु छत्निय पहुमि, वेद मंत्र आराधि॥ ४५४॥ 
तोन पुरुष उपज तहां , चालुक प्रथम पवांर। 
दृ्ज॑. तीज ऊपजे , क्षत्रि जाति पडिहार॥ ५५॥ 
कियउ युद्ध अतुल्ति तिनहि , नहिं खल जीते भूरि। 
तव चतुरानन यज्ञ थरलू, कियो तुरत वह दूरि॥ ५६ ॥" 


परमारों के शिलालेखों तथा- कवि पद्मगृप्त (परिमल) विरचित “नतवसाह सांक 
चरित' में परमारों की उत्पत्ति के विषय में स्पष्ट लिखा है--आयू शिखर पर मुनि वशिष्ट 
रहते थे, उनकी गौ ( नंदिनी ) को एक बार ऋषि विश्वामित्र छल से हर कर ले गए। 
इस पर मुनि वशिष्ट ने ऋद्ध होकर मंत्र पढ़ कर अपने अग्निकुण्ड में आहुति दो, जिसके 
प्रभाव से एक परम तेजस्वी एवं पराक्रमी पुरुष उस कुण्ड से प्रकट हुआ, जो शत्रु को परास्त 
कर गौ ( नंदिनी ) को लौटा लाया, इस पर प्रसन्न होकर ऋषि ने उसका नाम परमार! 
अर्थात्‌ शत्रु को मारने वाला रवखा | उसी वीर पुरुष के वंश का नाम 'परमार' हुआ ।' 


१, नागरी प्रचारिणी सभा संस्करण, छं० २५०, स० १। 

२ कवि जोधराज, हम्मीर रासो, संपादक द्यामसुन्दर दास, काशी नागरी प्रचारिणी 
सभा, द्वितीय संस्करण १९२९ । 

३. ब्रह्माण्डमण्प्र स्तम्भ: श्रीमानस्त्यव्‌ दो गरिरिः। *" ॥४९॥ 
अतिस्वाघधोन दीवारफलम्‌ लसमित्कुशम्‌ । 


[ १८] 
परमारों के शिलालेखों में उवत वंश के मूल पुरुप का नाम घूमराज' मिलता है। 'धम' 


फा बच है, धुआं | धुंआ अग्नि से उत्पन्न होता है। अत: मूल पुरुष के नाम से भी स्पष्ट है 
कि परमार अग्निव॑शी हैं । 


महामहोपाध्याय पं० गीौरीशंकर हीराचन्द ओझा परमारों को अग्निवंशी नहीं मानते 
हैं। वे परमारों को ब्रह्म क्षत्र” कहते हैं। 'मालवे के परमार राजा मुंज ( वाकपतिराज, 
आमोघ वर्मा ) के समय अर्थात्‌ वि० स० १०२८ से १०४४ (ई० स० ९७१ से ९९७ ) 
के आसपास होने वाले उसके दरवारी पंडित रलायुध ने 'मंगल सूत्न वृत्ति! में मुन्ज को “ब्रह्म 
क्षत्र” कुल का कहा है । 'ब्रह्म क्षत्र' शब्द का प्रयोग प्राचीन काल में उन राजवशों केलिए होता 
रहा है, जिनमें ब्रह्मत्व-क्षमत्व दोनों गुण विद्यमान हो- या जिनके वंशज क्षत्रिय से ब्राह्मण 
हुए हों ।"**““““राजा मुन्ज के समय तक पर्रमार भी ब्रह्मक्षत्र कहें जाते थे न कि अग्निवंशी' ।* 


भोक्षा जी के कथन मात्र से ही 'परमारों' को ब्रह्मक्षत्र, मान लेना उचित नहीं । उपयुक्त 





मुनिस्तपोचन चक्र तंत्र क््वाकुपुरोंहितः ॥ ६४ ॥। 
हृता तस्येकदा धेनुः काम रूर्गाधिसुनुना।- /. - मय 
कार्मवीर्याजुनेनेव.._ जमवस्नेरनीयत ॥ ६४ ॥ 
स्थूलाश्रुधारसन्तानस्त्रपि तस्तनवल्कला । 7 > हु 
अमर्पपावकस्या श्र द्धूतंस्समिदरूघती ॥ ६६ ॥॥ 
अथाथर्व विदामद्यस्समन्नामाहुति ददी । ु 
विकसह्ठविकटज्वालाजदिले जातवदसि ॥ ६७ ॥ 
ततः क्षणात्‌ सकोदण्ड: किरीट काञ्चनाड्भदः । 
उज्जगासाश्नितः को5पि सहेमकवचः पुमान्‌ ॥ ६८ ॥॥ 
दूरं सन्‍तमसेनेव विश्वामित्रेण सा हृता। ४ 
तेनानिन्यपे मुनेर्ेदुदिलभीरिव भानुना ॥ ६९ ॥ 
परमार इति प्र/पत्‌ स भुनेननि चार्यवत ॥ ७१ ॥। 
पद्मगुप्त ( परिमल ) रचित नवसाह सांक चरित, संर्ग १। 
१. श्री घूमराज: प्रयमं वनूवे भूवासवरतत्र नरेद्रवशे ॥॥ ३३ ॥ | ४ 
जादू पर के तेजपाल के मंदिर के वि० सं० ११८७ का शिलालेख । 
आनोतघन्वे परनिर्जयेन मुनिः स्वयोत्रं परमार जातिम । 
तस्में ददावद्धतमूरिनाग्यं त'घौसराजं च धकार नोम्ना ॥ : 
' आावू के नीचे के गिरंवर्र गाँव-कें पेस वाले पाठ नारायंण के मंदिर की वि० स० 
१३४४ की प्रश्स्ति की छाप से । 


२. राजपुताने का इतिहास, जिलल्‍्द पहलो, पु० ७५-७६, वंदिक मंत्रालय द्वारा प्रकशित/ 
मजमेर १९३७॥ 


996 * 


[ 9९ ] 


प्रमाणों के आधार पर 'परमार' अग्निवंशी -ही ठहरते हैं। अतः रासो- के विवरण को 
मप्राभमाणिक अथवा अनैतिहासिक मान बैठना एक बड़ा भारी प्रम होगा । वि० सं० १९७० 
(६० सं० १९१३) में, पं० हरप्रसादः शास्त्री को जोधपुत्र में एक वंशावली मिली थी, उसके 
अनुसार भी, “परमार अग्निवंशी ही ठहरते हैं ।' 'क्षत्र कुल वंशावली' नामक काव्य प्रम्थ में 
भी परमारों का अग्निवंशी होना ही लिखा है।' उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पृथ्वीराज 


रासो' में परमारों को अग्नि वंशी लिखना अनैतिहासिक नहीं, वरन्‌ उसमें सत्यता के पर्याप्त 
अंश विद्यमान हैं । 


प्रतिहार-'पृथ्वी राज रासो” में प्रतिहारों के उत्पत्ति के विषय में लिखा हुआ है कि 
अवुंदगिरी पर अनेक ऋषियों को यज्ञ करते देखकर' राक्षसों ने नाना प्रकार के उपद्रव करना 
प्रारम्भ कर दिया | यह देखकर सब मुनिगण वशिष्ट जी के पास गए तथा उनसे राक्षसरों के 
विनाश करने की प्रार्थन की तब गुरु वशिष्ट ने ध्यान लग।|कर हवन किया, जिससे प्रतिहार, 
चालुक्य तथा प्रमार ( परमार ) क्रमश: ये तीन वीर पुरुष उत्पन्न हुए जिन्‍्होने राक्षसों से 
युद्ध किया-- 


तब सु रिष्ष वचिस्ट | कुण्ड रोचन रचि तामह । 
घरिय ध्यान जजि होस । मध्य वेदी सुर सामहू। 
तब ॒प्रग्ड्याौ प्रतिहार। राज तिन ठोर छुधारिय। 
फुनि प्रग्ट्याो चालुक्य। ब्रह्मचारी ब्रत घारिय। 
पाँवार प्रगट्या चीर बर | कह्मौ रिष्प परमार घन। 
ज्रय पुरुष जुद्ध कीनो अतुछ। यह रण्षस पुहंत तन ॥ २५० ॥* 


कवि जोघराज क्ृत 'हम्मीर रासो” में भी इसी प्रकार की कथा प्राप्त होती है>'समुचित 
प्रकार से जिस समय यज्ञ हो रहा था और वेदिका से उत्पन्न हुई अग्नि शिखाएं आकाश को 
स्पश कर रही थीं, उसी समय उस वेदिका में से चालुक्य, प्रमार और परिहार क्षत्रिय क्रम 
से उत्पन्न हुए । इन्होंने मुनिवरों की आज्ञा पाकर दंत्यों से युद्ध किया, किन्तु उन्हें परास्त 
करने में वे समर्थ न हो सके' ।१ 





[.. फद्ॉमांगगएए किटएण६ ता 0० णएशवपठ्त गा इ९था०0) णी 458 ए फ्रशापार एपाणां- 
20०5, 923, 7०8० 2-22. 

आजमगढ़ के स्वर्गीय राजा रणजोर सिंह, क्षेत्रकुल वंशावलो । 

तागरी प्रचारिणी सभा संस्करण, छं० रडें४, सं० १॥ 

बही, छं० २४४५-४७ स० १॥। 
घही, छं० रेड स० ११ 
बही, छं० २५० स० १॥ 
कवि जोधराज, हम्मीर रासो--छ० ४४-१६ | 


हा 96 26९: 200 "४ 


[ २० |] 


उपर्युक्त विवेचन से स्पप्ट है कि प्रतिहार अग्निवंशी क्षत्रियथे किन्तु ओझा जी इन्हें 
अग्नि वंशी न॒ मानकर सूर्य वंशी ही मानते हैं। अपने मत के समर्थन में वह इस प्रकार 
लिखते हैं-ग्वालियर से वि० सं० ९०० ( ई० स० ८५४३ ) के आसपास की- प्रतिहार राजा 
भोजदेव की एक बड़ी प्रशस्ति मिली है। उसमें प्रतिहार सूर्यवंशी बतलाए गए हैं। इसी 
प्रकार सुप्रसिद्ध कवि राजशेखर, जिसने वि० सं० की दसवीं शताब्दी में कई नाठक रचे, 
अपने नाटकों में उक्त भोजदेव के पुत्र महेंद्रपाल को जो उसका शिष्य था, 'रघुकुल तिलक' 
और उसके पुत्र महीपाल को रघुवंश मुक्तामणि लिखता है । शेखावाटी के प्रसिद्ध हपं नाथ 
के मंदिर कीं चौहान राजा विग्रह राज के समय की वि० सं० १०३० की प्रशस्ति से भी 
कन्नौज के प्रतिहारों का रघुवंशी होना ज्ञात होता है । इन प्रमाणों से यह स्पष्ट हो जाता है 
कि प्रतिहार पहले अपने को अग्नि वंग्ी नहीं किन्तु सुर्य वंशी (रघुवंशी) मानते थे ।”' 


'राजस्थान की जातियाँ' नामक ग्रन्थ में प्रतिहारों के विपय में इस प्रकार का उल्लेख 
प्राप्त होता है--'पडिशर अग्निवंशीय हैं। इनकी शक्ति का अनुभव इसी से किया जा सकता 
है कि किसी समय में काबुल के शासक थे। काबुल छोड़ने पर ये अयोध्या चले गये थे और 
वहाँ से मारवाड़ में आए। अब इनकी संख्या वहुत अल्प रह गई है ।" श्री रसल महोदय के 
मतानुसार भी प्रतिहार 'अग्निवंशी' थे, वह प्रतिहारों को योद्धाओं की पंक्षित में नहीं मानते, 
अपितु उन्हें महल के द्वारा पर रह कर रक्षा करने वाला मानते हैं। इसी का विगड़ा रूप 
प्रतिहार है ।' 


प्रतिहार शब्द के ब्रिपय में एक स्थान पर महामहोंपाध्याय पं० गौरीशंकर हीराचन्द 
भोझा लिखते हैं-'गुहिल, चौलुक्य (सोलंकी), चाहमान आदि राजवंश अपने मूलपुरुषों के 
नाम से प्रचलित हुए हैं, परन्तु प्रतिहार नाम वंशकर्ता के नाम से चला हुआ नहीं किन्तु 
राज्याघिकार के पद से बना हुआ है। राज्य के भिन्न-भिन्न अधिकारियों में एक प्रतिहार भी 
था, जिसका काम राजा के बेठने के स्थान या रहने के महल के द्वार (ड्योढ़ी) पर रहे कर 
उसकी रखा करना था| इस पद के लिए किसी खास जाति या वर्ण का विचार नहीं रहता 


१. फोशोत्सव स्मारक संग्रह, १९८५। 

२. बजरंगलार लोहिया, राजस्थान की जातियां, पृ० १७, विज्ञाल भारत ब्रुक डिपो, 
कलकता, मई १९५४। 9, 

3. प्रफां5 ( श्तीत्रा ) लैशा छब्ड णाद ० पीट तठिपा 80:४४ ० विकेतााओ वश: 
शिप्रातेश/ छ85 प्रार ग750 ९० 55प८ (0 पीर फिट ,एिपराशी। 90 6 वे १० 9 
ऋक्यायां०075 पांधर, वाल फ्रशायनराा5 ए]३८९वै ग्रंता 35 एृप्थातंत्रत णी 6 8००, 
खाते गद्याटट कैंड ग्या९, शिफ्रो-॥3-तैज73. 7 ]6 "सं शाते ०४६८ ० (९ टटआानों 


एए०णंगरटल्ड ० छत, छज. ए. ए. एरेएटा] 25३5९० ४ एथ 8389]्व0प उॉशी2ो- 


8६ वा, ए9986 457, ऐैब्ित्माीशा & (00. उंणांपत्त 5६. /४०४४१ 50८८, 
7.07007 ]96. 


8 35 | 


री किन्तु राजा के विश्वासपात्र पुरुष ही इस पद पर नियुक्त होते थे। प्राचीन घिलालेखादि 
में प्रतिहार या महा-प्रतिह्ार नाम मिलता है और भाषा में उसे पड़िहार कहते हैं' ।* 


उपयुक्त विवेचन से इतना स्पष्ट हो जाता है कि प्रतिहार अग्निवंशो थे, उनकी उत्पत्ति 
'रासो में बताई हुई रीति से ही हुई थी। अतः स्पष्ट है कि 'प्रतिहार! अग्निवंशी थे । यहां 
पर प्रतिहारों को अग्निवंशी प्रगट करना तथा रासो ग्रन्थ की सत्यता पर ही प्रकाश डालना 
अभीष्ट था न कि यह देखना कि 'प्रतिहार' शब्द कहाँ से आया । 


चालुक्य--रासों में उल्लिखित ३६ राजवंशों में चालुक्य भी एक प्रमुख राजवंश है। 
अन्यकार ने इनकी उत्पत्ति भी अग्नि से मानी है । रासो में लिखा है कि अर्वृदगिरि पर अनेक 
ऋषियों को यज्ञ करते देखकर' राक्षसों ते अनेक प्रकार से विष्न डालना प्रारम्भ कर दिया ।' 
यह देखकर समस्त मुनगण मुनि वशिष्ट के पास गए तथा उनसे राक्षसों के विनाश करने की 
प्रार्थना की" तब ग्रुरु वशिष्ट ने ध्यान लगाकर यज्ञ किया जिससे प्रतिहार, चालुब्य तथा 
भरमार क्रमशः ये तीन घीर पुरुष उत्पन्न हुए जिन्होंने राक्षसों से घोर युद्ध किया ।* 


कवि जोधराज विरचित 'हम्मीर रासो में भो इसी प्रकार की कथा का वर्णन प्राप्त 
होता है ।* अर्थात्‌ हम्मीर रासो के मतानुसार चालुक्य अग्नि से उत्पन्न हुए थे अर्थात्‌ अग्ति- 
चंशी थे। जहाँ एक ओर प्राचीन ग्रन्थों में चालुक्यों को अग्निदंशी होना लिखा है, वहाँ दूसरी 
ओर भोझा जी उन्हें चन्द्रवंशी बताकर रासो ग्रन्थ को सत्यता में संदेह ही नहीं भपितु उसे 
निरी भट्ट कल्पना सिद्ध करने का प्रयत्न करते हुए लिखते हैं कि ''चालुक्य ( सोलंकी ) राजा 
विमला दित्य के पवें राज्य वर्ष अर्थात्‌ वि० सं० १०७५ ( ई० सं० १०१९ ) के दानपन्न में 
सोलंकियों को चन्द्रवंशी लिखा है। इसके सिवा उसमें ब्रह्मा से अन्रि, अन्रि से सोम, सोम से 
लगाकर विचिन्न वीर्य तथा उसके पुत्र पांडु राज तक की पूरी नामावली, पांड्‌ के पांचों पुत्र 
युधिष्ठिर, भीम, अजु न आदि के नाम ओर अर्जुन के पुन्न अभिमन्यु से लगाकर विमलादित्म 
तक की वंशावली भी दी हुई है । इससे स्पष्ट है कि उक्त सवंत में सोलंकी अपने की चन्द्र 
चंशांतर्गत पॉंडवों के चंशज मानते थे । 


सोलंकी राजा कुलोन्तुग चोड़देव ( दूसरे ) के सामंत बुद्धिराज के शक संवत १०९३ 
( वि० सं० ११२८ ) के दान पन्न में कुल्ोतुंग चोड़देव के प्रसिद्ध पूर्देजकुज विष्णु को 





राजपूताने का इतिहास, पहली जिंद्द, पु० १६५॥। 
नागरी प्रचारिणी सभा संस्करण, छं० र४ंद स० ११ 
चबही, छं० २४५-४७ स० ११ 

वही, छं० २४८ स० ११ 

वही, छं० २५०, स० १॥ 

कवि जोघराज, हम्मीर रासो, छं० ५४-५६ १ 


46 2ुद 2८ 2० 2० 2० 


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हर -] 


चन्द्रबंधी तिलक कहा है। सुप्रसिद्ध जैनाचार्य हेमचन्द्र ने जो गुजरात के सो्जकी राजा 
जयसिह ( सिद्धाज वि० सं० ११५०-११९९ ) तथा उसके उत्तराधिकारी कुमार पाल 
(वि० सं० ११९९-१२३० ) से सम्मानित हुआ था, अपने हयाक्षय महाकाव्य के ९वें सर्ग में 
गूजरात के सोलंकी राजा भीमदेव के दूत बौर चेदिदेस के राजा कर्ण के वार्तालाप का 
सर्विस्तार वर्णन किया है। उसका सारांश यह है-- 


दूत ने राजा कर्ण से पूछा कि भीम आपसे यह जानना चाहते हैं कि आप अपने 
मित्र हैं या शत्रु । इसके उत्तर में कर्ण ने कहा कि कभी निर्मूेल न होने वाला सोम ( चन्द्र ) 
वंश विजयी है! इसी वंश में जन्म लेकर पुरूरवा ने पृथ्वी का पालन किया । इन्द्र के अभाव 
में डरे हुए स्वर्ग का रक्षण करने वाला भूमिवाला मूतिमान, क्षात्र धर्म नहूप इसों कुल म 
उत्पन्न हुआ । इसी वश के राजा भरत ने निरन्तर संग्राम करते और अतीत के मांग पर 
चलने वाले दैत्यों का संहार कर अतुल यश्म प्राप्त किया । इसी कुल में जन्म लेकर धमंराज 
युधिप्ठिर ने उद्धत शत्रुओं का नाश किया । जनमेजय तथा अन्य अक्षय यश-वाले तेजस्वी 
राजा इसी वंश में हुए और इन सब पूर्ववर्ती राजाओं की समानता करने वाला भीम 
(भीमदेव) इस समय विजयी है । सत्य पुरुषों में परस्पर मँत्री होना स्वाभाविक है, अतएव 
हमारी मंत्री के विरुद्ध कौन क्या कह सकता है । | 

ऊपर उद्धृत किए हुए प्रमाणों से निश्चित है कि पृथ्वीराज के समय तथा उससे पुर्व 
भी सोलंकी अपने को अग्निवशी नहीं किन्तु चन्द्रवंशी और पांडवों की सतान मानते थे । 

ओझा जी.को इतने से ही सन्‍्तोष न हुआ वह एक स्थान पर और भी रासो को 
अनैनिहासिक सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं तथा चालुक्यों को चन्द्रबंशी होना ही प्रमाणित 
'करते है--'इस समय सोलकी और बघेल ( सोलंकियों की एक शाखा ) मपने को अग्निवंशी 
बतलाते हैं और वशिष्ट ऋषि के द्वारा आवयू पर के अग्नि कृण्ड से अपने मूल पुरुष चालुक्य 
( चालुक्य, चोलुक्य ) का उत्पन्त होना मानते हैं, परन्तु सोलंकियों के वि० स० ६३५ से 
१६०० ( ई० स० ५७८ से १५४३ ) तक के अनेक शिलालेखों, दानपत्रों तथा पुस्तकों में 

कहीं उनके अग्निवंशी होने की कथा का लेश भी पाया नहीं जाता । उनमें उनका चंद्रवंशी 

होना और पाण्डवों की वंश परम्परा में होना लिखा है । वि० सं० १६०० (६० सं० १५४३) 
के आसपास “पृथ्वीराज रासो' बना, जिसके कर्ता ने इतिहास के अज्ञान से इनकों भी अग्नि 
वंशी ठहरा दिया और ये भी अपने प्राचीन इतिहास की अज्ञानता में उसी को ऐतिहासिक 
ग्रन्य मानकर अपने को अग्निंशी कहने लगे ।!* 


सम्भव है ओझा जी के मत में कुछ सत्यता हो | किन्तु जन श्रुतिकी .अवहेलना भी 
तो नहीं की जा सकती है। “राजस्थान की जातियाँ” नामक ग्रन्थ में लिखा है कि 'सोलंकी 





१. कोशोत्सव स्मारक संग्रह, १९८५ । 
२. राजपुताने का इतिहास, पु० २३८। 


[ २३ |] 


भो अग्निवशियों में से अन्यतम है। इनका दूसरा नाम चालुक्य है। कर्नल टॉड के अनुसार 
राठोड़ों के' कन्नौज पर अधिकार करने के पूर्व सोलकी गंगा के तट पर बसे हुए सोरों नामक 
स्थान के शासक थे ।”! 

श्री रसल महोदय के मतानुसार भी सोलंकी अथवा चालुक्य अग्निवंशी हो थे।' 
वि० सं० १९७० ( ई० सं० १९१३ ) में एक वंशावली प० हरप्रसाद शास्त्री को जोधपुर 
में मिली थी ।* इस वंशावली के अनुसार भी सोलंकी भर्थात्‌ चालुक्य अग्निवंशी ही ठहरते 
हैं। आजमगढ़ के स्वर्गीय राजा रणजोर सिंह विरचित '“क्षत्रकूल वंशावली' में भी प्ोलकियों 
को अग्निवंशी साना गया है। इतने भ्रमाणों के श्ाघार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता 
है कि चालुक्य अग्निवंशी ही थे, चन्द्रवंशी नहीं। अत: 'पृथ्वीराज रासो'” में चालुक्यों को 
अग्निवंशीय लिखा होना ऐतिहासिक जान पड़ता है। यहां पर ३६ राजवंशों का विस्तत 
उल्लेख करना अभीष्ट नहीं है । पृथ्वीराज रास में मुख्यंत: उपरोक्त चार वंधों को ही अब्नि- 
चशौी माना है तथा इन्हीं चार कूलों के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद भी पर्याप्त है। अत: 
उन्हीं पर विस्तृत विवरण देकर रासो ग्रन्थ की ऐतिहासिकता पर प्रकाश डालना 
अभीष्ट था १ 





१. बजरंगलाल लोहिया, राजस्थान कौ जातियाँ, पृ० १६) 

2. गुफा लंबा एड णार रण प्रीट 88773 0णा प्रिल्‍-90ता थाते 3/८ भ्रध्वट९ ए00- 
अंपेलल्त ६० 98ए8 एाण्टग्जीए एशला एफस्‍[ंबाबड ता ठपुंचा5, पीला णांहीगवों एशा८ 
5 इ9ंत [0 ॥38ए९ छ९टा णीवोेंप:३, फचटश्फ्णड पीलए एढाह तिग्राव्व ग्र पीर फ़ॉगाः 
( नागए ) णी पीठ गाव, मत एटाह गए00 प्रप्टी 'ा0एए व रिकृ9पव9, 0५६ 
टाल ए९एए एा०ग्गांगदा। गा प्रीट ॥९९टव7., ्ंटा८ पा6ए एछला९ एलारबा9 टॉप 
'लागेणेए०, पी०णपट्टी गे )१्रणाफ्रला विगत पट 78॥स्‍९ 50) गीी। क्‍5 076 60प्राग70॥, 
बृफ6 पफ्फ्रलड बाते द्डाल: णी पार एशापवी शि0्एआाएटड ० पापछ, 9५. हि. ४७. 
एटा 85च्नंषाट्त 5ए रिंग नीःगेक्षे,, शिक्षा ही, केग्टामोँविय शापे (0. 
फ्रभा60, 8. िशिवीएड ड/९९, 4/णात0, ]96. 

3, एशांगांतथए रि्रूण+ णा चोर ठऊुदाब्वांता व उश्थाएं। ० ७9 ० छेडावार (00- 
९5, 923, 922५० 24:22. 


धर 


है] 


हिन्द पात्र : शासक वर्ग 


राजा--पृथ्वी राज रासो” के शासक वर्ग का विवेचन करने के पूर्व यदि 'राजा' की 
उत्पत्ति तथा उसके कतंव्य के विषय में थोड़ा सा उल्लेख कर दिया जाय तो अप्रासंगिक न 
होगा । समाज को व्यवस्थित रखने के लिए पूव॑-पुरुषों ने एक राजा की व्यवस्था की है। 
उनके मतानुसार यह व्यक्ति इस लोक में भी प्रसन्‍न एवं सुखी रहेगा और दूसरे मृत्यु के 
उपरान्त शांति तथा स्वर्ग का अधिकारी होगा । आज के युग में स्वर्ग की बात पर विश्वास 
न भी किया जावे किन्तु इतना मवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा कि सामाजिक जीवन में 
राजा का महत्वपूर्ण स्थान था । हमारे प्राचीन शास्त्रवेत्ताओं ने राजा को देवत्व स्वरूप में 
प्रतिष्ठित किया है तथा उसका वर्णन करते हुए बताया है कि-प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में राजा 
को 'इन्द्र वरुण” आदि अनेक नामों से सम्बोधित किया गया है। ऋग्वेद के अतिरिक्त यजुर्वेद 
में भी राजा को विभिन्न दंवी-शक्तियां, शक्ति एवं बल प्रदान करें इस प्रकार की भी प्रार्थना 
की गई है- हे राजन्‌ ! सविता तुझे आज्ञा प्रसारित करने के लिए, अग्नि तुझ्ले गहस्थों की 
रक्षा के लिए तथा सोम तुझे वनस्पतियों की रक्षा के लिए, वहस्पति तुझे वाणी के लिए 
तथा वरुण धर्म की रक्षा के लिए बल प्रदान करे ।' इसके अतिरिक्त “ऋग्वेद” के समान ही 
यजुर्वेद में भी राजा को, इन्द्र तथा वरुण को क्रमशः सम्राट्‌ तथा राजा कह कर संबोधित 


१. अहं राजा वरुणां”ड । ऋ ग्वेद, मंत्र २, सु० ४२, मंडल ४। 
महूमिन्द्रा वरुण: *ह*हल । ऋग्वेद, मंत्र ३, सु० ४२, मंडल ४। 
राजा वरुण: हट । ऋग्वेद, मंत्र १३, सु० २४, मंडल १॥। 


त्वमग्ने राजा वरुणां घृवब्नतत्त्वं । ऋग्वेद, मंत्र ४, सु० १, मंडल २। 
सो अस्मान्‌ राजा वरुणोमुमोक्तु | ऋग्वेद, मंत्र १२, सु० २४, मंडल १॥ 
२. सवितात्वा सवतां सुवतामग्निग हपती नाम सोमो वनस्पतिनाम्‌ । 


वृहस्पतिपचि इन्द्रो ज्येष्ठाय रूदः पशुम्यो मित्र सत्यां वदुणां धर्मपतीनाम्‌ 
यजुब व, मंत्र ३९, म० ९ ॥ 


[ २५ ] 


क्षिय्रा है अवातू तम्राट्‌ इन्द्र होता है तथा राजा वरुण +' इत्तना ही नहीं अधथर्ववेद में भी 
राजा को मिन्नामिन्न देवी-देवता का अंश कहा गया है /* इसी ग्रन्ध में एक स्थान पर राजा 
को विष्णुपद के नाम से सम्बोधित किया गया है ।१ वैदिक ग्रन्थों के अतिरिक्त ब्राह्मण ब्रन्यों 
तर भी इसी प्रकार के उल्लेख प्राप्त होते हैं। इन सभी विवरणों से स्पप्ट है कि राजा में 
दवी अस्तित्व रहता है। तिंत्तिरिय ब्राह्मण” से एक उदाहरण लिया जा सकता है ।॥ कथा का 
सारांश इस प्रकार है--'प्रजापति ने इन्द्र को देवों का राजा बनाने की इच्छा प्रकट की । 
इन्द्र ने राजपद प्राने के योग्य बनने के लिए प्रजापति से उनके तेज के प्राप्त के निमित्त 
याचना की, जिसके प्राप्त करने के उपरान्त इन्द्रदेवों का राजा बन गया, यद्यपि वह देवों 
में सबसे छोटा था |” वाल्मीकि रामायण में राजा को पृज्य कहा गया है-'राज़ा देव है, 
वह इस पृथ्वीतल पर मनुप्य शरीर धारण करके विचरण करता है। इसलिए राज़ा की 
हिंसा नहीं करनी चाहिए, उसकी निन्‍दा नहीं करनी चाहिए, उसका तिरस्कार नहीं करना 
चाहिए तथा उसके प्रतिकूल नहीं बोलना चाहिए, क्योकि राजा देव है, वह मनुष्य रूप घारण 
कर इस भू-मडल पर विचरण करता है! ।* अयोध्याकांड में एक श्लोक में राजा के लिए 
लिखा है कि 'राजा सत्य है, धर्म है और कुलमानों का कुल है, राजा माता-पिता है, वह 
मनुष्य का हित॑षी है! ।* महाभारत के शांतिपवं में राजा के स्वरूप के विषय में इस प्रकार 
लिखा गया है--'इसकी उत्पत्ति, यम, कुवेर, वरुण, इन्द्र, अग्नि देवों से हुई हैं ।" आादि- 
शास्त्रवेत्ता मनु ने भी राजा की उत्पत्ति इस प्रकार से बताई है-/ईश्वर ने इस समस्त जगत 
की रक्षा के निमित्त, इन्द्र, वायु यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र तथा कुबेर की शाश्वत 


इन्द्रतच सम्राट वदणरय राजा'“+ यजुवेद मंत्र २७, ख्ृ० ८ । 
४२... इन्द्रस्य मागस्य, । सोमस्य म/गस्थ । वरुणस्थ मागस्थ । मित्र वरुणायां मागस्थ। 
ममस्य सागस्य | पितृणा मस्गध्थ । देवस्य सवितुसागस्थ । अयंबबेद मंत्र ८-१४, सु० 
प, का० १११॥ 
३ वि:णां : क्रमाउसि' , अयजंबेद मंत्र २५, सु० ५, का० १०॥ 
तंत्तिरीय ब्राह्मण वर्तता-१*२, भनु० आ० १०, अ० २ अष्ठ २। 
४५ तान्नहिसयान्न चाकरांशस्नक्षियेन्नप्रिय वदेत । 
देवा मानुष रूपेण चरस्त्येते मही तले । किष्किन्ध्याकाण्ड, इलोक ४२, स० (१८॥। 
६. राजा सत्यं चर धर्मश्च राजा कुलवतांकुलूम्‌ । 
राजा माता पिता चेव राजा हिंतकारी नृणाम । 
क्षयोष्याकाण्ड, इछोक रे४, स० ६७ । 
७. कुरुते पंच रुपरणि काल युक्तानियः सदा । 


मवत्याग्निस्तयादित्यां. मृत्युवेश्रवर्णांयसः ।) 
महामारत, इलोक ४१, अ० ६5 इांतिपर 


[ २१६ ।] 
माश्नाओं अर्थात सारभूत अंशों को निकाल_कर राजा का निर्माण किया! ।* “बृहस्पतिस्मृति 
में भी राजा की उत्पत्ति की कथा ऐसी ही प्राप्त होती है-राजा की उत्पत्ति सोम, अग्नि 
मूर्य, वायु, इन्द्र, कुवर तथा यम के तेजमय अंशों को संग्रहीत करके हुई है' ।' आचार्य कौटिल्य॑ 
अपने “अर्थशास्त्र” में राजा के विपय में लिखते है+-'इन्द्र तथा यम दोनों पद एक ही में 
समाविष्ट हैं तथा राजा का अपमान करने वाले व्यक्ति को ईश्वर का दंड भोगना पड़ता 
है।' “विष्णुंपुराण” में शाजा वेन ने कहा है--'ैह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, वायू, यम, सूर्य, 

वरुण, पूपा, पथ्वी, तथा चन्द्र और इसके अतिरिक्त जितने भी देव शाप एवं ऊईंपा करने में 
समर्थ हैं, वे सभी राजा के शरीर में निवास करते हैं ।” परम. भागवृत कहलाने वाले गुप्त 
शासकों की भी दैवी नामों से सँवोधित किया जाता था। समुद्रगुप्त के .शिलालेख में 
अचित्यपुरा शब्द को प्रयोग हुआ है। जिसकी. प्रयोग संस्कृत साहित्य में. ईश्वर, के लिए 
होता था । 


ि दर ब्>ः 


उपयुक्त विवेचन द्वारा स्पष्ट है.'कि राजा की उत्पत्ति कैसे हुई। अब 'तृथ्वीसर्ज 
रासो? में आए हुए शासकवर्ग का“वर्णन प्रस्तुत कर उनकी ऐंत्रिहोसिकता पर विचार 
किया जावेगा | -. : वेग औ पके 


अजयसिहु-कंवि चेन्दवरदायी 'पृथ्वौराज रासो के अनुसार चौहान वंश में राजा मोहस्त 
के उपरान्त पचिवी पीढ़ी में राजां| अजयसिंह उनके उत्तराधिकारी हुए ।! कवि ने चौहानों 
की वंशावली का विवरण प्रस्तुत 'करते हुए इनके नाम मात्र का उल्लेख किया है । रा०ए०सो० 





रु 


१, रक्षा मस्य सर्वस्य रॉजानंम सुजत्पभु।। इईछोंक ३, अ० ७। 
इन्द्रानिछयमा कर्णिमस्नैज्चर्य वंरुणस्पच । ते 
चन्द्र विते दयोइचेव मात्रा निहृत्यशाइवती: । मानवर्धर्म शास्त्र, इछीक ४, अ०:७। 
२. सोमामग्न्यर्कानिलेन्द्राणा वित्ताप्प्योयम्स्थ च। बृहस्पति स्मृति, इलोक .६,०का०:४ । 
तेजां मांत्र समुद्धस्य राजां मूर्तिहिन्मिता । वृहरपतिस्मृति,दलोक -७, क्वा० ३-६ 
है. इन्द्रयम स्थानमेतद्राजानः । अर्थशास्त्र वार्ता १०,,झ० १३, अधि० ,१। , 
तानवमन्य माना देवी उपि दंडःस्पृशति ।. स्‍रलर्शशास्त्र वार्ता १६, अ० $३, अधि, ६४ 
४. ग्रह्मा जनार्दनः दाम्भुरिन्ध्रां बायुयंमां रविः। ह ट 
हतभुग्वर्णांधाता पुषा  भूमिनिनेशाकरः ही 
एते चान्ये चे ये देवाः शापनुग्रहकारिणः । 
नृपस्थैते द्ारीस्था: सर्वदेव यमो नृपः॥ * 
जद विष्णुपुराण, इलौंक ३०२१, अ० १३, अंडा ६। 
४. अचित्य पुरुष धनद वरुणेन्द्रान्कक समस्पें छोक घाम प्ररेयहेतु ॥ 7 5 
! >-प्रयाग स्तम्म अभिलेख, समुद्रगुप्त । 
६. पृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणों समा, छं० २८५ स० १। 


ही» 


7९. 


[| २७ ] 


लंदन की रासो की अप्रकाशित प्रति में भी इनका नाम दिया हुमा है । किन्तु अजयसिह को 
नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित रासो के अनुसार मोहन्त का पुत्र नहीं लिखा है। इस 
प्रति के अनुसार इनके पिता का नाम महादेव था ।* घारणोज की प्रति तथा साहित्य संस्चान, 
उंदयपुर, से प्रकाशित पृथ्वीराज रासों इनके विषय में सवंथा मौन है। शिलालेख और 
(पृथ्वी राजविजय महाकाव्य' में दी हुई वंशावलिमों में एक जयराज नाम के राजा का उल्लेख 
हुआ है। 'प्रबन्धकोष' तथा सुर्जन चरित में अजयराज नाम मिलता है ।' सम्भव है यह एक 
ही व्यक्ति के नाम के तीन रुपान्तर हों । सामग्री अभाव में निश्चित मत प्रस्तुत करना कठिन 
है । 'हम्मीर महाकाव्य' इनके विषय में सर्वथा मौन है । 


अनंगपाल--रासोकार के मतानुसार राजा बमनंगपाल का जन्म पांडवों के वंश में हुला 
था। पांडवों ने एक बार जमुना नदी के किनारे हस्तिनापुर नाम का एक ग्राम बसाया था। 
कालान्तर में राजा अनंगपाल तूथेर ने भी इसी स्थान पर दिल्‍ली वसाई तथा वहाँ नर-नारी 
सुख पूर्वक निवास करने लगे ।' एक बार राजा अनंगपाल पर कमधज्ज ने म्राक्रमण कर दिया 
सूचना प्राप्त होने पर मपनी विशाल सेना लेकर कालिन्दी की उत्तर दिशा में राजा मनंगपाल 
ने श॒त्नु का सामना किया । अजमेर पति सोमेश्वर को कमधज्ज के आक्रमण की सूचना मिलने 
पर्‌ उसने, भी राजा अनंगपाल की सहायता दिल्‍ली की ओर प्रस्थान किया। राजा 
अनंगपाल तथा सोमेश्वर की सम्मिलित वाहिनी ने कमधज्ज की सेना को परास्त कर दिया । 
विजय के नगाड़े वज उठे। दोनों राजा सुख पूर्वक दिल्ली जा गए। राजा अनंगपाल ने 
सोमेश्वर की वीरता से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया । राजा अनंगपाल 
के दो पुत्रियाँ थीं, एक का नाम सुन्दरी था जिसका विवाह कनवज्ज के राजा विजयपाल से 
चिर मंत्रि के सूत्र में बंधने के लिए कर दिया था तथा दूसरी पुत्री का नाम कमला था जिसका 
विवाह सोमेश्वर की वीरता से प्रसन्न होकर, उनके साथ कर दिया था। कालान्‍्तर में इन्हीं 
से महाराज पृथ्वीराज चौहान का जन्म हुआ था- 


अनंगपाल पुत्री उपय। इक्त दीनी विजपारू ॥ 
- * ८ « “ इक दीनी सोमेस को। बीज बबन कलिकाल ॥ ६८१ स० १॥। 
5 । |. एक नाम सुर सुन्दरी। अनिवर कसला नास ॥ 
दरसन सुर नर दुल्लही ) सनो सु कलिका कास ॥ ६८२ स० १॥ 
हि सोमेसर तोअर घरति । अनंगपाल पुन्नीय ॥॥ 
- .. तिन सु पिथ्य गर्म घरिय | द।नव कुल छत्तिय॥ ६८४ स० ११ 





१. पृथ्वीराज रासो, आदि समय, रा० ए० सो० लंदन, की अप्रकाशित प्रति । 
२. देखिए, प्रस्तुत शोघ-प्रबन्ध, परिश्चिष्ट । 

३. पृथ्वीराज रासो, छं० ५६९-५७०, स० १॥ 

४. वही; छं० ६१७ स० ११ 


[ £१८ ] 


महाराज पृथ्वीराज की जन्म दिल्‍ली में ही हुआ था। अतः पुत्री के पुश्र॒ उत्पन्न 
पर राजा अनंगपाल अत्यन्त प्रसन्न हुएं तथा नगर में नाना प्रकार के उत्सव मनवाए ।* 


० 
हांन 


'दिल्‍ली किल्‍ली कथा में प्रन्यकार ने लिखा है कि “एक बार ण्थ्वीराज को स्वप्न 
में देवी ने दर्शन दिया जिसका फल ज्योतिपषियों ने यह वत्तलाया कि पृथ्वीराज दिल्‍ली का 
शासक होगा । यह सुनकर पृथ्वीराज की माता कमला ने अपने पुत्र को एक प्राचीन कथा 
इस प्रकार सुनाई-'हमारे पूर्व पुरुष राजा कल्हन चन्वबन में (जहाँ आज कल दिल्‍ली बसी 
है ) आखेट के लिए गए थे । उस समय उन्होंने एक शशक के पीछे अपना श्वान छोड़ दिया । 
श्वान उसकी गंध के द्वारा उसका पता लगाता हुआ उसके पीछे-पीछे भागा । आगे जाकर 
शर्शक श्वान का सामना कर बैठा, जिससे वेचारा श्वाने डरकर भोग गया । यह अद्भुत 
दृश्य देखकर सव साथियों तथा राजा कल्हन को अत्यन्त आश्चर्य हुआ । जगजाति व्यास में 
शीघ्र ही मुह्तं देखकर उसी स्थान पर शेपनाग को सिद्ध करके अच्छ पत्थर की एक कीली 
गाड़ दी ।' राजा कल्हन ने अपने स्वजनों सहित उस स्थान पर एर्क नगर बसाया जिसका 
नाम 'कल्हणपुर” रक्‍्खा गया। राजा कल्हन के कई पीढ़ियों के बाद अनेंगंपाल का जन्मे 
हुआ । जब राजा अनंगपाल ने उपयुक्त घटना का वृतान्त सुनी तो उन्हें अंत्यन्त आप्चय 
हुंआ जिम्तका समाधान ज्योतिषियों कें द्वारा कर दिया गया। एंक बार राजा अनगेपाल 
ने एक गढ़ बनवाने की इच्छा प्रकट की | ज्योतिषियों ने शुंभ मुहूर्त देखकर नींव रखने के 
समंय एक लोहे की कील पृथ्वी में गाड़ दी और कहा कि यह कौल शेपनाग के मस्तक 
( फन ) पर स्थिर हो गई है, जिंसके कारण तोमर वंश का राज्य कील की भाँति अचल 
एवं दृढ़ रहेगा । राजा अनंगपाल को पुरोहित की बात पर विश्वास न हुआ तथा उस कील 
का उखड़वा कर, उनके कथन की सत्यता देखनी चाही । कील के निकलते ही उस स्थान 
से खून को घार निकली। यह देखकर राजा अनंगपाल अत्यन्त दुखी हुए तथा वह काल 


पुनः उसी स्थान पर स्थिर करनी चाही किन्तु वह ढीली रह गई इसी से दिल्‍ली का नाम 
'ढीली' पड़ा तथा 'ढीली' से 'ढिल्ली' तथा अब “दिल्ली” हो गया है । 


उपयु कत आाख्यान में कितना सत्य है यह कहना तो बड़ा कठिन है किन्तु इतना अवश्य 
सत्य है कि अनंगपाल ने दिल्‍ली को वसाया और दिल्‍ली में तोवरों का राज्य था। इस बात 
का साक्षी इतिहास भी है तथा रासौ के अन्य संस्करण भी समर्थन करते हैं 


ऊुँछ समयापरान्त राजा अनंगपाल के दूत ने एक पत्र मंत्री कैमास के हाथों में दिया । 
पत्र मे राजा अनंगफल ने अपनी बेटी के बेटे पथ्वीराज को लिखा था कि अब मैं वबद्ध 





१. पृथ्वीराज रासो/ छं० ६८९, समये १।॥ 

२. वहो, ना० प्र० स० काशी, छं० १५-२५, स० ३॥ 
दे, वही, छं० १७-४०, स० ३ 

ड 


* दिल्‍ली दान प्रंस्ताव, पृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणी समा, काशी छं० १ स० १८! 


[ २९ ] 


गंधा हूँ । बर्द्धिकाश्रम तोर्थयात्रा करना चाहता हूं, मेरा जो कुछ है, सब तुम्हें समर्प ण करता 
हैं ।' पृथ्वीराज चौहान द्वारा पूछे जाने पर कि ताना जी को वेराग्य क्यों हुआ' दूत ने राजा 
अंतंगपाल का प्रताप वर्णन करके कहा' कि राजा अनंगपाल ने रात्रि में एक स्वप्न देखा 
कि तोंवर वंश दक्षिण दिशा को जा रहा है। इसी कारण उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ है।' 
प्रात: जागने पर अनंग्रपान्ल ने हरि-हरि शब्द का उच्चारण किया ।” स्वप्न का फल ज्योत्ति- 
षियों से पूछते पर व्यास ने ध्यान करके कहा कि दिल्‍ली में चौहानों का राज्य होगा । अतः 
यदि तुम भला चाहो तो तप करके स्वर्ग का मार्ग लो" व्यास की वाणी सुनकर रः 
अनंगपाल ने मन में विचार किया कि यदि कोई पुत्र होता तो वह भूमि की रक्षा करता | 
अत: भव तो यही उचित है क्रिि सब भूमि पृथ्वीराज को देकर वनवास करना चाहिए । 
मंत्रियों ने राजा जनंगपाल को बहुत समझाया कि राज्य देना उचित नहीं है ।* किन्तु राजा 
में मंत्रियों के कथन पर कान नदिया और पश्र लिखकर मुझे आपके पास अजमेर भेज 
दिया ।* अन्ततोगत्व राजा अनंगपाल ने दो दिन अपार उत्सव मना कर, शुभ लग्न में, बड़ी 
तैयारी और विधि के साथ, पृथ्वीराज का राज्याभिषेंक अपने हाथों से कर दिया ।*" अनंगपाल 
ने अपने हाथों से राज-तिलक करके बदरीनाथ की यात्रा की ओर-प्रस्थान किया ।" दिल्‍ली 
राज्य पृथ्वीराज को मिलने की सूचना पाकर अजमेरफ्ति सोमेश्वर अत्यन्त प्रसन्न हुए तथा 
पृथ्वीराज अपने समस्त श्रेष्ठ सामन्तों के साथ दिल्‍ली में सुख पूर्वक राज्य करने लगे ।"' 
प्रत्थकार के मतानुसार अनंगपान्न ने पृथ्वीराज को दिल्‍ली राज्य अनन्द सम्वत्‌ ११६८ में 
दिया था । 


कुंछ समय के उपराम्त अनंगपाल की प्रजा ने बद्विकाश्रम में जाकर पुकार की, कि पृथ्वीन:ज 
मे हमें घर से निकाल दिया है तथा आपका भी प्रभाव नहीं मानता । यदि राजा के जीवित 
रहते हुए प्रजा पराधीन होती तो यह न न्याय है, भऔर न नीति ही। ऐसे राजा व सत्रत्र 
निन्‍्दा होती है तथा अंत में वह नरक का भागी होता है | 


प्रजा की बातं पुकार सुनकर जअनंगपाल का तेज ज्वाज्वल्यमान हो उठा तथा दिल्‍ली 


१. दिल्‍लो दान प्रस्ताव, प्रृथ्वों राज रासो, नागरी प्रच, रणी सभा, काशी; &ं० २ स| रैम ' 
२, यही, छं० १०, स० १८।॥ ३. वही, छं० १३, स० १८।॥ 
४. वही, छ० १५, स० १८। ५. चही, छं० १६, स० १८। 
६. बही, छं० १९, स० १८। ७. वही, छं० २१, स* १८5१॥ 
८. घही, छ3 ३२, स> प८। ९. वही, छं + ३३, स> १८१ 
१०. चही, छं> ४०-७४, स> १८६। १५१. वही, छ> ९६, स> ८ । 


१९. वही, छं० १०४, सं० १६॥। 
१६, पथ्वीराज रासो, माधोमट्ट कथा, नागरी प्रचारिणी समा काशी; छ8०११८5-११९; सं> १९। 
१४. पृथ्वीराज रासो, साहित्य संस्थान उदयउर, छ० रहें, सः २६॥ 


[ ३० ] 


दूत भेजकर कहलाया कि घन्य, धान्य, द्रव्य, सव ले आवो (पृथ्वीराज की दिल्‍ली पुनः लौटाने 
के लिए कहला भेजा) ।' किन्तु पृथ्वीराज ने दूत को घिककार कर लौठा दिया।" अतः 
राजा बनंगपाल ने समाचार सुनकर दूत के समझाने पर भी दिल्‍ली पर आक्रमण कर दिया ।' 
राजा अनंगपाल ने दिल्‍ली पर आक्रमण कर तो दिया किन्तु उसे प्राप्त करने में असमर्थ 
रहा ।* अपनी सेना को निर्वल देखकर उसने गजनीपति गौरी की सहायता के लिए नीतिराव 


खतन्नी को भेजा-- 


नीतिराव खिन्री सुबर , तुअर निहि परधान। 
गोरी दिसि नृप अप्प दिसि , मदे दियो चहुआन ॥" 


यद्यपि पृथ्वोराज चौहान ने राजा अनंगपाल को बहुत समझाया किन्तु वह अपनी बात 
पर इटा रहा । राजा अनंगपाल ने पुनः गोरी की सहायता से दो सहस्त्र सैनिक लेकर भाक्रमण 
किया ।' दोनों दलों ने सम्मिलित होकर पृथ्वीराज पर आक्रमण किया । पृथ्वीराज ने अपने 
सामन्तों को आज्ञा दी, कि युद्ध में राजा अनंगपाल मारा न जाये तथा शाह को भी जीवित 
ही वन्दी बना लिया जाय ।" अन्त में शाह युद्ध करता हुआ वीर चामण्डराय के हाथों बन्दी 
बना लिया गया तथा अनगपाल भी युद्ध में पराजित होकर वन्दी बना लिया गया । पृथ्वीराज 
की विजय हुई । सत्र सामन्तों के साथ दिल्‍ली लौटने पर पृथ्वीराज ने दरवार किया, उसमें 
मत्री कमास ने आज्ञा दी कि राजा अनंगपाल को पृथ्वीराज के सम्मुख प्रस्तुत किया जावे । 
अनगपाल के आने पर पृथ्वीराज ने उनके चरण स्पर्ण किए तथा विशेष प्रेम पूर्वक हृदय से 
सम्मानित कर भक्तिभाव का प्रदर्शन किया-- पर 


मुसलमान घर गड्डि , दाग निज सुभर दिवायी। 
लिये जीति प्रथिराज , समह सामंत घर आयी ॥॥ 
समा वंठि मर सूमर , कह्यो कंसास राह ग्रुर। 
अनगेसह्‌ ले आउ , चल्यी मंत्री सुलेन घर।॥ 
आान्‍्यो सु राज अनगेस तहें, प्रथिराज रूग्गौ सु पय ॥ 
सनसान प्रान अति प्रीति सी, भाव मगति राजन करय ॥* 


की 


अनंगपल सभय, पृथ्वीराज रासो, साहित्य संध्यान, उदययुर छं० २५, स० २६ ; 
२. बही, छ० ३१, स० २६। ३ वही, छ० ३४, स० २६। 

४, यही, छं० ३७, स० २६। ५. वही, छं० ४१, स० २६। 

६. वही, छं० ५०, स० २६। ७, वही, छं० ६०, स० २६ । 

८. बहोी, छं० ६३ स> २६१॥ 

६. यही, छं० धथ स०, २६ ॥ 


[ ३१ ] 


5. राज भेगेंगपाल ने दिल्‍ली में एक वर्ष एक माह पृथ्वीराज के साथ रुख पूर्वक व्यतीत 
ऊर पुनः वद्धिंकाश्रम जाने की इच्छा प्रकट की । पृथ्वीराज ने दिल्‍ली में रहने का ही हट किया 
किन्‍्तू अनंग्रपाल न माना तब पृथ्वीराज मे धर्म-कर्भ के लिए दस लक्ष का प्रव्प दिया और 
सौ सेवक, , एक रथ, ग्यारह विश्व साथ में देकर वद्रिकाश्र॒म उन्‍हें सकुशल भंज दिया । राजा 
भनेंगपाल ने बद्रिकाश्रम पहुंच कर उम्र तपस्या की-- 


हक 


€ फैह्ी सुत सोमेस , राज अनगेस ले सानो। 
5 *. घपु साधन तप काज , बद्रि दिसि सनछा ठानी ॥॥ 
तब पुत्री वर पुत्र , लख्ख दह द्रव्य सु अप्पी। 
सत अनुचर इक जांन , विप्र दस एक समप्पो। 
चल्ल्यो अनंग बद्रीसरन, पहुचायौ प्रथिराज नृप । 
तहं जाइ राज -तोवर सुबर, तर्प॑ राज उग्रह सु-त्प ॥'* 


ऐतिहासिकता--श्री 'अमृतलाल शौल, पृथ्वीराज के दिल्‍ली गोद जाने वाली घटना को 
असल्य एवज्अनैतिहासिक सिद्ध करते हुए लिखते हैं कि--'इससे यह श्रमाणित होता है कि र. न्‌ 
4६३ ई०'से कुछ पहले-वीसलदेव ने दिल्‍ली को जय किया था | इससे यह भी प्रमाणित 
-होश्म, है कि सोमेशएवर के राण्यकाल में. दिल्‍ली में अजमेर का कोई करदाता राज्य करता था 
'अथवा अजमैंर राज्य का कोई वेतनभागी सामन्त चहाँ का दुर्ग रक्षक था। पृथ्वीराज अजमेर 
'कै युवराज' थे । उनका अपने पिता के अधीन किसी करदाता राजा अथवा उनके नौकर दुग- 
रक्षक के घर गोद जाना केवल असम्भव हो नहीं, अश्वद्ैय भी प्रतोत होता है' ।' 


- * अुयवृहाहुर ओझा उपयुक्त रासो को घटना को काष्पतिक एवं अनतिहासिक मानते 
हए लिखते हैं कि 'तर्व॑रों ने पुराने इन्द्रश्रत्थ के स्थान में दिल्‍ली वसाई, यह प्रसिद्धि चलो 
भाती है ।, दिल्‍ली के वसाने' चाले राजा का नाम अनंगपाल श्रसिद्ध है। फिरिश्ता हि० स० 
३०७ ( वि6 स॒ं> ९७६-७७ 3 में तंवर वश के राजा वादित्य ( या वादपिता ?ै का नाम 
अशुद्धू है) का कस्बा इस्द्रप्रस्थ वसाना उसका हिल्‍ली (दिल्‍ली) नम से प्रसिद्ध होना तथा 
उस राजा के पौछे आठ तंवर राजाओं का होना लिखता है। उसने अंतिम राजा का नाम 
शोलिंवान ( शालीवाहन ) बतलाया हैं । घंवरों के पीछे घहाँ चौहानों का राज्य होना तथा 
उस वंश के मौनकदेव, देवराज, रावलदेव, जाहरदेव, संहरदेव ओर पिथोरा ( पृथ्वीराज ) 
का वहाँ क्रमश: राज्य करना भी फिरिश्ता ने लिखा है, परन्चु फिरिश्ता का लिखा हुआ 
हिन्दुओं का पुराना इतिहास जैसा कल्पित है वैसा ही यह कथन भो कल्पित ही है, क्योकि 





१. अनंगपाल समय, प्रृश्वोराज रासो, स.हित्य संस्थान उदयपुर, छं० ८१ 8 के 
२. चन्दवरदाई का प्थ्वीराज रासो, सरस्वती, भ.ग २७, संस्या ५, जून, १९२६ ई< 
पृष्ठ ५५६। 


[ है ] 


तंवरों से दिल्‍ली, चौहान भाना के पुत्र विग्रह राज ( बीसलदेव चौथा ) ने वि० सं० १२०७ 
( ई० सं० ११४० ) के लगभग ली और तब से ही दिल्‍ली का राज्य अजमेर के राज्य का 
सत्रा बना ।” विद्रह राज के पीछे ऊपर लिखे हुए राजा नहीं, किन्तु अभर गांगेब ( अपर 
गगिय, अमर गंगू ), पृथ्वीराज दूसरा ( पृथ्वीभट ), सोमेश्वर बौर पृथ्वीराज ( तोसरा ) 
ऋमण: अजमेर के राज्य के स्वामी हुए । 'अवुलफजल दिल्‍ली के बसाए जाने का सम्बंत्‌ 
८२९ मानता है” यह भी विश्वास के योग्य नहीं है । यह प्रसिद्धि चली आती है कि तंवर 
अनंगपाल ने दिल्‍ली को बसाया । उसी ने वहाँ की विष्णपद नाम की पहाड़ी पर प्रसिद्ध 
लोहे की लाट का जिसको कीलो भी कहते हैं और जो वतंमान दिल्‍ली से ९ मील दूर 
मिहरीली गाँव के पास कुतुबमीनार के निकट खड़ी है, उठाकर वहाँ खड़ी करवाई थी। 
उक्त लाट पर का प्रसिद्ध लेख राजा चन्द ( चन्द्रगुप्त दूसरा ) का है, जिसने उस लाट को 
टकक्‍त पहाड़ी पर विष्णु के ध्वज रूप में स्थापित किया था । उस पर पिछले समय के छोटे- 
छोटे और भी लेख खुद हैं जिनमें से एक 'संवत दिल्‍ली ११०९ अनंगपाल वही” है । उसके 
अनुसार उक्त लेख के खुदवाए जाने के समय अनंगपाल को उक्त सम्बत्‌ में दिल्ली 
बसाना माना जाता था। कुतुबुद्दीन एवक की मसजिद के पास एक तालाब की पाल पर 
अनंगपाल के बनाए हुए एक मंदिर के स्तम्भ अब तक खड़ हैं, जिनमें से एक पर अनंग्रपाल 
वा नाम भी खुदा है। पृथ्वीराज रासो के कर्ता ने अनगपाल की पुत्री कमला का विवाह 
अजमेर के चौहान सोमेश्वर के साथ होना गौर उसी से पृथ्वीराज का जन्म तथा उसका 
कअ्षपने नाना अनंगप्राल का राज्य पाना आदि जो लिखा है, वह सारी कथा कलल्पित है । 
पृथ्वी राज की माता दिल्‍ली के अनंगपाल की पुश्नी कमला नहीं, किन्तु चेदि देश के राजा की 
पुत्नी कपूर देवी थी ।, * ह 

डॉ० माताप्रसाद गुप्त भी, पृथ्वीराज को दिल्‍ली दान स्वरुप प्राप्त होने की घटना 
को अप्रामाणिक एवं बनेतिहासिक मानते हुए लखते हैं कि--'दिल्‍ली बीसलदेव ( विग्रह राज ) 
के द्वारा ही जो कि आनल्लदेव (अर्णपोराज ) का पुत्र था-विजित हो चुकी थी, यह 
सोमेश्वर के सं० १२२६ के विजोलियाँ के शिलालेख से दिया हुआ है। सं० १२२० का 
वीसलदेव ( विग्रहराज ) का दिल्‍ली ( सिवालिक ) स्तम्भ पर का अभिलेख भी इस बात 
का प्रमाण है कि वह सं० १२२० के पूर्व उसके अधिकार में श्रा चुकी थी | हांसी प्रदेश पर 
_ उसके पूर्वजों का शासन था, वह तोमरों के शासन में नहीं थी ।* 
नागरी प्रचारिणी पत्रिका, माग १, पृ० ४०४५ भौर टिप्पणी ४३। 
चहा, नाग १, पृ० ३९३ । 
वही, नाग १, पु० ३६९-४०० । 
राजपूताने फा इतिहास, जिल्द १, पृ० २६५-६७ वेंदिक मंत्रालय, अजमेर, ट्वितीव 
संस्करण, १९३७ । 
४. ढां० माताप्रताद युप्त, पृ्योराज रासो की ऐतिहासिकता और रचना तिथि; राष्ट्रकवि 

मेंविलोगशरण गुप्त जनिनन्‍्दन ग्रन्य; पृ० ९१५३-५४; २ अक्टूबर, १९५९। 


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जहाँ एक भोर डॉ गुप्त दिल्‍्लीदान कथा को अश्रामाणिक मानते हैं वहीं उन्होंने यह 
भी स्वीकार किया है कि दिल्‍ली पर चौहानों के पूर्व तोमरों का राज्य था--'चाहमानों के 
पूर्व अवश्य दिल्‍ली पर तोमरों का शासन था | सं० १३३७ का गयासुद्दीन बलवन छा वाहेर 
(जिला रोहतक) प्रलम बावज्ी का एक शिक्षा लेख है, जिसमें कहा गया है कि हरियाना 
देश पर पहले तोमरों का शासन था, तव चाहुवानों का और उनके वाद शक ( तुर्क ) राजानों 
का हुआ, जो गहावुद्दीन से प्रारम्भ होता है । सं० ११८९ में 'पाश्व॑ चरित्र” की रचना करते 
हुए उसके रचयिदा श्री धर ने अनंगपाल ( तृतीय ) तोमर के राज्य-चंभव का चर्णन किया 
है इसलिए जिस अनंगपाल तोमर के सम्बन्ध में रासो में उपयुक्त कल्पना की गई है उसका 
समय स० ११८९ के लगभग पड़ता है! ।' 

डॉ० दशरथ शर्मा ललित विग्नद राज! नाटक के आधार पर कल्पना करते है कि 
दिल्‍ली के अंतिम तोमर शासक ने अपना राज्य वीसलदेव ( चतुर्थ ) को अपनी पुत्री के दहेझ 
में दिया था, यही कथा सम्भव है रासोकार ने भ्रमवश उनके छोटे भाई सोमेश्वर के साथ 
जोड़ दी है ।' तथा एक अन्य स्थान पर लिखते हैं कि 'सोमेश्वर की स्त्री को अनंगपाल की 
पुत्री अवश्य वत्ताया गया है । परन्तु सम्भव है कि वे पृथ्वीराज की विमाता हो । [दल्ल। के 
वीसलदेव के अधीन होने पर भी तोमर राजाओं का वहाँ रहना सभव है! ।' 


७ विराव मोहन सिह राजा अनगपाल को पृथ्वीराज का समकालीन तथा पृथ्वीराज 
रासो की घटना को सत्य प्रमाणित करते हुए लिखते हैं कि 'अब यह देखना है कि बि० सं० 
१२१३ से लेकर १२२९ तक दिल्‍ली पर अनंगपाल नामक तोंचर शासक था कि नही? 
अनंगपाल के नाम दिल्‍ली के कई स्तम्भों पर उपलब्ध है, लेकिन उनमें सवत्‌ नहों है । केवल 
कृतुदुद्दीन ऐवक की मसजिद के अहाते में जो लोहे का स्तम्भ पड़ा हुआ है, उसे। पर उसके 





१, डॉ० माताप्रसाद गुप्स, पृथ्वीराज रासो की ऐतिहसिकता ओर रचना तिथि; राष्ट्रकवि 
मेंथिलोशरण गुप्त अभिननन्‍दन ग्रन्थ, पु० ९४५४। 

2. “कप 5 40 ग्र०० छ0घजेड पा एच फ्रांहध। 8५७ फेशशा बढाए३) हास्का गया 
छ0छएए 9ए पार [85९ प्रणाएथ्था 7प्रोधा 06 प्राट एॉग्ट८ १० ए्बपैंट०७, फट कैश 
फण्फ्राक ती $0म्र्योएदा, गण जो।00 प्रीट डगए प्रगांहय पेबेरद 0:८7 प्रथा (पं 
६0 50घाटभाएवाः 9ए 5०6 ।45 7८४८० एी ६७5० २ ६ वैच्था0 किए. छाए 4) 
एाएगोबायांब गरवागे पवा रेडक्येपेटरव बे प्ड्ते इलाएडी४ पेलसा)79०१ 0 खागए) 
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790: ९०ग्एचिव्) (पम्र८ बहुल बगपे प्रोढ सींशण) ० रो छाब्पाणाय ०४५०, पार 
वृगरतीबय वश०गप्डी 90० पछ9, ०. जज, ए८८्टागथ: ४940), 

३. पृथ्वीराज रासो की एक प्राचीन प्रति और उसकी प्रामाणिकता, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, 


कारतिक सं० १९९६ वि, प० रेज्शे-फरे 


[ इं४ |] 


विवय में सम्वत का उल्लेख इस प्रकार है 'संवत दिल्ली'लिखने के पश्चात अंक लिखें हैं । 
इससे यह सिद्ध होता है. कि दिल्ली के संवत ११०९ में इसे (दिल्ली को नए सिरे से या 
जीर्णोद्धार के हप में ) बसाया ।/ उसमें बसाने के स्थान का नाम नहीं आया, परन्तु जहां 
यह लेख लगा है वह स्थान ही अपने वसने की पुष्टि स्वयं कर देता है। यह दिल्‍ली वाला 
सम्बत कौन सा था इस पर विचार किए जाने से निश्चित है कि वही दिल्ली वाला रासों 
में लिखा अनन्द संवत ही है, जिसमें स्वर्गीय पांड्या मोहनलाल जी के मतानुसार ९१ वर्ष 
विक्रमी सम्वत से जो कमी है वे जोड़ देने से वि० स० १३०० में अनंगपाल का दिल्‍ली पर 
होना सिद्ध होता है । 


जिनपाल रचित खरतरगच्छ पदावली का अनुसरण करते हुए-अगर चंद नाहटा, डौ० 
दशरथ शर्मा आदि विद्वान भी वि० सं० १२२३ के लगभग मदनपाल नामक राजा का नाम 
दिल्‍ली के शासक रूप में होना लिखते हैं। मंदनपाल अनंगपाल का पर्यायवाची है। अस्तु 
इससे भी अनंगपाल का समय चहुवान विग्रह ( चतुर्थ ) सोमेश्वर और पृथ्वीराज से आ 
मिलता है। | 


भ्त: स्मरणीय महाराणा प्रताप के उत्तराधिकारी अमर में अपने मित्र रहीम को 
जो पत्र लिखे उनसे भी निश्चय है कि तंवर और राठौर वंश-के -मुख्य स्थान दिल्‍ली और 
कन्नौज का एक ही समय ( २२ वर्ष के अन्तर्गत ही ) में नाश हुआ + के 

अस्तु चाहुवानों से पूर्व दिल्‍ली का शासक तंवर ही था और वह था अनंगपाल तवर 
ही ।”' अत: स्पष्ट है कि राजा अनंगपाल एक ऐतिहासिक व्यक्ति या । 


अरिमंत- पृथ्वी राज रासो' के अनुसार राजा वीरदंड के उपरान्त चौहान वंश परम्परा 
फी १४वीं पीढ़ी में ररजा अरिमंत हुए । इतनी सूचना के अतिरिक्त सम्धूर्ण 'रासो' इनके 
विषय में कुछ भी विवरण प्रस्तुत नही करता | रा० ए० सो० लंदन की “रासो” की प्रति में 
इनका नाम तो मिलता है किन्तु अन्तर इतना है कि यह वीरसिंह के उत्तराधिकारी ये, न कि 
वीरदंड के ।' राजा वीरदड का नामौल्लेख इस प्रति में नहीं हुआ है। धारणोज की प्रति 
एवं साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज रासो' की प्रति इनके विषय में 
सर्वंया मौन हूं । 

पंडित सदाशिव “अरिमंत' शब्द को राजा माणिक्यराय का विशेषण मानते हुए लिखते 
हैं कि--'श्री ओज्ा जी ने 'अरिमंत' इस विशेषण पद से एक नॉमान्तर की कल्पना कर जिस 





१. पृथ्वीराज रासो की प्राम्माणिकता पर पुनविचार, प्रुष्ठ ४१-४३, राजस्थानी भारती 
माग १, अंक ३-३ पुग्मांक जुलाई, अवटूबर सन्‌ १९४६ ॥ 

२. प्रप्वोराज रासों, ना० प्र० स० काशी, छं० २८६, स० ११३ 

3... रासो को ह॒त्तलिखित एवं अप्रकाश्ित प्रति, पु० .१० ॥ 


[| रेश |] 
शैली का प्रदर्शन किया है, वह प्राच्य विधारदों को आश्चर्य में डाल देने वालो है । 'रासो' 
में लिखा हं-- 
अरिसंत सकल कलि करन चूर। 
माणिक्यराय चहुवानसूर ॥' 


५ 


अस्थूलनंद- पृथ्वीराज रासो' के अनुसार चौहान वंश वृलक्ष में २थ्वों पीढ़ी में राजा 
नागहस्त के उपरान्त उनका पुत्र अस्थूलनद हुआ ।' कवि ने ग्रन्थ में इनका विशेष विवरण 
प्रस्तुत नहीं फिया है। रा० ए० सो० लद॒न की “रासो' की प्रति उपयुक्त कथन का समर्थन 
करती है ४ ९ किन्तु 'रासो' की अन्य प्रतियां यथा घारणोज की प्रति, बीकानेर को एक लक्ष 
अक्षर वाली प्रति तथा साहित्य सस्थान उदयपुर से प्रकाशित प्रति. प्राचीन शिला लेख एव 
संस्कृत के ग्रन्थ जिनमें चौहानों की वशावलियां दी हुई हैं इनके नाम का समर्थन नहों 
करते हैं ।* 


आनन्ददेच- पृथ्वी राज रासो' के अनुसार चौहान वंश परम्परा में ४०वों पीढ़ी में राजा 
जयसिंह के उपरान्त उनका एक मान्न पुन्न आनन्ददेव राजगद्दी का उत्तराधिकारी हुआ । 
१०० वर्षों तक सुख-शांति से राज्य करने के उपरान्त इन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र सोमैश्वर 
को सौंप दिया- 


तहां तप्ति तेज आनन्द मेव | बराह रूप दिप्यो सुदेव ॥ 
घरनी बिहार आयास साद । मंड्यो सुराज पुहुकर प्रसाद ॥॥ 
सो बरस राज तप अंत कीन । सिर छत्र सोम पुत्रह सुदीन ॥' 


रा० ए० सो० लंदन की रासो की प्रति, घारणोंज की प्रति तथा बीकानेर की एकलक्ष 
वक्षर वाली प्रति उपयुक्त कथन का समर्थन करती है, किन्तु साहित्य संस्थान, उदयपुर, 
से प्रकाशित 'पृथ्वीराज रासो” इनका कोई संकेत प्रस्तुत नहीं करता है । शिला न्षेख एवं सस्कृत 
के प्राचीन ग्रन्थ जिनमें चौहानों की वंशावली का उल्लेख है, आनन्द देव के विपय में सबंथा 
मौन है ।" पंडित सदाशिव दीक्षित, विग्रह राज, आनन्द देव तथा वीसल देव, आदि नामों में 


पं० सदाशिव दीक्षित, रासो-समोक्षा, पृ० ११४॥ 
पृथ्वी राज रासो, ना० प्र० स० काशी, छं० २८९, स० ११ 
रासो. की हस्त लिखित एवं अप्रकाशित प्रति, पृ० १०१ 
देखिए, प्रस्तुत शोध प्रबन्ध, परिशिष्ट भाग । 

पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काशी, छं० ६१२, स० ११ 
रासो की एक हस्त लिखित एवं अप्रकाशित प्रति, पृ० १३१ 
धारणोज का अप्रकाशित प्रति, आदि समय । 


00720 28% 26 0 0 208 


कि] 


[ $६ । 


कोई अंतर नहीं मानते है वरन्‌ उनका कथन है कि यह सव एक व्यक्ति आर्मन्ददेव के 
थी नाम हैं* 


३७ 


दुसके तौन माम हैं*विग्रहराज, आनन्ददेव और वीसलदेव । शित्तालेख और पृथ्वीराज 
विजय में विश्रहराज, रासो के आनन्ददेव तथा प्रबंध कोप, हम्मीर महाक।ब्य और सुर्जन 
चरित में वीसलदेव । इस प्रकार इसके नाम त्रितव की सत्ता ऐतिहासिक विद्वानों से तिरोहित 


नहीं है । 


अनेक प्राचीन पुस्तकों में 'आनन्दर्दव' के स्थाम पर 'आनन्दभव” मिलतां है जो कि 
सर्वथा अशुद्ध है, क्योंकि 'मेब” पद का कोई अथ्थ नहीं होता । लेखक प्रमाद से देव के स्थान 
पर मेव हो जाना अधिक सभ्भावित है । सामंतदेव, वीसलदेब, सारंगदेव आदि के समान 
आानन्ददेव ही समुचित प्रतीत होता है ।/* 


आनन्दराजः- पृथ्वीराज रासो” के अनुसार चौहामों के वंश वुक्ष की १५ वीं पीढ़ी में 
राजा अस्थूलनद चौहान का पुत्र आनन्दराज हुआ जिसने अस्थूलनंद के उपरान्त राज्यभारे 
ग्रहण कर चौहामों की वंशावली को आगे बढ़ाया ।* अ्न्थकार ने इमके नाम मात्र का उल्लेख 
किया है । रा० ए० सो० सदन की रासो की प्रति उपयु क्त कथस की पुष्टि करती है,' किन्तु 
रासो के अन्य संस्करण, जैसे धारणोज की प्रति, बीकानेर की एक लक्ष अक्षर वाली, प्रति 
एवं साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित प्रति इनके विषय में सर्वधा मौन है । शिलालेख 
एवं प्राचीन संस्कृत के ग्रन्थ भी इमके नाम का समर्थव नहीं करते ।* पंडित सदाशिव दीक्षित 
शिलालिखों के विग्रहराज एवं प्रबंधकोप के विजय+राज को ही भानन्दराज मानते हुए लिखते 
हैं कि 'प्रशस्ति, पृथ्वीराज विजय तथा हम्मीर-महाकाव्य में इसका नाम विग्रहराज बतलाबा 
गया है भर शिंनालेख में थिग्रह, परन्तु प्रबंधवोष तथा रांसों में इनका स्मरण विजयराज 
तेया आनन्दराज इन नामों से किया गया है ।”” संभव है पडित जी को नाम के अंत का 


'राज' शब्द देखकर ही, एक ही व्यक्ति के नाम होने का भ्रम हो गया है। प्रामाणिक प्रमाणों 
के अभाव में पंडित जी का मत ग्राह्म नहीं है । 


आनलराज अथवा आना--पृथ्वी राज रासो के अनुसार चौहान वंश परम्परा में ३८वीं 
पीढ़ी में राजा सारंगदेंव के आनलराज अथवा आना नामक पुत्र ने जन्म लिया। इनकी माता 


व 


१. पं० सदाशिव दीक्षित+रासतो समोक्षा; पृ० १२३ ॥ 

२. प्रच्वीराज रासौ, ना० प्र० स० काश्षी छं० २८९, स० १॥ 
३, रासी की हस्त लिखित एवं अप्रकाशित प्रति, पृ० १०३॥ 
४. देखिए; प्रस्तुत शोघ प्रवन्ध, परिशिष्ट भाग । 

प्‌ 


पं ० सदाशिव दीक्षित-रासो समौक्षा पु० ११७ ह 


[ ३७ ] 


के नौम॑ गवरी था । रोजों सार्रगदेव की पत्ती गवरी रणथम्भ चली गई थीं, वहीं पर राज- 
कुमार आनलराज ने जन्म ग्रहण किया ।' अनलराज ने बड़े होने पर एक दिन अपनी माता 
पे प्रश्न किया कि मेरा जन्म किस वंश में हुआ है-- 


घोर -पुत सातुल सुमति । गवरि सपन्‍नों जाइ॥ 
फो किहि वंसहि ऊपज्ञौ। तू मुझ जंपहि माई ॥* 
माता गंवरी, पुत्र के इस प्रश्व को सुनकर, दुःखो होकर बोली कि हें पुत्र | यदि इस 
प्रश्न को न पूछो तभी अच्छा है, क्योंकि उसके स्मरण मात्र से भय तथा, करुणा उत्पन्न हो 
जाती है ।* आनलराज के अत्यन्त हुठ करने पर गवरी ने वीसलदेव की समस्त कथा कह 
सुनाई तथा अपने पत्ति सारंगदेव की मृत्यु का रहस्य भी समझा दिया । आनलदेव ने अपने 
पिता की मृत्यु का कारण जानकर वीसलदेव अथवा दुंढा दानव को मारने का प्रण किया-- 


सात सुनो तपसिन चचन। अरु दिय असिस पवारि। 
अवदि जाय अजमेर गढ़। अरि कौ आऊँ मारि।' 


आना के प्रण को धुनकर उसकी माता गवरी ने बहुत समझाया कि कुमंत्र मत ग्रहण 
फरो । दुँढा दानव, जो इतना भीषण है, वह तो मनुष्यों को ढुंढ-दुंढ कर भक्षण करता है 
और तुम स्वयं ही उसकी सेवा करने के लिए भाग्रह कर रहे हो ।' किन्तु जाना ने माता 
की एक न सुनी एवं पुनः चीसलदेव के पास जाने का आग्रह किया । आना ने अजमेर के 
भीषण जंगलों में जाकर अपनी बुद्धि की निर्भवता के कारण राक्षस ढुंढ़ा को प्रसन्न कर 
लिया ।( परिणामस्वरूप दानव राजा आना ( अर्णोराज ) को अजमेर का राज्य देकर 
आकाश मार्ग से दिल्‍ली की ओर उड़ गया ।१ राजा आला ने दानव से मजमेर राज्य पुन: 
प्राप्त कर लिया तथा लौट कर समस्त कथा अपनी साता से कह सुनाई। राजा आना ने 
अजमेर को पुन: बसा कर सुख पूर्वक ७१ घर्ष तक राज्य किया । 


अनल ओनि मातह मिल्यौ। कहि सब वत्त सुनाइ॥ 

लोग सहाजत संग ले | मूसि बदसाई जाई ॥( छं० ६०४॥ 
आना नारद अजमेर बास। संमरीय कीन सौक्नन्न रास ॥ 
नियनाम कह्या आना नौरिंद । अरि धरनि वीर मंघो सुदंद ॥ छं० ६०४५ ॥ 





पृथ्वौरांज रासो; नौ० श्र० सं० काशी, छं० ३०८-२१०, स० १। 
बंही, छं० ३१९, से० ११ 

वही, छं० रै२०, स० ११ 

वही, छं० ४१८, स० ११ 

वही, छं० ५२२, स॑० १। 

बहा, छं० ५२२९-५१, स० ११ 

वही, छं० ५५२-३२, स० १। 


8 5 2260 86 ए 280 2७ 


(5 हक 


ग्रामान ग्राम तोरन उत्तग ) बन चढ़्िढ कट्टि निधि-निधि पुरंग ॥। 

पसु पपि सद श्रुत मंडलेन | जल नहान दान ब्रह्मन सु देन ॥ छं० ६०६। 
हारम्म रम्य फिरि मंडि लोइ। दालिंदर दीन दीसे न कोई ॥ 

चौधट्टि सत्त वरघष प्रमान। आना नरिंद तपि चहुँवान॥ छं० ६०७४ 


रा० ए० सो० लंदन फी रासो की प्रति उपयु'क्त मत का समर्थन केरती है । घारणोज 


की श्रति एवं बीकानेर की एक लक्ष अक्षर वाली प्रति में भी अनलराज का नाम चौहान वश 
परम्परा में प्राप्त होता है। किन्तु साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित “रासो/ इनके विपय 
में सर्वया मौन हैं । पंडित सदाशिव दीक्षित्त ने लिखा है कि--/शिलालेख तथा पृथ्वीराज विजय 
में इसका नाम अर्गोराज और रासो, प्रवंधकोष, हम्मीर महाकाव्य तथा सुर्जनचरित में इसका 
नाम बनलराज बतलाया गया है । अनलराज और अनलदेव एक ही नाम के दो रूप हैं ।' 


इतिहासवेत्ता अ्गोराज अथवा अनलराज को पृथ्वीराज (प्रथम) का पुत्र मानते हैं। 


डॉ ० दशरथ शर्मा ने सारंगदेव को पृथ्वीराज होने का अनुमान भी लगाया है। 'रासो' के 
बनुसार अर्गोराज अथवा अनलराज ने अजमेर को वसाया था। इत्तिहासवेत्ता भी इस कथन 
का समयंन करते हैं । डॉ० एच० सो० राय ने अपनी पुस्तक '॥9/76४0० जांश०| ण॑ 
0०70९ 70॥9' में अजमेर बसाने वाली बात का समर्थन किया हैं ।' 


६. 
२. 


पृव्वीराज रासो; ना» प्र० स फाशी, छ० ६०४-६०७, स० १। 

पं० सदाशिव दोक्षित, रासो समीक्षा, पृ० १२३ | 
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[रे |] 


अतः स्पष्ट है कि राजा अनलराज अथवा अर्गोराज अथवा आना एक ऐतिहासिक पात्र 
हैं तथा इन्होंने अजमेर नगर को बसाया था । 'रासो' मूल रूप से एक काव्य प्नन्‍्य है, इतिहास 
भहीं | भतः यत्र-तत्र कल्पना का योग होना स्वाभाविक ही है । 


उद्दारहार--पृथ्वी राज रासो' के अनुसार चौहान वश की ९वी पीढ़ी में उद्दारहार नाम 
का राजा हुआ ।' यह राजा विन्दसार के उपरान्त उन्तकी गद्दी का उत्तराधिकारी हुआ था। 
सम्पूर्ण रासो में इनके नाम के अतिरिक्त कोई सूचना प्राप्त नहीं होती है। रा० ए० सो० 
जदन की रासो की प्रति के अनुसार भी उदारहार नामक राजा विन्दसार के उपरान्त ही 
गद्दी पर बैठा / धारणोज की प्रति एवं साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो, शिलालेख 
एवं संस्कृत के प्राचीन भ्रन्थ भी इनके विषय में सत्रंथा मौन हैं ।' 


उद्दारहार को पंडित सदाशिव दीक्षित विन्दुसार का विशेपषण मानते हुए लिखते है कि- 
'उद्ारहार, अशोक और शंकाबिडार इन तीनों नामों के दर्शन पाना रासो की अर्थानि्भिन्नता 
का पूर्ण परिचायक है । रासो अवलोकन करने पर इनकी विशेषणता में किसी प्रकार का 
सन्देह नहीं रह जाता-- 


सुअ विन्दसार  उद्दारहार । 
आसोकश्नीय. संकाविडार' । 


क्रिस्तराज अथवा कुष्णराज--'पृथ्व्ी राज रासो' के अनुसार चौहानों की वंशावली को 
३१ वीं पीढ़ी में राजा चंदराय चौहान के उपरान्त उनका एकमाप्न पुत्र किस्तराज मथवा 
फृष्णराज उनका उत्तराधिकारी हुआ / रा० ए० सो० लंदन की रासो की प्रति उपयुक्त 
कथन का समर्थन करती है (५ किन्तु घारणोज की प्रति, बीकानेर की एक लक्ष अक्षर वाली 
प्रति तथा साहित्य संस्थान, उदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज रासो, एवं शिलालेख आदि इनके 
विषय में कुछ उल्लेखनीय विवरण प्रस्तुत नहीं करते हैं 


पंडित सदाशिव दीक्षित नें इनके विषय में एक स्थान पर लिखा है कि “इसके नाम 





१. पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स०, काशी, छं० २८५, स० ११ 
२... रासो की अप्रकाशित प्रति, पृ० १० । 

३ देखिए, प्रस्तुत शोध प्रचन्ध परिद्िष्ठ भाग । 

४. पं० सदाशिव दोक्षित, रासो-समीक्षा, पृ० ११३। 

५ प्थ्वोराज रासो ना० प्र० स० काशी, छ० २९०, स॑० १। 
६. रासो की हस्तलिखित एवं अप्रकाशित प्रति, प्‌० १०१ 

७. देखिए, प्रस्तुत शोध प्रबन्ध परिशिष्ट भाग । 


[ ४० ] 


दिलालेय तथा पृथ्वीराज विजय में “वियंराय', प्रवंध कीय में 'विजयराय', हम्मीरमहाकाव्य 
में 'राय', सुर्जेनचरित में 'रायनाथ” तथा “'रासो' में कृष्ण राज बतलाते हैं ।' पता नहीं पंडित, 
ही ने यह पीस अनमान लगा लिया कि यह सव एक हो व्यक्ति के नाम है। प्रमाणों. के मभाव 
में पंदित जी का मत ग्राह्म नहीं हो सकता । 


घतुरबाहुमाण, चाहुबान, चौहान-ऋषि वशिष्ट ने आवू पर्वत पर अपने यज्ञ को निविध्न 
समाप्त करने के लिए वीर पृरुष चाहुमान को हवनकुण्ड से मंत्रबल के आधार पर उत्पन्न 
किया । इस बीर पुरुष की चार भुजाएं होने के कारण चाहुवान कहा गया-- 


अनल कुण्ड फिय . अनल । सज्जि उपगार सार सुर ॥ 
फमलासन आसनह्‌ । मंडि जम्योपवीत . जुरि॥ 
चतुरानन स्तुति सह । मंत्र उच्चार सार किय॥ 
सुकरि कमडरू वारि । जुजित भाद्धान  थान दिय॥ 
जा जन्नि पानि श्रव अहृति जजि । मजि सु दुष्ट आह्वान करि ॥ 
उप्पज्यो अनल चहुवान तब । चव सु वाहु असि वाह घरि। छं० २५५। 
भुज प्रचंड चव च्यार मुष । रक्त ब्रप्त तन तुग। 

अनल कुंड उपज्यो अनलू । चाहुवान चतुरग ॥ छं० २५६ ॥' 


इन्हीं महापुरुष से चौहान वंश की उत्पत्ति हुई। इन्हीं की वंश परम्परा में कालान्तर 
हिन्दुओं के आन्तिम शासक दिल्‍ली, अजमेर के अधिपति महाराज पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) 
ने जन्म लिया । 


तिन रक्षा किन्‍्ही सु दुज | तिहि सुदंस प्रथिराज । 
सो सिरपत पर वादनह्‌ । किय रासो जु विराज ॥ छं० २८१ ॥।' 


चाहुवान की उपयुक्त उत्पत्ति कथा के विषय में इतिहासवेत्ता एक मत नहीं है। प्रायः 

सद “रासो को उपयुक्त कथा को काल्पनिक ही मानते हैं। राजा विग्रहराज चौहान के 
समय की वि० सं० १०३० की हपंनाय के मंदिर की प्रशस्ति में चौहानों की वंशावली का 
इत्लेस हुआ है, किन्तु उसमें भी चौहान वश वे: आदि पुरुष का नाम चाहुवान नहीं मिलता 
। राजा सामब्वर चौहान के समय के वि० स० १२२६ के विजालियाँ के शिला लेख में 
चौहान वंश के बादि पुरुष का नाम 'सामंत' दिया है, चाहुवान नहीं । वि० सं० १५ वों 


१. पं० सदादशिय दोक्षित रासो समीक्षा, प० ११८। 

पृष्यीराज रामो, ना प्र८ स> कायी, छं० २५५-५६, स० १। 
पह, ६० २८९, स5 १ 

रेणिए, प्रततुत झोष प्रबन्ध, परिद्षिग्ट भाग | 


हि 


न्यू बडा 


[ ४१ ] 


शताब्दी के आसपास लिखें गए प्रवंधकोष के अन्त में दी हुई चौहानों की वंशावली के 
आधार पर चौहान वंश के आदि पूरुप का नाम 'वासुदेव' था ।' वि० सं० १६३४५ के आसपास 
चने हुए 'सुर्जनचरित' काव्य में प्रथम पुरुष का नाम भी “वासुदेव' ही मिलता है,' किन्त्‌ इतना 
सब होते हुए भी 'पृथ्वीराज विजय महाकाव्य, हम्मीरकाव्य तथा रासो के समस्त संस्करणों 
में आदि पुरुष का नाम 'चाहुवान' ही दिया हुआ है । 


उपयुक्त शिलालेखों एवं प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर यह निर्णय करना कि चौहानों के 
आदि पुरुष का नाम “चाहुवान' था, अत्यन्त कठिन है। कुछ इतिहासवेत्ता चौहानों को अग्नि- 
वंशी मानते हैं, किन्तु चौहान अग्निवंशी ही हैं । अधिकतर प्रमाण इसी पक्ष में है कि चौहान 
वंश के आदि पुरुष का नाम चाहुवान था। डॉ० टीकमर्सिह तोमर चाहुवान का अस्तित्व 
स्वीकार करते हुए अपने ग्रन्थ 'वीर काव्य” में लिखते हैं--'चाहमान की उत्पत्ति सूर्यवंभ में 
मानकर उन्हें चौहान वंश का प्रवरत्त क वबतलाया गया है । इथके जन्म के सम्वन्ध में जोधराज 
का मत निराधार है। चाहमान को एकदम काल्पनिक व्यक्ति नहीं माना जा सकता | पर्याप्त 
सामग्री के अभाव में इनका अधिक विवरण देना दुष्कर है! ।' डॉ० दशरथ शर्मा एक स्थान 
पर रासो की प्रामाणिकता दर्शाते हुए लिखते हैं कि “प्रायः सभी ही प्रथम चौहान फो ब्रह्मा 
के यज्ञ से ही उत्पन्न मानते है। सुर्जनचरित के सप्तम सर्ग में लिखा है कि ब्रह्मा ने पुप्कर 
में एक यज्ञ किया । विष्न की आशका से उन्होंने सूर्य की तरफ देखा और उससे प्रथम चौहान 
की उत्पत्ति हुई । अतः ब्रह्मा का यज्ञ ही प्रथम चौहान की उत्पत्ति का कारण था। हम्मीर 
महाकाव्य की कथा भी इससे विशेष भिन्न नहीं है। उसमें लिखा है कि ब्रह्मा यज्ञ के लिए 
भूमि ढूँढते हुए जब पुष्कर पहुंचे तो उनके हाथ का कमल वहाँ गिर पड़ा । इसलिए उ्सी 
स्थान को शुभ मानकर ब्रह्मा ने वहाँ यज्ञ प्रारम्भ किया। फिर राक्षसों द्वारा विध्न की 
आशंका उत्पन्न होने पर उन्होंने सूर्य का स्मरण किया। उससे एक अत्वन्त तेजेस्वी पुरुष 
उतरा । यह प्रथम चाहमान था । इस प्रकार हम्मीर महाकाव्य भी ब्रह्मा के यज्ञ को ही प्रथम 
चाहमान की उत्पत्ति का कारण बताता है। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य भी पुष्कर की रक्षा 
के लिए ही चाहमान की उत्पत्ति करवाता है और इस काव्य के बनुसार भी त्रिपुप्कर मे 
केवल जल से परिपूर्ण ब्रह्मा के तोन यज्ञ कुण्ड थे । यदि हम्मीर रासो की प्रति प्रचलित अग्नि 
वंश की उत्पत्ति कथा देती या कम से कम यही कहती कि चौहानों को उत्पत्ति वशिप्ड ने 
अग्ति कुण्ड से या अर्बृंद पवेत पर हुई तो हमे उसे मर्नेतिहासिक वतलान का हग कक 
था। परन्तु ब्रह्मा के यज्ञ से चौहानों की उत्पत्ति बतलाने पर ही यदि उसे बनेतिहासिक 
ठहराया जाय तो यह दोप चौहान वंश के प्रमाणिक से प्रामाणिक शिलालेखों ओर काव्या के 





२. देखिए प्रस्तुत शोव प्रव'घ, परिशिष्ट भाग 


२ डॉ० टीकुससिह तोमर, वोरकाव्य, पृ० रे*२। 


[श्र] 


॥ आर वित किया जा सकता है ।” रासो के प्रायः समस्त संस्केरण उपर्यक्त मतका समर्थन 
स्ने है । यह मानना हो वद़ता हैं कि चौहानों के आदि पुरुष का नाम चाहवान था तथा उसी 

में के आधार पर उस वंश का नाम चीहान हुआ तथा यही उस वंश का आदि पुरुष था, 
धौर फिर वर्तमान काल में समस्त चौहान अपने को अग्निवंशी मानते भी हैं । 


5 
सर 


हा । 3! 


चदराप-'पृथ्वी राज रासो' के अनुसार च्ौह्ानों को वश्यावली की ३०वीं पीढ़ी में राजा 
जोगसूर अथवा योगसुर चौहान के उपरामस्त उनका एक मात्र पृत्र चंदराय उनका उत्तरा- 
घिकारी हुआ, जिसने यण का अर्जन करके अपयश को दूर किया ।' रा० ए० सो० लद॒न की 
रामो की प्रति उपर्युक्त भत का समर्थन करती है ।' किन्तु घारणोज की प्रति, बीकानेर की 
एक लक्ष अक्षर वाली प्रति, साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज रासो' की प्रति, 
पघिल्लालयर एवं संम्द्रत के प्राचीन ग्रन्य इसके विषय में सर्वधा मौन है । 


पंडिन सदाशिव दीक्षित चन्दराय शब्द को राजा विवुध सिंह का विशेषण मात्र मानते 

सम्भव है, उनक कथन किसी सीमा तक सच हो । “श्री भोझा आदि विद्वानों ने रासों 

के आधार पर 'योगसूर' और “चंदराय” इन दो और नामों की कल्पना की है, परन्तु तात्विक 

दृष्टि सु विवेचन करने के अनन्तर ये दोयों विशेषण प्रतीत होते हैं, नाम नहीं । रासोकार 
के। कथन है कि-- 


सुअ विव॒ुध सिंध सय जोगसुर । 
जस चन्दराद वर अजस दूर 


चदन््रगुप्त- पृथ्वी राज रासो' के अनुसार चौहान वश परम्परा की १८वीं पीढ़ी में राजा 
गैंग्राम मिह के उपरान्त उसका पुत्र चस्ब्रगुप्त, उनका उत्तराधिकारी हुआ । कवि के अनुसार 
यह चद्धमा के समान सुन्दर था ।" रा० ए० सो० लंदन की रासो की प्रति उपयुक्त कथन 
का समर्थन करती है ।* 


धारणोज की प्रति तथा साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासों इनके विपय में 
मौन हूँ । हप॑ंनाथ मदिर की प्रशस्ति तथा पश्वीराज विजय में चम्द्रराज, विजोलियाँ शिलालेख 
१. डॉ० दशरथ शर्मा, पृथ्योराज रासो की रूथाओं का अनेतिहासिक आधार, पु० रे-४/ 
राजरथानो-नाग ३, अंफ ३, जनवरो १९४०, कलकत्ता । 
२. प्रृग्योराज़ रासो, ना० प्र० स० काशी, छं० २९०, स० ११॥ 
रासो वी हरतलछिस्वित एवं अप्रकादित्त प्रति, पु० १० । 
पं० सदाशिय दोक्षित, रासो-समीक्षा, पृ० ११८॥। 
पृष्वोरान रासो, दा० प्र० स० काशी, छं० २८७, स० १॥ 
राम की हस्त छिस्ित एवं अप्रकान्षित प्रति, पु० १० ॥ 


जै् 
+ 


ही] 


डी हू ६६ 


[के | 5] 


में शशिनृप, सुर्जन चरित में चन्द आदि नाम मिलते हैं। संभव है यह एक ही व्यक्ति के नाम 
हों । प्रबंध कोष तथा हम्मीर महाकाव्य का मौन वास्तव में आश्चर्य का विपय है ।' 


चन्देलराज परमद्विदेव-१२वीं शताब्दी के उत्तरी भारत की प्रबल शक्तियों में से एक 
हृत्वपुर्ण सत्ता महोबा एव कालिजर के आधिपति परमाल राज की थी । महोवे का चन्देल 
वंश ९वीं शताब्दी से लेकर ११वीं शत्ताब्दी तक अत्यंत सम्पन्न रहा। चन्देल वश के अति 
प्रसिद्ध राजा धग राज के वनारस से प्राप्त लेख से ज्ञात होता है कि इस वश के आदि पुरुष 
नन्‍तुक ने सन्‌ २३१ में जैजाकमुकिति (वुन्देलखड) से परिहारों को निकाल कर अपना स्वतन्न 
राज्य स्थापित किया था ।' 


परमहिदेव के सिहासनारूड़ होते ही चन्देलों तथा दिल्‍ली के चौहानों के घोर सम्राम 
छिड़ गए तथा सन्‌ ११८२ में पृथ्वीराज चौहान ने उन्हें पूर्णतया परास्त कर दिया तथा 
उसके राज्यान्तर्गत सुदूरस्थ मदनपुर तक खदेड़ दिया ।* 


पृथ्वीराज रासो' के महोवा समय में चौहान तथा परमहिदेव के सघपं का कारण 
राजा परमाल की अनीति था ।” पृथ्वीराज के कुछ घायल सैनिक दिल्‍ली जाते समय मार्य 
भूल कर महोबा आ पहुंचे, जिन्हें परमाल ने मरवा डाला। इसी का प्रतिशोध लेने के लिए 
पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण किया था । किन्तु यह विवरण पक्षपात॒ पूर्ण प्रवोत 
होता है । वास्तव में इस युद्ध का मूल कारण पृथ्वीराज की विजयाकांक्षा ही थी । इस संग्राम 
के द्वारा भारतवर्ष की स्थिति राष्ट्रीय संकट में पड़ गई । जैसा कि चि० वि० वैद्य का कथन 
है 'परमहिदेव की शक्ति पृथ्वीराज के आक्रमण से बहुत ल्षत-विज्ञप्त हो गई । इसे एक ऐसी 
भूल समझनी चाहिए जो राष्ट्रीय विनाश का कारण बनी क्योंकि चन्देल तत्कालीन भारत के 
अग्रणी क्षत्रिय शासकों में से एक थे ।* 


'आल्हा' के अनु तार भी पृथ्वीराज का महोबा पर आक्रमण राज्य विस्तार ही मालूम 
होता है । 'आल्हा' में लिखा है कि माहिल से सूचना पाकर कि आाल्हा-ऊदल कन्नौज मे है; 
पृथ्वीराज चौहान ने राज्य विस्तार की कामना से महोवा की ओोर कूच कर दिया। प्रथम 
सग्राम पहूज नदी के तट पर लगभग सन्‌ ११८२ के अक्टूबर में सिरसागढ़ की भूमि पर 
वीर मलखान की अध्यक्षता में हुआ ।* पराक्रमी वीर मलखान वोर गति को प्राप्त हुबा 
तथा पृथ्वीराज ने उसका किला गिरवा दिया। 


देखिए, प्रस्तुत शोध प्रवन्ध, परिशिष्द भाग । 

इन्डि० एन्दी, भाग १, पृ० १३९ ॥ 

डॉ० ईश्वरी प्रसाद, मध्य कालीन हिन्दू भारत, पृ० २०-२१, प्रयाग, १९५२ । 

हिस्‍्द्री आफ मेडिवल हिन्दू इन्डिया, जि> ३, पु० १८३ । | 

« आर्कोलाजिकल रिपोर्ट, जि० ९, पृ० १८८ तथा इस्डियन ऐटीक्वेरी, पु० १४५, १६०८। 


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[. ४४ ] 


पधैन्‍्माल रासो' के अनुसार युद्ध काल में मलखान ने महोबा से सहायता मंगव।ई थी, 
डिम्तु माहिल परिहार के कहने पर राजा परमाल ने इस ओर कुछ ध्यान न दिया। हिततीय 
यार पृब्वीराज ने कीतिसागर पर अपना डेरा डाला, तब मल्हना के परामर्श से परमाल ने 
अत्टा-ऊदल को बुलाने और जयचद से सहायता लेने के लिए कवि जागनिक को कन्नौज 
भेजा । उनके आने पर युद्ध हुला। चन्देलों के प्रायः सभी योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए । 
राजा परमाल का पुत्र ब्रह्मा भी इसी संग्राम में वीरगति को प्राप्त हुआ । महोबा पर चौहानों 
की विजय परताका फहराने लगी । इस विजय की एतिहासिकता मदनपुर की वारादरी में 
पृस्वीराज के मादेश मे उत्की्ण सन्‌ ११८२३ के दो शिलालेखों से भी प्रमाणित होती है ।' 
युन्देली धात्हा के मंदुसार यह युद्ध उरई में हुआ था ।' ज्ञात होता है कि परम द्दिव ने पराजय 
होने के कुछ ही समय उपरान्त अपनी शक्ति पुन: संगठित कर महोंचा पर अधिकार कर लिया 
होगा, वयोंकि महोबा के किले की दीवार पर उसकी आाज्ञा से उत्कीर्ण ४ जून सन्‌ ११८४५ ई० 
का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है' तथा ८ अवटू्बर सम्‌ १२०१ ई० तक उसने प्रायः अपने 
सभी पश्चिमी प्रान्तों पर पुनः अधिकार पा लिया था। इस बात की पुष्टि कालिजर के 
नीलकाठ मदिर में एक पापाण पर उत्फीर्ण निम्न लेख से हो जाती है-नृप परम्दि ने अपने 
शमुओों को जीतकर अपने सहज विश्वास से मुरारि की इस स्तुति का प्रणयन किया ।' 

“पृथ्वी राज रासो' के महोवा समय में परमह्टिदेव की मृत्यु के विषय में कुछ भी सकेत॑ 
नहीं प्राप्त होता हैं। आल्हा के अनुसार परमाल ने पराजय के दुख से दुखित होकर अपने 
प्राण त्याग दिए थे। 'परमाल रासो” के अनुसार पराजय के बाद वह गजाधघर के मंदिर में 
गया तथा चौहानों को शाप देंकर अपना शरीर त्याग दिया । किन्तु यह दोनों विवरण विश्वास 
योग्य नहीं हैं। फरिश्ता के अनुसार सन्‌ १२०२ ई० में कुतुवद्दीन ऐंबक ने कालिजर की ओर 
कूच किया और वहाँ के राजा को पराजित कर किले में घेरा डाल दिया। राजा ने कुछ 
शर्तों पर उससे संधि कर ली, परन्तु जब वह उपहारों का प्रबंध कर रहा था, तभी उसके 
मंत्री ने उसका बध कर दिया । वास्तव में फरिश्ता का विवरण पक्षपात पूर्ण है। तत्कालिक' 





६. श्रो चाहुमानयंद्ये पृथ्वोराजय भूजा । परमरदि नरेन्द्रर्य, 
देशोपमुदयास्यते । ऑ अष्रणराजस्प पौत्ण श्री 
सोमेदबरसनुना । जेंजाकभु वितदेदोप॑ पृथ्वीराजेन छूनितः ॥॥ 
सं० १२३९। आ० स० रि०, जि० १०; पृ० ९८। 
३. छलिगुस्टिक सर्वे आफ इंडिया, जि० ९, भाग १, प्र ५१३ + 
३. इदष्टियन एन्टोफ्वेरी, जि० १९, पु० १७९ । 
४... शृष्टियन एन्टीजवेरो, जि० २५, पृ० २०६ तथा आ० स्त० रि०, जि० २१, पूृ० ३८४ 
परमाल रासो, छं० ६३-५, पृ० प्र३८॥। 
६... द्वित, फरिदता, ए० १९७ । 


[ ४५ ] 


(तिहांसवेत्ता हसन-निजामी ने स्पष्ट लिखा है कि कालिजर का राय अभिशत परमार, 
संधि की एक भी शर्ते का पालन किए बिना ही स्वाभाविक रूप से मृत्यु को प्राप्त हुआ ।' 
फारसी इतिहासकार के इस विवरण के विरोघ में ओरछा गजेटियर में लिखा है कि यह झूठा 
मृत्यु का समाचार जानवूझ कर घड़ाया गया था तथा घास्तव में परमाल सं० १२७० वि० 
तक जीवित रहा था । किन्तु इस विरोधी मत का पुष्ट प्रमाणन मिलने के कारण हसन 
निजामी का विवरण हौ अधिक ग्राह्म प्रतीत होता है । हु ह 


जोगसुर*'पृथ्वी राज शसो' के अनुसार चौहाप वंशावली की रष्घों पीढ़ी में राजा 
विवुध सिंह के उपरान्त उनका एक मात्र पुत्र जोंगसूर उनका उत्तराधिकारी हुआ ।' रासोकार 
अन्य विवरण के विषय में मौन है । रा० ए० सो० लंदन की रासो को प्रति उपयुवत भत का 
समर्थन करतौ है ।' किन्तु धारणोज की प्रति, बीकामेर की एक लक्ष अक्षर वाली प्रति तथा 
साहित्य संस्थान, उदयपुर से प्रकाशित रासो की प्रति राजा जोगसूर के विपय में कोई भी सूचना 
प्रस्तुत नहीं करती है | शिलालेख एवं संस्क्ृत के ग्रन्थ भी इनका समर्थन नहीं करते ।* 


पंडित सदाशिंव दीक्षित 'जोगसूर' शब्द को विदुध सिंह का विशेषण मात्र मानते हुए 
लिखते हैं कि “श्री ओझा आदि विद्वानों ने रासो के आधार पर “योगसूर” भौर 'चन्दराय' 
इन दो और नामों की कल्पना की है, परन्तु तात्विक दृष्टि से विवेचन करने के अनन्तर थे 
दोनों विशेषण ग्रतीत होते हैं, नाम धहीं । रासोकार का कथन है कि-- 
सुअ विवुध सिंघ सम जोग सुर। 
जस चंदराई वर _अजसे दूर॥' 


संभव है पंडित जी का कंथन सत्य हो । कवि राव मोहन सिंह की धारणा है कि चोहानों 
की वंशावली में बहुंत से नाम॑ भ्रंमवर्श दे दिए गये हैं, वास्तव में वे राजाओं के नाम न हीकर 
विशेषण है ।'" | 

जयचन्द गाहड़बाल-“पृथ्वीराज रासो' में जँसा कि नाम से स्पष्ट है पृथ्वीराज के 
साहसिक कार्यो को उल्लेख हुआ है । अन्य सम्बन्धित राजाओं अथवा पात्नों के विपय में फचि 
ने निर्देश मात्र कैर दिया है। फर भी संपूर्ण रासों ग्रन्थ के आधार पर हम यहां राजा 
जयचंद तथा उसके वंशजों फे विषय में प्रकाश डःलने का प्रयत्न करेंगे। वर्नौजपत्ति ने एुझ 


१. हलियट एण्ड डाउसन्स, हिस्ट्रो आफं इण्डिया, जि० २, प्रृ० २२८-९ २ 
पृथ्वीराज रासो, छं० २९०, स० १। 

रासो की हस्त लिखित एवं अश्रकाशित प्रति, पू० १०५ 

देखिए, प्रस्तुत शोघ प्रबन्ध, परिशिष्ट । 

पं० सदाशिव दीक्षित, रासो रुमीक्षा, पृू० ११८॥ 

पृथ्वीराज रासो फी प्रमाणिकता पर पुनविचार-फुध्नोट, प्‌ ० रे७ । 
राजस्थान-मारती, भाग-१, अंक २-३ युग्मांक जुलाई, अक्टूबर, सन्‌ १९४६॥ 


रु वह का ए0 


[0 7 :] 


बार राजसूब यज्ञ के अनुष्ठान का विचार किया किन्‍्तु उनके मंत्रि सुमंत ने विरोध किया। 
मेने यज्ञ को अनुचित एवं असामबधिक बतावार राजा को समझाते का प्रयत्न किया किन्तु 
शाजा ने माना । इसो समय उपस्थित चारणेों एवं भाटों द्वारा पंगराज ने अपना वश परित्रय 

ज्ञानने की लिन्नासा की तथा इसी वंश परिचय से रासोकार ने भूत कालीन यज्ञ कर्ताओं क॑ 
राजा के बंशन बना दिए । 


हि 


तुम बंद नयी कमधज्ज सूर , कीनो सुराज राजस मसूर। 
तव वंस भयो बाहुन नरिंद , अंतरिष्प रयूथ चलि श्रग्ग कंद । 
तुम बस नथो पूरूर सुर , थ च्यारि चक्रनिहे जीति सुर। 
सत सिधु सूर जिहि रयूथ चोल्ह , तुम वस भयोी नृप राजनील । 
तुम वस भयी नलराइ अंद , नंपद्ध हार ही धन्या बध। 
पट चक्र नथी कमधज्ज आदि , किन्‍नोीं नरिद जिंहि बसन बाद । 
जीनूत धघन्यों विहि चक्सीस , संसार कित्ति कीनी जग्रीस । 
कौ कहूँ पंग सी दुष्ट भाय , सड सुजग्य निहर्चत राय। 
बारुत्न भूमि हयगय अनग्ग , परपंत पृुन्चन राजसू जग्ग। 
सौधिग पुरान बलिवंस वीर , भूगोल लिपित दिध्पित सहौर। 
छिति छनत्न बंध राजन समान , जितीत्ति सकरू हय गय प्रमान। 
पुच्छे सेमंत परधान तब्ब , अब करहु जग्य त्रिय चल कब्च ॥' 
पयु वत छन्‍्द के अनुसार कमधज्ज वश के मादि पुरुष कमघज्ज सूर थे जिन्होंने राजसूय 
ज्ञ कर सूर विरद की धारण किया तथा उसके बाद से यह सूरपद सभी कमधज्ज राजाओं 
दे: नाम के साथ जुड़ने लगा। इनके उपरान्त वाहन नरिद नामक राजा हुआ जिसका स्थ 
अतरिक्षगामी होकर स्वर्ग तक पहुंचा था। इनके पण्चात्‌ हुए पुरुरसूर (सम्भवत: पौराणिक 
हाजा पुरुर्वा ) जिन्होंने चक्रवर्ती पद प्राप्त किया | इनके बाद राजा सत सिधुसूर हुए, नीलराज 


नया राजा नल भादि जिनकी कीति चतुदिक प्रसारित हुई । छःहो लोको में विख्यात चक्रवर्ती 
इसी वंश में उत्पन्न हुए जिनमें से रुक जीभूत वाहन भी थे । 


ल्‍्व 
लि 


स्पप्ठ है कि घारणों ने सभी नाम पौराणिक कथाओं से लेकर राजा जयचन्द के वंगज 
गना दिए हैं। इतिहास को देखने पर इनमें से एक भी नाम मेल नहीं खाता है। अतः 
ग्पष्ठ है कि उपयुवत सभी नाम काल्पनिक हैं। ग्रन्थकार ने 'सूर! शब्द को लेकर ही राजा 


जयचन्द वी मुर्यबंणोीं बताया है जवक्ति ऐतिहासिक विवरण उसे गाहडवाल वंशी बताते हैं । 





१. प्‌ स्वोरान रासो, छं० २५-३०, सम० ४८ । 


रत 


[ ४७ ] 
ऐतिहासिक गाहड़वाल दंद्ा 
१-यशोविग्रह 
२>मही चन्द्र 

३-चन्द्रदेव 


॥। 


होम -+८०%4-922400- 7० 2:::2% “०2:००: कक! 





डै-मदनपाल विग्रहपाल 
हो ॥ ( बदायूं की शाखा का मूल पुरुष ) 
४-गो विद चन्द्र 


| 


नबए-:००-+-३०-... ६७......७२०५-+४००००-...०५००--+५९५३८६५०-२:७३६-००३०-३:७०....०+०- --.-..ब_...लल तन 5 


] | 





| 5». ३ 
६-विजयचन्द राजपाल धास्फोतचन्द (वस्सराज) 
व 
4 0: 
मर | 
७-जैय चन्द माणिक्य चन्दे 


[| 
बेस उपज नि 220 >> अप अस्थ- उमर कार दल मर 


] | ].*“॥$.॥ 
४-हरिएचन्द (? )जजपाल (?) मेधचन्द्र (!) उडउदयपाल (?) संयोगिता (कन्या) (? ) 





अंत: उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि कन्नौजपत्ति राजा जयबन्द सूर्यंव्णी 
नहीं अपितु गाहड़वाल वंशी था । 
विता--'रासो के अनुसोर राजा जयचन्द के पिता का नाम विजयपाल था ( इतिहास 
में इसका मास विजयचन्द्र मिलता है ) जिसने कन्नौज पर सं० ११५६-११७० ई० तक शासन 
किया । रासो के मताबुसार राजा घिजयपाल का विवाह दिल्‍ली नरेश अनंगपाल की पृत्री 
सुरसुन्दरी से हुआ था-- 
अनंगपालं पुत्री उमय। इंक॑ दीनी विजयपाल 
हक दीनी सोमेस को । बीज चपन कलि काल ॥ ६८११ 
एक नाम सुर सुम्दी। अनिवर कसला नाभ। 
दरसन सुर नर दुल्लही । मनो सुकलिका काम | ६८२। 
अतः उपयुक्त विवेचन के अनुसार स्पष्ट है कि राजा जयचन्द के पिता का नाम 
विजयपाल अथवा विजयचन्द्र था । 
माता--पृथ्बी राज रासो' में सपप्ट रूप से राजा जयचन्द को भाता का नाम नदह्दये मिलता 
है | प्रन्थकार के मतानुसार दिल्‍ली पत्ति अनंगपाल की बड़ी पुत्री सुरसुन्दरी का विवाह 


१. पृथ्वीराज रासो, छं० ६८१-८२, स० ११ 


पल । 


विशयपाल से अवश्य हुआ था किन्तु यह स्पष्ट नहीं होता कि राजा जयचन्द्र उसी के गर्भ से 
हातपन्न दुआ था । पृथ्वीराज के जन्म का वर्णन करते हुए ग्रन्यकार ने एक बड़ा महत्वपूर्ण 
उल्लिय किया है । सोमेश्वर के पुत्र जन्म का समाचार कर्नौज पहुंचने पर रासोकार ने 
लिखा है कि जयचन्द को माता ने अपनी बहन के प्र॒त्ष उत्पन्त होने के उपलक्ष में नाना 
उपहार भेजे थे ।" 

उपयुवत विवरण में प्रत्यक्ष नाम न होने पर भी परोक्ष रूप से यह सिद्ध हो जाता है 
कि रासो के अनुसार राजा जयचन्द को माता का नाभ 'सुरसुन्दरी' था रासों के बन्‍्य समस्त 
संस्करण भी 'सुरसून्दरी' नाम का समर्थन करते हैं । 

विवाहु--कवि चन्द वरदायी ने राजा जयचन्द का विवाह दक्षिण के राजा मकुन्ददेव 
की कन्या ( जिसका नामोल्लेख नहीं किया है ) के साथ होने का उल्लेख किया है। यही 
राजा जयचन्द की पटरानी थी । 'रासो' में परिणय कथा का वर्णन इस प्रकार मिलता है-- 
कान्यकुब्जेग्वर महाराज विजयपाल ने अपने दो योग्यमंत्री मतिराम तथा चित्तविद्या और 
समस्त चतुरगिनी सेना को एकन्र कर दक्षिण विजय हेतु प्रस्थान किया । मरुभूमि को छोड़कर 
क्रम से पूर्व दिशा से लेकर सम्पूर्ण दक्षिण की यात्रा की । उस समय पूर्वी सागरतट पर चन्द्र- 
वंधी राजा मुदुन्द देव राज्य करता था जिसकी राजधानी कटके थी | यह राजा वड़ा पराक्रमी 
तथा योद्धा था, इसके यहाँ तीस लाख अध्वारोही, एक लाख गजरोाह्दयी, दस लाख पंदल को 
बेंतनिक सेन। थी । राजा मुक्रुन्द देव ने सात कोस आगे बढ़कर राजा विजयपाल का स्वागत 
किया तथा नाना प्रकार का सत्कार कर अपार घनराशि, दास-दासियों सहित अपनी पत्नी 
घिजयपाल को अपंण कर दी । विजयपाल ने उस कुमारी का विवाह जयचन्द से कर दिया । 
बस्नौज लौटने पर पुत्र तथा वधू सुख पूर्वक अपना समय व्यतीत करने लगे तथा सोलद्ट बष 
यी आयु होने पर इसी रानो से सुकुमार कुमारी संयोगिता का जन्म हुआ ।' 


जयचन्द विरचित 'रम्भा मंजरी” में जयचन्द की सात रानियों का उल्लेख मिलता है । 
तथा राजा जयचन्द अपना भूपति नाम साथंक -करने के हेतु पुन; किम्मीर वंशी देवराज की 
पोग्ी तथा लाट नरेश मदनवर्मा की पुत्री से विवाह करने के लिए लालाइत दिखाई देता है ।' 
“रम्मा मंजरी' की नायिका “रम्भा' का सम्बन्ध हूंस नामक व्यक्ति से पूर्व ही स्थिर हो चुका 
था किन्‍्तु विदृषक तथा नारायण दास के सतत प्रयत्नों के फलस्वरूप उसका शास्त्रों के अनुसार 
परिणय संबंध कसतौजपतिति राजा जयचन्द से हो गया । अन्य रानियों सहित वह भी महल में 


१. कनवन जैँचन्द मात , भयो संभरि बहनी सुत । 

तिन पयंत द्रम पदिय , भार जर चोर थपिय थुत्त ॥ छं० ४५, स० १, उदयपुर संस्करण । 
पृस्योरान रासो, सागरी प्रचारिणी सभा, १० १२५५-१२५७, स० ४५॥ 

थी आदिनायथ नेमिनाथ उपाध्याय, नयचन्द और उनका प्रन्य रम्मा मंजरी-प्रेमी अभि- 
नम्दन प्रस्य, पृ० ४११॥। 


लक 


जे 


[ ४९ 


मेज दी गई | इसी 'नाटिका' के अवुसार राजा जयचन्द की एक रानी और थी जिसका नाम 
राजमती था जो वाटिका की नाथिका रम्भा का विशेष ध्यान रखती थी। जयचन्द की पूर्व 
सात रानियों में एक पटरानी थी जिसकी बनुमति से ही राजा जयचन्द रम्भा के पास बामोद- 
ग्रमोद के लिए जा सकता था । 


अज्ञात कवि विरचित एक प्राचीन प्रवंध' में निम्नलिखित वर्णन प्राप्त होता है-- 
“काम्यकुब्जे देशे घाराणसी पुत्री नव योजन विस्तीर्णाद्वदसः यौजनायाम । तत्र श्री विजयचंद्रा- 
गजो राष्ट्रकूटीयो जेन्रयन्यों राज्य करोति। तस्य कपूर देवी परमप्रीत्तिमात्रम अथनगर 
चास्तव्य (स्य) कस्यापि झाल।पतेः पुत्नी सुहागदेवी पुरी प्रत्यासन्ने ग्राम परिणाता अस्ति ।” 
इसी प्रवध में आगे लिखा है--“सब्तमे दिने राज पाटयां नृपेण व्रजता गृह द्वारे बनदेवीव दृप्टा । 
सानुरागो धघवल गृ हू गत्वाशालापति माहुय पुत्रीय याच | तेनदत्त “अर्थात्‌ विजय चन्द का 
पुत्र 'राष्ट्रकूट जयचन्द कान्यकुब्जदेश के वाराणसी. का राजा था कपूरदेवी नाम की कोई 
रानी उसकी परम प्रति पात्र थी तथा एक शालापति की दुहिता सुहागदेवी पर मुग्ध हो उससे 
परिणय कर लिया था । 


'प्रवंध चिन्तामणि' में लिखा है कि--'काशी का राजा जयचन्द जो एक साम्राज्य का 
अधीश्वर 'प्राज्य साम्राज्य लक्ष्मी पालनम्‌ था पंगु कहलाता था। इसने एक शालापति की 
पृत्री सुहवा से विवाह किया था ।”' कविराज शेखर ने अपने “प्रबंधकोश' में श्री हप॑ प्रवंध में 
गोविन्दचन्द के पौत्र जयचन्द के विषय में उल्लेख किया हैं कि वह बनारस का आधिपत्ति था 
तथा उसने सुहवादेवी नामक किसी तरुण एवं सुन्दर विधवा से परिणय किया था जो कि 
पहले पहल राजा कुमारपाल के अणदिल पट्टन के निवासी शालापति की परनी थी' ॥' 


तत्कालीन सामन्तयुग में बहुविवाह की सामान्य प्रथा प्रचलित थी। बत्तः यदि राजा 
के यहाँ भी अनेक रानियां हों, तो कोई आश्चय की बात नहीं है । 

“रासो? के मतानुसार राजा जयचन्द के एक और रानी थी जिसका नाम जुन्हाई था। 
रासोसार में लिखा है--'राजा जयचंद के उस स्वर्ण रचित रत्न जटित सुविस्तीर्ण रनियास 
में काम की कला सदृश अनेक नव यौवनाएं थी. जो सब चित्रिनी तथा पद्मिनी जाति की 
एक से एक सुन्दर एवं मनोहर थी परन्तु राजा का जुन्हाई पर विशेष प्रेम था ।* 


ग्रन्थकार ने रानी जुन्हाई का वर्णन इस श्रकार प्रस्तुत किया है-''इस संसार का बंधकार 





१. जिन विजयघुनि-पुरातन प्रबन्ध संग्रह, पृ० ८८-९०, सिन्धी ग्रन्य माल-२, कलूकत्ता- 
१९३६ ॥। 

२. मेझतु ग-प्रवन्ध चिन्तामणि, शांति निकेतन (१९३५) पृ० ११३-११४। 

श्री हुए प्रबन्ध-प्रवः्ध कोष, शांति निकेतन (१९३५) पृ० ५४-५८ । 

४. नागरी प्रचारिणी समा काशी, रासोसार, पृ० १८5७ ॥ 


न 


[ ९१० | 


विनिष्ट करने वाले श्री सूर्य भगवान की किरण से उत्पन्न एक कन्या कैलाश शिखर पर एक 
ऊेने वक्ष की डाल पर पड़े हुए झूले में झूल रही थी, जिसे देखकर पंग्राज अपना मन 
पो बैठा तथा उस पर मोहित हो गया। राजा ने उसकी प्राप्ति हेतु एक पंर पर खड़े 
होकर तपस्या करना प्रारम्भ की | इस साधना से प्रसन्न होकर कऋ्रषि वशिष्ट ने सूर्य देव से 


प्रार्नना करे, वह कन्या राजा को दिला दी। वही कन्या इस समय रानी जुन्हाई के नाम 
से प्रसिद्ध है... 


प ४१, हक ।प् 
ग्रन्थका र' के मतानुसार रानी जुन्हाई ही राजा जयचन्द की पटरानी थी । रानी जुन्हाई 
के विपय में>अत्यय विस्तार से लिखा जावेगा । यहाँ इतना विवरण ही पर्याप्त है । 


राजा जयचन्द अपने युग का एक महान शासक था । उसके दरबार में बड़े-बड़े कलावंत 
रहा करते थे। उसकी नगरी कन्नौज भी इन्द्रपुरी के समान थी। ग्रन्थकार ने राजा जयचन्द 
की नगरी का वर्णन करते हुए लिखा है कि नित्य-प्रति प्रातः काल पंगराज के नगाड़े बजा 
करते थे जिससे ऐसा प्रतीत होता था मानो बादल गरण रहे हों।' मार्ग पर चारों ओर 
विस्तृत पाँच योजन तक राजा का उद्यान था, जिसमें नारंगियाँ, पुष्प तथा अनार विकसित 
हो रहे थे । लताएं नरम रहीं थी, जूही, जंमीरी, सेव आदि फलों से परिपूरित था ।" नगर 
में प्रवेश करते ही चूत शालाएं मिली ।' भिन्न-भिन्न व्यवसाय वाले नाना प्रकार के स्त्री-पुरुष 
मिलने लगे, स्थान-स्थान पर वीणा आदि वाद्य वज रहे थे। वैश्या नृत्य कर रहीं थी ।* 
माजार में रतन, मोती, माणिक्य के हार, सोना, वस्त्र आदि नाना प्रकार की वस्तुएं बिक रही 
रही थीं ।" बजाज सुन्दर वस्त्र बेच रहे थे, जरी का काम हो रहा था । दसों दिशाओं से हाथी* 
घोट़े आ-जा रहे थे | सामने ही राजा जयचन्द के महत्र थे, जहां हाथी-धीड़े तथा भाँति-भाँति 
के पश्नु दृष्टि गोचर हो रहे थे, नगाड़े तथा अन्य विविध प्रकार के वाद्य निनादित हो रहे थे 
तथा मनुष्यों की अच्छी खासी भीड़-भाड़ थी ।' जयचन्द के अस्सी लाख की विशाल वाहिनी 
थी जो उसकी आज्ञा पलनार्य सर्देव तत्पर रहती थी ।१ 


स्पष्ट है जिस राजा का नगर इतना सुन्दर होगा उसका दरबार भी सुंदर होना ही 
चाहिए | उसके यहाँ अवश्य ही नाना प्रकार के योद्धामों से दरवार भरा रहता होगा । ककि 


पृथ्वीराज रास्तो, ना० प्र० स० कादी/ छं० ४०३, स० ६१॥ 
चही, छं० ४०९-२२, स० ६१॥ 

यही, छं० ४श्ड, स० ६१॥ 

वही, छं० ४२५-३४, स० ६१। 

यही, छे० ४३५४-४५, स० ६१॥ 

« यही, छं० ४४९, स० ६११ 

यही, छं० ४५२, स० ६११ 


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चन्द ने राजा जयचन्द गाहड़वाल की बैठक का वर्णन करते हुए उसके योद्धाओों का नाम तया 
आम का विवरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है । 


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१४. 
4५ 

१६. 
१७. 
प१ृ८- 
१९. 
२०. 
२१. 
२२, 
२३. 
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२५. 
२६. 
२७. 
र्प८, 


रयसलराद 
वीरचंद 
मानराय 
गुजरान वीर 
कास नरिद 
नूसिहराय 
कंठियाराय 
प्रताप सिंह 
रामरेनराय 
सारंगराय 
मुकुन्दराय 
वीरमराय 
महादेव 
हरसिहराय 
प्रनराय 
गोइन्दराय 
प्रतापराय 
सब्रुलाल 
साखुला राय 
सरवन्तराय 
वीरभद्र 
राजा कृष्णराय 
पुकुंदराय 
जैसिंह सूर 


रनवीर राय 
चन्द्रसेन 
भीमदेव 
तरसिंह सूर 





कमघुज्ज 
कमधृज्ज 
यादव 
सुर्यद शी 
चघेला 
कृठे र 
भट्टी 
सोरी (प्रमार) 


सोलकी 
प्रमार 
हम्मीर 


राठौर 
प्रमार 


सोलंकी 


१. पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काज्ञी, छं० 


जयचन्द का चचेरा भाई 







हैः श ष४ 


[8+-) 
- प्र 





करवाटक का सूवेदार $ 


दूसरा नाम नरपाल वोर ५ 
तलवार के युद्ध में दक्ष 
पहाड़ी युद्ध में निपुण 
पटना का राजा । 
सल्‍्लयुद्ध में अद्वितीय । 


चेड़ा (वाएं हाथ से हथियार घलामे 


वाला) । 


घाजानवाहू 


प्र२५-घ४५४८६, स० ६११। 


४२. 
५३. 
प्र १४ थे 
२२. 


४.६. 
६ ३, 


१. 


[ ४३२ 


डदसिह कंठेर 
श्रोरामसेत +- 
साखुलादेव “८ 
राय रामचन्द्र राव -- 
हम्मीर सेन ++ 
सारंग सूर जाट 
जय सिह राठौर 
भीमराय प्रमार 
अर्जुनराय निम्न कुलोत्पर 
असोकराय का 
वीरभद्र चन्देल 
सहर्द व न्‍+ 
केहरीब्रहय सोलंकी 
हेरिचनद्र चौहान 
हरसिह राय न 
निसुरतखाँ मुसलमान 
ममरेजयां मुसलमान 
मीर महवलखाँ मुसलमान 
भारास सा मुसलमान 
कम्मोदखाँ मुसलमान 

] अल्लोखाँ मुसलमान 
महमूदया मुसलमान 
अब्दुल्ला खाँ ] मुसलमान 
सुलेमान खां मुसलमान 
हरवीर राय न 
मुर्कुद ( सिवरा ) 
श्री कंठ कवि ] 
कमल भट्ट राजपुरोहित / 


जज, 


बिजित राजाओं का नेता । 


गनिग 


अन्न», 


समस्त चतुरंगनी सेना का सनापति । 


पी 
कलम 


बन्‍न्‍न्‍मक 


पासवानों का प्रधाने | 


फीरोजर्खा का भाई । 


विश. 


दोनो भाई । 


बवमन# 


जयचन्द के चौरबरदार।॥ 


मंत्री के वाएं हाथ खड़ा होने वाला ॥ 
ग्रायक 


राजा के सिंहासन के सामने खड़े रहने 
याले । 


रासोकार ने एक स्थान पर जयचन्द की अस्सी लाख सेना का विवरण दिया है।* 
राजा जयचंद के क्रधिक सेना होने के कारण ही उसे पंगराजा की उपाधि दी गई है । रासो 





पृष्योरान रासो, ना£ प्र० स० काशी, छं० ४५२, स० ६१ ॥ 


[ १३ ] 


में अनेक स्थानों पर 'पहुपंग' शब्द राजा जयचन्द के लिए प्रयुवत हुआ है ।'* टांड ने अपने 
'राजस्थान' में 'दुल पंगूल” नाम की उत्पत्ति इस प्रकार की है-"कप्नोज राज के किले की 
चाहार दोवारी तीस मील से भी अधिक थी और राज्य फी असंख्य सेना के कारण राजा का 
विशेषण धुल पंगुल हो गया | दुल पंगुल से तात्पयं है कि राजा लंगड़ा है या सेना को 
अधिकता के कारण वह नहीं चल सकता । चन्द बरदायी के अनुसार अगली सेना युद्ध क्षेत्र 
में पहुँच जाती थी दव भी पिछली सेना को बागे बढ़ने का स्थान न मिलता था और वह 
खड़ी ही रह जाती थी ।* तयचन्द सूरि की “रम्भामंजरी' में भी जयचन्द के लिए 'पग्र' शब्द 
का प्रयोग हुआ है--'सैन्यातिश्यात पगू विरुद्ध घारक ।” प्रबंध चिन्तामणी' के अनुसार भो 
राजा जयचन्द के एक विशाल वाहिनी होने का संकेत प्राप्त होताहै। 'सूरज प्रकाश! नामक 
भ्रन्थ के अनुसार पंगराज की सेना में ८०,००० सुसज्जित सैनिक, ३०,००० जिरह-वस्तर 
वाले घोड़े, ३,००,००० पैदल सैनिक, २,००,००० घनुधेर तथा फ़रशाघरी सैनिक और 
सैनिकों सहित असंख्य हाथी थे ।* 

अतः स्पष्ट है कान्यकुब्जेश्वर राजा जयचन्द तत्कालीन राजाओं में अपार शक्तिशाली 


तथा वभव सम्पन्त था । 


राजा जथचन्द के प्रतिहन्दी-पृथ्वीराज रासों को आदि से अन्त तक अध्ययन करने 
पर राजा जयचन्द के तीन प्रमुख प्रतिद्वन्दी हमारे समक्ष आते हैं- 


१-दिल्ली-अजमेर पंति पृथ्वीराज चौहान । 
२-रावल समर सिह, तथा 
३-गजनीपति शहाबुद्दीन गोरी । 


(१) पृृथ्वोराज चौहान-'पृथ्वीराज रासो' के अनुसार पृथ्वीराज चोहान पंग राण की 
कन्या का अपहरण कर्ता, सम्राट जयचन्द का प्रधान एवं प्रवल प्रतिद्वन्दी था । उत्तरी भारत 
के प्रायः सभस्त राजाओं ने कनन्‍्नौजपति की आधीनत्ता स्वीकार फर ली थी, किन्तु पराकमी 





१. एक ताप पहुपंग को , अर रचनोक जु थान। 

चामंडराय वचन्न सुनि , चढ़ि चढ़यों चहुआंच ॥। छें० १२, स० २७। 
तब पहुपंग नरिंद | कुसल जानो न गरिठो॥ छं० ४, स० २६। 

तब पहुपंग नरिद भ्रति । दत्त सु उत्तर जप्पु॥ छं० ६ स० २६ आदि । 
वैगग्रशेड बए्पे ठैगपंचृूण९६ 0 शुगध)87. ५०. व]. ए३४९ 7. 
रम्सामंजरी, मृम्तिका, पृ० ४ तथा प्रथम अंक, पृ० ६। 

भुनिराज जिन विजय, प्रबन्ध चिन्‍्तामणि छं०, २१०, प्‌ृ० ११३ ॥ 

हैग्राचोंड गाते वैगांवर्वा।ह ए रिव्वुंब॒ष्या॥, ४णे, 7, 298० 36. 


(७ «( 4४ >> 


[ ४४ |] 


सम्राट के भी छक्के छुटा दिए थे। पृथ्वीराज, जयचन्द 
थी मो्मी का लड़का था फिर भी द्वप एवं वैमनस्यत्ता के कारण दोनों हो एक दूसरे के 


पृ्डीराज ने जयचन्द ऊँसे चक्रवर्ती 


हामा का नायक पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) है, जो अपने युग के समस्त शासकों में 
धराक्रमी समझा जाता था । पृथ्वीराज तथा जयचन्द के सम्बन्ध आदि से ही कदुता पूर्ण हो 
गए थे। संभवत: कटुता का क्रारण साना अनंगपाल का पक्षपातपूर्ण व्यवहार ही रहा हो। 
व्र्भाव का यह बीज राजा अनगपाल द्वारा वोया गया तथा पृथ्वीराज ने अपने कृत्यों द्वारा 
उस सिचित कर पत्लवित और प्रुष्पित किया । जिसकी विशाल छाया स्वरूपी वैमनस्यता 
की आग में उत्तरी भारत की ये दोनों प्रवल शक्तियाँ भस्मीभूत हो गई तथा अन्त में बाह्य 
क्रमणकारियों के हाथ म भारत चला गया। समय-समय पर रासाकार राजा जयचन्द 
नथा पृथ्वीराज की शत्रुता का सक्रेत देता चलता है। 'धनकथा” समय में गड़े धन को निकालने 
मा समय मश्नी कैमास रावल समरक्तिह को बुलाने की मन्नणा देता है। पुनः उसने पृथ्वीराज 
नौहान के प्रवल-णम्र॒जों का अतक प्रदर्शित किया जो संभवत: ईप्यविश इस शुभकार्य के विध्न 
डालने का प्रग्न्त करते । 


कम्नवज राव ज॑चरद देव , नर असी लप्प मेच्छ तिन करत सेव । 
गज्जन मरेस साहाब साह , दपु्त लूप्य मेक्ठ सेवंत ताह ॥' 


'शशिवृत्ता' समय में यह वैमनस्य का बीज भौर भी दृढ़ हो जाता है। राजकुमारी 
शशिव॒ता अपने पिता यादव की इच्छा के विरुद्ध अपहरण हेतु संकेत स्थल निश्चित करती है । 
झवि चन्द ने उसी अवसर पर स्पप्ट रूप से लिखा है- 


पुच्च बेर अहुआन चर फमघज्ज विपन्नो। 
सवर जोर संग्राम , निवर अगम्यो न जाइय ॥* 


वध्वीराज में संकेत स्थल पर पहुंच कर राजकुमारी का अपहरण किया । इसी अवसर 
पर पंगराज की सेना से भी घोर यद्ध हआ। परिस्थिति से पराजित हो पंगराज देवास से 
7म्नीन लौट नो मवश्य आया किसत उसके हृदय में वेमनस्य की ज्वाला और भी भभक उठी । 


पृच्वीराज तथा जयचन्द के बीच वेमनस्यता का भाव बढ़ता द्वी रहा। समय-समय 
रे दोनों एक दूसरे को कष्ट पहुंचाने का उपक्रम करते रहते थे । रेवातटठ समय में पृथ्वीराज 
मुग्या हँस प्रम्यान किया जिम्रमें अनेक दह श्यों के साथ एक उर्ए्य 'एक ताप पहुपंग 
॥ क्षीया। 


दा 


$, दण्योराज रासो। छं० ६३. स० २४ ॥ 


कि 


हो, ४ं० २८१, स० २५ ॥ 


[ ५४५ ] 


'पीपा युद्ध के अन्तग्ंत हम जयचन्द को पृथ्वीराज के विश्दध गजनीपत्ि शाह गोरों 
की सहायता करते हुए पाते हैं। इधर पृथ्वीराज राजकुमारी हँसावती से विवाह हेतु उज्जैन 
की ओर प्रस्थान करते हैं उघर गोरी जयचन्द की सहायता लेकर वीच में ही मार्ग बअवरुद् 
कर युद्ध हेतु आ खड़ा होता है । 

चघत्यों राज सव सेन सजि दिसि उज्जेननिय रंग। 
आई साहि जगह जुरन लूये सहायक पंग॥' 

“वरुण कथा में राजा सोमेश्वर पोडश दान देते है जिसकी सूचना पाकर कान्यदुब्जेप्वर 
कहता है- 

मंत्रिन सरिस भहीनन्‍द कसरध॑ज्ज इन्द्र कुप्पियं काल ॥ 
जम्बूद्वीप महीपन को मो सरिसं मडव सारह॥। 
छिति क्षत्री जे छत्रपति ते यो हुकुम हुजूर। 
मिद्टि सके फुरसान को , सारि मिलाऊ घूर।' 


फ्रोधोन्मत्त हो राजा जयचन्द ने अपनी शक्ति का बखान किया ठथा अजमेरपति सोमेश्वर 
के पोड़शदान की ईर्ष्या से जलकर स्वयं ने राजसूत्र यज्ञ करने का विचार चित्त में दृढ़ किया 
तथा सभा मंडप से उठ खड़ा हुआ ।' पृथ्वीराज चौहान को भी यज्ञ हेतु आमंत्रित किया किन्तु 
उसे द्वारपाल का कार्य सौंपा गया, दूत द्वारा पृथ्वीराज की भस्वीकृति पाकर उसकी स्वर्ण 
प्रतिमा द्वारपाल के स्थान पर प्रतिष्ठित करवाई गई । स्वाभाविक था कि इस अपमान से 
पृथ्वीराज चौहान मौर भी अधिक क्रोधित हो उठता । अतः चौहान ने यज्ञ-विध्वंस करने का 
चुृढ़ निए्चय कर कम्नौज१ति राजा जयचन्द फी सीमा का अतिक्रमण कर, उसके भाई वालुका- 
राय को सूर्य लोक भेजकर, यज्ञ विध्वंस कर दिया तथा स्वयं दिल्‍ली लौट आय। । 


अपनी अभिलाषा पर इस प्रकार कुठाराघात होते देखकर पंगराज आपे से बाहर ही 
गया | अपने समस्त प्रतिद्वन्दियों को समूल नष्ट करके पुनः यज्ञ करने की, उसने प्रतिज्ञा की । 
किन्तु पट्टरानी के समझाने पर तथा उपयुक्त समय पाकर उसने अपनी पुत्री संयोगिता के 
स्वयंवर का आयोजन किया | संयोगिता ने अन्य उपस्यित राजाओं की अवहेलना कर पृथ्वीराज 
की स्वर्ण प्रतिमा को ही घरमाला डाल कर अपना पति घोषित किया । कन्या के इस हृत्य 
से कुपित हो राजा जयचन्द ने उसे गगातट स्थित महलों में एकान्तवास का दण्ड दिया । 


तब झुक्ति पंग नरिंद्र ने, तद ग्रगा दिम गेहू। 
के कुड्डवि जल मंझि पर , के न॑न निरप्प देह । ४५। 





१. पृथ्वीराज रासो, साहित्य सेरथान उदयपुर, छं० १२८, स० ३१ १ 
२. वही, छं० ६९:७०, स० ६४१ 
६. वही छं० ७१, स॒० ऐड? 


[ «४६ । 


दंटस दान समान करि दोने दुजबर पंग। 
घन अनव चहुआन के रष्पि सुरीतट गंग ॥' ५५॥ 


राजमूय यज्ञ विध्वंस का प्रतिशोध लेने की कामना से पंगराज ने दिल्‍ली पर आक्रमण 
किया किन्‍न पृथ्वीराज को दिल्‍ली में न पाकर पुनः लौट आया । पंगराज ने पुनः यज्ञ पूर्ण 
मारते की अमिलापा की । अतः उसने अपने मंत्री को दिल्‍ली भेजकर पृथ्वीराज से नाना 
अनंगपाल के राज्य का आधा भाग पंचनद प्रदेश मांगा । पृथ्वीराज द्वारा राज्य न देने पर 
पगराज ने दिल्‍ली पर बाक्रमण कर दिया, जिसमें पंगराज पूर्णरूपेण परास्त हुआ । 
इस प्रकार की घटनाओं से दोनों का परस्पर वँमनस्यथ भौर भी दृढ़ होता गया। एक 
बार पृथ्वीराज ने अपने बालसखा कवि चंद से कन्‍्नौजपति का वैभव देखने की अभिलापा 
प्रवट की तथा दूसरे उन्हें मंयोगिता द्वारा स्वरणमूति को वरमाला पहनाने की सूचना भी 
प्राप्त हो चुकी थी । अतः पृथ्वीराज चौहान ने अपने समस्त सामंतों को साथ लेकर छद्म 
भ्रप बनाकर कवि चंद के साथ कन्नौज की बोर प्रस्थान किया । दरबार में पगराज द्वारा 
परथ्योराज के विषय में पूछे जाने पर कवि चन्द ने छदम वेश धारी पृथ्वीराज की ओर सकेत 
किया जिससे समस्त दरवारी तथा पंगराज का संदेह पुष्ट हो गया। दोनों विपक्षी एक दूसरे 
को निरीक्षण की दृष्टि से देखने लगे । 
देधि थवाहत थिर नयन , करि कनवज्ज नरिंद । 
नयन नयन अंकुर परिय इक थह होई ममद। छं० ६५६१ 
दिपष्पि नयनरा पंग , पंग चुआन महामर॥। 
अंकुरि नयन विसाल , झाल झारंत रंच उर॥ 
दूब फयार कंठीर , पलन आकज्ज वारत तमि। 
वर चायनी समग्ग ,सत्त मांतग रोस जमि ॥* छं० ६५७। 


पगराज को शंका अवश्य हुई किन्तु वह दुद्ट निश्चय नहीं कर पाया कि पृथ्वीराज खवास 
दे छदग बेपष में आवेगा बतः अपनी शंक्रा का मन ही मन समाधान करके कवि चम्द से 
दृस्वीराज का अपने से न मिलने का कारण पृछा-- 

'सोमेस पुत्र तुम हित्त करि , क्यों मुझ्झहि माही मिलत ॥' छं० ६६१ । 

निमिझ कवि ने उत्तर में इसके लिए जयचन्द को ही उत्तरदायी बताया । वात पर 
बाल बढती गई- 
१. प्रथ्वोरान रासो, ना» प्र० स० काज्चो, छं० ध४-५५, स० ५०॥ 
« यहा, छ० ८७ स्त० ५५॥ 
वही, छ० ६५४६-५७, स० ६१। 
४. महों, छं० ६६१, स० ६१। 





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संत मंती लहु मंत कहि , नीते नोति बढ़त। 
जिम जिस सेसय सो दुरं , तिम तिम मदन चढत । ' छं० ६६० । 
पंगराज को पृथ्वीराज की उपस्थिति पर सन्देह तो हो ही गया था, गत: उसने करनाटो 

वेश्या को दरबार में बुलाकर अपना संदेह निवारण करना चाहा। करनाटी वेश्या ने 
पृथ्वीराज को देखते ही घूंघट निकाल लिया, किन्तु कवि चन्द का संकेत पाकर पुनः अवगुण्ठन 
हटा लिया। वेश्या करनाटी के इस कृत्य से पंगराज की संदेह की जड़ भौर भी अधिक द्ढ़ 
हो गई । नगर रक्षक रावन को भट्ट चन्द के सत्कार का भार सौंपा गया। मंत्री सुमन्त 
काव की विदाई लेकर कवि के निवास स्थान पर गया । वहाँ से लौटने पर मन्नी ने भी कवि 
चन्द के पानघर पर सन्देंह करते हुए पृथ्वीराज का होना, पगराज से कहा। पंगराज का 
सन्देह और भी अधिक पुष्ट हो गया । इसी बीच गुप्तचरों ने आकर सूचना दी जिससे शंका 
ने प्रमाण का रूप घारण कर लिया ।" अपने प्रवल शत्रु पृथ्वीराज को अपने नगर में तथा 
इतने निकट पाकर पंगराज के आनन्द का परावार न रहा-- 


श्रवन सुनिय कमधज्ज , पंय फुल्लयोी वरमांस। 
प्रात फुल्लि सतपन्न , सन्न कामोद प्रकास ॥' छं० ६७८। 
पंगराज कवि की विदाई के बहाने स्वयं चतुरगिनी सेना लेकर उससे मिलने के लिए 
अग्रसर हुए । 
सतक पंगराज ने नगर को चारों ओर से घेरने की बाज्ञा पहले ही दे दी थी। कवि चंद 
के छद्‌म वेशधारी पानधर पृथ्वीराज ने पु वंर का स्मरण कर वायें हाथ से ताम्बूल ब्या, 
मानों कोई वस्तु दान दे रहे हों । पंगराज ने भी इस प्रकार पान लेना स्वीकार नहीं किया- 
करे न कर प्रुथ्वोराज नर , घर न कर जंचन्द। 
उसय नयन अंकुरि परग, जयो जुगमत्त गयंद ॥' छं० ९१८। 
पंगराज पृथ्वीराज के इस प्रकार के व्यवहार को देखकर व्यग्र हो उठा। परिस्थिति 
को देखकर चतुर कवि चंद ने पंगराज से पान ग्रहण करने का पुनः बाग्रह किया। शिप्टाचार- 
वश पंगराज ने ताम्वूल ग्रहण कर लिया किन्तु कलह प्रिय पृथ्वीराज ने विपक्षी को एक वार 
पुनः हाथ दवाकर चुनौती दी-- 


'पानि पान करिके दियों, कमधज्जहू पृथिराज । 
चल्यो रक्त कर पललवनि , ग्रह्मो कुलिगंन वाज ॥ छं० ९३२ । 


१. पृथ्वीराज रासो, छं० ६६०, स० ६११ 
२. चही, छं० ८७५ स० ६१ । 
३. चही, छं० ६७८, स० ६१॥ 
४. चही, छं० ९१८०, स० ६१। 


पैर चंपे नूप तात फार , सारंग दिद सुपरणग[- 
पानि प्रथोपति दिव्वियों , श्रोन चल्यो नप संग ॥' छंट ९३४ | 
पैंगराज ने इध प्रकार का व्यवहार देखकर तुरन्त ही पृथ्वीराज को पकड़ने की आज्ञा 

दे दी। रफभरी नियादित हो उठी। पंगराज के सैनिक पृथ्वीराज को पकड़ने का प्रयत्न 
परने लगे । इघर पृथ्वीराज के सामत्त भी अपने स्वामी के सम्मान की रक्षा हेतु अपने प्राणों 
को हथेली पर रखकर पंगराज की सेना से जा भिन्‍्ठे। कहने की आवश्यकता नहों इस युद्ध 
में पगराज की घूरों तरह पराणय हुई। पृथ्वीराज पंगराज को परास्त कर तथा सयागिता 
पा »पहरण कर दिल्सी पहुंचने में सफल हुआ । 


इतिहासकार समोगिता क्षपहरण की घटना के विपय में मौन हैं । किन्तु जगनिक कवि 
विरसित आतल्टा' इस युद्ध का इस प्रकार वर्णन करता हैं-'दोनों और के वीर बड़े उत्ताह से 
युद्ध में सम्मिल। हुए । नृसिह फूंके गये, तलवारे म्यान से निकले कर चक।*चौंध करने लगीं । 
दोनों सेनाओं के बोच वो घमासान थुद्ध हुआ कि शत्रु तथा मित्र का विवेक जाता रहा। 
दिन भर मारकाट होती रही | योद्धाओं ने रक्त बहाने से हाथ त्व क से खींचा जब तक 
मिर पर तारागण न जगमगाने लगे । जयचन्द ने आज्ञा दी कि राजकुमारी की प्रालकी रण॑भूमि 
में लाकर रख दी जावे तथा घोषणा की कि जिसे विजय श्री प्राप्त हो वही डोला उठाले 
जाय । उम्तक्ा उहं व्य यह था कि पृथ्वीराज स्वयं मैदान में आ जाये और मैं उसे मार डालूं, 
और चोहानों को ललकार कर कहा पालकी यहाँ रख दो तथा ठडे-ठडे गृह मां ग्रहण करो । 
उपर राठोर भी चिल्लाए जिन योद्धाओं में पालकी दिल्ली ले जाने का गवे हो जरा सम्मुझ , 
नो आधे | प्रत्येक बीर ने दो-दो तलवारें अपने हाथों में सम्भाल ली तथा वीर मृत्यु को एक 
ममोरजक प्रेल समझकर युद्ध में जुट गए। चौहामों का पल्‍ला भारी था तथा पालकी पाच 
फंस दिल्‍ली की भोर अग्रसर हो चुकी थी । 


फरनीजियों ने भी पिट ने छोड़ा । रात दित बरावर लड़ते रहे | पालकी कभी दिल्ली 
को ओर क्यमर होती तो कभी कन्नौज वाले अपनी ओर खींचते थे । किन्तु डोला दिल्‍ली 
यो घोर हो क्रमशः अग्रसर होता गया। सोंरों के घाट पर गंगा पार जाते समय एक वार 
किंग भमासान युद्ध हुआ । दोनों और के चुने हुए वीर आमने-सामने आकर अपनी-अपनी रण॑ 
इुगलता का परिचय देने लगे। किन्तु बाजी चौद्वानों के हाथ हो रही तथा कन्नौज की सेना 
दिन प्रतिदिन घदती ही गई। दिल्ली छे फाटक के सामने फिर अन्तिम युद्ध हुआ । उसमें 
राहोर सेना के ब्चे-सनसे सैनिक भी काम आ गये । बानन्द एवं उत्साह में चंदवरदायी तथां 


पस्वीराए ने रबये होला उठा लिया तथा अत्यस्त हृथित हो नगर प्रवेश किया । कविचंद नें 


एपसइ को संबोधित कर कहा यदि आपके सब सैनिक काम आ गए तो पृथ्वीराज की भी 


१. प्ृथ्योराज रासो, छं० ९१३२-९३४, स० ६१। 


[ ५९ ] 


प्रही दशा है अतः अब युद्ध व्यर्थ है। शांति से घर की ओर प्रस्थान करिये ।”' घोक और 
पश्चाताप में डूबा हुआ पंगराज बन्‍नोज लौट आया। घायल पड़ हुए वीरों की सुभूपषा 
करने के उपरान्त दिल्‍ली भेज दिया । साथ ही अपने पुरोहित श्रीकंठ को अपार घन राधि 
दहेज स्वरूप देकर दिल्‍ली भेजा किन्तु फिर भी हादिक हंए समाप्त न हो सका। इसके 
अतिरिक्त डॉ० दशरथ शर्मा संयोगिता अपहरण की घटना को पूर्णतय: ऐतिहासिक मानते 
हुए लिखते हैं कि ''पृथ्वीराज विजय में पृथ्वीराज के तिलोत्तमा के चित्र पर मुग्ध होने मौर 
तदनंतर उसके विरह से व्यथित होने की जो कथा है, वह किसी ऐसी राजकुमारी से होने 
वाले विवाह की भूमिका मात्र है, जिसको उसके लेखक ने तिलोत्तमा का बवतार बताया 
होगा, वह राजकुमारी गंगातटवर्ती किसी स्थान की थी यह उसके अतिम प्राप्त सर्ग के ७न्वें 
अुटिल श्लोक के 'नाक नदी तट स्थित से प्रकट है, इसलिए उसमें रासो की संयोगी अघवा 
सुजंन चरित की कान्तिमती का चरित्र और पृथ्वीराज से उसके विवाह की कथा आई हो, 
तो आश्चर्य न होगा । भलतः प्राप्त साक्ष्यों से रासो की प्रथ्वीराज भौर जयचन्द के संघर्ष 
की कथा का कोई विरोध नहीं दिखाई पड़ता है ।”'" 


चित्रांगी रावलसमरसिह-मेवाडाधिपति चित्रांगी रावल समरपस्िह दिल्ली-अजमेर के 
अंतिम शासक पृथ्वीराज चौहान के बहनोई थे । ग्रन्थकार ने रावल की पृथ्वीराज के घोर 
पक्षपाती के रूप में चित्रित किया है। क|न्‍्यकुव्जेश्वर राजा जयचद के प्रमुख प्रत्तिइवन्दियों में 
से रावल भी एक थे-पंगराज ने अपने राजसुय यज्ञ को सफलता पूर्वक समाप्त करने के 
उद्दे श्य से रावल समरर््षिह्‌ को अपनी ओर मिलाने की चेष्टा की। पगराज यह भलो-भाँति 
जानते थे कि दिल्‍लीपति चौहान तथा चित्तौड़पति रावल से सम्मिलित रूप से सामना करना 
नितान्त असम्भव है । अतः पंगराज ने अपने मन्नी सुमत को भेजकर मंत्री का संदेश भजा, 
साथ ही यंह भी लालच दिया कि वह और रावल मिलकर चौहान को परास्त करंगे तथा 
इस विजय के उपलक्ष में पजाव का आधा शभ्रूभाग प्राप्त होगा । मत्री सुमत ने चित्तौड़ पहुंच 
कर रावल के समक्ष पंगराज का सन्देश निवेदन कर दिया । मंत्री की बात का समर्घन तो 
गया एक तरफ, उल्टे रावल ने यज्ञ को अनुचित बताते हुए उसे बहुत बुरी तरह से धिवकारा- 


नम सुमंत्री तिन घरयौ, रे अमंत परधान। 

हीनत भये भयो न जग , जग्य बेर बलिदान ॥ छं० ३६॥ 
मिलिस समर उच्चरि चौहान , जग्य करन पहुपंग निधान । 

त्रेता द्वापर करयो जुदेव , फलिधुग पंग जग्य करिसेव ॥ छं० ३७ ।' 





आल्हा खण्ड, पु० ३९-२६। 
डॉ० साताप्रसाद गुप्त, पृथ्वीराज रासो को ऐतिहासिकता और रचना तिथि राष्ट्रकथि 
मंथिलीश रण एुप्त अभिनदन ग्रन्थ, १ृ० ९५७. २ अउटूबर १९५९ । 

३. प्रुय्वी राज रासो, ना? प्र० स० काशी, छं० ३६-३७, स० ५५१। 


[ ० | 
शबल समरमसिह ने और भो नाना प्रकार की वातें करके पंगराज के प्रस्ताव को ढेकरां 
दिया । कम्नौज पहुंच कर मंत्री सुमंत ने सब दातें पंगराज को विस्तार से बता दीं। रावल 
समर सिदर, पृथ्वीराह का समर्थक होने के कारण एक तो पगराज की भाँखों में यो ही खटकता 
था, दूसरे अपनी योजना को असफल होते देखकर वह क्रोधोन्मत्त हो उठा । अत: अपने दल-बल 
सहित पगराज ने चित्तौड़ की ओर प्रस्थान कर दिया-- 


चित्त चिति चित चित्रंग देस , चढ़ि चत्यौँ स॒गुरि पंगुर नरेश । 
दिसि संकि दिसा दस कंपि थान , कूमलिय सेस गय संकियान ॥ छं० २।' 


पंगराज के आक्रमण की सूचना पाकर रावल समरसिह भी उसका सामना करने आ 
उपस्थित हुआ ।* 


युद्ध में रावल के सैनिकों ने अपार पराक्रम प्रदर्शन करके पंगराज की सेना के छवके 
ठटा दिए | पंगराज को अपने प्रवल शत्रु का सामना करने के लिए गज को छोड़कर अश्वा- 
रोहण करना पड़ा- 


देल अग्गी, अग्गी अनी , हल मलियों दर्लपंग। -' 
पो उम्मी सुम्भ सुमरुभ , तिहुपुर मंडन . जंग ॥ छं० ६८।* 


बाहने की आवश्यकता नहीं कि कान्यकुब्जेश्वर महाराज जयचम्द की इस युद्ध में भी 
पराजय हुई | पराजित होकर पंगराज कन्नौज लौट गया किन्तु इस पराजय के परिणाम स्वरुप 
दुश्वीनाज चौहान में वैमनरयता की नींव और भी दृढ़ हो गई । 


शहाबुहीन गौरी-दिल्‍्ली-अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान तथा चित्तीड़ाधिपति 
रावबल समरसिह के अतिरिक्त पंगराज का एक और प्रवल शत्रु गोरी भी था। इतिहासकार 
गउलनेस्वर से मिलकर पृथ्वीराज को पराजित करने का आरोप भी लगाते हैं। 'रासो' में 
भी उक्त मत का समर्थन प्राप्त होता है । 'पीपा युद्ध! में राजकुमारी हंसावती के विवाह हेतु 
जाये हुए पृथ्वीराज का मार्ग गजनीपति गोरी नें अवरुद्ध कर लिया था, उस समय पंगराज 
की भी विशाल सेना का सहयोग देने का उल्लेख कवि ने किया है-- 


घत्यो राज सब सेन सजि विसि उज्जनिय रग। 
आई साहि जगह जूरन लये सहायक पंगव।। छं० १२८४ 


१... पृस्योराज रासों, ना० प्रा० स० काशी, छं० २, स० ५६ | 
२. यही, द्ट० प्र,स० ५६१ 

३. यहा, छं० ६८, स० ६५१ 

४, यहाँ, छ॑ं० १२८, स० ३११ 


| 


पंगराज का गोरी की सहायता दैने का मुख्य उहंश्य यह जान पड़ता है कि वह अपने 
प्रबल शत्रु का विनाश देखना चाहता था । अतः इसी भावना से प्रेरित होकर वह बार-बार 
गोरी की सहायता करता था । रासोकार ने पंगराज तथा शाह गोरी की मैत्री का भी संकेत 
किया है-“जिम्त भज्जने सूर साहाब साही, निते मोक्‍ल्यो सेव निसुरति माही ॥” यदि इसे 
मित्रता स्वीकार कर भी -लिया जावे तो वस्तुतः यह एकांगी ही रही होगी । 


रासो में यत्र-तन्न॒ पंगराज को पृथ्वीराज चोहान के विरुद्ध गोरी को उकसाते हुए 
प्रदर्शित किया गया है । प्न्थकार ने बालुकाराय सोलंकी तथा गौरी द्वारा दिल्‍ली पर सम्मिलित 
आक्रमण का उत्तरदायी- जयचन्द को ही ठहराया-- 


चा्सुबका॑ हिन्दू कमंध ,/ मौर सुगोरी साहि। 
संमभेद जयचन्द किय , पति विल्‍ली समवाहि ॥' छं० १। 


'सामंत पंग युद्ध समग्र, में भी कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द ने पृथ्वीराज को बंदी बनाने के 
उपक्रम में गजनीपति गोरी को भी प्रोत्साहित, किया था- 


सुविधि कोन संज्जिय समन , गहने याइ चहुआम । 
तो सुरपुर भंजे नहीं, इह आधार विरान ॥' छं० १०९। 


उपयु कत छंदों को पढ़कर विद्वानों-को जयचन्द पर आक्षेप करने का अवसर मिल जाता 
है, किन्तु वास्तविकता कुछ और थी ।-वस्तुतः पंग्राज अपने प्रवल शन्नु पृथ्वीराज को परास्त 
देखना चाहता था यही कारण था कि कभी-कभी गोरी तथा जयघंद का साथ हो जाता था । 
वस्तुत: एक दूसरे को मित्र मानना भ्रम ही होगा । 


अंतिम युद्ध में दिल्‍्लोपति पृथ्वीराज को परास्त कर लेने के उपरान्त गोरी ने कम्नौज 
की भोर दृष्टिपात किया। कन्नौजपत्ति पंगराज को पूर्णतया परास्त कर काशी ठफ के विशाल 
भू-भाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया । जयचंद को अन्तिम सग्राम अपने प्रवल प्रति- 
इन्दी गोरी से करना पड़ा था। कन्नौज पर गोरी के आक्रमण का कारण प्ररतुत करते हुए श्री 
सत्यकेतु ने स्पष्ट किया है- 'शाहाबुद्दीन गोरी केवल गजनी के राज्य सिहासन से ही संतुष्ट 
नहीं हुआ, उसते पहले उत्तरी-पश्चिमी भारत से तुर्कों के शासन का अंत कर दिया, फिर 
पंजाब से भागे बढ़ कर दिल्‍ली और कन्नौज के चौहान तथा गाहड़वाल राजाओं के साथ युद्ध 
किया । अनेक युद्धों में परास्त होकर भी अन्तत: वह दिल्‍ली तथा शाकम्भरी के चोहान राजा 
पृथ्वीराज (तृतीय) को परास्त करने में समर्थ हुआ ( ११९२ ६० ) बौर दो ही साल 


१. पृथ्चोराज रासो, छं० १, स० ४१। 


४. वही, छं० १०९, स० ५५॥। 


न 


[ ६२ ] 


बाद गाहदबाल राजा जबचन्द को हराकर कन्नौज के राज्य पर उसने अपना अधिकार 
कर लिया - 

अतः उपयुक्त व्रिवेचन से स्पप्ट है कि गोरी ने कन्नौज पर आक्रमण अपने साम्राज्य 
को दिशाल बनाने के लिए ही किया था। यह गोरी का सौभाग्य ही था कि उस समय भारत 
में आपसी फट के कारण उसे सम्मिलित शवितयों का सामना न करना पड़ा तथा उसके विणाल 
साम्राज्य बनाने का रवप्त पूर्ण हुआ। गोरी के आक्रमण से कन्नौज आाक्रान्त हो उठा ।' 
गजनीपति णाह गोरी तथा कमप्नीज की विशाल सेना के मध्य हुए इस घोर प्रलयकारी सग्राम 
में पंगराज युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ- 


इन्द्र पयध्धर लिंग, रमन सध्यो असुरावन। 

दिसि कनवज्ज अखंत , सुन्यो जैचन्द पराइन ॥ 

सयन सनम्मुथष आय , जुद्ध भारत भर मच्यों। 

जित्यो तिनय साहब परत घर सिर बर नच्यी ॥॥ 

नर॒म्म न पान भावी विगति , असिल लप्प जित्ते असुर । 

जंचग्द फमथ सत्रहु सहुस, हनिय रूग्गि गय घारघुर ॥ छं० २१९ ॥' 


इस प्रकार पंगराज अपने प्रवल एवं ऋ,र प्रतिद्वन्दी शाह गोरी से पराजित होकर परामाव 
फो प्राप्त हजा । 


गोरी के कस्नीड आक्रमण के विपय में समस्त इतिहासकार एक मत हैं । श्री के० एम० 

मी ने भी इस युद्ध का वर्णन करते हुए गोरी की जीत का समर्थन किया है ।* स्टेनली लेनपूल 
सत्यक्रेतु विद्यालंफार-ना० स० इतिहास, पु० ४१६॥। 

पृथ्वीराज रासो, छ० २१५-१७, स० द८ । 
३. चबही, छं० २१९, स० इ८ । 
प्रा) व एट्या 0्ी पार विष्टनपों उैगोर ता वछाबणा, 0एञाएा। छाती ग8॥॥778 
57९८९ ग्राबालालव बहुबाा5ए ुछए एीोग्ावाड ४0 लि वह्लाताह्र णा धाट ग20 ० 
(ागातितवा, पाएं एातत्टल्तटव पता क0वगो तीएतप्रटाएारड ला एटाट गर25- 
एब्प, वठ6्छा5ड रा 7००८५, जाए ै्िताएकतट59 25 8 टोाधापलते 7), 
बकद रण्गरपुपदाणर पीशा छा0टटटक्‍९त0 00 पाढ ए०्फांप्बो ठ 89ए (89073. व्रत 
[00;९व छा [साठा-ह्रापटो:, एद्वावव959, ९ मालीालटाएदों द्वागत 808) ८९८7(९ 
् पतंग, ग्ि0्प्रा ध्यीशट 0ि स्थापपांद5 #80 वी0७7 वंपइछं।2घधंणा ॥00. #70%7-08८, 
लि डा 76 शाए वशाते5 णण जोर विप्शएुश गाएबतेंएए, 2 फ्रा०्पष्मत प्टापए]2८5 'एटा८ 
ते 0७. 3०50७६5 7056 वा तीला फाॉं5०९५, 'ुब१8०ावाताव5 5०म पद्वान॑लावाती 9, 
# छ0ए ० साएविव्टए गएप्रटत 0 व तंज्प्वाए फ़ाँत्रल्ट बाते छा पए 5 वं्रवल्फुटातंटाल्‍्ट, 
5. ३ फेपिपलंएं, ईवट 50079 90 १४४5६ छपणा[ब्गाग्त८बछ (फटा 0प्ा[ंधा 85) 
शा. व7, 9०86 206, फोक्य धवछय ए-त५० बचा 50099, 5६ ९७४४079, १944. 


न +>9 


पथ 


[ ६३ ] 


ने गोरी के विशाल साआज्य स्थापना की प्रसंशा बड़े मुक्तकंठ से की है-"महान सुल्तान की 
मृत्यु के उपरान्त योरवंश का साम्राज्य पहाड़ी सामन्तत्व में परिवर्तित हो गया परन्तु जो 
राज्य भारत में उसने जीता था उसे इस्लाम मे खोया नहीं । दूसरे राजाओं ने उसे संगठित 


किया और गोरी के समथ से लेकर सन्‌ १८५७ की भारतीय क्रान्ति तक सर्देव मुसलमान 
राजा दिल्‍ली के सिहासन पर आरूढ़ रहा।”' 


अवसान-शाह गोरी का आक्रमण सुनकर कान्यक्कुब्जेश्वर भी अपना अगणित सैन्यवल 
लेकर, जिसमें लगभग सौ हाथी तथा एक करोड़ से भी अधिक संज्या में मनुष्य रहे होंगे' 
विदेशी भाक्रमंण का सामना करने के लिए भागे बढ़ा ।' पृथ्वीराज रासो के मत्तानुसार यह 
पुद्ध सात दिनों वक चलता रहा । जिसमें पंगराज की पराजय हुई तथा क्षोभ के कारण उससे 
जल सभाधि ले ली ।' 'रासो' के उक्त कथन का 'रासमाला' ने भी समथेन किया है । मुसल- 
भान इतिहासकार फरिश्ता के मतानुसार युद्ध के अन्तर्गत 'घनारस का राय जो कि एक 
हाथी पर अत्यन्त ऊँचे हौदे पर बैठा था, कुतुबुद्दीन के हाथों छूटे हुए एक बाण से संघातक 
आधात पाकर धरांशार्यी हुआ। उत्तका मुण्ड भाले की नोक पर उठा लिया गया तथा घड़ 
उपेक्षा से घूल में फेंक दिया गया ।' 


उपयुक्त मतों में 'रासो' का विवरण हो अधिक उचित प्रत्तीत्त होता है। पगराज एक 
स्वाभिमानी व्यक्ति था | संभव है, अपने आत्म सम्मान की रक्षा करता हुमा, युद्ध भूमि मे 
अपार पराक्रम प्रदर्शित करने के उपरान्त गगा की पावन लहरों में उसने सम्राधि ले ली हो । 
वास्तव में रासो का वर्णन पंगराज का स्वाभिमान देखते हुए उचित ही है । 


जयसिह-'पृथ्वीराज रासो” के अनुसार चोहान वंश परम्परा में ३९चों पीढ़ी में राजा 
आनल्ल राज चौहान के उपराध्त उनका एक मात्र उत्तराधिकारी जयसिह गद्दी पर वेठा। 
इन्होंने १०८ वर्ष तक अजमेर पर आनन्द पूर्वक्क राज्य किया तथा उसके उपरान्त अपने पु 
आनन्ददेव को राज्यभार सौंप दिया ॥९ रा० ए० सो० लंदन की रासो की प्रत्ति, घारणोज की 
ध्रति तथा बीकानेर की एक लक्ष अक्षर वाली प्रति, उपयु कक्‍त कथन का समर्थन करती है । 
साहित्य-संस्थान उदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज सास जयघन्निह के विपय में मौन है । 





श्री नेन्न पांण्छे, भारत का बुहत इतिहासं--भाग २, पु० ७२१) 
इलियद, हिस्ट्री आव इंडिया, जि० शे पृ० २५॥ 

वही, पु० २५१, ब्रिज फिरिश्ता, जि० १ पु० १७८१ 
पथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणी समा काशी, जि० ६४ 
फेविस-रासमएला, भाग १ पु० ररे३ । 

द्विज-फिरइता, पृ० १९२। 

पृथ्वीराज 'रासो, ना० श्र० स० काशी, छं० ६०८-६११, स० १४ 


कस 


ढ़ दब कद 246 २० 


[ ६४ ] 


अलालेख एवं संन्‍्कृत ग्रन्य जिनमें चौहानों की वंशावली दी हुई है, इनके विषय में सर्वथा 
मौन है ।' 

प० सदाणिव दीक्षित प्रवन्धकोप, हम्मीर महाकाव्य, तथा सुजंन चरित के जगदेव को 
ही जयमसिंह मानते हैं | उन्होंने लिखा है कि 'इनका नाम रासो में 'जयसिंह' और प्रवधकोप, 
हम्पीर महाकाव्य तथा सुरजजंन चरित में 'जगवेव” उल्लिखित है । शिलालेख तथा पृथ्वीराज 
विजय में इसका सकेत नहीं मिलता ।" पत्ता नहीं पडित जी ने ऐसी क्लिप्ट कल्पना कंसे कर 
ली । कल्पना पर आधारित होने के कारण पडित जी का मत ग्राह्म नहीं हो सकता । 


प्रमस्तार अबबा धर्मंसार-'पृथ्वी राज रासो” के अनुसार चौहान वंशावली की रछवी 
पीढ़ी में राजा लोहधीर अथवा लोहसार चौहान के उपरान्त घर्मसार राज्य गद्दी पर वंठे 
कवि ने इनका विस्तृत विवरण प्रस्तुत नहीं किया है । रा० ए० सो० लंदन की रासो की प्रति 
उपयू कत कथन का समर्थन करती है ।* किन्तु घारणोज की प्रति, बीकानेर की एक लक्ष 
अक्षर वाली प्रति तथा साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो इनके विषय में पूर्णतः 
मौन है । शिलालेख एवं सं*कृत के ग्रन्थ जिनमें चौहानों की वंशावली का उल्लेख हुआ है, 
उनमें भी धमंसार का नाम नहीं मिलता है ।* 


पंडित सदाशिव दीक्षित जी धर्मंसार के विषय में लिखते है- इसका नाम शिलालेख में 
गुट, प्रबंधकोप में गृदुराज तथा सुर्जन चरित में गुंडदेव मिलता -है | परन्तु इसका स्मरण 
पृच्वीराजविजय में, हम्मीर महाकाव्य में तथा रासो में क्रमश: गोविदराज, गंगदेव, तथा धम- 
सार, इन भिन्न-भिन्न नामों से किया गया है ।* पंडित जी का मत पुष्ट प्रमाणों के अभाव में: 
सवंया भग्राह्म है । 


धर्माधिराज-'पृथ्वीराज रासो' के अनुसार चौहान वंश परम्परा में ३५वीं पीढ़ी में 
राजा प्रयवराइ अथवा प्रथवराय के उपरान्त धर्माधिराज उनका उत्तराधिकारी हुआ, जिसने 
छहों प्रकार के योगों को भली भाँति भोगा ।" रासोकार ने इनका विशेष विवरण प्रस्तुत 
नहीं किया है । रा० ए० सो० लंदन की रासो की प्रति उपयुक्त कथन का समर्थन करती है ।* 





देखिए, प्रस्तुत झोध प्रबन्ध, परिद्चिष्ट । 

पं० सदादिव दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० १२३ । 
पृम्योराज रासो, ना० प्र० स० काश्ों, छं० २८०९, स० १॥ 
रातों की हस्त लिखित एबं अप्रकाशित प्रति, पृ० १०॥ 
देसिए, प्रस्तुत शोव प्रबन्ध, परिशिष्ट । 

पं० सदाधिय दीक्षित, रासो समोक्षा, पृ० ११७-११८॥। 
पृथ्वीराज रासो ना“ प्र० स० काशी, छं० २९२, स० १। 
- रासों को हस्ततिसित एवं अप्रकाशित प्रति, पृ० १०१। 


॥ 


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+ 


ढ़ कढ्ला कल 


[ ६५ ] 


किन्तु घारणोज की प्रति तथा साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो इनके विषय में 
स्वेथा मोन हैं । वीकानेर की एक लञ्ष अक्षर वाली भ्रति में इनका नाम मिलता है, किन्नू यह 
सूचना प्राप्त नहीं होती कि यह प्रथवराई के उत्तराधिकारी थे। मानिक्यराव चौहान के वश 
में ही कवि ने धर्माधिराज का नाम दे दिया है ।* 


डॉ० दशरथ शर्मा घर्माधिराज को उपाधिमात्र मानते हैँ तथा उनका कथन है कि संभवत: 
यह चामुण्डराय हो | उन्होंने लिखा है-'माणिक्यराय का नाम प्राय: सभी ही खझ्यातों कौर 
कुछ पुराने शिलालेखों में प्राप्त है उसका वंशघर धर्माधिराज संभवत: राजा चामृण्डराज 
हो । उसने नरवरा में भगवान विष्णु का मंदिर बनवाया था ( पृथ्वीराजविजय महाकाव्य, 
सगे ५, श्लोक ६५ ) | अत: अत्यत्त धर्मिष्ट होने के कारण ही उसे धर्माधिराज पदवी मिली 
होगी |” डॉ० शर्मा जी का मत भी संभावना पर अधिक आधारित है । मत: निश्चित रूप 
से मानने में संकोच ही रह जाता है। 


नागहस्त-'पृथ्वी राज रासो” के मनुसार चौहान वश वृक्ष की रईवीं पीढ़ी में राजा 
संप्रतिराय के उपरान्त उनका पुत्र राज्यगद्दी का उत्तराधिकारी हुआ +' ग्रन्थकार ने वशवृक्ष 
के अन्तगंत ही इनका उल्लेख किया है, वैसे समस्त ग्रन्थ इनके विपय में मौन है। रा० ए० 
सो० लंदन की रासो की प्रति उपयुक्त कथन का समर्थन करती है ।* घारणोज की प्रति, 
बीकानेर की एक लक्ष अक्षर वाली प्रति तथा साहित्य सस्थान उदयपुर से +काशित शासो 
इनके विषय में मौन हैं। शिलालेख एवं प्राचीन सल्कृत ग्रन्थ भी इनके बस्तित्व मे सदह 
करते हैं।" 

पंडित सदाशिव दीक्षित इनका नाम नागराज मानते हैं तथा प्रशस्ति आदि के सिहराज 
नामक राजा में आरोपित करते हैं-''इसे प्रशस्ति आदि में सिहराव कहा गया है, परन्तु रातों 
में नागराज । रासो के आधार पर इसका नाम 'नागहस्त” लिखना मर्थान्भिन्षत्ा है वयोकि 
रासो में लिखा है- 


सु नागहथूथ सम नागराज ।' सुजंनचरित में इसका बनुल्लेख आश्चयंजनक है।' 
पंडित जी का नागहस्थ के स्थान पर नागराज नाम तो किसी प्रकार ग्राह्म हो भी सकता है किन्तु 





१, पृथ्वीराज रासो को कथाओं का ऐतिहासिक आधार, राजस्थानी नाग हे, मंफ हे, जनवरी 
१९४०, पु० २१ 
२ दही पृ० ४। 
३. पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काज्ञी, छं० २८९, स० १॥ 
. “रासो' की हस्तलिखित एवं अप्रकाशित प्रति, पृ० १०। 
५. देखिए, प्रस्तुत शोध प्रवन्ध, परिशिष्ट । 
पं० सदाशिव दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० ११६॥ 


न्फी 


[ £६ ॥ 


मिहराज में आरीपित करने बाली बात समझ में नहीं आती । यह कैसे कहा जा संकंतां है कि 
नो व्यतिति एक ही है अथवा एक ही व्यक्ति के दोनों नाम हैं। वास्तव में पर्याप्त सामग्री 


है 


| 
न होने के कारण ही विद्वानों ने ऐसी अटकलें लगायी है । 


प्रतापतसिह--' पृथ्वीराज रासो' के अनुसार चौहान वंश की १९वीं पीढ़ी में राजा 

गुप्त चौहान के उपरान्त उनका पुत्र प्रतापसिह उनका उत्तराधिकारों हुआ। रा० ए० 

सो० खंदन की प्रति उपर्यक्स कथन का समर्थन करती है । धारणोज तथा साहित्य संस्थान 

डदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज रासो इनके विषय में मौन है। शिलालेख एवं संस्कृत ग्रन्य 

भी इनका कुछ विवरण प्रस्तुत नहीं करते हैं । | 

पंडित सदाशिव दीक्षित चद्धगुप्त एवं प्रताप सिंह को एक ही व्यक्ति मानते हुए लिखते 

हैं कि-- इनके नाम प्रशत्ति और प्थ्वीराजविजय में चन्द्ररज, शिलालेख में शशिनृप, सुर्जन 

चरित में चन्द्र और रासो में प्रतापसिह बतलाये गए हैं, परन्तु रासोकार को इसका साम चन्द्र 
भी परिन्नात है । वह कहता है कि-- 


॥ 
] 


सुअ चमन्द्रगुप्त सम चन्द रुप। 
परतापसिह आरन्नदूप ॥॥ 


यहे बात समझ में नहीं छाती कि श्री भ्ोज्मा जी ने 'चन्द्रगुप्त' इस एक भोर माम की 
पत्पना किस आधार पर की है। प्रवधधकोष और हम्मीर महाकाव्य में इस चन्द्रराज का 
अनुल्लेख कुछ कम महत्वशाली नहीं है ।' सामग्री अभाव के कारण पडित जी का मत ग्रांह्म 
मंदी है। संभावनाओं पर निर्णय देना भूल होगी । पु 


प्रयवराई--'पृथ्वी राज रासो' के अनुसार चौहान वंश परम्परा में ३४ वी पीढ़ी में राजा 
बालन्नराय खौहान के उपरान्त उनका एक मात्र उत्तराधिकारी प्रथवराय हुआ, जिसने अपनी 
राज्य की सोमा की बूद्धि की । कवि से इनका विशेष परिचय नहीं दिया है । रा० ए० सो० 
सदन की रासो फी प्रति से भी उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है किन्तु इस प्रति में प्रथवराई 
के स्थान पर 'प्रमराई' लिया है | प्रयवराई का प्रमराई होना लिपिकारों की असावधानी के 
हो परिवायक है । किन्तु रासो की अन्य समस्त प्रतियों में इनके विषय में एक शब्द भी 
प्राप्त नहीं होता । शिलालेख एवं संस्कृत ग्रन्थ जिनमें चौहानों की वंशावली का उल्लेख हुआ 





१, पृण्यीराज़ रासों। मा प्र० सम काशी, छे० ए८०, स० १7 
२. शामो शो हस्तलिरित एवं अप्रकादित प्रति, पू० १० ॥ 

३. पं० मदाशिव दौक्षित, रासो समौक्षा, पृ८ ११५॥। 

€, . दृश्योगाज राखों, ना? प्र स० फाशी, छ० २९१, स० १३ 
2. रामो को हस्तलिरित एवं अप्रद्ाशित प्रति, पु० १० । 


[ ६७ ] 


है, वह सव प्रथवराई के विषय में मौन है ।' प्रथवराई के सम्बन्ध में उपर्युक्त समस्त ग्रन्थों 
का मौन, इनके अस्तित्व में संदेह पैदा कर देता है। अन्य प्रमाणों के अभाव में इनके विपय 
में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। 

पृथ्वीराज चौहान-दिल्‍ली अजमेर का अंतिम हिन्दू शासक महाराज पृथ्वीराज चौहान 
चंंशी थे। पृथ्वीराज रासो' को आधद्योपान्त पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वीराज का जन्म 
चौहान वंशी ढूंढा दानव की ज्योति से हुआ था । ग्रन्थकार लिखता है । 


“दुढ रुप दानव उतंग , वौलि आना नरिंद दिय । 
अस्ति सकरू सामंत तेज प्रथिराज वीर विय। 
बल, विक्रम अति चसूर ,जीह कवि चन्द प्रमाने। 
एक ठासम उप्पध एक थरू मरने निधान । 
संजाल काल बिल्ली रही , चौततदुठा टोडर समनि। 
देवत्त पहू देवान गति , देव गत्ति जोगा सघनि।' छ० ५५७। 


उपयुक्त छन्‍्द से स्पष्ट है कि महाराज पृथ्वीराज का जन्म ढूंढा दानव की ज्योति से 
हुआ था। ग्रन्थकार कवि चन्द बरदायी तथा पृथ्वीराज को समवय€क होने का प्रमाण निम्न- 
लिखित छंद से स्पष्ट होता है-- 


दानव कुल छत्नीय नाम दुढा रष्पसः वर। 
तिहि सु जोत प्रथिराज सूर सांमत अस्ति भर । 
जीह जोति कविचन्द रुप सजोगि भोगि भ्रम । 
इक्क् दीहू ऊपनन इक्क दीहै समाय क्रम । 
जथूथ कथूथ होई निर्भये , जोग भोग राजन लहिय । 
बच्च ग॒ बाहु अरि दलमलन , तासु कित्ति चंदह्‌ कहिय ।' छ० ६९२॥। 


दानव कुल में दुढा नाम का एक श्रेष्ठ राक्षस हुआ. उसकी ज्योति से महाराज पृथ्वीराज 
ने जन्म लिया, हड्डियों से श्र सामंत उत्पन्त हुए, जि्दा फी ज्योत्ति से कवि चन्द का 
जन्म हुआ, रूप से संयोगिता हुई, यह सब एक ही दिन उत्पन्न हुए तथा एक ही दिन विनिष्ट 
हो गए, इसी प्रकार से उनकी कथा है। रांजा को योग तथा भोग दोनों ही प्राप्त हुए, भगत 
दल का दलन करने वाले ब्रजवाहु चौहान नरेश की कीति कवि चन्द ने वर्णन की । अन्य वाई 
स्थानों पर भी कविःने अपना जन्म तथा पृथ्वीराज का जन्म एक साथ ही होना लिया है 
त्था साथ ही दोनों ने शरीर भी त्याग किया । 





१. देखिए, भ्रस्तुत शोध प्रवन्ध, परिशिष्द । 
२. पृथ्वीराज रासो नागरो प्रचारिणी सभा काशी, छू० ५५७, स० ६७। 
३. वही छ॑ं० ६९२, स० १ ॥ 


[ 5) 


ज्यीं नयौ जनम कवि चन्व को , नमो जनम सामनन्‍्त संब । 
इक भान जनम मरनह सु इक , चलहि कित्त ससि लग्गि रव | छं० ७६०। 


श्रवात जिम प्रकार कवि चन्द्र तथा अन्य सामान्‍्तों का जन्म हुआ तथा एक ही स्थान 
पर जन्म और एक ही स्थान पर मरण का वर्णन करूगा। जब तक सूर्य-चन्द विद्यमान है 
सब तक उनकी कीधि बनी रहेगी । अंतिम युद्ध में कवि चन्द को वीरभद्र द्वारा पृथ्वीराज 
की पराजय तथा सुलतान गोरी द्वारा उनके वन्दी बनाए जाने की सूचना मित्ती जिससे वह 


सप्पन्त 


त दुप्मी हुआ । अपनी अपार बेदना को प्रकट करते हुए कवि ने लिखा है-हें श्रेष्ठ वीर, 
माया-मोह के अपार उदधि में डूबा हुआ, एक साधारण मनुष्य, में तत्व क्या समझूं । में तथा 
राजा पृथ्वीराज एक ही साथ उत्पन्त हुए थे, एक स्थान पर निवास-किया भौर सर्देव साथ 
ही साथ रहे हैं, हम दोनों स्नेह पाण में ती बंधे ही थे, किन्तु राजा पृथ्वीराज का मुझ पर 
अपार प्रेम था । समस्त सामन्‍्त भी स्नेह बंधन में बंधे थे, बालस्नेह ने हृदय में घर कर लिया 
है, है वीरभद्र | संसार में स्तेह ही आनन्द का देने वाला है, फिर हृदय से इसे किस प्रकार 
विलग किया जावे-- 


फहे तास कवि चन्द अहो वीराधि बोर सुनि। 

हम मनुष्ठ मय मोह उदधि बुड्ड सुतत्त दुनि। 

हमहि राज इक वास सथृथ उत्पन्न संग सदि। 

सेहू बंध बंधियं करिय अति प्रीति राज रिदि! 

सामंत सकल अति प्रेम तर , वाल नेह उर धुर कियी । 

घलिनद्र नेहु संसार सुष , किम सुनेह छडे जियो।' छं० १७०२॥। 
एक स्थान पर रासोकार ने पृथ्वीराज के जन्म सम्बत्‌ के सम्बन्ध में इस अकार लिखा है- 


एकादस से पत्र दह, विक्रम साक आन-द | 
तिहि रिपु जय पुर , हरत की भय प्रिथिराज नरिंद ।' छं० ६९४। 


उपयुंवन छन्द से भनुसार महाराज पृश्वीर।ज का जन्म अनन्द विक्रम सम्बत्‌ १११४ में 

टेझा ( 7० मोहनलाल विध्युलाल पांडया के अनुसार १११४-+९१०१२०६ विक्रम संवत्‌ 

मिड टुआ ) । किन्तु महामहोपराध्याय, गोरीशंकर हीराचन्द ओझा ने तो भानन्द सम्बद को 

एक 'भदायत सम्बन' का नाम दिया है । सम्वतों के विपय में एक स्थान पर लिखा है--'राष्तो 

में दिए टुए सभी सम्बत्‌ अशुद्ध है। कनेल टॉड ने रासों के आधार पर चौहानों का इतिद्ास 
3 मी मल 


१. पृष्दीराज़ रासो, नगगरों प्रचारिणी सना काझी, छं० ७६०, स० १३ 
वही, १७०२. स० ६६९ ॥ 


३. वही, छं० ६९४, स० १३ 


न्च 


[ ६९ ] 


लिंखेते समय सम्वतों की जाँच कर उन्हें अशुद्ध वताया और लिखा कि आश्चयंजनक भूल के 
कारण सब चौहान जातियां अपने इतिहासों में १०० वर्ष पहले के सम्बत्‌ लिखती है । रासो 
को प्राचीन सिद्ध करने की खींचतान के प० मोहनलाल विष्णुलाल पांड्वा ने टॉड का बताया 
हुआ १०० वर्ष का अन्तर देख कर एक नए 'भटाग्रत' सम्बत्‌ की कल्पना कर बि० सं० १९४४ 
में 'रासो की प्रथम संरक्षा” नामक 'पुस्तिका लिखी, परन्तु इस कल्पना से भी रासो -के सम्वतों 
की अशुद्धि दूर न हुईं | इससे पृथ्वीराज के जन्म संवत्त १११५ में ४३ साल जोड़कर उसकी 
मृत्यु १९५८ भटायत सम्बत अर्थात्‌ वि० स० १२५८ में माननी पड़ती थी, परन्तु ब्रि+ सं० 
१२४९ में अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों से उसकी मृत्यु सिद्ध थी। इस वास्ते इन ९ वर्षो की 
कमी पूरी करने के लिए उन्होंने पृथ्वीराज के जन्म सम्वत्‌ सम्बन्धी दोहे में 'अनन्दां शब्द को 
देखकर आनन्द स्वत की कल्पना की है और उक्त शब्द का अर्थ अनस्द' अर्थात सौ रहित 
किया । फिर इसे नौ रहित सी अर्थात्‌ ९१ वर्ष का अन्तर बताकर उन्होंने उक्त नवीन सबत 
की कल्पना की और कहा कि पृथ्वीराज रासों में दिए हुए सब सम्बतों में ९५१ जोड़ देने से 
वे शुद्ध विक्रम सम्वत हो जाते हैं ।'' पृथ्वीराज का जन्म सम्वत्‌ वड़' विवादग्रस्थ विपय है । 
वाह्मसाक्षों के आधार पर इस विषय में निराशा ही हाथ लगती है । थि० सं० १२२७ 5 
विजौलियाँ के शिलालेख, १२वीं. शताब्दी का 'पृथ्वीराज-विजय महाकाव्य' १४वी० शताब्दी 
का 'प्रवन्धकोप', १५ वीं शताब्दी का हम्मीर महाकाब्य तथा १६ वीं शताब्दी का सुर्जन- 
चरित भी इस विपय में मौन हैं । "पृथ्वीराज विजय” महाकावग्य में कवि जयानक ने पृथ्वीराज 
फा जन्म ज्येष्ठ मास द्वादशी को होने का उल्लेख क्रिया है, सम्वत्‌ का उल्लेख वहाँ भी 
नहीं है ।* 

वलभद्र विलास" नामक ग्रन्थ के अनुसार पृथ्वीराज का जन्म सम्वबद ११३२ माघ शुवल 
प्रयोदशी, शुक्रवार की दोपहर को दिन के समय पृष्य नक्षत्र अभिजित मुहतें में, सब लोगो के 





ओझा, फोशोत्सव स्मारक संग्रह-प्ृथ्वीराज रासो का निर्माण काल । 

२ ज्पेष्ठत्वं चरितार्थतामश्र नयद्रानान्तरापेक्षया । 
ज्येष्ठस्य प्रथयन्परं तपत्तया ग्रोषमस्य मीण्मां स्थितोम्‌ । 
द्वादश्यास्तिथि मुख्यतामुपदिशस्मानो: प्रतापोन्नतिम्‌ 
तन्वनगोत्रगुरोनिजन नपतेज॑ंज्ञ सुतो जन्मना ॥ सर्गं ७ प० २४९१ । 

४. अथ स साध मासे तु त्रयोदट्यां सिते श्रगौ । 

पुष्पे व्वित्रीन्दचख्रे5ब्दे मध्य:न्ठेडमिजितक्षगे ॥ १॥॥ 

मुदिति लोक सन्‍्ताने तदा पुन्रमज़ोजनत । 

ये बदन्ति नराः संर्वे धातराष्ट्रावदारकम्‌ ॥ २॥ 

आजानुबाहुः शशिपूर्ण भास्यः पद्मायताक्षी मदनेक रुप: । 

चौरप्रहन्ता क्षितिभारहर्ता वंशावतसों नरदेहज्ञः॥ हे ॥ बलनद्र विरूस। 


[ ७४० ] 


प्रमम साल में हमला के हुआ, जिसको सब मनुष्य दर्योधन का अवतार कहते हैं। बहु बालक 
पम्बी नहा बाला, चन्द्रमा के समान मुख कान्ति वाला, कमल सदश् नेत्रों वाला, कामदेव के 
समान रूप बला, बीरहस्ता भूमि के भार को हटाने वाला, चौहान वंश में भूषण नरदेहों हुआ । 


यदि बिल मं० ११६२ को पृथ्वीराज का जन्म सम्वत्‌ मान लिया जावे तो उसकी 
मम्पूर्त आयु ११७ वर्ष की ठहरती है, क्‍्योंक्रि उसकी मृत्यु वि० सं० १२४९-५७ ( ई० सं० 
१५९९२) सर्व विदित है । अतः 'बलभद्र विलास” के सम्बत्‌ को भी प्रमाणिक नहीं मान सकते। 


'रासो' में दिए हुए. पृथ्वीराज चौहान के जन्म सम्बत्‌ को अप्रामाणिक मानते हुए 
डॉ माताप्रमाद गृप्त लिखते हैं क्रि--'पृथ्वी राज के जीवन काल के जो अन्य अभिलेख मिले 
है, वे भी सं० १२३६ तथा स० १२४४५ के बीच के हैं । इस प्रकार हम देंखते हैं कि पृथ्वीराज 
के प्रौद्ध जीवन से सवधित समस्त तिथियाँ विक्रमीय तेरहवीं शती की है, किन्तु ऊपर हमते 

या है कि रासो में दी हुई समस्त तिथियाँ विक्रमीय बारहवीं शती की है । इसलिए यह्‌ प्रकट 
है कि रासो की तिथियाँ नितानन्‍्त कल्पित है। रासो की तिथियों को शुद्ध प्रमाणित करने के 
लिए विक्रमीय सम्वत्‌ से ९१ वर्ष पिछडें हुए अनन्द नामक सम्बत्‌ की कल्पना की गई है, 
किल्तु कल्पना से भी अन्तर का समाधान नहीं होता ।! 


उपर्यवत विवेचन से पृथ्वीराज के जन्म सम्वत्‌ पर प्रकाश नहीं पड़ता वरनू विपय भौर 
मी उस जाता है। किन्तु विवश होकर यहाँ इतने से ही सनन्‍्तोप करना पड़ता है कि 'रासो 
के अनुसार कवि चन्द्र तथा पृथ्वीराज का जन्म साथ ही साथ हुआ था । प्रमाणों के अभाव में 
जन्म सम्वत्‌ पर निर्णय देना असभव है। अब भी इस विपय पर पर्याप्त अनुसधान की 
कावध्यकता है । | 


जन्म सम्बत्‌ विवादास्पत होने पर भी एक स्थान पर कविराव मोहनसिह ने “रासो' के 
सम्बत को ही प्रमाणिक मानते हुए लिखा हे--'पृथ्चीर/ज के जन्म सम्बत्‌ पर अन्य लेखक 
सेबल अनुवान हो लगाते रहें है । उसके जन्म सम्बत का उल्लेख केवल पृथ्वीराज रासो मे द्वो 
अर स० १११५ ( वि० सं० १२०५-६ ) हुआ है, जिसकी पुष्टि 'पृथ्वीराजधिजय! भौर 
हम्मीर मशाकाब्य के लेख मे ही हो जाती है। पथ्चीराज विजय! में लिखा है कि पथ्चीराज 
शो युवास्थ! को सुनकर सब राजकन्याएं अनुराग प्रकट करने लगीं और पूर्व जन्म में वियोग 
रडने के कारण घदराई हुई सीता ने अपने समान गुण वाली अनेक स्थ्रियों के बहाने अमेक 
धारण करके पथ्योगाज का अतियन कर सनोष पाया ( पृथ्वीराज को वरण करके सतृप्ट 
) । इसके बाद खियदा है कि 'तनृपश्चात गजनी के स्वामी गोरी का आधिपत्य खोजाने, 


नी 


हो - माताश्साद गुप्त; पृथ्वीरात शासो की ऐनिहुसिकता कर रचना तिथि, पृ० ९६०, 


राप्ुकदि मेबितीयरण गृषप्द अनिनदन ब्रन्ब, २, अक्टबर, १९५९। 


[ ७१ ] 


से भारतीय राज मंडली ही को चन्द्रमंडल मात इसकी शोभा को विधप्ट करने के हेत वह 
राहु बनना चाहा, उसने पृथ्वीराज के पास दूत भेंजा"“दूत की बात सुनकर पृथ्वीराज ने 
भूकुटि चढ़ाई “तब मन्री ( कंमास ) ने कहा “अभी क्रोध करने का अवसर नहीं है' । 'तिलो- 
त्तमा' के पीछे सुन्द-उपसन्द नष्ट हुए वैसे ही शत्रु ( गौरी और गुजराता ) स्वतः ( एक दूसरे 
से लड़कर ) नष्ट हो जायगे । मत्री ऐसा कह ही रहा था, इतने में गूजर मडल से एक आदमी 
आया उसने निवेदन. किया कि गुजेरों ने गोरियों का पराभाव ( पराजय ) कर दिया है ।' 
'इस घटना को संस्क्ृत लेखक वि० सं० १२३२ ओर मुसलमान लेखक १२३४५ पें हुई मानते 
हैं । तथा स्थर्गीय गौरीशंकर ओझा ने मूलराज के शासन का अत और भीम ( द्वितीय ) 
फे शासत का प्रारंभ ( वि० सं० १२३४ ) के निकट माना है। भतः इस युद्ध से पृव॑ हो 
पृथ्वीराज युवा हो चुका और कितनी ही राजकन्यातं से घिवाह कर चुका था. उसका छोटा 
भाई हरिराज भी इन घटना से पूर्व ही पृथ्वीराज विजय' फे लेखानुतार फकच घारण करने 
( युद्ध में जाने ) योग्य ( युवा ) हो पाया था । 


'हम्मीर महाकाव्य' सें लिखा है 'जब पृथ्वीराज सच शबस्त्र-शास्त्र विद्या में कुघल हो 
गया, तव सोमेश्वर उसे राज्य सोंप स्वयं योगाम्यास में लग गया । पृथ्वीराज न्याय पूर्वक 
प्रजा पालन करता और शत्रु को भयभीत्त रखता था। उसी समय शहाबुद्दीन ( गोरी ) इस 
पृथ्वी ( भारत ) को अधीन करने का परिश्रम करने लगा, उसने कई क्षत्रियों का नाश 
करके मुलतान में अपनी राजधानी स्थापित की । तध पश्चिम प्रान्त के राजाओं ने आकर 
अपने अगुए गोविन्दराज के पुत्र चन्द्रराज के द्वारा पृथ्वीराज से निवेदन किया । तिस पर 
पृथ्वीर'ज ने शहाबुद्दीन पर चढ़ाई करके उसे बन्दी घनाया, जिससे स्पष्ट हो जाता हे कि 
सोमेश्वर की जीविनावस्था में ( वि० १२३२-३६ से पूर्व ) ही पृथ्वीराज सर्वे शस्त्र-शास्त्र 
विद्या में पारंगत और राज्य कार्य में कुशल हो गया था। उप्तके पिता ने उसे अपनी उपस्थिति 
में ही राजा बना दिया और आप ( शास्त्र नियमानुसार वानप्रस्थावस्था ५० वर्ष से आरम्भ 
होती है, उसको प्राप्त कर ) योगाष्यास मे लग गया। उसये धाद मुलतान पर शहादुद्दीन 
मे राज्य स्थापित ( वि० स० १२३४ में ) किया, तब उधर के राजाओं ने पृथ्वीराज से 
पुकार की और पृथ्वीराज ने चढ़ाई कर शहाबुद्दीन को पकड़ा । अत: वि० स० १६४२ से 
पू्व ही पृथ्वीराज शस्त्र-शास्त्र व्द्वा एवं नीति कुशल और शात्रु को दचाने योग्य ( तश्ण ) 
अवस्था प्राप्त कर चुका थो । . 


ही विजव प्राप्त की थी, जिसका लेख सदनपुर नामक प्राम के एक मदिर के स्तम्भ पर 
वि० सं० ९२३६ में लगाया भ्या । हे 

यदि पथ्वीराज का जन्म आरक्षेपकर्ताओं के अनुसार वि० सं० १२२२ के आस-पास 
भाना जाय ो वि० सं० १२३२ के निकट उसकी आयु लगभग १० वएँ वी बहरको है। 
जबकि इस ससय तक उसके कई विवाह होना, झाहावृद्दीन को धछीद झरना, सोमेम्दार वा 


[ ४२ ] 


से के लिए प्रस्थान करना, एवं परमर्दी पर पृथ्वीराज का विजय पाना आदि घटनाएं 

थीं। ऐसी स्थिति में एक दस वर्षीय बालक के लिए उपर्यक्त कामों को कर लेना 

हारयास्थद सा लगता है। बतः रासो के उल्लिखितत अनन्द सम्बत १११४५ ( बि० सं० 

१२०५-६ ) ही उसका जन्मकाल बिना किसी हिचकिचाहट के स्वीकार कर लिया जाय तो 
न 


कथि राव मोहनसिह के कथन में सत्यता का पर्याप्त अंश होते हुए भी निश्चित रूप से 
पथ्वीयाज वा जन्म सवत्‌ ११९५ मान लेना उचित नहीं है 


माता-पिता--म म्पूर्ण पृथ्वीराज रासो' पृथ्वीराज के चरित्र से परियूर्ण है, जैसा कि 
ग्रन्थ मे; नाम से ही स्पष्ट है । रासोकार के मतानसार पृथ्वीराज की माता का नाम कमला 
जा दिल्लीयलि अनगपाल की पत्रों थी, तथा पित्ता का नाम सोमेश्वर था । 


अनंगपाल पुत्री उनय , इक दन्नी चिजपाल। 

इफ दननी सोमेस को , वीज वचन कलिकाल ॥ छं० ६८१। 

एक नाम सुर सुन्दर अनिवर कमला नाम । 

दरसन सुर नर दुल्लही , मानो सुकलिका काम ॥ छं० ६८२ । 

सोमेसुर तोमर धघरणि , अनगपाल . पुत्रीय । ु 

तिहि गर्भह पृथिराजु धरि , दानव कुल क्षत्रिय । छं० ६८५ ।' 

अर्थात्‌ सोमेशर्वर की रानी तबरानी अनंगपाल की पुत्री के अपने गर्भ से उस कुल 

( चाहुवान वंण में ) उत्पप्न दानव (ढुढ्ाा ) को पृथ्वीराज के रूप में धारण किया ।.अत: 
स्पप्ट है कि पृथ्वीराज की माता का नाम कमला तथा पिता का नाम सोमेश्वर था। “रासो' 
के प्राय: सभी संस्करण उक्त मत का समन करते है 


वाह्यपाल-बालवः पृथ्वीराज का जन्म हुमा | राज महल में अपार हर्ष फैल गया । 
राजा सोमेश्वर पुत्र रत्न प्राप्त कर आत्म विभोर हो उठे | सोमेश्वर द्वारा योग्य तथा अनुभवी 
ज्योतिषियों को बुलाकर पृथ्वीराज के भविष्य के विपय में पूछने पर, ज्योतिषियों ने बताया कि- 
दम नवजात सेप्ठ राजकुमार की जन्म पत्रिका में जन्म लग्न फलों के अनुसार यह ४३ वर्ष 
या होने तक इन्ट्रप्रस्थ ( दिल्‍ली ) तथा पंच सरिताओं युक्त पंजाब की पृथ्वी को भोगेगा । 
# सोमेण्वर |! क्रापकी ज्योति को घारण किए हुए यह श्रेप्ठ संभरी दिल्‍ली भोक्ता, गजनेश्वर 
को बंधन में ले-लेकर झुब्त करेगा तथा इस तरह अपने जन्म को सार्थक करेगा ।'' बालक 


१. प्रविराध मोटनॉसिह, पृध्चीराज रासो, प्रयम नाग, सम्पादकीय--प० ९-१० प्रकादक- 
साहित्य मग्धान, राजस्थान विश्वविद्य।पीठ, उदयपुर, प्रथम संस्करण, संवत २०११ । 
२... पुृशस्यीराज रामो, नगरी फ्रदारिषों सना काशी, छं० ६८६१-८५, स० १ । 


३. प्स्दोवान रासो, सास्तय संस्यान, उदयठुर, भादि कया, छ० ५०२, स० ११। 


[ ७३ ) 


पृथ्वीराज का भविष्य सुन, राजा सोमेश्वर को हर्ष भी हुआ ओर विषाद भी । हर इस कझारप 
कि पृथ्वीराज विशाल भू-भाग का स्वामी होगा तथा विषाद इस कारण कि उसके कारण 
उनके ( सोमेश्वर ) ससुराल वालों का अनिष्ट होगा । अन्त में ज्योतिषी ने भविष्यवाणी 


की कि मेरी वात पर विश्वास करो बालक पृथ्वीराज का उत्पन्न होना वास्तव में सब प्रकार 
से श्रेष्ठ है ।*" 


बालक पृथ्वीराज का लालन-पालन महलों में सुख पूवंक होने लगा । किसी प्रकार की 
घिन्ता एवं अभाव न होने के कारण बालक दिन टूना औौर रात चौगूना बढ़ने लगा। कवि 
चन्द्रवरदायी ने एक छन्द में बालक का रूप वर्णन तथा उसके शारीरिक विकास को देखकर 
इस प्रकार लिखा है-- 


“अन्य बालक जितने एक वर्ष में बढ़ते हैं उतना ही पृथ्वीराज एक मास में बढ़ने लगे । 
जब वह एक व, एक मास, एक पक्ष, एक दिन, एक घड़ी तथा एक पल के हुए तो शुभ 
मुह॒तं में वाह" लाए गए । उनके गले में मणियों की माला पड़ी हुई थी, जिसमें प्िह के 
नाखून शोभा पा रहे थे ।”* बालक पृथ्वीराज अपने परिवार को आनन्द देने वाले तथा शत्रुओं 
को त्रास देने वाले थे | पृथ्वीराज वत्तीस लक्षणों तथा बहत्तर कलाओं से युक्त थे । पृथ्वीराज 
अपने हाथ में गुलेल लेकर क्रीड़ा करते तो ऐसा प्रतीत होता, मानों साक्षात कामदेव ही 
भवतरित हुआ हो, अन्तर केवल इतना था कि उनके हाथों में प्रुष्पवाण के स्थान पर 
गुलेल थी । 


शिक्षा-वालक पृथ्वीराज अपनी वाल्थावस्था में ही गुरु राम पुरोहित के पास 
विद्याध्ययन के लिए भेजा गया वालक अपनी प्रखर वुद्धि के कारण शीघ्र ही चौदह विद्याओं 
में निपुण हो गया तथा पट्टी पर सुन्दर लिपि लिखना भी सीख लिया। बअल्पकाल में ही 
बालक पृथ्वीराज ७२ कलाओं का ज्ञाता हो गया तथा ८४ कलाकों ( विज्ञानों ) में भो 
विशेष योग्यता प्राप्त कर ली | कवि ने इनकी बहुज्ञता पर इस प्रकार प्रकाश डाला है-- 
बालक पृथ्वीराज शीघ्र ही समस्त विद्याओं में पारंगत हो गए । विद्या, वंधविचार, सत्य, 
विनय, पवित्रता, साम्यभाव, सम्मान, श्रेष्ठ स्थान, सुख का भाव, विजय, चौजन्य, सौभाग्य, 
पूर्णरूप, लावण्य प्रेमी, चिचकला, सदाचार, सगीत और मिलन, इन्हीं सब श्रेष्ठ लक्षणों से 
उसने अपनी कलाओं का विस्तार किया ।” वालक पृथ्वीराज में गंभोर गुणों का अभाव न 
था । वीर पृथ्वीराज गौ तथा ब्राह्मण की रक्षा करमे वाला ओौर नाना प्रकार के दान देने 
वाला था । इतना ही नहीं सत्ताईस प्रकार के शास्त्रों के पठन में व शब्दादि के उच्चारण 





१. पृथ्वीराज रासो, छं० ५३, स० १॥। 
२. पथ्चीराज रासो, साहित्य संस्थान उदयपुर, आदि कथा; छ० ५६ स० १॥ 
३. वही, छ० ६०-६३, सर ११ 


[ ७४ | 


मे भी बह निदृण वा ।' ग्रस्थकार ने एक प्रस्थान पर सूचित किया है कि पृथ्वीराज चौहान कौ 
मस्कुत, प्राकृत, अपन्व स, पिमाचिका, मागधोी और सूरसनी आादि छ तत्कालीन भाषाओं 
का पुर्ध ज्ञान था-- 


संस्कृत, प्राक्रत चंवे , अपभ्रश पिशञाचिका | 


मागधी सूरसंनी च, पट भमापाइ्चंव ज्ञायते। 


टतमा ही नहीं, वह विनयी गुरुजनों का सम्मान करने वाला, सर्वेज्ष और सबका पालन 
करता था । उसके शरीर पर श्रेष्ठ ३२ लक्षण शोभा पाते थे । पृथ्वीराज पठन-पाठन में हीं 
निपुण न था अपित वह सब कलाओं का मरमन्न अस्प्र-शस्त्र चलाने तथा शत्रुओं का नाश 
करने में भी उतना हो निप्रण था, जितना अन्य कलाओं में-पृथ्वीराज शत्रुरूपी वृक्षों को 
क्राटने के लिए कुठार तथा अपने कुल रूपी कमल को विकसित करने के लिए प्रखर किरणों 
वाला भास्कर के समान था। वह पर दर्शनों का प्रेमी, सेवा करने बाला तथा कामनियों 
के लिए साक्षात काम मूर्ति तथा ब्राह्मणों का पालन करने वाला था ।' 


संक्षेप में पृथ्वीराज चौहान सबं॑ कला निपुण था, उसकी योग्यता देखकर तत्कालीन 
राजाओं ने उसकी आधीनता स्वीकार कर ली थी। वह पृरथ्वीपतियों का स्वामी था, उसे 
छत्तीय कुत्त के क्षत्रियों ने अपना सिरमौर मान लिया था। सम्पूर्ण रूप से बत्तीस लक्षण 


उसमें विद्यमान ये । 
प्रिव्यराज पत्ति प्रिथ्थिपति , सिर मनि फुलो छत्तीस। 
नप सिप पर मित लस तजे / ते ग्रुन॒ वरनि कत्तीस॥ ६९ ॥४ 
उपयक्त विवेचन की पुष्टि इतने से ही हो जाती है कि उसके सहायक एक सो छह 
सामन्‍्त ये-- 
तिहि सहाइ सूर ति सुनद , सत सामन्‍्त छ सुूर॥ 
तिहि सु क्ित्ति प्रगटहु करण + कह्यो चन्द्र कवि सूर ॥ ७० ।" 


कझावि की उपर्यक्त वर्णन देखकर तथा पृथ्वीराज की प्रतिभा एवं शासन व्यवस्था देखते 


१. पर्वोराज रासो, साहित्य संस्थान उदयपुर, छं० ६४, स० ११ 
यही, छं० ६४५ स० १ । 
यहा, छं० ६६-६७ स० १। 


+ 


हि । 


नर. जय 


बरी, छं० ६९, स० १ । 


ब्च्जी 
के 


वहा, छं० ७०, स० 2 ) 


[ ७५ | 


हुए यह मानने के लिए विवश होना पड़ता है कि महाराज पृथ्वीराज अवश्य ही विद्या प्रेमी 
तथा अनेक कलाओं का ज्ञाता था । 


पृथ्वीराज के विवाह-पृथ्वीराज रासो/ विवाह सम्यों ६५ में पृथ्वीराज के चोदह 
विवाह होने की सूचना प्राप्त होती है-- 
प्रथम परनि परिहारि। राइ नाहुर की जाइय |. 
जा पछे इंछनीय । सलप की सुता वताइय । 
जा पाछे दाहिमी । राय डाहर की कन्या॥ 
राय कुअरि अति रोत | सुता हंमोौर सु मन्‍्या। 
राम साह की नंदिनी। बड़गुज्जरि वानों बरनि। 
ता पाछ॑ँ पद्मावती । जादवबनी जोरी परनि। १॥। 
रायधन की कुअरि। दुति जमुगीरी सुकहिय। 
कछवाही पज्जूनि। भ्रात बलिश्रद्र सुलहिय । 
जा पछे. पुडीरि। चन्द नंदनी सु गायव॥ 
ससि वरना सुन्दरी । अबर हंसावती पायव । 
देवासी सोलंकनी । सारंग की पुत्री प्रगट ॥। 
पंयानी. संजोगता | इतें राज महिला सुपट | २॥' 


कवि ने पृथ्वीराज रासो के अगामी छन्दों में पृथ्वीराज के विधाह, उनकी किस मवस्पा 
में हुए थे, इस पर प्रकाश डाला है-ग्यारह वर्ष की आयु में महाराज पृथ्वीराज ने नाहर राय 
प्रतिहार को युद्ध में यमपुर ( स्वर्ग ) पहुंचा कर उसकी कन्या ले 'पुहकर' ( पुष्कर ) में 
दिवाह किया, बारह वर्ष की आयु में आबू दुर्ग को घराशायी करने वाले भीमदेव चालुयय 
को परास्त करके राजा सलख की दुहिता तथा आधू राज्य की राजकुमारों इंच्छिनी से विवाह 
किया, तेरहवें वर्ष में सामन्‍त चामण्डराय ने अपनी वहन का परिणय महाराज पृथ्वीराज के 
साथ स्वयं ही बड़े उत्साह के साथ कर दिया, चौदहवें वर्ष में हाहुलीराय हम्मीर ने अपनी 
कन्या का तिलक भेजकर उसके साथ व्याह दी तथा अपने को वड़भागी समझता । पढद्रहवें वर्ष 
की आयु में पृथ्वीराज ने अत्यन्त गंभीर गड़गयूजरी के साथ परिणय किया तथा इसी वर्ष 
अत्यन्त हित मानते हुए उन्होंने रामसिह की पुत्री से भी विवाह कर लिया, सोलह वर की 
अवस्था में पू्॑ दिशा के समुद्र शिखरगढ़ के शासक राजा यादव की आत्मजा पद्मावती मे 
परिणय किया । सभ्ह वर्ष की आयु में गिरदेव पर ग़र्जन करके रामधन की पुृश्री का मपहरप 
कर गन्धव॑ विवाह किया, अठारहवें वर्ष में वीरभद्र कछवाह की बहन पज्जूनी का पाणिग्रहण 
किया, उन्नीस वर्ष की आयु में चन्दपुंडीर की आत्मजा चन्दबदनी पुंडीरनी से विवाद क्या, 
बीस वर्ष की आयु में ( देवगिरी की ) शशिवृता को मपहरण कर ले आए, इक्कासव दप 


१: (थ्चीराज रासो, ना० प्रा० स० काशी, छं० १-२, स० ६॥ 


[ ७६ |] 


में मंभर के राजा ने हंसावती से परिणय किया, बाइसवें वर्ष पृथ्वीराज ने वीर यौद्धा सार्रंग 
की पुत्री का पाणिग्रहण किया' तथा छत्तीस वर्ष एवं दो मास की जायु में वे अपने चौसठ 


वीर सामन्‍्तों की बलि देकर पचास हजार भद्रु सेना को मृत्यु के घाट उत्तार कर पंग (जयचंद ) 
की पुष्री राठौरनी को ले आए। | 


छत्तीस बरस 'पटमास लोय । पंगानि सुता ल्याये सुसोय ।॥ 
रट्टौरि ल्याय चौसठि मराय । पंचास लाख अरि दल खपाय। १२॥' 


पृथ्यीराज रासो के समय ३२ तथा ३३ में पृथ्वीराज का उज्जैन के राजा भीमप्रमार 
की पुत्री इन्द्रावती से विवाह का उल्लेख बड़े विस्तृत रूप में मिलता है, किन्तु विवाह 
सम्यो ६५ में उपयुक्त विवाह का उल्लेख तक नहीं किया गया है । 


'वृथ्बी राज रासो! में पृथ्वीराज के कुल १५ विवाहो का उल्लेख मिलता है । रासोकार 
मे सव विवाहों का प्रथक््‌्‌ रूप से एक-एक सर्ग में वर्णन नही किया है, अनेक विवाहों का तो 
पयन्न उल्लेखमात्र, (विवाह सम्यो ६५' में कर दिया गया है, जिससे उन विवाहों के प्रामाणिक 
होने में कुछ-कुछ सन्देह सा होने लगता है, किन्तु यह कहना कि पृथ्वीराज के अनेक विवाह 
नहीं हुए होंगे, भी उचित प्रतीत नहीं होता है। प्रृथ्वीराज के युग में बहु-विवाह प्रथा थी, 
बड़े-बड़े सामन्‍्तों के घरों में अनेकानंक रानियाँ हुआ करती थीं । ऐसी स्थिति में यदि पृथ्वी- 
राज चोहान ( तृतीय ) फे महल में पन्द्रह रानियां रही हों तो कोई आश्चये की बात नहीं 
है । डॉ० विपिनविहारी त्रिवेदी भी उपयुवत विषय पर प्रकाशन डालते हुए लिखते हैं--/“राज 
पुरुषों के वहु-विवाहों के पीछे जहां कुमारी के प्रति आकपेण भौर शीर्य॑ प्रदर्शन का एक 
निम्मित्त भादि रहे होंगे वहाँयेनकेन प्रकारण विवाह सम्बन्ध से अन्य शासकों की म॑ैश्नी का 
चिर वन्धन और उस पर आधारित सहायता प्राप्ति का अभीष्ट भी प्रेरक रहना सम्भव है। 
यहू-यिवाह वाले उस युग में अपूर्व शूरमा पृथ्वीराज के अनेक विवाह न हुए हों यह किचित 
आश्चर्यजनक है ।” 


मर 


भमी तक ऐसा कोई भी शिलालेख प्रकाश में नहीं आया, जिसके आधार पर पृथ्वीराज 
के विवाहों दी उच्चित जांच-पड़ताल की जा सके । बनेकानेक विरोधी प्रमाण मिलने के कारण 
इतिहासकारों को रासो वर्णित पृथ्वीराज के विवाहों में से एक भी सत्य एवं प्रमाणिक नहीं 
प्रतोत्त होता है । विवाहों की ऐतिहासिक्रता पर अन्यत्र विचार किया गया है । 


१. पृष्यौराज़ रासों, ना» प्र० सं काशी, छ॑० ३-११ स० ६५॥ 
र्‌. फ्ष के छं० 4२, स० ६५॥ 


३. डॉ3 विपिनबिहारों प्रिवेदों, रेवातटः समय, पू० २१६-१७, हिन्दी विभाग, छद्बगऊ 
छिदयदिशालय, छ्लनऊ सन १९४३ $ 





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पृस्वोराज का ऐशम्वर्य-- 


दासों के अनुसार पृथ्वीराज चौहान अपने समय का एक महान्‌ शासक या, उन्हें 
छतीस इस के छत्नरियों ने अपना सिरमौर मान लिया था। उनमें छत्तीसों श्रेष्ठ लक्षण विद्य- 
मान थे ।' पृथ्वीराज का यश चारों दिशाजं में फला हुआ था। समस्त क्षत्रीय वंश उनकी 
बाघीनता में जा गए थे । पृथ्वीराज का राज-दरवार सर्देव योग्य कलाकारों से भरा रहता 
था। उनकी आधोनता में उस युग के प्रसिद्ध योद्धा एवं सूरमा रहा करते थे, जिनकी संख्या 
रासोकार ने १०६ बताई है ।' पृथ्वीराज चौहान दिल्‍ली का आआपधिपत्ति था। जहाँ कवि ने 
उसकी महानता एवं सूरवीरता का विवरण दिया है, वहीं वह उसकी राजधानी की सुन्दरता 
का बर्गन करना भी नहीं भूला है । निगम बोध स्थित राज उद्यान' में लगे वृक्षों, फलों तथा 
फूत्तों की विस्तृत सूची देने के उपरान्त कवि ने दिल्‍ली का विवरण प्रस्तुत किया है--इन्द्रपुरी 
सदुण्य चौहान पृथ्वीराज की दिल्ली में श्रंवाल तथा नग्राड़े बजते रहते हैं। राजा के समक्ष 
पहचने के लिए दस पोरियाँ पार करनी पड़ती थीं और फिर सात खडोवाला राजप्रसाद था ।' 
दिल्‍ली नगर की हाट में अनेक प्रकार के माणिक्य-मोती खरीदे जा सकते थे-- 


घुरि थुम्मिय नररंध निम्तान धुर॑ं , धघुर है प्रथिराज कि इद्रपुर । 
प्रथम॑ दिलियं किलियं कहन॑ , ग्रह पौरि प्रसाद धना सतवं । २३ । 
घन भूपष अनेक अनेक मती , जिन यधिय बंघन छत्रपती । 
जिन अश्व चर्ढों घरि झबव लप॑ , वल अश्रीप्रभु मंत्र अनेक भयं। रेड । 
दह पौरि सु सोनत पिय्थ बर॑ं , नरनाहु निसंकित दाम नरं। 
नर हृट्ट सु लप्पनयं मरयं , घरि वस्त अमोल नयं नरयं ॥ २५॥। 
तिहि बीच महत्ल सतप्पनमं , रलूपि कोटि धजी सु कवी गनय॑ । 
नर सागर तारंग युद्ध परे , परि राति सुरायन बादु परे।२६। 


नः न लि ब् 
पचि उछल्लिय नोलिय मानक , रतन जतनं मनि तेज. फरय । 
सुन दित्लिय हुदुट सु नर मर्श , करि दंत मिलंत गिरंत सझे॥ ३० ।४* 


उम्स विवरण से पृथ्वीराज चौहान की ऐश्वयंता का पर्याप्त बोघ हो जाता है। सम्भव 





१. पृथ्यीरान रासो; साहित्य संस्थान उदयपुर; छं० ६९, स० १। 
२. तिहि सहाय सुर लि सुमट , सत सामंत छ सूर । 
हिहि स्‌ कित्ति प्रगदहु करण , कह्यो चन्द कवि सूर ॥-पृथ्वीराज रासो, छं० ७०, स० ६ । 
३. पथ्योराज रासो, नागरी प्रवारिणी सना काशी, छं० ५-११, स० ५९ | 
४. यहाँ, छं० २३-३०, स० ५९ । 


[ ७९ |] 


है कुछ विद्वानों को यह वर्णन भट्ट-भगंत अतीत हो । सं० १२४० वि० में विरचित 'गर्वावली' 
मै पृथ्वीराज की महानता पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है !” गर्वावली' की प्रामणिकता में किसी 
प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता । श्री जिनपति सूरि के शिष्य श्री जिनपालोपाध्याय 
रचित खरतरग*छ गवरविली' के आधारपर श्वी अंगरचंद नाहदा और श्री भंवरलाल नाहटा 
ने पृथ्वीराज की राज-सभा में जैनाचार्यों के शास्प्राथ नामक निवन्ध में लिखा है कि--'अतुल 
वलश'्ली महाराज पृथ्वीराज का कहाँ तक वर्णन करें जिन्होंने अपने सैन्य घल से तमाम 
दिश्ाओं को जीत लिया है, अतएव: जय लक्ष्मी ने माकर इनकी भुजाओमों फो अपना घर 
घना लिया है। जब नर्व प्रथम मयोढ़ा चधू घर में आती है तथ गृहद्वार में स्वस्ति किया 
जाता है, वैसे ही इनकी भुजाओं में जयलक्ष्मी के प्रवेश के समय रण भूमि में भद्दानक राजा 
के हाथियों ने तीखे भालों की मार से फटे हुए अपने कुंभस्थल से निकलते हुए गज मुक्ताओं 
पे स्वस्ति किया ।'' एक स्थाप् पर घूरि जी में पृथ्वीराज को राजसभा का वर्णन निम्न शब्दों 
से किया है ।' 


“राजा पृथ्वीराज का प्भा मंडप कैसा है? चमकती हुई सुन्दर मणियों से इसकी 
भीत्त और गेगम वन्ाए गए हैं। उन्हीं मणियों की रुचिर रचना से रचित फर्श से निकलने 
घाली किरणों से इसके चारों ओर दिशाएं जगमगा रही हैं। जिनकी सुगंध के लोभ से आगत्त 
भ्रमरों के गुंजारव से सारे हो सभा भचन का भध्य भाग भर गया है, ऐसे फूलों के गुच्छे 
सभा मंडप के प्रगंण में विखरे हुए हैं। इस सभा में नौले रंग का रेशमी छशामियाना तना 
हुआ है । हवा से हिलती हुई उसके चारों तरफ की चंचल युवत मालाएं ऐसी प्रतीत होती 
हैं, मानों किसी जलाशय के चारों ओर निर्मल जल घारा टपकदी हो । जिप्तमें कामदेव की 
राजधानी के उपयुक्त सुन्दरो वेश्याए विधमाम हैं, उनके धुन्दर कटाक्षों से कामीजनोा का 
हृदय श्षुष्ध हो रहा है। वैश्याओं के घारण किए हुए अनेक बर्ण वाले रत्न जटित आाभूषणों 
से विस्फूटित रग-बिरंगी किरणों, के समूह से निरालंक ही आकाश में चिश्रकारी सी हो रही 
है । सभा-भवत्त में किसी स्थाध पर आम की मंजरी खाते से मस्त हुए कोयल के कलरबव के 
समान संगीत कला में निपृण कलावंत लीयों से सुन्दर गायन किया जा रहा है। कहो पर 
सदाचार सम्पस्त सुन्दर वनों की रचना चातुरी प्रसिद्ध पीत्ति शास्त्र को विभारने मे दिचल्षण, 
मंत्रिमंडल आधार-अनाचार का विवेचन फर रहा है। इसी सभा में किसी स्थान पर उत्कट 
प्रतिवादियों को परास्‍्त फरने भें समर्थ उत्तमोत्तम समस्त विद्याएं जिनकी जिहल्ना पर नृत्य 
कर रही है, ऐसे विद्ददव्‌ द विद्यमान है । यहां पर उद्धत रंघरा वाले अनेकः मागप्र राजानों 
की घीरता-गंभीरता और उदारता का व्याख्यान कर रहे हैं। चक्कसा फे समान श्वेत यद्च 
हारा घवल फो हुई पृथ्वी को मांगने घाले अनेक छोटे-बड़े सामन्‍त राजा था धाकर जिसमें 





१. अगरचन्द नाहूटा और भवरलाल्‍ू नाहूटा, पृथ्वीराज को राज्कुमा में सेयाचाम 
शास्त्रार्थ; हिन्दुस्तानी पन्निका, पृ० ८११ 


| 


प्रवेशकर रहे है। जिसमें राजा नानावर्ण की मणियों के जड़ाव से बनाए हुए इन्द्र धनुपाकार 
मिहासन पर ईंड हुए हैं । जिसने अपने बाहुबल से समस्त शत्रु समुदाय फो छिन्न-भिन्न कर 
दिया है ॥ऐमे राजा पृथ्वीराज के चरण कमलों में अनेक राजा लोग किरीट मुकुटाच्छादित 
मस्तक को सुकाते है | जैसे वगीचा पुन्नाग और श्रीफल के बगीचों से शोभित होता है वैसे 
ही यह सभा भवन हस्यि तुल्य पुप्टकाय पुरुषों तथा लक्ष्मी के वैभव से शोभित है। जिस 
प्रकार महाकाव्य काव्य-व्यास्या करने योग्य वर्णों से पूर्ण तथा हास्य, श्रगार, करण आदि 
रुसों से सुबत रहता है-उसोी तरह यह सभा भवन ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णो से युक्त है 
हया अभिलापा को व्यजित करने वाला है। जैसे सरोवर फी शोभा राजहंस भौर कमलों 
में होती है वैसे ही आपके सभा भवन की शोभा राजा और पद्मजा ( लक्ष्मी ) से है । 
इुग्द्र की नगरी अमरावती में कोई भी मिथ्याभाषपी नहीं है तथा सर्देव उसमें देवताओं की 
भोट्ट बनी रहती है, बसे हो इस भवन में सब सत्यवक्ता है भौर इस में विद्वानों की सर्देय 
भोट सगी रहती है । आकाश में जिस प्रकार मंगल औौर शुक्र नाम के ग्रह शोभांवुद्धि करते 
हैं, वैसे ही आपकी सभा में गायानादि मांगलिक कार्य तथा कवि लोग शोभा बढ़ाने में हेतु 
हैं । कास्ता के मुख की शोभा अच्छे-अच्छे मालंकारों से है तथंव इस सभा मंडप की शोभा 
भी सुन्दर सजावट से है। विविध प्रकार के चित्रों से यह चित्रित है ।” अपने लेख को बंत 
में समाप्त करते हुए सूरि जी महाराज इस प्रकार लिखते हैं--“महाराज पृथ्वीराज के ऐसे 
सभा मंडप को देखकर किस पुरुष का चित्त आश्चरयंमग्न नहीं होता ।/' 


अन्त में मास्त्रार्थ में सूरि जी की विजय हुई। अति प्रसन्न होकर महाराज पृथ्वीराज 
नौहान ने बहा--''वाह । महाराज ! भाप जीत गए हैं, हम आपकी विजय की मुक्त कंठ से 
प्रशंसा करते है । मैंने अपने धर्म औौर न्याय के प्रभाव से हजारों स्थानों पर प्रभुता प्राप्त 
फी है । ७०,००० ( सत्तर हजार ) घोड़ों पर मेरा आधिपत्य है, मैं समझता हूं कि कोई 
भी प्रतिपक्षी मेरे समान दरज को अभी तक प्राप्त नहीं कर सका है। परन्तु इसी देश में मैं 
भाषको अपने समान श्रेणि का मानता हूं, क्योंकि आपने भी समस्त देशों के धर्माचार्यों को 
जीत कर उन पर प्रमुता प्राप्त की है। बाचार्य महोदय अब तक हमें ऐसा मालूम नहीं था 
कि आप इस प्रकार के रत्न है। इसलिए जान या आनजान में मुझ्न से अनुचित व्यवहार 
टला हो तो आप हमें क्षमा करें।”* 


चौहान पृथ्वीराज एक महान शासक था, उसकी सभा में वागीश्वर, जनादंन गौड़ 
और विद्यापति प्रमूति प्रकांड विद्वन राजपडित थे जौर शास्त्रार्य के समय मंडलेश्वर कैमास भी 
दपम्यित था । महाराज पृथ्वीराज ने स्थय अपने मुख से मपनी सना में ७०,००० (सत्तर हजार) 


६. अगरचन्द सलाहटा और भंवरताल नाहूटा, पृय्वोराज को राजसभा में जनाचार्यों के 
शास्दायं, हिरदुस्तानों पत्रिका, पु० ८इ-८४ ॥ 
२. दहो, पृ० ९१-५२ ! 


[ 5१ |] 
धोड़ों का होना कहा है, यह वात विशेष महत्व की है। इतना ही नहीं नपितु यहां तक 


कहा है कि इतना ऊँचा पद किसी को भी प्राप्त नहीं है। इस वाक्य से पृथ्वीराज के 
तथा चक्रवतित्व का स्पष्ट परिचय प्राप्त होता है । 


व भव 


पृथ्वीराज की उदारता--पृथ्वीराज रासो” में सर्व-प्रथम पृथ्वीराज की उदारता का 
परिचय 'आखेटक वीर वरदान” समय से मिलता है। चंद ने एक ऋषि की कपा से परर्‌ 
पराक्रमी बावन वीरों को वश में करने वाला मंत्र सिद्ध करके, उन गणों का प्रत्यक्ष पौरुष 
दिखाने तथा पृथ्वीराज की आज्ञानुसार उक्त मन्न सब सामन्‍्तों को सिखाने पर, महाराज 
पृथ्वीराज द्वारा कवि चन्द वरदायी को उदारता पूवंक बीस गाँव तथा एक सुसज्जित अश्व 
देने का उल्लेख मिलता है-- 


बीस ग्राम कवि चन्द प्रति करी कुवर बगसीस। 
एक वाजि साजति सर्जाह दियो सुसम्भरि ईस ॥ १७८ ॥' 


ग्रन्थकार ने यहाँ पर बीस गांवों के वामों का उल्लेख नहीं किया है, अतः उनके नाम 
रासो में खोजना असभव ही है । 


पृथ्वीराज की उदारता के दर्शन एक बार पुनः “भूमि स्वप्न कथा में होते है । लगरी- 
राय ने पृथ्वीराज को बचा कर स्वयं अपनी तलवार द्वारा बन में शेर का शिकार कर वीरता 
का प्रदर्शन किया । उस समय की पृथ्वीराज की उदारता देखते ही बनती है-- 


भौ प्रसन्न प्रथिराज वोल वुल्लयों सु लूंगरिय। 
इत्तो देऊं॑ प्रचन्ड, पंच जो मद्धि मोह जिय। 


अद्धा राज सु बद्ध, पाद बढद्धा तंबूले। 
अद्धा बेस सुदेस , करों आदर संसूल। 


बोलंत बैन पृथ्वोराज सुनि , जीव छूज्जि नीची नजरि। 
लग्गाइ कंठ ठुकि पिटुठ कर मी मल्ों सब सयूथ करि॥ १८ ॥7 


” अर्थात-सिंह को मारने पर पृथ्वीराज ने प्रसन्न हो लंगरीराय से कहा यदि मेरे शरीर 

हि पांचों तत्व विद्यमान रहे तो इतना ऊँचा सम्मान दूंगा, अर्थात्‌ मेरा बाधा राजसी ठाद, 

आधा! सिंहासन, मेरे खाने में से आधा ताम्वूल, अच्छे देश में से आधा देश देकर सब तरह 

से आदर करूगा। इस प्रकार पृथ्वीराज का कथन सुन कर उस वीर ने विराचित ढय से बन 

में लज्जा का अनुभव कर दृष्टि नीची कर ली । पृथ्वीराज ने उसकी (लगरोराय) की पीठ 
ठोक कर कठ से लगा लिया तथा अन्य समस्त साथियों ने उसकी प्रथसा की । 


१. पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काशी, छं० १७८, स० ६। 
२. .पथ्चीराज रासो, साहित्य संस्थान, उदयपुर, छं० १८, नूमि स्वप्न कया समय । 


[ ५३१ ] 


दृत्पीराज चौहान की उदारता के दर्शन तो उस समय होते है जब वह अपने प्रबल शत्रु 
मजनोपति शाह जाहाबुद्दीन गोरी को युद्ध में अनेक बार परास्त कर उदारता तथा सम्मानपूर्वक 
मुक्त कर देते है | पृथ्वीराज चौहान की उदारंता की यह चरम सीमा है। इसी उदारता के 
परिणाम स्वरूप ही हिन्दुओं के अन्तिम शासक पृथ्वीराज चोहान को अपने प्राणों की आहुति 
देनी परी | ग्रस्थकार ने गोरी को बनन्‍्दी बनाने तथा पुनः उसे उदारता पूर्वक मुक्त करने के 
वर्णन अनेक स्थानों पर किया है । 'माघोभाट कथा में गोरी वीर चामण०्डराय के हाथों वन्दी 
बनाया गया ।' 'हस्सेन कथा! में पुतः वीर च'मण्डराय ने शहाबुद्दीन गोरी को बन्दी बनाया 
तथा उदारता की साक्षात मूति महाराज पृथ्वीराज चौहान ने कुछ दण्ड लेकर उसे मुक्त 
कर दिया । पदुमावती समय में महाराज पृथ्वीराज राजकुमारी पद्मावती का अपहरण करके 
जब ममुद्र शिखरगढ़ से लौट रहे थे, तब मार्ग में गोरी ने आ घेरा, इस वार महाराज पृ थ्वी- 
राज ने स्वयं ही गोरी को अपनी कमान उसके गले में डालकर पकड़ लिया तथा दिल्‍ली ले 
गए । दिल्ली पहुंचने पर अपने विवाह के उपलक्ष में कुछ दण्ड लेकर गोरी को पुनः मुक्त 
फर दिया ।' 'सलप युद्ध समय में गोरों फिर बन्दी बनाकर मुक्त कर दिया गया।* 'घन 
कया समय में चित्तौषपति रावल समरसिह ने शहाबुद्दीन गोरी को बन्दी बनाया किन्तु 
महाराज पृथ्वीराज ने अपनी उदारता का परिचय देते हुए भौर कुछ दण्ड लेकर पुनः मुक्त 
कर दिया ।* 'रेवातट समय' में वीर गुज्जर ने गजनीपति गोरी को बन्दी बनाया ।" “अनंग- 
पाल समय! में गोरी को वीर चामण्डराय ने बन्दी बनाया तथा महाराज पृथ्वीराज ने मुक्त 
कर दिया ।९ 'घधर की लड़ाई” में चाचा कान्‍्ह के द्वारा गोरी पकड़ा गया तथा पुनः पुक्त 
कर दिया गया ।* 'पीपा युद्ध सउय” में वीर पीपा ने अपनी रण कुशलता का परिचय देते 
हुए गोरी को बन्दी चना लिया ।' 'कैमास युद्ध समय! में पृथ्वीराज के मुख्य मत्नी कंमास ने 
शहाबुद्वीन गोरी को महाराज पृथ्वीराज की आधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर 
दिया ।' 'पहाडराय समय! में स्वयं पहाड़राय ने शहाबुद्दीन गोरी को पकड़ कर बन्दी बनाया 
तया पृथ्वीराज ने पुनः दण्ड लेकर मुक्त कर दिया ॥7 पंजून पातशाह युद्ध समय में वीर 


१, पृथ्वीराज रासो, साहित्य सस्यान उदयपुर, छं० ५८, माघोनाद कथा सम्रय 
यही, ८० ७२ हस्सेन कया समय । 





बह >> 
के 


यही. ८० ३८, पद्म यतो समय । 
पट्टो, 5० ७६ सन्‍पएुद्ध समय 
५. यहाँ, ८० ९५, घनकफवा समय । 
६. यहाँ, छं० ७२, रेवातद समय । 
3. यहीं, छोॉ० ७०-७६ अनंगपाल समय 
८. यही छं० ३४ घघर को ऊूटाई समय । 
*. यहों, छं० ३९ पोपा रृद्ध समय । 
१०. यहो, इ ० १०, प्रंमास एड समय । 
११. वही, ४८ ४९, पद्ाइटाय समय । 


[ 5३ ] 


पज्जून के पुत्र मलयसिंह ने गोरी को वन्‍्दी बनाया तथा महाराज पृथ्वीराज चौहान ने उसे 
मुक्त कर पुन: अपनी महानता एवं उदारता का परिचय प्रस्तुत किया ।* (दुर्गा केदार समय 
में पहाड़राय ने गोरी को पकड़ कर वन्दी बनाया तथा वीर पृथ्वीराज ने गोरी को मुवत्त कर 
दण्ड स्वरूप प्राप्त अपार सम्पत्ति पहाड़राय को पुरस्कार स्वरूप दे दी ।" महाराज पृथ्वीराज 
ने प्रत्येक बार गोरी को थोड़ा-बहुत दण्ड लेकर मुक्त कर दिया, यह उनकी अखण्ड उदारता 
का परिचायक है। सम्भव है कवि ने अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन किया हो, पर इस प्रकार 
के वर्णन से इतना तो अवश्य स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वीराज उदार प्रकृति का घा । 


इतना ही नहीं, एक-दो स्थानों पर 'रासो” ग्रन्थ पृथ्वीराज की उदारता के और भी 
उदाहरण प्रस्तुत करता है,--'पृथा” विवाह ऐसा ही स्थल है । रासोकार ने पृथा विवाह के 
समय अनेक प्रकार के दानों का उल्लेख किया है, भांवर के समय पृथ्वीराज चीहान ने रावल 
समरसिह को जिस प्रकार मुक्त हस्त होकर दान दिया वह देखते ही बनता है, देखिए-- 


एक पफिरत भांवरी, साहि मेंबात गांम दिय। 

दुतिय. फिरत माँवरी , दुरव-दान-एक-अग्गरिय । 

तजितिय फिरत मांवरी , दयो संभरि उदकक्‍क फर। 

चौथी भांवरि फिरत , द्रव्य दीनों अनन्त बर ॥ 

चांहुबान चतुर चावहिसा , हिन्दवान वर भान विधि । 

गुन रूप सहज लच्छी सुवर , सहित बोर चंघी जु सिधि ॥ ३३ ॥॥' 


चक्त छन्‍्द में कवि ने, मेवात के ६० गाँव दिए जाने का उल्लेख किया है किन्तु उन 
गाँवों के नामों के बारे में राप्तोकार सवंधा मोन है। अतः केवल ६० की संख्या के आधार 
पर यह ज्ञात करना कि वह गवि कौन से हैं, नितान्त असम्भव है । यहां इतने से दी सनन्‍्ताप 
करना पड़ता है कि पृथ्वीराज ने ६० गाँव दान में दिए होंगे तथा यहां पर गाँवों की ऐति- 
हासिकता न देख कर केवल पृथ्वीराज की उदारता पर प्रकाश डालना ही अभीष्ट है । 
ग्रन्थकार ने लिखा है कि चतुर्थ भांवर में साम्भर प्रदेशदान में दे दिया। सम्भर प्रदेश दान 
देना सम्भवतः अतिशयोक्ति पुर्ण वर्णन ही मानना चाहिए क्योंकि यदि पृथ्वीराज सम्भर 
प्रदेश रावल समरसिह को दान दे देते तो कवि, पृथ्वीराज के लिए 'संभर नरेश शब्द का 
प्रयोग न करता जो कि कवि ने स्थान-स्थान पर पृथ्वीराज के लिए किया है। कत्त: स्पष्ट 
है, कि पृथ्वीराज ने सम्भर प्रदेश दान नहीं दिया था । 


'घव कथा' समय में महाराज पृथ्वीराज को उदारता चरम सीमा पर पहुची हुई 





१. पश्वीराज रासो, साहित्य संस्थान, उदयपुर छं० ३०, पंजूनपांत जश्ञाह्‌ समय | 
२. वही, छं० १०७, दुर्गा केदार समय । 
३. चही, छं० ३३, पृथा व्वाह समय । 


[ ६४ड ] 


दृष्टियोच होती है । पृथ्वीराज की दान शीजता तथा उदारता का चित्रण त्तौन स्थलों पर 


बढ 
डे क्र 
प्राद होता हैं । 


(१) बन में घन निकालने पर पृथ्वीराज ने उस घन का वितरण कर दिया। (२) 
शाह को रावल समरक्तिह की सहायता से पकड़ कर मुक्त कर दिया। (३) शाह से दण्ड 
स्थरूप पाए द्रए अधष्यों को सामन्‍्तों में बांद दिया तथा अपने लिए केवल यश ही रखा । 
ग्रस्यकार ने उपयुवत घटनाओं का वर्णन क्रमश: इस प्रकार किया है-- 


(१) वंदि दियो पूथिराज , भाग क्ल्नों सह श्रव्वर। 
एक भाग फंमास , तीय अप्पे नर सिध नर ॥ 
पंच भाग चांवबड़ , माग अद्घों वर कन्‍हूं । 
द्वादस भाग नरिंद , दियों परिगह्‌ सब अथंनं ॥। 
प्रथिराज दिप्ट आये नहीं , चिकट कुभ ज्यों जल अभिद । 
लग्गी न नीर पत्रह फसल , भिदे न सत्ति छोवे उछिद ॥ १०० ॥। 
एक भाग दिय विप्रकर, फर्र राज सुख फंद। 
घन लम्निय प्रथिराज घन , फकथी फथ्य फविचन्द । १०११" 


(२) वजि नरयंद जय पत्त , वीय बज्जा घन बज्ज। 
ताइय घर गज राज राज , दरवारणि गज्ज ॥ 
चामर छत्र रखत्त , तखत लिननो सुलितानी। 
उत्तर वह उत्तगं गयो , मुछ्तानह पानी ॥ 
छन्दयों छत्त सुलितांन सिर राज-छत्र सिर मण्डयों । 
बाजंत नह निस्सांन धन , वधि साहि दंडि छंड्यो ॥ ९५ ॥ 


भौर भोौ-- 


(३) दंड सुबर पतिसाह , दीय हय॑ बंदि राजबर | 
बीस सुनर हय फरह , बीस हय उंचहु निडडुर ॥ 
योस दूअभ रघुवस , बोस उभ्मय दाहिम्मं। 
मतत्ताईइ अल्हन पहाड़ , वीस हय जंत गुरंम ॥॥ 
ओऔरहु सु सकल नर बीस अध , वंटि बंटि दिय सबर नर। 
रण्पन सु गल्हू राजंद गुर , जस रबहयो निज बर सुकर॥ १०८॥* 
१. प्श्यीरात रासो, साहित्य संस्यान, उदयपुर, &० १००-१०१; धनकथा समय । 
२ यहों 5० ९५, घनरूया समय । 


3 दो छ० १०८, धनकया समय । 


[ 5५ ] 


सम्भव है कवि ने अपने आश्रयदाता की कीति एवं उदारता का वर्णन अनिश्मयोक्ति 
पूर्ण किया हो । किन्तु यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि पृथ्वीराज वड़ा उदार एवं महान 
शासक था | ऐसा 'रासो' के आधार पर ही नहीं वरन्‌ू उसकी उदारता का परिचय देने वाले 
अनेक संस्कृत ग्रन्थ भी हैं । 

सं० १२४० में रचित 'खरतरगच्छ गर्वावली' में भी पृथ्वीराज की उदारता पर पर्याप्त 
प्रकाशडाला गया है । पृथ्वीराज की राजसभा में जैनाचायों के शास्त्राथ/” नामव निवन्ध 
में श्री अगरचन्द नाहुट। तथा श्री भंवरलाल नाहटा ने इस प्रकार लिखा है--''सूरि मद्दाराज 
की सर्व तत्रों में स्वतंत्र, प्रतिमा देखकर ऐसा कौन मनुष्य था जिसके हृदय कमल पर आण्चयं 
लक्ष्मी विराजमान न हुई हो ? अति प्रसन्न होकर महाराज ने कहा--''वाह । महाराज ! 
आप जीत गए हैं । हम आपके विजय की मुक्त कण्ठ से प्रशसा करते हैं। मैंने अपने घर्भ और 
न्याय के प्रभाव से हजारों स्थानों पर प्रभुता प्राप्त की है। सत्तर हजार धोड़ों पर मेरा 
आधिपत्य है, मैं समझता हूं कि कोई भी प्रतिपक्षी मेरे समान दरजे को अभी तक प्राप्त नहीं 
कर सका है । परन्तु इसी देश में मैं आपको अपने समान श्रेणी का मानता हूं, क्योंकि आपने 
भी समस्त देशों के धर्माचार्यों को जीत कर उन पर प्रभुता प्राप्त की है। आचाय॑ महोदय ! 
अब तक ऐसा मालूम नहीं था कि आप इस प्रकार के रत्न हैं। इसलिए जान या अनजान में 
मुझ से अनुचित व्यवहार हुआ तो हमें क्षमा करें। 'इस प्रकार कहते हुए नरपति ने आचाय॑ 
श्री के समक्ष क्षमा याचनार्थ दोनों हाथ जोड़े ।/' 

“महाराज पृथ्वीराज सूरि जी को विजयोपलक्ष में कुछ मांगने फो बहते है किन्तु सूरि 
जी कुछ भी ग्रहण करने में अपनी असमथ्थंता प्रकट करते हैं॥ अन्त में सेठ रामदेव जी कहते 
हैं कृपानाथ । आप ग्रुरु महाराज को चिजय पत्र भेंट करने की कृपा करें । 

राजा-- भाज तो समय अधिक हो गया है दो दिन पश्चात्‌ मैं कायंवश अजमेर ब्ाऊँगा 
तब अवश्य ही सूरि जी को जयपत्न भेंट कर दूँगा । ह 

ददो दिन के पश्चात अपनी प्रतिज्ञा को पूरी करने के लिए महाराज पृथ्वीराज सर्सन्य 
अपने अजमेर के महलों में आए । वहाँ से हाथी के होदे पर जयपन्न रख कर नगर थे; मध्य- 
मध्य होते हुए पौषधशाला पधारे और सूरि जी के हाथ में जयपन्न समपंण किया ।" 

उपर्युक्त घटना पृथ्वीराज की महानता एवं दानशीलता की घोषणामुक्त कण्ठ से करती 
है । महाराज पृथ्वीराज केवल उदार ही नहीं वरन्‌ वह किसी विद्वान का उचित सत्कार करना 
भी भली-भाँति जानते थे । सूरि जी के निवास स्थान पर ही जाकर जयपत्र देना तो पृध्वी- 
राज की उदारता में चार-चाँद लगा देता है । 


१. अगरचन्द नाहुटठा तथा भंवरलाल नाहूंठा, पृथ्वीराज को राजसना से जनाचार्यों ये: 
शास्त्रार्थ, हिन्दुस्तानी पतन्निका, पृ० ९१-९२१ 
२. बहो, पृ० ९६-९७ । 


गणिका--'पृथ्वी राज रासो' में जहाँ एक ओर पृथ्वोराज चौहान के ९५ विवाहों का 
दर्णन प्राप्त होता है वहीं दूसरी मोर यह भी लिखा है कि महाराज पृथ्वीराज चौहान ने 
करनाटक देश पर आक्रमण कर तथा संधि रूप में करनाटी नामक एक वेश्या को प्राप्त किया | 
महाराज उम्र वेश्या को अपन साथ दिल्‍ली ले आए कवि ने लिखा है-- 
ले आयो नाइवक सय , करनाटी प्रियिराज । 
जम्र-तत्र एकठ भये , सर्व साज सम्माज ॥ ४॥।४ 


महाराज पृथ्वीराज करनाटी के रूप चुण तथा लक्षणों पर रीक्ष गए तथा उसे रक्षिता 
के रूप में रानी इच्छनी प्रमारनी के अन्तःपुर के बाहर के द्वार पर रहने के लिए व्यवस्था 
मार दी तथा उसके भवन पर रक्षा के लिए दिन रात बहुत सी दासियाँ रख दी गईं । 
काम कला तुट्ट नृपति सुग्रिह पवारों द्वार । 
तिन अवास दासी सघन , अहनिस रहि रखबार ॥ ११ ॥* 


यहाँ पर पथ्वीराज चौहान के महलों में १५ रानियों के अतिरिक्त एक दंश्य। की सूचना 
मात्र देना अभीष्ट है । गणिका करनाही के विपय में अन्यतञ्न विवरण प्रस्तुत किया गया 
पृथ्वीराज के सामस्त-भारतव् के अन्तिम हिन्दू शासक महाराज पृथ्वीराज (तृतीय) 
का नाम ऐसा कौन व्यवित है, जिसने ने सुना हो । भारतीय इतिहासकार ही नहीं अपितु 
विदेशी इतिहासवेत्ता भी पृथ्वीराज की वीरता के संबंध में बहुत कुछ लिख गए है। उनके 
समकालीन एवं दरवारी कवि चन्द ने भी पृथ्दीराज का शौय॑ वर्णन अत्याधिक किया है। 
पृथ्वी राज की वीरता एवं उदारता का चित्रण हम यहाँ-वहाँ करते ही रहे अतः स्वा- 
भाविक है, कि ऐसे वीर शासक की आधीनता में अनेक सामन्त भी रहते हों । यही कारण है 
कि कवि चन्द ने 'पृथ्वीराज रासो' में पृथ्वीराज के आघीनस्थ सामनन्‍्तों की सख्या कही पर 
१०० तथा मयह्दीं पर १०६ बतलाई है । 
तिहि सहाई सुर ति सुमट , सत सामन्त छन्सुर। 
तिहि सु कित्ति प्रमदहु करण, कह्यो चन्द कवि सुर ॥ ७० ॥।!' 
महाराज प्‌च्वीराज, कवि चन्द्र से कस्नोज जान का दृढ़ निश्चय प्रगट करते हैँ । अतः 
सवत ११९१ चेत वदी ३ रविवार के दिन ग्यारह सो घुड़सवार साथ लेकर महाराज पृथ्वी- 
गाज ने बसन्नोज की कोर प्रस्थान किया-- 
ग्यारह से एकानवे | चंत तोज रविवार । 
वःनवज देपन करणे | चन्योसु समरिवार ॥ छं० १०२ ॥ 


१. पृथ्योराज रासो, साहित्य सन्‍्यान उदय ० ४, करनाटी पाशन्न समय । 
२... पढ़ ११, फरन,टा समय । 

३. यहां, नागरो प्रचारिणों समा काशी, छ० ४०, स० १॥ 

४, सही, 5० ९०२, स० ६११॥ 


[ ५७ ] 


महाराज पृथ्वीराज अपने साथ में एक लाख सिपाहियों को पराजित करने में सर 
ग्यारह सी वीर योद्धाओं को लिए हुए थे । उनका शरीर पुप्ट था राजपूत संनिक ऐसे हृष्ट- 
पुष्ट थे कि उनके हृदय पर बच्च का प्रहार भी विफल हो जाता था । युद्ध में एक रुद्र वेश घारण 
कर शन्नुओं को तृण के समान भस्म करने के लिए साक्षात अग्नि के समान थे । महाभारत 
युग से आज तक उनके समक्ष कोई योद्धा पैदा नहीं हुआ । सम्भरी नाथ पृथ्वीराज भी बस 
एक ही थे । उनकी वीरता की वातें देश भर में कानों-कान हो रही थी । गजनीपति को वांघ- 
बाँध कर छोड देने तथा कैमास जैसे मंत्री का वध कर देने ने तो उनके आतंक को और भी बढ़ा- 
चढ़। दिया था। ऐसा योद्धा, वीर महाराज पृथ्वीराज चाहुवान ग्यारह सो सवार और सामन्‍्त 
तथा ६ निज सूरमाओं तथा कवि चन्द को साथ लेकर राज महल से घल पड़ा और नगर से 
बाहर यमुना के किनारे जा ठहरा ।" 


आगे चल कर कवि ने उन सौ सामन्तों का परिचय दिया है जो पृथ्वीराज के साथ ये । 

थहाँ पर उन सामन्तों का नाम मात्र का उल्लेख किया जावेगा । अलग-अलग पात्र के विपय में 
अन्य स्थानों पर पूर्ण विवरण देने का प्रयत्न किया जावेगा । सामन्तों के नाम इस प्रकार है-( १) 

कन्‍्ह, (२) गोइन्दराय, (३) सेनचन्द, (४) लगरीराय, (५) देवराज, (६) जाजराय, (७) 
रणधीर प्रमार, (८) जैत प्रमार, ( ९ ) आम राव, ( १० ) प्रसगराय खोची, ( ११ ) 
पज्जूनराय, ( १२ ) वलिभद्वराय, ( १३ ) पाल्हन राय, (१४ ) निड्डुरराय, ( १५ ) 
रामराय, ( १६ ) गम्भोरसिंह, ( १७ ) नरसिंह, ( १८ ) जंधारभीम, ( १९ ) अतात्ताई, 
( २० ) उदिंगपगार, ( २१ ) चन्दसेन ( २२ वीरसिह, (२३ ) हरसिह, (२४ ) 
सारंगराय, ( २५ ) विझराज, ( २६ ) नागरराय, ( २७ ) दाहरराय, ( २८ ) रामरेन, 
(२९ ) रूपराय अथवा, सूचराय ( ३० ) मोहाराय, ( ३१ ) कनकराय, ( ३२ ) कनक- 
राय ( ३३ ) माल चन्देल ( ३४ ) भानराय, (३५) सामला सूर, (३६ ) वेसिह राय, 
( ३७ ) देवराज, (३८) मंडलीराव, / ३९ ) घनूराव, (४० ) पहारराय, (४१ ) 
जुल्हराय, ( ४२ ) खेता खगांर, ( ४३ ) वीरमराय, ( ४४ ) रूपराय, ( ४५ ) सारगराय, 
( ४६ ) भोजराज, ( ४७ ) साखूंला वीर, ( ४८ ) सामलेसिंह, (४९ ) विक्रमराय (२०) 
सहल्लराय, ( ५१ ) ठंडरीराय ( ५२ ) सारंगराय, ( ५३) जयसिंह ( ५४ ) वारुराय, 
(५५ ) भीमराय, (५६ ) पीपाराय, ( ५७ ) देवराज, ( ५८ ) अचलेसराय (५९ ) 
कचराराय, ( ६० ) नाहरराय, ( ६१ ) महनसिह, ( ६२ ) भीमसिह, ( ६३ ) लगखनराय, 
( ६४ ) पूरवराय, (६४ ) तेलज्जराय, ( ६६ ) अचलेस भट्टी, ( ६७ ) चद्वमेन, 
( ६८ ) सग्रामसिह, ( ६९ ), विजैराय वधेला, ( ७० ) मोहिल्ल, ( ७१ ) लक्खनराय 
( ७२ ) रंघरीराय, ( ७३ ) जेसिंह कमघुज्ज, ( ७४ ) पंजपराय ( ७४ ) भार्परास, 


7 न 


(७६ ) जागरराय, (७७ ) टाकचाटा, (७८) रावतराब, (७९ ) हरीदेव, ( 5२) 





९. वधध्वौराज रासो, नागरी प्रचारिणी सभा, काज्ी, छं० १०३-४, स० ६१ । 


[ फेक. | 


जाजराय, (८१) महदुदीराय, (८२) हाहुलीराय, (८३) पुहकरराय, (८४) कन्हराज, (८५) 
हुगसी राय, (८६) पंचादइत राय, (८७) रणवीरराब (८८) छग्गन, (८६९) देवतीराय ।' 


उपयुक्त सामस्तों की सूची देखने से पता लगता है कि इनमें १७ सामनन्‍्त कम है जबकि 
रासोक्ार कवि चन्द ने सामन्‍्तों की संख्या १०६ तक बतलाई है । सम्भव है रासोकार ने जिन 
€ निज सामस्तों का वर्णन किया है, उन्हें इस सूची में न रखा हो और उनके नाम छोड़ 
दिए हों फिर भी उपयुक्त सूची के अनुसार ११ सामन्तों का अंतर पड़ता है जबकि कवि 
चन्द ने १०० सामल्तों का तो स्पष्ट होना लिखा है । 

वास्तव में पृथ्वीराज अपने युग का महान शासक था। इसमें कोई भाश्चयं की बात 
नही है कि उसकी आधघीनता मे १०६ सामनन्‍्त रहते थे, यह वात दूसरी है कि सामग्री के अभाव 
में हम उनके नाम ने जान सकें । वैसे एक रथान पर स्वयं ही महाराज पृथ्वीराज ने अपने 
आपको ७०,००० ( मत्तर हजार ) घुडसवारों का स्वामी होना कहा है--''मैंने अपने धर्म 
ओर न्याय के प्रभाव में हजारों स्थानों पर प्रभृता प्राप्त की है । सत्तर हजार घोड़ों पर मेरा 
भाधिपत्य है, में समझता हू कि कोई भी प्रतिपक्षी मेरे समान दरज को अभी तक प्राप्त नहीं 
गर सका है ।/' अत: स्पष्ट है कि पृथ्वीराज चौहान के पीछे उनके भाधीनस्त सामन्तों की 
मरया निश्चय ही अधिक होगी । 


सिहासनारोहण-जिस समय महाराज पृथ्वीराज को अपने पिता सोमेश्वर की मृत्यु 
को सूचना मिली तो उसने अपने पिता के पिंड के लिए पोडस ( सोलह ) दान देने का 
निश्मय फिया | उस मतवाले राजा ने राजाओं की हो भाँति समस्त कल्याणकारी कार्य 
किए । वह बारह दिन तक भूम पर तथा तृण पट्टी पर ही सोया । भोगविलास को उपेक्षा 
की दृष्टि से देखते हुए केवल एक समय ही भोजन ग्रहण किया | समस्त दान महाराज पृथ्वी- 
राज ने अपने ही हाथों में दिया तथा इतना दान दिया कि अन्य कोई व्यक्ति अपने सम्पूर्ण 
जीवन में भी नहीं दे सकता घा-- 


सुनी बत्त पृथिराज , भुम्मि सेना अधिकारी । 

तात फाज तिन प्यडू , दान खोडस विच्चारी । 

मह मह सद्धयों , राज गति स्रब्य प्रकार । 

द्वादश दिन पृथीराज भुप्ति राज्य सथारं। 

विनु मोंग भोज इबक टेंक फरि, सु हय दान दिय देववर । 

दयंन्तोत फीई देह ने को , इतों दान जनमत नर॥ ४५ ॥।' 


4, प्श्योराज रासों. नगरी प्रचारिणी समा, छ० १०९-३३, स० ६१ । 

२ पस्थीराज़ को राज्सना में जेनाचार्यो के शास्त्र्य-अगरचन्द नाहुटा तथा भवरर्वालू नाहुटा 
हिन्दुस्तानी, पृु० ९२-९२ । 
पृष्वोराज रासो. साहित्य सरधान उदयपुर, ८० ८५, सोमवध समय । 


अभा 


[ ५९ ] 


महाराज सोमेश्चर का निधन हो जाने पर उनका एक मात्र पुप्र पृथ्वीराज उनकी 
राजगद्दी का अधिकारी हुआ । भनेकानेक उत्सव मनाएं गये। महाराज पृथ्वीराज को सर्व 
प्रथम नरनाह चाचा कन्ह ने अपने हाथ से तिलक किया तत्पश्चात विडडरराय ने तिलक 
किया । उस समय विप्रगण स्वस्ति वचन कर रहे थे। इसके उपरान्त समस्त सामन्तों ने 
बारी-बारी से महाराज पृथ्वीराज को तिलक किया तथा अपना स्वामी रवीकार किया । 


प्रथम तिलक सिर कन्‍्ह फरि , पुनि निड्डर रट्ठोर । 
इन छकग्मगहू घुस सेंति करि , पच्छे सब भर और ॥ ५० ॥' 


महाराज पृथ्वीराज सिहासनरूढ़ हुए | उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पृथ्वी- 
राज के चन्द्रमा स्वरूपी भाल के अर्द्धांग में कन्‍्ह का कमल रुपी कर सुशोमित हो रहा है । 
पृथ्वीराज के ऊपर #्वेत चमर डुलाया जा रहा था। वह ऐसा प्रतीत होता था मानों सूर्य पर 
समस्त दिशाओं से चन्द्र अपनी किरणें फैक रहे हों । पृथ्वीराज पृथ्वी पर प्रखर तेज को धारण 
कर तपने लगा । मृलतान को पकड़ने तथा बार-बार छोड़ने में उसने चीर रस रूपी अपार धन 
संचय किया । 


कियो तिलकु सिर फंह , पाठ प्रथिराज चिराजहि 
मनहूु इंद अंग , ह॒त्य इन्दीचर राजहि। 
चमर सेत सोभंत +दुरहि चावाह्सि सींस। 
सनुहं भानं पर घरिय , फिरणि ससि की प्रतिदीस॑। 
मवनीय यंद्ु रूग्गो तपन , घुबह तेज घर उद्धरण । 
सुरतान गहन मोखन फरण , बहुवीरा रस संचि धन ॥ ४१ ॥' 


ग्रन्थकार में पृथ्वीराज के राज्याभिषेक के विपय में तो क्वश्य लिखा, पर उसके: 
समय का उल्लेख नहीं किया है। धत: सन्‌-सम्वत्‌ जानने के लिए हमें शिलालेएों तथा 
इतिहास की शरण लेना आवश्यक हो जाता है । म० म० गोरीशंकर होराचन्द बोला एय 
स्थान पर रासो में वर्णित स्लोमेश्वर की मृत्यु की घटना को बस्त्य सिद्ध करते हुए लिखते है- 
'यह सारी कथा ( रासो का वर्णन ) भी असत्य है. क्योंकि न तो सोमेश्वर भीमदेव के हाथ 
से मारा गया और न भीमदेव पृथ्वीराज के हाथ से । त्ोमेश्वर के समय के कई घिलालेय 
मिले हैं, जिनमें से पहला वि० सं० १२२६ फाल्गुव बदी ३ का विजोलियाँ का प्रसिद्ध सेप 
है मौर अंतिम वि० सं० १२३४ भाद्ग पद सुदी ४ का है। पृथ्वीराज का सबसे पहला सेश 
वि० सं० १२३६ आपाढ़ वदी १२ का है। वि० सं० १२३६ के प्रारम्भ में सोमेम्वर का 
देहान्त और पृथ्वीराज की गद्दी नशीनी मानी जा सकती है, जँसा कि प्रवघधकोप के अन्त रू 





१. पृथ्वीराज रासो, साहित्य संस्थान उदयपुर, छं० ४५, सोमवध समय । 
२. बही, 5० ५१, सोमवध समय । 


[ ९० | 


बंजावली से शान होता है । भोमदेव वि० सं० १२३४ में गद्दी पर विल्कुल वाल्यावस्थां में 
 झ्लौर ६३ वां अर्थात्‌ बि० मं० १२९८ तक वह जीवित रहा इतनी वाल्यावस्यथा में वह 
मोमेम्बर को नहीं मार सकता और न पृथ्वीनाज ने उसका बदला लेने के लिए उस पर चढ़ाई 
र उसे मारा था गजरात के ऐतिहासिक संस्कृत ग्रन्थों में भी कही इस बात का उल्लेख 
राजपूताना म्युजियम में भीमदेव का वि० सं० ११६४५ का एक शिलालेख विद्यमान 
है । आय पर देलवाड़ा गाँव के प्रसिद्ध तेजपाल के जैन मदिर की वि० सं० १२८७ को 

रिति के लिखने के समय भी भीमदेव विद्यमान था| डॉ० बलर ने वि० सं० १२९६ मार्ग 
शाप बदा १४ का भीमदंव का दान पत्र प्रकाशित किया है। इससे निश्चित है कि भीमदेंव 
पश्वीराज की मृत्यु से अनुमान पचास वर्ष पीछे भी विद्यमान था ।”' 


उपयुक्त कथन में कितना सत्य है, यह दूसरी बात है। किन्तु यह तो स्पष्टत: भोझा 

भी भी मानते हैं कि वि० सं० १२३६ में सोमेम्वर का देहान्त हो गया था तथा पृथ्वीराज 
को राजगद्दी प्राप्त हो गई थी किन्तु तत्कालीन खोजों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि 
प्रीसा जी का मत ठीक नहीं है । सब इतिहासकार एक मत होकर प्रृथ्वीराज का राज्यकाल 
वि० मंं० १:३६ से ही मानते हैं किन्तु श्री यू० सी० भट्टाचार्य ने हाल ही में एक बारला 
का शिलालेख सोज कर यह सिद्ध कर दिया है कि महाराज पृथ्वीराज का राज्प्काल वि० सं० 
:२४८ से आरम्भ हो गया था अर्थात्‌ वि० स० १२३४ में पृथ्वीराज को अपने पिता की 


द्री उत्तराधिकार रूप में प्राप्त हो गई थी । बारला का शिलालेख वि० सं० १२३४ का है । 


अतः वक्त विवेचन से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता हैं कि महाराज पृथ्वीराज को राज्य 
सिहामन उत्तराधिकार के रूप में घि० सं० १२३४ में प्राप्त हा गया था । 


पृद्ध--११वीं तथा १२वीं शताब्दी से निरन्तर उत्तर भारत पर मलेच्छों के आक्रमण 
ठ़ोरहेथ 


थे | इनका वेग पश्चिमी भारत को भी सहन करता पड़ा, जो उस समय भारतीय 


१. श्रो ओज़ाजो, पृथ्वोराज रासो का निर्माण काल कोश्योत्सव स्मारक संग्रह । 


2... +वूताट गि्र॥ वीष्टाफपता दवा पीप 9९८ विड्रेटाय 35 पोल टव्वागीएड छीाठचा। 7लटठापे 


ता पर चार ० मितिलेसशुन ]] छा05८ संत शाल्ते इ0मार पर बीटा परत 9 
ता शीट फिलशीा। छितंशी तक्रीउतका इ्ाएा 7234 छात इफाश॑रए टाल ० 
फ्रिपा पी दंवए ० पीट फजंशा। गा ती हाट गराणाएी ते एव प्याएवा 234, [॥र 
वजह ण॑ शताजेयक5 5एटटटव्जतन गत फट ऐए.गीवगणा पःणाररंड तप एपशारर्त 
पतली: [0 गाठाट सत्य [छ० एल्थ5 बाते जठपाँव 96 संहा।ए ॥00:८व 0 छाफिंग तीट 
एलड05वैं ता बीता। इटए्टा ग्रा0्याई कैट्हुमफगएु गा फट 020८ ० छाए वैपएबौतेग् 
फ्रष्ट्तफ्ञात0,, 6. 50095 234 एमठ675 $घत॑ 4 5चा-३की। [संवत १२३४ नाद्र 
मुद्दि '४ शुक्र दिन] ॥ ८७ हा ठा पार एफशीबागया सांडाण #-8ए एं, 0, 8892६9- 
इमवाए3, (पाया तत, शिलएफ्रशा3 कैएडटए्ण, 2]पग्राटक, 





सभ्यता का केन्द्र बना हुआ था। दिल्‍ली, कन्नौज, अन्हलवाडा तथा बजमेर ऊँसी प्रसिद्ध 
राजपघानियां इसी क्षेत्र में अवस्थित थीं। सम्राट हपंवर्धन की मृत्यु के उपरान्त केन्द्रीय राज्य- 
शव्ति छिन्त-भिन्न हो गई थी। शक्ति छोटे-छोटे खण्ड राज्यों में विभाजित हो गई थी। 
इन राज्यों में परस्पर युद्ध होते रहते थे । इधर पारस्परिक युद्ध तथा उघर निरन्तर मुसल- 
मानों के आक्रमणों ने देश में एक प्रकार से अराजकता फैला दी थी। राजनीतिक संघर्ष के 
इस युग में सामाजिक परिस्थिति भी अत्यन्त शोचनीय हो गई थी । गृह-कलह ने घोड़े शौय॑ 
की भावना उत्पत्न कर दी थी, जिसका प्रदशेन पारस्परिक अकारण युद्ध तथा स्वयम्वरों 
में किया जाता था। साधारण जनता तो तत्कालीन नृपतियों को बात्मापंण फरती गई बौर 
अपरिणामदर्शी नृपतियों ने घर में ही वैर तथा फूट के बीज वोए जिनका कटु फल देश तथा 
जाति को चिरकाल तक भोगना पड़ा । एक स्थान पर श्री स्मिथ ने भी लिखा है-'यह छोटे- 
छोटे राज्य शिशुओं की भाँति छोटी-छोटी बातों पर झगड़ना खूब जानते थे ।' 

पृथ्वीराज रासो' के महाराज प्थ्वीराज का जीवन युद्ध अथवा शिविर का जीवन है । 
पृथ्वीराज का समस्त जीवन युद्धों में ही व्यतीत हुआ । राजपूतों का आत्म सम्मान, वंश 
परम्परा, कीति तथा घर्मं के नाम पर युद्ध करना जीवन का एक प्रमुख अंग था। महाराज 
पृथ्वीराज भी शुद्ध क्षत्रि कुल में उत्पन्त हुए थे। बतः उनमें क्षत्रियता के संपूर्ण गुण होना 
स्वाभाविक ही था। पृथ्वीराज रासो' ग्रन्थ को अद्योपान्त अध्ययन के उपरान्त यह स्पष्ट ही 
जाता है कि लगभग सभी समयो (अध्यायों) में युद्ध की भरी वजती है । पृथ्वी राज ने नपनी 
११ वर्ष की बल्प आयु में अपने पिता के सम्मान की रक्षा हेतु इप्ट का स्मरण कर खड़ग 
धारण कर मांडोवर के राजा नाहरराय को परास्त किया था। दिल्‍ली-अजमेर के मन्तिम 
हिन्दू शासक सम्राट पृथ्वीराज ने अपने ४३ वर्ष के छोटे से जीवन में छोदे-मोटे ४५ युद्धों के 
प्रतिदान किए । बहुतों में वह स्वयं थे भर अनेक युद्धों में उसके सामन्‍्त गध । 

रासो के युद्धों को हम संक्षेप में इस प्रकार विभाजित कर सकते है-- 

(१) चौहान पृथ्वीराज तथा गजनीपत्ति शाह शहाबुद्दीन गौरी । 

(२ ) चौहान पृथ्वीराज तथा कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द । 

(३ ) चौहान पृथ्वीराज तथा मुर्जेश्वर भीमदेव । 

( ४ ) चौहान पृथ्वीराज तथा मेवाती मुंगल । 

(५) अन्य । 

डॉ० शम्मूनाथ सिंह ने एक स्थान पर रासो के युद्धों के विषय में लिखा है कि “रात 
को पढ़ने पर इतिहास के ये सभो भाव सत्य आँखों के सामने मूर्त हो जाते है। उसके बुद्धो 
में अधिकांश व्यसन युद्ध ही हैं। पृथ्वीराज विवाह के लिए यायों भी अकारण किसी दर 
आक्रमण कर देता था। उस पर भी किसी बात का बदला लेने के लिए बाऋ्मण होते पे ; 


१. विसन्द स्मिय-इम्पीरियल गजेटियर आव इन्डिया, ना० २, पु० ३०१॥+ 


9 55] 


ने आक्रमणों का तांता कमी टुठता ही नहीं था और आाशएचय यह कि वह बार- 
7 दबा कर छोड दिया जाता या ।“इस प्रकार रासो में युद्ध आवश्यकता ही नहीं 
गामस्सों-राणाओं के ध्यमन के रूप में भी वणित हुए हैं। उसमें इतने युद्धों का वर्णन हुआ। है 
कि शाखको एक साथ स्मन्ण भी नहों रखा जा सकता । 


हू 


हि नर 
* | 


भऐव 
ही 


कहे 
जय 22 


पहाँ पर पृथ्वीराज द्वारा लड़े गए युद्धों का उल्लेख मात्र करना अभीष्ट था। अन्य 
स्थानों पर उनके विप्रय में स्वतत्न रूप से विस्तार के साथ विचार क्या जावेगा । उपवुक्‍त 
विधेशन से इतना अवश्य स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वीराज चौहान की सम्पूर्ण भायु युद्ध करते 
हैंए ही व्यतीत हुई 

मृत्यु-रासों समय ६६ 'लड़ाईरो प्रस्ताव” में कवि ने उल्लेख किया है कि जब महाराज 
पृथ्वीराज ने णहाबुद्दीन गोरी के आक्रमण की सूचना प्राप्त की तो चन्द वरदायी को कांगड़ा 
दुर्ग के हाहुली हमीर को मना लाने तथा सहायतार्थ बुला लाने के लिए भेजा । कवि चन्द ने 
शमीर को घनेक प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया । अन्त में दोनों ( हमीर तथा चन्द ) 
जालस्घ-देवी के मदिर में गए तथा देवी की स्तुति की | धूत हमीर ने कवि चन्द को तो 
मदिर में बंद कर दिया तथा स्वयं गोरी की सहायतार्थ चल पड़ा । उस युद्ध में पृथ्वीराज की 
पराजय हुई | पृथ्वीराज को पकड़ कर गोरी गजनी ले गया तथा वीरभद्र ने युद्ध का अन्त 
देखकर कवि चन्द के सम्मुख उपस्थित होकर उपरोक्त घटता कह सुनाई। इस शोकमय 
घटना को सुनफर कवि मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा | वीरभद्र ने कवि की मूर्छा दूर 
बी तथा उसे प्रबोधा | इस बार कवि कहने लगा कि मैं राजा के वाल स्नेह तथा सामन्तों 
का प्रेम वार-बार +मरण आने के कारण इतना अधिक व्याकुल हो रहा हूं। वीरभद्र ने चन्द 
ये अनेक प्रकार से समझाया तथा कहा, हे कवि चन्द ! अब तुम अपने दुःख का परित्याग 
करो तथा अपने महाराज पृथ्वीराज के उद्धार का कोई उपाय सोचो । यह शरीर तो नाशवान 
है, शोक न करने अपने कर्तंथ्य का पालन करो] 

समय ६७ में कवि चन्द महाराज पृथ्वीराज के उद्धार के लिए प्रयत्न करता हुआ 
दृष्टिगोचर होता है । कवि वीरभद्र से कहता है क्रि, हे वीर ! मंदिर के वज्च सदृश्य कपाट तो 
पर्द है, में बस निकलूं । यह सुनते ही घनघोर शब्द के साथ द्वार खुल गए तथा कवि चन्द 
मुदत हो गया । का मुक्त होकर दिल्‍ली की ओर चल दिया। दिल्‍ली की दुर्दशा देखकर उसे 
सरपन्त दुः्य हुआ, नगर निवासी महाराज के वियोग में सौ-सौ आँसू रो रहे थे । कवि ने राजा 
दे उछार या दूट़ निश्चय कर योग घारण कर लिया । योगी वेष में अपनो धुन में मस्त, कवि 
घन्द आशुधानपिपासा को और ध्यान न करके गजनी की और चल पड़ा, मार्ग के अमेकानेक 
पष्टा दा द्वसपडर बढ़ वलान्त हो उठा तव उसने देवी की बन्दमा की, देवी ने उसे दर्शन 


३. कि इशुनाथ निष, हिंदी महयाच्य का स्वसूप विकास, पृ० २९८-९९, हिन्दी प्रचारक 


एपरपलप, बाराइसी, दितोय संस्दारण, १९६४२ + 


#ब ६... 


(४ 


देकर सँहायंता करने का वचन दिया । मार्ग के अनेक्रानेक कप्टों क्री सहन करता हुमा, कावि 
अन्त: गजनी पहुंचा तथा शाहवृद्दीन के दरबार के द्वारपाल के सामने जा खड़ा हुआ है दारपाल 
कवि को पहचान गया । कवि भी अपने गुप्त भेप का भंडाफोड़ होता देखकर वहाँ पे चला 
आया । एक दिन तीसरे पहर में शहाबुद्दीन गोरी हृदफ खेलने के लिए अपने साजवाज से 
निकला । कवि ने शाह को देखकर जोर से विरदावलि पढ़कर हाथ उठा कर आार्शीवाद 
दिया। शाह का घ्यान उस मोर आक्ृष्ट हुआ तथा परिचय जानने के लिए उसे पांज् बुला 
लिया । उसे ठहराने का भार हब्शी पीौरोज खां को सौंपा गया । कवि को भीम खभ्नी के यहां 
रहने के लिए स्थान दिया गया, वहाँ उसने अपनी देवी का हवन पूजन कर देवी को प्रसप्र 
फर मन वांछित वर प्राप्त किया कि सुलतान शाह गोरी पृथ्वीराज तथा तुम (कविचन्द) 
एक साथ ही मृत्यु को प्राप्त होगे। दूसरे दिन प्रातःकाल दरवार में सुलतान ने कवि को 
बुलाने की इच्छा प्रगट करते हुए, हुजव खाँ को उप्त दरवार में उपस्थित करने की बाज्ना दी । 
शाह की आज्ञा सुनकर तातार खाँ ने ऐसा करने के लिए मना किया तथा शाह को अनेक 
प्रकार से समझाया किन्तु शाह ने उसकी एक न सुनी और कवि को दरबार में बुला लिया 
गया ) नीतिज्न चन्द ने शाह गोरी को अपनी कुशल वार्ता से मोहित कर लिया तथा बाहा 
कि पृथ्वीराज ने मुर्झ सात्त लोहे के तवे वेघनें का अपना कौशल दिखाने का बचन दिया घा, 
शाह यह सुन कर कहने लगा तुम्हारा नरेश तो अब नेभ्रहीन और क्षीण वाणी बाला हो गया 
है । अब उसमें वह पौरुष कहां कि यह सब कृत्य कर सके । चन्द ने कहा कि यदि काज्ञा हो 
तो मैं अपने राजा से एक वार पूछ तो लूं। शाह इस बात पर सहमत हो गया तथा 
कवि को पृथ्वीराज से मिलने की आज्ञा दे दी किन्तु गोरी ने अपने सैनिकों को आदेश दिया 
कि कवि चन्द तथा बन्‍्दी पृथ्वीराज, दोनों को दस-दस हाथ की दूरी पर रवखा जावे। चन्द 
ने राजा पृथ्वीराज को आर्शीवाद दिया, परन्तु उन्होंने उसे पस्रिर झुकाया तब कवि ने उसकी 
विरदावलि पढ़ी जिसे सुनकर राजा ने उसे क्मेक प्रकार से धिवकारा | दुःख को अधिकता 
के कारण कवि के नेन्नों में पानी आ गया तथा गला भर आया किन्तु राजा ने उसे नमन 
न किया, तथ चन्द इस प्रकार कहने लगा, कि सम्भरिधनी मुस्ते जो आपने वचन दिया था, 
उसे पूरा कीजिए, राजा ने कहा कि अब मुझमें उसे पूर्ण करने को शक्ति नहों है तब कवि 
ने कहा कि मैं शाह से वुलवाऊँगा आप वचन दीजिए राजा ने इस वात पर शंका प्रकट को 
परन्तु चन्द ने उन्हें प्रवोधते हुए वचन ले लिया। इसके उपरान्त हुजव खाँ कवि को लेकर 
बापिस आ गया । वह पृथ्रीराज तथा चन्द के शब्दों का मर्म न समझ सका । कवि ने थाह 
पे आकर कद़ा कि यदि आप आज्ञा देना स्वीकार करें तो राजा पृथ्वीराज अपने बचने को 
पूर्ण करना स्वीकार करते है | तातारखोाँ ने चन्द को डपठा क्रि क्‍या निरर्घक बात करता सह 
चन्द ने फिर कह्दा कि यदि शाह गोरी बचन दे तो प्रत्यक्ष तमाशा देख लो, इतना सुनकर 
गोरी आज्ञा देने के लिए सहमत हो गया तथा लोहे के घड़ियाल सजाये ज:ने लगे, यह कोसुक 
देखने के लिए गजनी के सब नागरिकों को अपार भीड़ एक होदे लगी। तातार एां ने काह्ा 
कि है शाह माज जुमेरात का दिन है तथा मैंने रात्रि में मशुभ स्वप्न देखा है। रत: बाज 


[ ६४ ) 


न होने दीजिए किन्तु जाह न माना और कहा कि मैं अपने दिए हुए वचन से नहों 
पदद महता । यह सुनकर तातार खाँ खीज कर दरवार से उठकर चला गया । गोरी कवि 
खनन्‍्द से बोला कि मैं फ़्मान (आज्ञा) दंगा, तुम राजा का कौशल दिखाओ। सुनकर 
सस्दर पृथ्वीराज को लेकर रंगमूमि में आ गया। उस दिन सम्वत, मास, पक्ष तथा घड़ी इस 


दे 


रांदत अदठावन माघ मास , अनसित्त पष्ष दसमी सुनास । 
दिन घटिय अंत पल आदि जात , तारक मूल श्रिव तिथ्य पास ॥ ४६१ ॥' 
हुजाब या ने पृथ्वीराज को रंगभूमि में कई कमाने दी, जो वीर पृथ्वीराज के खीचते 
॥ टट गई, तब मीरशाह की कमान दी गई, बिलन्दी खां ने उसका कमान खींचना देखकर 
कि यदि घड़ियाल फोड़ दिए तो घाह प्रसन्‍त होकर बहुत कुछ देगा। चन्द ने अवसर 
रणाह में प्राथंना की कि शाह गोरी पथ्वीराज को उसकी स्वयं की कमान दिलवाई 
जावे, शाह की आज्ञा से हुजाव खाँ ने ऐसा ही किया । उस समय तातार खाँ ने शाह को 
यह ग्ैल देखने के लिए फिर एक वार मना किया, किस्तु शाह ने उसकी बात पर ध्यान न 
दिया । अपना घनुप पाकर पृथ्वीराज प्रसन्‍न हो गए, निसुरत्त खां ने उसके हाथ में तरकम 
भी दे दिया । राजा ने बाण का संघान किया, तब चन्द ने ज्ञानोपदेश करते हुए उन्हें दृढ़ता 
दी तथा नाना प्रकार से उत्कपं देकर समझाया कि हे सम्भरि नरेश, सात को वेधने की 
भपज्षा एक का वेधन कीजिए तथा एक ही वाण से अपना पराक्रम दिखाएं । वस इतना करने 
मात्र से आपकी कीति युग-युगों तक चलती रहेगी । कवि के गूढ़ संकेत पाकर पृथ्वीराज ने 
थाह गोरी के समक्ष अपना मुह कर लिया- 
गिरमारा रूमि ग्रोड़, देस जीता जंगल थरू। 
लंका गठह जित्तयों , समद जित्ती उर सलियल । 
हथिनावर जित्तयों, सीम कंथारा वंधिय। 
मय॒रापुर जित्तदी , एक मुप घार न सधिय। 
प्रधिराज-सुनवि संभरिधनी , सुहिनेही मम जानि सुप। 
इमि जंपेँ चन्द वरदिया , सजि जालूंघर देस मुप॥ छं० ५२५ ॥' 
महाराज पृथ्वीराज सावधान होकर खड़े हो गए, कवि ने डमरू बजाकर शाह से आाज्ञा 


हा डर पे 


ड' | ४ 


ने की प्रायंना की तथा महाराज पृथ्वीराज की विरदावलि फनी आरम्भ की। शाह के 
मर से प्रथम फरमान निकलते ही पृब्वीराज ने अपना बाण संधाना, दूसरे पर उसे लक्ष 
पर क्षदल बारफे दृढ़ कर 


7१ करत हुए प्रत्यंश्वा को कान तक खींच लिया, तीसरा फरमान प्राण 
जा का शब्दवेधी वाण सुलतान के दाँत, जीम, तालू तोड़ता हआ सिर के टुकड़- 
के पार हो गया तथा उसका घट नीचे गिर पड़ा-- 





एग्दाराज रामा, नाणए प्र० सण० फाशो, ८छ&० ४६१, स० ६७ ॥ 
२०. यंत्र, छ० असर४2, स० ६७१ 


भेयो एक फुरमान, बान जोगिनिपुर संध्यी। 
सोइ सबद अरू बान , अग्र अधिचल फरि वध्यों । 
भयोा वियो फुरमान , तानि रप्यो श्रवदतरि। 
तिथी भयो अन भयौ , परवौ पति साहि धरतरि । 


ले दसन रसन तालू सघन , सीस फदिट वह दिसि गवन । 
सुरतान परयथो पां पुकषकरे , भयो चन्द राजन मरन ॥ ५४९ ॥१ 
शाह के घराशायी होते ही कवि चन्द ने महाराज पृथ्वीराज को योगवल द्वारा प्राण 
त्यागने की प्रार्थना की परन्तु उन्होंने ऐसा कर सकने में असमर्थता प्रकट की, इसी समय 
गोरी के दरबार में इन दोनों को, मारने के लिए चारों ओर से मलेच्छ दोड़ पहे । तत्काल 
ही कवि चन्द ने अपनी जटाओं में छिपी हुई छुरी निकाल कर अपना सिर अलग कर तिगा 
ओऔर छुरी महाराज पृथ्वीराज की ओोर बढ़ा दी जिससे उन्होंने भी अपना प्रापास्त 
कर लिया- 
कहे षान तत्तार , भट्ट करि टूक रज्ज सम । 
में द्विग देघत कहि मट॒ठ , दुष्ट देखिये काल ऋम । 
धरो साहि अब गोरि , बिन स.हाव च.न ल्‍रूगि। 
चन्द राज वर घेरि, लोह छुट्टे न अग रूगरि। 
छुरिका कविद जट मश्नझ थी , कट्टि भट्ट कटि सीस अप। 
ता पछे चन्द वरदाय में , दइय राज घर हवूथ नूप ॥ छं० प्रश४ ॥ 
भूत वृत्त मन वृत्तयो, सवछित पढ़ि कविचन्द। 
गयी क्रग्ग जीवत करि, तज्य सुबर ग्रह दद ॥ छ० ५५५ ॥। 


मरन चन्द वरदाइ , राज पुनि सुनिग स.हि हनि। 
पुहुपजलि असमान , सीस छोड़ी सु देवतनि। 
मेच्छ अवद्धित धरनि , घरनि सव त्तोय सोह सिग । 
तिनहिं. तिनह्‌ संजोति , जोति जोतिह सफरतिय । 
रासो असभ नव रस सरस , चन्द छंद किय अमिय सम । 
शगार वोर करुना विमछ , भय अदभुत हसंत सम ॥ ४५६॥ 
इस प्रकार वीर शिरोमणि पृथ्वीराज ने अपने प्रवल शत्रु शाह गोरी से कवि चन्द 
चरदायी की सहायता से वदला ले लिया तथा बाद में अपने भी प्राण उत्सर्ग कर दिए, उनकी 
कीति निःसंदेह सूर्य और चन्द्र के साथ-साथ चलती रहेगी। भारत भूमि पृथ्वीराज उसे 





१, पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काजश्ो, छं० ५४९, स० ६७ । 
२. वही, छं० ५४५४-४६, स० ६७। 


७ -+ के मरैद ह 5 गोपदरियत गामी । रागों वे अन्य सस्क्रण भी उपयुक्त कथन बाग सर्वर्थन 
टेक 25 
दानठ रस छारोंगम माम , देद्ा दृष्पस ढर॥। 
विजिस जोत प्रविराज सुर सांमत अस्ति मर। 
इन जोति शतीचिग्द , रुप संतोगि भोगि शत । 
दुपका होड़ ऊपरन , दृेगप्म दीटे समाय पम। 
शम्ध फषाय होई निरंतर, लोग भोग राजन लहिय। 
रुप गे यपा अरि दस मलन | तासू कित्ति चंदह काहिय ॥ छं० ९२॥' 
78 27:: 


ए दतिटामयत्ता आता जी पृथ्वीराज ओर शाहबुद्दीन की मृत्यु को अनेतिहासिक 
५ दे किये 20 सिधते है पि>मसह् (रासो की कथा ) सम्पूर्ण कथन भी ऐतिहासिक दुष्टिस 


मा 


नं) कयोशि गठ़ानद्रीस की मत्य पसच्चीराज के हाथ से वि० सं० १२४९ में नहीं 
८२ 47. दि० मं ६९२६३ संत मृदि ३ को गक्खरों के हाथ से हुई थी। जब गवखरों को 


बाज बार लाफ़र में गजनी जा रहा था, उस समय धमेक के पास नदी के किनारे वाग में 
भ्याट पता ए॒ता, दे 


, यह मारा गया। पृण्वीराज के पीछे भी उसका पुत्र ग्रोविन्दराज दिल्‍ली 
पेज दी पर सही, विल्‍तु अजमेर की गही पर बैठा था, न कि रेणसी ।7" 


मो में बचित पृश्यीराज की मृत्यु तवा इतिहासकारों द्वारा बताई पृथ्वीराज की 
हू 7 विषय में पर्याष्स भेद है । पृथ्वीराज की मृत्यु के विपय में सी० वी० वैद्य लिखते हैं- 


जगह पश्भीरा 


सस्पीराड का अपना जीवन अस्त करने का रासो वर्णित वृत्तान्त उसकी अनैतिहा- 
दिए पद बे चरम सोमा है । यरद्त प्रतिशाध की प्रचलित गाथा है भौर एक कहानी है 


हि्यी तट सर गर्यरो द्वारा मुहम्मद गोरी की हत्या का सत्य विवरण विस्मृत 


कार कु हा ही2 जे आधा 


४ हा गया होगी । पृब्वीराज का मृत्यु, पानीपत में जनकोजी सिंधिया और 


रह 


मी तक रहस्य गमित बनी हुई है। ताज मौर तबकात के 
दवण मिहेपशस्स 7 ॥ एसई ग्रस्य में इतना मात्र उल्लेख है कि 'पिश्नौरा अपने हाथी से 
सरबद भागा, सरस्तु सरसुती के निकट पकड़ा गया और नरक भेज 
हज (६ प्र ९९५ ) में लिया है कि अजमेर! का राय बंदी बना लिया 
हर इसे नीयड दाने दियारब। । अजमेर पहुँचकर ( जहां उसे ले जाया गया था ) 
लक दया मउदा पर्टा झया | जैसा कि संकेत लक्षित है ) इस लिए उसके शिरो- 
हा वार ने उस कमीने बंदी का शिर उसके शरीर में 

"7 दिया 4 व प्रमाझों मे घ/ नि्य करना कठिन है कि पृथ्वीराज की मृत्यु किस 


हद, हाण गुह था घट 
हर] हा हर 
८ ाए 7 


३१, 4 + ध्ट ड्ट ५ 
हि का अप का: शाह पा दे 
४ 


पर: राज राणा मान प्र८ म० काथधी छं० ९२, स० १। 
7 ४ पाती 


विउयर चसा का निर्माण काछ, कोशोस्सब स्मारक संग्रह 


[ ९७ ] 


प्रकार हुई, परन्तु हम यह विश्वास करना चाहेंगे कि पृथ्वीराज सरस्वती पर बन्दी हुए ओर 
तुरन्त ही उन्हें मार डाला गया जेसा कि तबकात में लिखा है।' फारसी इतिहासकारों क्के 
मत को पुष्ट करने वाले डॉ० ए० वी० एम० हवीवुल्ला अपनी पुस्तक 'दि फाउंडेशन बाद 
मुस्लिम रूल इन इंडिया” में लिखते हैं--“फरिश्ता के अनुसार भफगान, लिखजी ओर खुरा- 
सानी नायकों की अवहेलना के कारण युद्ध में पराजित होना पड़ा थघा मौर गजनी पहुंच कर 
उसने उसकी तीम् निदा की दूसरे वर्ष वह एक लाख बीस हजार सवारों के साथ लौटा और 
एक बार फिर तराई के मैदान में. अपने प्रतिहन्दी चौहान से भिड़ा । सम्भवत्त: अपनी तैया- 
रियाँ पूरी करने के लिए तथा शत्रु को असावधघान रखने के लिए ही उसने किवामुलमुल्द 
को लाहौर से पृथ्वीराज के पास अपनी मांघीनता स्वीकार कराने के लिए भेजा । आज्ञा बे 
अनुसार ललकार भौर उपेक्षा गर्भित उत्तर आया। अन्ततः जब युद्ध का मोर्चा छिड़ा तर 
पृथ्वीराज की सेना में अति विश्वासनीय सूत्र से ( फरिश्ता, भाग १, पृ० ५८ ) तीन लाए 
मनुष्य थे । मुईजुद्दीन ने अपनी सेना के पांच भाग किए जिनमें से चार ने शभ्रु को चारों भोर 
से युद्ध में संलग्न कर लिया | दिन ढलने पर रोक रखे गये पाँचवें भाग ने थके हुए शत्रु पर 
माक्रमण किया और इस युक्ति द्वारा संघर्ष का निर्णय कर डाला। खाठ्ेराय (गोविन्दराय) 
जिसने पिछले वर्ष के युद्ध में मुईजुद्दीन को जाहत किया था, मारा गया और निकल भागने 
के प्रयत्न में पृथ्वीराज को सरसुती के निकट बंदी बना लिया गयी ( मिनहाज, पृ० १२० ) 
हसन निजामी के अनुसार उसे अजमेर ले जाया गया जहाँ कुछ समय के उपरान्त विश्वासघात 
का अपराधी पाकर उसे मृत्यु दण्ड दिया गया ( ताजुल-मगासिर, पत्र ४४ व ) मिनहाद 
का कथन है कि उसे तुरन्त मार डाला गया था। चन्द वरदायी फो निराधघार कहानी कि 
पथ्वीराज ने किस प्रकार नेन्न विहीन करके गजनी के वन्दीगृह में रखे जाने पर भी उसकी 
सहायता से अपनी मृत्यु से पूर्व मुईजुद्दीन का वध कर डाला-देखिए पृथ्वीराज रासो भाग 
६ तथा राज दशिनी पन्न ४९ थ। उसके कुछ सिक्कों पर संस्कृत के अतिरिक्त 'हम्मीर' मब्द 
उत्कीर्ण मिलता है जो इस बात का प्रदर्शक है कि उसने मुईजुद्दीन की आधीनता स्वीकार 
कर ली थी ( टामस क्रानिकल्स, पृ० १३, नं० १५ )।” 

तालउल मआसिर के लेखक द्वारा प्रथम पृथ्वी राज को प्राणदान देवर उसके पश्चात 
विद्रोही मान कर मस्तक विछिपन्न कराने का उल्लेख स्पप्टत: यवन अत्याचारों को छिपाने का 


प्रयास जान पड़ता है । पृथ्वीराज के युद्ध में मारे जाने का प्रमाण नमधिक विश्वासनीय है । 


ध्तवकात' का रचयिता भी यूद्ध से भागते पिथोरा को कत्ल करने का विवरण पक्षपात- 
पूर्ण देता है। पृथ्वीराज जैसा पराक्रमी वीर रण प्रांगण में पीठ दिखाकर भ्रांप रक्षा का 
प्रयास करे, असंगत सा प्रतीत होता है । 'तारीख फरिश्ता' का प्रणेता जिसने तबबात' की 


जम 7 ब 
१. हिस्दी आव मेडीवल हिन्दू इंडिया, माग हे; अध्याय २० १० ३८५, सन्‌ १६२६॥। 
२.  डॉ० ए० दो० एम० हवीदुल्ला, दि फाउंडेशन आव मुस्लिस रुप इन इंडिया, प० भ८- 


५९, सितम्बर, १९४५ ! 


3." हर के, कोले आन ४ 


छापा में प्रन्य की रचना को, हिजरी सन वि० पं० १२४३ में शाह को बुरी तरह 
हार ज्ोना स्वीवार करता है | शाह के पकड़े जाने के विवरण को गृप्त रखकर वह पुण्वीराज 


के गामस्त साम्हेराव ( गोविदराब ) द्वारा विशेष घायल हो, एक खिलजी प्यादे द्वारा घोड़े 
धर उठाकर के भमागना लिखा है। पश्वीराज की सेना बाहुत्य के साथ वह उसमें १५० 
जाओ की उपस्यिति को भो स्वीकार करता है । रासोकार ने भी पृथ्वीराज के सामन्तों 
की सदया १०६ लिखी है । शाह गोरी द्वारा घोखा भी दिया गया था कि अपने भाई से 
काश प्राप्त कर सघि कर सकता हूं, अतः राजपुत्र सेना असावधान रही प्रातः काल होते ही 
गजनी की भेना ने आगे तथा पीछे दोनों ओर से भयंकर आक्रमण किया, जिससे दिल्‍ली 
का हाकिम साण्टेराव ( गोविन्दराय ) तथा अन्य कितने ही राजा मारे गए तथा राय पिथौरा 
गरस्वती की सीमा में पफड़ा जा कर सुलतान की आज्ञा से कत्ल कर दिया गया । 


>्भ्प 


स्पप्ठत: देखा जा सकता है कि सभी मुसलमान तवारीखकारों का विवरण पक्षपातपूर्ण 
है । एक दो स्थानों पर गोरी की पराजय को अवश्य ही दबी जवान में स्वीकार किया गया 
है तथा वीर पृथ्वीराज को घायल अवस्था में बन्दी बनाने के कृतघ्न कार्य को भी वह नहीं 
छिपा सके है । पृथ्वीराज के पराक्रम तथा उसकी विशाल वाहनी का भी उन्होंने उल्लेख 
किया है किन्तु पृव्वीराज की वीरता को अधिक महत्व न देकर यवनों का ही गधिक ग्रुणगान 
किया गया है 


हुम्मीर महाकाव्य के लेखक ने अन्तिम युद्ध का विवरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है 
मुसलमानों ने पृथ्वीराज के अण्वणाला के अधिकारी को अपनी ओर मिलाकर युद्धार्थ नृतंक घोड़े 
को तैयार फराया | युद्ध छिड़ने पर रणवाद्य बजते ही वह नृत्य करने लगा जिससे पृथ्वीराज 
गठन पर आकह्ृरमण करने में असमर्थ हो, पकड़ा जाकर मारा गया । यह विवरण भी अधिक 
तर्क संगत प्रतीत नहीं होता है क्योंकि तत्कालीन युद्धों में मश्व एवं अस्पत्र ही योद्धाओं के 
सायी होते थे | ऐसी स्थिति में नृतक घोड़ों को न पहचान पाना बड़ा अजीव सा लगता है । 
पु भी हो 'हम्मीर महाक्राव्य' का कयन भी प्रामाणिक नहीं माना जा सकता है । 


पृस्शीराज नोहान को मृत्यु का प्रसग अत्यन्त विवाइग्रस्त होने के कारण निश्चित 
मात्र निर्धारित करना बड़ा ही कठिन मालूम होता है, फिर भी हम तो यही कहना चाहेंगे कि 
पद्दीराए सरस्वती के तद पर बन्दी बना लिया गया तथा तुरन्त ही मार डाला गया, जैसा 
जदयवानल में लिया है । 


दापगरगाइ- प्र ब्या राज़ रासा के अनुसार चाह्ान यश परम्परा में स्भ्वा पीढ़ी में 
टाडा हहिसस्राय चौटान के उपरास्त उनका पुत्र वालन्नराइ उनका उत्तराधिकारी हुआ । 


प्हिमदए 


इलवाय विज्ञेष विवरण प्रस्तुत नहीं किया है। रा० ए० सो० लंदन की रासो की 


है दष्वोराण रामो, ना० 7० म< कादयों, ४० २९१ ,सं० १। 


७ फेक. 


प्रति भी उपयुक्त कथन का समर्थन करती है। किन्तु नाम में थोड़ा सा अन्तर है । इस प्रादि 
में वालन्नराई के स्थान पर वबालणमराई” लिखा है। सम्भव है लिपिकारों की मसावधानी 
के कारण ऐसा हो गया हो | वैसे तात्विक दृष्टि से दोनों नामों में कोई विशेष अन्तर नहीं 
है । रासो की अन्य प्रतियाँ जैसे घारणोज की प्रति, बीकानेर की एफ लक्ष बक्षर बाली 
प्रति, तथा साहित्य संस्थान, उदयपुर वाली रासो की प्रति इनके विपय में कोई सूचना 
प्रस्तुत नहीं करती हैं । शिलालेख एवं संस्कृृत-ग्रन्य जिनमें चौहानों की वंशावलियाँ दी हई 
हैं, इनके विषय में स्वंथा मौन हैं ।' हु 


पंडित सदाशिव दीक्षित के मनुसार इनका नाम चालुन्चराय पा तथा वह इन्हें मोर 
चामुण्डराय, को एक ही व्यक्ति मानते हुए लिखते है कि-'उपलब्ध सभी काब्यों में इसका 
नाम चापुण्ड अथवा चामुण्डराज कहा गया है। रासो में उल्लिखित चालुप्तराय भी चामुण्ड- 
राज का ही खरूपान्तर है। अवन्ती भूपाल भोज के द्वारा वीगेराय के वध किये जाने पर 
चामुण्डराज ने शासन सूत्र को अपने हाथ में ले लिया था ।"* 


पता नहीं पंडित जी ने 'चालुन्तराय” किस प्रति में लिखा हुआ देख लिया। दीक्षित 
जी का मत निश्चित ही कल्पना पर जाधघारित होने फे कारण ग्राद्य नहीं है। इनकी ऐदचि- 
हासिकता संदिग्ध है । 
न्दसूर अथवा बिन्दसार--'पृथ्वीराज रासो' के बनुसार घोहानों फो वंशपरम्पर। में 
८वीं पीढ़ी में राजा विन्दसार हुए वीरसिह के उपरान्त यही राजगद्दी के उत्तराधिकारी 
हुए । रासोकार ने इनका इससे अधिक विवरण प्रस्तुत नहीं किया है। रा० ए० सो० लन्दन 
की प्रति के अनुसार भी राजा विन्दसार, राजा वीरसिंह के उपरान्त ही गद्दी पर बैठे थे 
किन्तु घारणोज की प्रति तथा साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो इनके विषय में 
सर्वंथा मौन है । शिलालेख, पृथ्वीराजविजय महाकाव्य तथा प्रवंध कोप में विन्दसूर के स्पान 
पर विग्रहराज नाम मिलता है ।' संभव है विग्नहराज तथा रासो को विन्दसार एक ही ब्यक्ति 
हो । किन्तु सामग्री अभाव के कारण निश्चित मत व्यक्त करना असंभव है । 


बिबुधसिह--पृथ्वी राज रासो' के अनुसार चोहान वंघावली की २५ यो पीढ़ी में 


रासो की हस्तलिखित एवं अप्रकाशित प्रति, पृ० १०१ 
देखिए, प्रस्तुत शोध प्रबन्ध, परिशिप्ट भाग । 

पं० सदाशिव दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० ११९ 
पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काशी, छं० २८५, स० १। 
रासो की हस्तलिखित एवं अप्रकाशित प्रति, पृू० १० । 
देखिए, प्रस्तुत शोध प्रवन्ध, परिशिष्ट भाग । 


सी कद ४ ६ #ए 0 -० 


[ १०० | 


शाओा धर्मेंसार के उपरान्त बिबुधर्सिह चौहान उत्पन्न हुआ । रासोकार इनके विषय में केवल 
ठपयु के विवरण देने के अतिरिक्त पूर्णतया मौन है । रा० ए० सो० लंदन की रासो की प्रति 
उपयू तते कथन का समर्थन करती हे ।' किन्तु घारणोज की प्रति, बीकानेर की एक सक्ष 
अदार बाली प्रति तथा साहित्य संस्यान, उदयपुर से प्रकाशित रासो की प्रति में इनका 
नामोह्लेंस नहीं हुआ है । इतना ही नहीं, शिलालेखादि एवं संस्कृत के विभिन्न ग्रन्य भी इनके 
विएय में मौन है । 


पंडित सदाशिव दीक्षित एक स्थान पर इनके विषय में लिखते है--''इसका नाम शिला- 
वैध में “वावपति” तथा पृथ्वीराज विजय में 'वावपतिराज' बतलाया गया है, प्रबंधकोप में 
इसवग नाम वापल देव है। हम्मीर महाकाव्य तथा सुर्जन-चरित में इसका नाम क्रमश: 
बहलमराण तथा बल्लभ कहा गया है, और रासो में इसका स्मरण विवुघसिह, इस नाम से 
किया गया है | अतः चाहमान वंश में नामों की अनेकता में भी एक विशेषता है ।” पंडित 
जो अनेकेता में एक रूपता देखने के अभ्यस्त मालूम होते हैं। पता नहीं वह ऐसी निराधार 
वन्‍्यना कैसे कर लेते हैं। 


बोरसिह--'पृथ्वीराज रासो” के अनुसार चौहान वश में राजा रामसिंह के उपराम्त 
मातवों पीढ़ी में राजा बीरसिह हुए ।' वंशवृक्ष का उल्लेख करते हुए कवि ने नाम मात्र का 
मंकेत प्रस्तुत किया है। रा० ए० सो० ख्ंदन की प्रति के अनुसार वीरसिह अजयपिह के 
उपरान्त ही गद्दी पर बेंठे थे। इस प्रति में रामसिह नामक किसी भी राजा का उल्लेख 
नहीं किया गया है । साहित्य सस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो एवं धारणोज की रासो 
की लघुतम प्रति इनके विषय में सर्वथा मौन है । 


एक स्थान पर पंडित सदाशिव दीक्षित वीरसिंह को बजयसिंह का विशेषण माल्त 
मानते गए इनके अस्तित्व में संदेह करते हुए लिखते हैं--''भ्ी ओझा अपने नकशे में रामसिह 
और दौरसिह इन दो और नामों का रासाो की तालिका में समावेश करते है, परन्तु-- 


सुअ अनर्यास्ध सिघह सुराय 


नर बोरसिह झँँग्राम साथ ।। 


दस ऋर्धाली से राय कोर योरमिट के पूर्व सृत, सुवन आदि बदों के प्रयोग ने होते न्‌ 


पृप्वोगाज रासी, ना० प्र० स० काशी, छं० २००, सर १ 
२... रामसों की हस्तखिशित एव शप्राश्षित प्रति, पु० १० । 


इक 
के 


पें> संदाशिद दोजकित, रासों समीक्षा, प७ ११८॥ 


6 दृध्यीराज रासो, ना० प्र> स० काशों, छें० २८६५, स> 2 7 


हब 


गासोे व हस्तक्िखित छुई अप्रशादित प्रति; दु० १० । 


[ १०१ ] 


इनकी पृथक्‌ सत्ता नतो तके की कसौटी पर सिद्ध होती है और न प्रिचा लेख आदि झी 
भित्ति पर ही । ये पद अजय सिंह के विशेषण हैं ।”' 

भोक्ताराय (सोमदेव) चालुक्य-गुर्ज रेश्वर भीमदेव की सेना में अनेक गद़पति रह 
करते थे | सिन्ध तक के जहाजी वेड़े पर उसका अधिकार था तथा घारावर्थ तक उसको 
सेनिक छावनियां फैली हुई थीं। अमर्रास॒ह शेवड़ा नामक साधु उसकी सेवा में रहता था । 
बह मत्रों द्वारा स्त्री-पुरुष तथा देवादि को वश में करना जानता था। उसने ब्राह्मणों के अनेक 
बार भस्तक मुइवा दिए थे तथा उन्हें देशनिष्कासित कर दिया था। आवबू के परमार जैतसी 
के एक पुश्र सलख राज तथा एक पुत्री इच्छनी कुमारी थी । भीमदेव ने सुन्दरी इच्छनोकुमारी 
से विवाह की इच्छा प्रकट की | भोलाराय बिना सत्य-मसत्य का विवेक कर राजकुमारी 
इच्छनी के रूप की बातें सुना करता था। यह रोग उसका इतना भीषण हो गया कि राज- 
कुमारी इच्छती स्वप्न में भी दिखाई देने लगी । अन्ततोत्वा इच्छनी की बाकांक्षा से उसने 
अपने मंत्री अमरसिह को बावूराज के पास भेज ही दिया, किन्तु राजकुमारी की सगाई 
पहले ही चौहान पृथ्वीराज के साथ तय हो चुकी थी। भोलाराय के प्रतिनिधि को ज्ञात होने 
पर, उसने कहा 'है पव॑त पति ! भोलावीर इच्छनी को भूल नहीं सकता, वह तुममे कन्या की 
माँग करता है । यदि उसकी माँग को दुकरा कर राजकुमारी इच्छनी का विवाह चौहान में 
कर दोगे तो निश्चय ही वह तुम्हें आवू से वाहर निक्राल देगा । उसके लिए परमारों से युद्ध 
करना उतना ही सरल है जितना वीर अजू न के लिए किसी तुच्छ से यूद्ध करना यथा - सलपघ 
ने भीमदेव के प्रतिनिधि की वातें शांति पूर्वक सुनी तथा पाँच दिन तक बहुत आदर-सरकार 
करके अपने यहाँ रखा ॥ अन्त में मंत्रियों से मंत्रणा कर उसने उत्तर दिया--यदि भोला भीम 
मेरे राज्य की कामना करता तो निश्चय ही मैं उसे स्वेच्छा से दे देता, किन्तु उसने जैन धर्म 
अपना लिया है, इसी प्रकार के पाखण्ड से उसने इतनी भूमि प्राप्त को है, किन्तु उत्तर 
दिशा के शत्रु की शक्ति का भान नहीं है । 'जेतसी ने भी कहा--'मरुभूमि में नो लाख योद्धा 
निवास करते हैं, मावू के अंतर्गत १८ राज्य हैं तथा सम्भरपति चौहान सहायताये मेरे साथ 
है और यदि इन्होंने भी मेरी रक्षा न की तो गरोवर्धनघारी श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करेंगे ।' 
उपयु क्‍त उत्तर देकर भीमदेव के प्रधान को विदा किया गया । 


दूत को बिदा करने के उपरान्त आवू पति ने मंत्रणा करके पृथ्वीराज से सहायता मांगने 
फा निश्चय किया तथा एक पत्र में सम्भर पति को लिखा-मसलख राज की भगिनी तथा 
जैत की पुत्री को गुज॑रेश्वर भोलाभीम माँगता है और न देने पर आबू को उम्ताड़ देने की 
धमकी देता है। क्या सिंह का भाग्य गरीदड़ के हाथों में मा गया । वह भेरे राज्य सीमा ने 
दिन व दिन लूट करता है मेरी प्रजा दिन पर दिन गरीब होती डा रही है ।” पृथ्वीराज ने 
परमार का स्वागत किया तथा सलपष के साथ ही सहायता्थ चल दिया। भोताभीय 





१. पं० सदाशिव दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० १९१२-१३ | 


[ १०३ ] 


इप्यू बत सूचना पाकर अत्यन्त क्राधित हुआ तथा मंत्रणा करके रण दुन्दुभि बजा दी। चार 
द्रमाओं से सेनाए एकत्र होने लगी । गिरनार का राजा लोहाण कटारी, वीरदेव बाघेला 
राय परमार, वीरम का राजा रणिज्ञ झाला, सोढ़ा शाज्भू देव तथा गंग दाभी आदि सभी 
झर बीर उपस्यित हुए । मोलाराय ने अपने मंत्री सहित आादू का चारों भोर से घेर लिया। 
छाई दिनों सक भयंकर युद्ध चलता रहा । अन्ततोगत्वा परमारों की पराजय ई तथा आवूगर 
सालुक्यों के हाथ आ गया । भीम जय घ्वजा फहराता हुआ आवधचू दुगे पर चढ़ गया । 
इसी बोच शाह गोरी ने जो ऐसे अवसर की ताक में रहता था रणवाद्य बजा दिए । 
मंत्रियों के लाया समझाने पर भी 'भोलाराय ने शाह गोरी को आमंत्रित कर बुलवाया, 
किस्तु शाह ने इससे मिल कर युद्ध न किया भीमदेव तथा शाह गोरी दोनों ही ने पृथ्वीराज 
पर आक्रमण कर दिया । पृथ्वीराज चौहान की सेना दोनों दलों के मध्य ढोल की भांठि 
पिटने लगो । चौहान ने देवी की आराधना की। रात्रि के समय चौहानों ने चालुबयों पर 
क्रमण कर दिया । यद्यपि चालुक्‍्यों की सेना लौह दुर्ग की भाँति खड़ी थी फिर भी चौहानों 
की विजय हुई । रात्रि के अन्धकार में ऐसी गड़बड़ी मची कि भीम के योद्धा आपस में ही 
एक दूसरे को मारने लगे । यद्यपि राजा नेभी युद्ध में भाग लिया तथा अपना बल भी गेंवाया, 
विस्तु फिर भी विवश होकर उसे पीछे हटना पड़ा । 


भीमदेव को परास्त करने के उपरान्त चौहान पृथ्वीराज ने थोड़ी सी सना भीम की 
गति-विधि पर दृष्टि रखने के लिए छोड़ कर एक विशाल वाहिनी लेकर शाह गोरी पर 
कआाफ्रमणं कर, उसे भी परास्त किया ।* 


भीमदेव के काका सारंग देव के सात पृत्र, भीमदेव से कहा सुनी हो जाने के कारण 
देल्‍लीपति पृथ्वीराज चौहान के दरवार में रहने लगे थे। एक बार दरवार में महाभारत 
का प्रसंग चल रहा था जिसमे प्रतापसिद चालुबय का हाथ मूछों पर जा पड़ा। चाचा कन्ह 
में कुपित होकर उसके दो टुकाटे कर दिए। भीमदेव को अपने चचरे भाइयों की मृत्यु की 
उसके हृदय में बदला लेने की भावना प्रज्वल्लित हूं! 
उठी । इसी बीच प्थ्वीराज को दिल्‍ली राज सौप कर अनंगपाल बद्रीकाश्रम चले गये जिससे 
मे की और भी बुरा लगा । 


सूचना पाकर लपार पप्ट हआ तथा 


गु्जरेश्वर भीमदेव चालुक्य के हृदय में सांभरपति सामेश्चर सदेव शूल की भांति 
घभता गहता या नया प्य्वीराज अंगारे के समान जलन पैदा करता था। उसने-अपने मश्रियों 
में मचा बार चसुरंगिणी सेना तंयार की । वह कहने लगा “अब में शत्र को 


कुचल कर मार 
शल्‌गा तथा समस्त पूर्वी पर एक छत्त राज्य करूंगा । 


डिस भाँति छोदे-छोटे बनेक सख्ोते आ-ज्राकर नदी में मिलते है उसी प्रकार भिन्न- 


५, पृष्दोशन राक्ती, झाहिए संरयान उदयपुर, मोलाराय समय । 


[ १०३ ] 


भिन्न राज्यों की सेनाएं एकन्र होने लगीं। एक विशाल सेना को लेकर भोमदेव ने सोमेम्वर 
की सीमा का अतिक्रमण किया। वेचारी प्रजा भयभीत होकर भाग गई तथा भीमदेव ने 
लूट मचा दी | अपनी प्रजा की बार्तवाणी सुन कर सोमेश्वर घोड़े पर शीघ्र चढ़कर इसी 
प्रकार तैयार हो गया जिस प्रकार कोई सती अपने पति के साथ जाने के लिए तैयार हो 
जाती है । सोमेश्वर पृथ्वीराज को दिल्‍ली में ही छोड़ कर अन्य सामन्‍्तों को साथ लेकर 
भीमदेव का सामना करने चल दिय । 


सोमेश्वर चौहान तथा भीमदेव के मध्य भयंकर युद्ध हुमा । पृथ्वी भय से कांप उठी । 
लाश पर लाश पड़ने लगी, खून की सरिताएं वह चली । स्वयं सोमेश्वर ने भागे बढ़े कर 
गुजरातपति का सामना क्रिया । दोनों ही देश रक्षक राजा थे, छत्रपति थे, कवच घारण किए 
बुए थे, दोनों ही हिन्दू धर्म की मर्यादा रूप थे तथा दोनों ही सच्चे राजपुत घे । उस समय 
रण क्षेत्र ऐसा दिखाई पड़ रहा था मानों वर्षा ऋतु की घनघोर अंधकार तथा तूफानी रात्रि 
प्रें पवतों पर दावानल जल रहा हो। सच्चा योद्धा सोमेश्वर चौहान रणक्षेत्र में वीरता 
दिखाता हुआ खण्ड-खण्ड होकर गिर पड़ा । सोमेश्वर सोम ( चन्द ) लोक को चला गया 


तथा चालुक्यों ने अपना हाथ रोक लिया। समस्त पृथ्वी भोलाराय की जय-जय कार से 
एज उठी ।/! 


पृथ्वीराज ने युद्ध परिणाम सुना तो शोक समुद्र में डूब गया | पृथ्वीराज ने बची हुई 


 मेना वापिस बुला ली तथा अपने पिता के लिए पोडश पिण्ड दान किया। पृथ्वीराज ने 


बारह दिन तक कुशशथ्या पर शयन किया, एक बार भोजन किया तथा स्त्रियों के संसर्ग को 
छोड़ दिया । ब्राह्मणों की दान दिया गया । सोने से सींग तथा खरी मंदी हुई आ्राठ हजार 
श्रेष्ठ गाएं ब्राह्मणों को दान में दी ।" 


पिता की क्रिया कर्म करने के उपरान्त पृथ्वीराज ने भीम से बदला लेने फा पूर्ण निश्चय 
किया तथा पगड़ी न बाँधने की प्रतिज्ञा की । उसने वार-वार कहा 'भीम चालुवय को मार 
कर मैं उसकी अंतड़ियों में से अपने पिता को निकालूंगा। धिक्‍कार है उस पुश्र को जो अपने 
पिता का बदला न ले ।' यह कहते हुए राजा पृथ्वीराज की माँ्ें लाल हो गई । पृष्वीराज 
ने एक विशाल सेना तैयार कर प्रथम राज्याभिषेक का कार्य सम्पन्न कर पुनः भीमदेव से 
युद्ध करता निश्चय किया । 


पथ्वीराज के हृदय को भीम निरन्तर सलता रहता यथा, शत्रु के श्राण लिए विना उसकी 
प्रबल कोपाग्नि शान्त नहीं हो सकती थी । बतः उसने मंत्रियों से मंत्रणा कर तथा घुभ मुहूत्त 
दिखाकर रण-वाद्य बजवा दिए । पृथ्वीराज ने निश्चय घड़ी में प्ररथान कर उपयुक्त स्थान पर 





१. पृथ्वीराज रासो, साहित्य संस्थान, उदयपुर, छें० १७-४० सोमबंध समय । 
२. वही, छं० ४५-४६ सोमवध, समय । 


[ १०४ ) 


कपने शिविर गाड़ु दिया । भीमदेव के गृप्तचरों ने जाकर खबर दी कि चौहान चौसठ हजार 
सेनिक लेकर इंद्ध हेतु गुनरात की बोर अग्रसर हो रहा है । 

समाचार सुन कर भीम छुषित हो उठा । उसके अंग-प्रत्यंग शौर्य से फड़कने लगे तथा 
बांचें साल हो गई । उसने नुरस्त मंत्रियों को बुलाकर सेनाएं तैयार करने का आदेश दिया। 
दात की बाल में सब सेनाएं एकश्र होने लगीं । 

सांमरपति के गुप्तचर ने जाकर सूचना दी कि 'समुद्र के समान गर्जेन करती हुई 
पालुक्य सेना तैयार हो रही है, उसमें एक लाख योद्धा तथा एक हजार हाथी हैं । यह 
सुनकर पृथ्वीराज ने कहा 'यद्ि युद्ध में भीम मेरे समक्ष आया तो जिस प्रकार ग्रीष्म ऋतु 
में पचन वी सहायता से अग्नि विशाल व्नों को भस्म फर देती है उसी प्रकार में इन सर्बो 
को नष्ट कर दूंगा । दूसरे दिन पृथ्वीराज की सेना अपार उत्साह के साथ आगे बढ़ी। बोर 
पृथ्वीराज ने गुजर मरेण को भड़काने के लिए चन्दवरदाई को भेजा-- 


नहों चन्द उन्दहु मरन , दिन दिन सललं दुष्प। 

फ्ही जाइ चालुकक सम, मर्गे वर समुष्प ॥ छं० ९८। 
के चल्ली नृुप भीम को, चंगी दोय रसाल। 

एक झुरंगी पधूघरी , इक कंचुकी भुजाल॥ 8० ९९।' 


चौहान ने कहा कि है चन्द, मुर्से विता की मृत्यु की वेदना दिन प्रति दिन कष्ट दायक 

सिद्ध हो रही है, बतः तुम चालुक्य भोलाभीम को सूचित करो कि मैं तुरन्त शत्रुता का बदला 
सेना चाहता हा । तुम उसके पास दो चंगी ले जाबो। एक लाल पगड़ी तथा दूसरी लाल रंग 
पी चोली । इतना ही नहीं पृस्वोराज ने निम्नाॉँकित संदेश और भी भेज दिया-- 

मन माने सोई गहीं , करिय चित्त इकतार। 

इहू ससार खसुपन्न , अपन घुन्न्त इक बार ॥ 

चन्द हथूथ झाहि पठय , भोम सम समरि वार॑ं। 

तात बंर संग्रहन , बचन तत्ते उच्चार॥ . 

गज भाट सुनर घट भजि तुम , सरित घल्ाऊं यधिर की । 

धार समिचि सोमेस कहूँ , तपत्ति दुझाऊुं उश्षर को॥ छ० १००१+' 


रामाहन॑ मंथन ,न , बरयि छना अमत धार। 
शालमिकशि पोटूपष , सोधि रूब रघपति रार ॥। 
सरजुन सयन समेत , आरनि बब्बर पताल सनति। 


देद स्थास मारथय , सकल क्षोहुनि दीपक बनि। 





६... पृवारान रासा, नाई पट्र० मन कादो, छ० 4८-५०, स० ४४ । 


हज. डा ० ००, मू८ 2८॥ 


[ १०५ |] 


चाहुआन , कहाइय चन्द कर , पिता बैर कज ह॒ह बयन | 
चालुक्क मीम उन समर सुनहू , तुमहु जिवावन अब कवन॥ छं० १०१।' 


पृथ्वीराज ने चन्द्र को एक लाल चोली तथा एक लाल पगड़ी तो उपयुक्त कठोर म्देश 
के साथ देकर भेजी ही किन्तु कवि चन्द अपनी ओर से एक जाल, नर्सनी, कुदाल, दीपक तथा 
हाथी का अंकुश भी साथ लेकर गुजरात की राजधानी में पहुंचा । चन्द की ऐसी विचित्र दमा 
देख, तत्काल ही देखने वालों की भीड़ लग गई । चन्द ने भोला के पास पहुंच कर घोषणा की 
कि 'पांभरपति आ पहुंचा है। चन्द की ऐसी विचित्र दशा देखकर भालाराय ने पूछा कि है 
भाट ! तुम्हारी लाई हुई इन विचित्र वस्तुओं का क्‍या अर्थ है-- 
चल्यों चन्द गुज्जरह , गरे जारी जंजारह । 
नीसरनी कुहाल , दोप मंकुस आधारह ॥। 
कस्न सूल संग्रहे , गयो चालुक दरवारह। 
इह अचंभ जन देपि , सिलपी पेषत संसारह । 
भेट्यों सु भीम मोरा सुमर , कहिय वत्त संमरि बयन 
हो भट्ट चट्ट बोलहूु कयन , कहा इहे डंवचर सयन ॥॥ छं० १०२ ।* 
कवि चन्द ने उत्तर दिया--'पृथ्वीराज की आज्ञा है कि यदि तुम पानी में जाकर 
छपोगे तो इस जाल से पकड़ लिए जामोगे, यदि आकाश में उड़ोगे तो यह नर्सनी वन्‍्दी बनाने 
के लिए प्रस्तुत है । यदि पाताल में जाकर छिपोगे तो इस कुदाल से खोद कर पकड़ लिए 
जावोगे, अन्धकार में छिपोगे तो दीपक के प्रकाश से खोज कर वन्दी बना लिए जावोगे, यह 
अंकुश तुम्हें वश में करने के लिए है तथा इस श्रिसुल से तुम्हारा वध कर दिया जावेगा । 
एन जाल संग्रहो , जाम जल भीतर पडेयो। 
इन नीसरनी ग्रहो , जाम भाकासह्‌ चढ़यो ॥ 
इन कुद्दाल पनौ , जाम पायारू पनठ्ठों।॥ 
इन दीपक संग्रही , जाम अंधार॑ नद॒ठी ॥ 
इन अंफुस असि बसि फरर्रों , इन त्रिसूल हनि हनि सिरों। 
जगमगे जोति जग उप्पर , तो डर प्रयम नरिदरं ॥ छं० १०३।' 
चन्द के वचन सुनकर भोलाराय भभक उठा, उसने भी ऐसा ही उत्तर दिया-झु्ते 
जो धमकी देता है, उसका मैं वध कर डालता .हो । मेरा नाम भीम है, में भयंकर युद्ध फरने 
वाला हों । इतना बढ़-बढ़ के बातें मत कर जो कुछ पूर्व हो चुका है उसका भी स्मरण 
कर ले।” 





१. पृथ्वीराज रासो, ना» प्र० स० काशो, छं० १०१, स० ४४। 
२.  चही, छं० १०२, स० ४४। 
३. चही, छं० १०३, स० ४४ १ 


[ १०६ ] 


जाल ज्वाल करि मसम , करस नोसरनों कह्टों। 

धन भंजोी. कुद्दाल, दोप कर पवन झपदूटों। 

अंकुस अंकुर मोड़ि , तिनह तसूल संकोड़ों।॥ 

हनन कहै ता हनों , जोति जग॑ मच्छर मोड़ों। 

हों भीम भीम कन्दल करों , मो डर डंक अचंम नर। 

सम्त प्ररद प्रवद धरिलज्ज अब , बित्तक पुठ्त्॒ परचक्चि पर ॥ छं० ६०४। 


चन्द ने पुनः उत्तर विया-यदि देव योग से कभी कोई चूहा बिलार को पराजित कर 
से, गिद्ध पवित्र राज हंस के शिर पर नाच ले, युद्ध में मृग सिंह का सामना करले, मेढ़क 
सर्प को निगल जाय तो इसे विधाता के विघान की विचित्रता ही समझना उचित है-ऐशसी 
बातों की पुःनरावुत्ति होगी, सोचना मूख्खता है । क्या पव॑तों पर छाए हुए भीषण वन को 
भस्म करने वाली दावाग्नि की बराबरी एक छोटा सा दीपक कर सकता है ? अर्थात्‌ नही । 


रे उंदर विहाल , कोई करन भिर मच्चो। 
रे गिहिन सिर हंस, देव जोगहू सिर नच्ची। 
रे मृग वध संग्राम , लरे वर अप्पन आयी। 
रे श्रप्पहू सो समर , करें मंदुक जस पायो। 


आंचम ब्रह्म गति वह नहीं , बार बार तुहि सिध्पिय । 
प्रज्जरे झार तरवर गिरह , का दीपक हूं विधष्पियें॥ छं० १०४+ 


तक बढ़ता देख कर भीम ने उत्तर दिवा-/भाटों के पुत्र तो केवल वाणी युद्ध जानते 
है । यदि सोमेश्वर की मृत्यु का बदला चाहते हो तो अपने घर का घन वान्ध्रवों को बाँट दो, 
जाकर पृथ्वीराज से कहता कि इस प्रकार की डीगों से बच्चे हो भयभीत हो सकते हैं, यदि 
उम्रमें रुछ बल हो तो सेना सजाकर युद्ध भूमि में निर्भवता से भावे ।' 


येन बाद सो करे , होई भट्टह कौ जायो। 

शारि रारि सो करें , जे न रस पपुथ ने पायौ। 

हपूय वयूय सो भिरं , घरह घन बंधन बटटे। 

इह सोमेसर बंर, ऊझेहु अप्पन सिर सटूटे॥ 

तुम कहो जाई संभरिे बपन , इन डिसमसन डिसद डरे॥ 

संज्यो दरक हक चरत , सज्न फटबर्क निककरे ॥ छं० १०६+ 








१, पृश्यौरात रास, ना० प्र” स० काशौ, छं० १०४, स० ४४ ६ 
२. बही, 8४० १०५, स० ४४ ] 
३. बहा, 58० १०६, स० ४४ , 


[ १०७ ।] 


कवि चन्द ऐसा उत्तर पाकर क्षुब्ध हो गया तथा उसके नेन्न लाल हो गए । वह त्रन्त 
पृथ्वीराज के पास लौट आया- 


चन्द मंद मन भातुरह , उठयो रक्त करि ननव। 
फिरि पहुच्यो नूप पियूथ पे, कहै चरक्‍का वन ॥ छं० १०७।* 
भोलाराय भीम, चन्द की वातों से उत्तेजित हो ही चुका था अत: उसने बपने भाट 

जगदेव को चन्द के पास अपने भेजे हुए सन्देश का उत्तर लाने के लिए भेजा । जगदेव ने 
चन्द से कहा कि तुम दीपक, जाल, कुदाल साथ लेकर विचित्र रूप धारण करके गुज॑रेश्वर 
को छेड़ने गए थे, यदि कैमास, चामण्डराय अथवा सम्भरी नरेश गए होते तो मालूम पढ़ 
जादा, तुमको तो उसने दूत समझ कर छोड़ दिया- 

फट्ठ मिसरे छेड़यो , राउः गुज्जरी नरंसर। 

दीबी जाल कुदाल , कहमि वह सह आउडंबर ॥ 

कह मिसर॑ कंसास , जास पुच्छंत विचष्पन। 

चामंड रा कहां गयौ , बहुत राया वर दष्पन ॥ 

फह॒ मिसर कन्हू बिप्पनौ , जग्गदेव सचो घधिय। 

वमन हय या दिद्ध घर , फह मिसरे संभरि घनिय ॥ छं० १०९१ 


चंद ने कहा कि वातें बनाने व,ले गुजंरेश्वर ने अभी तक भनेक खेल किए हैं, इस बार 
उसे पूरा आनन्द मिल जावेगा संभंर नरेश अन्य राजाबों फी भांति नहीं है जिनको उसने 
रण में पराजित कर लिया। बिच्छू का मंत्र बिना जाने सप॑ के बिल में हाथ दिया है र्पात्‌ 
अब तो उसे अपने किया का फल भोगना ही पड़ेगा-- 


बार बार बोलयो , सरस चत्ताड़िया गुज्जर। 
अब विगत्ति ऊभिम है, मिरच चब्दं ज्यों गज्जर ॥ 
तू अनि राव मसजाय , जिके रन अगम जित्ता। 
हन संभमरि थे राव , कोड़ि से सहस विघत्ता ॥ 
भेदयौं नहीं गुर अष्परो , कविय वयन संम्हों सर । 
कर नहीं मंत्र बीछिय तनो , घत्ते हयथ सप्पा हर ॥ छं० ११० ।' 


कवि चन्द की बातें सुन कर जगदेव प्रत्यावरतित हो गया तथा भोलाराय भीम से बोला 
कि चौहान पृथ्वीराज हाथी, घोड़े तथा योद्धाओों की चतुरंगिणी सेना सजा कर युद्ध हेतु 


था रहा है-- 





१. पृथ्वीराज रासो ना० प्र० स० काशी, छं० १०७, स० डंडे । 
२. वही, छं० १०९, स० ४४। 
३... वही, छं० ११०, स॒० ४४। 


मुनि सु बेन जगदेव फिरि , कहि भोरा नीमंग। 
आयी नप चहुआन सजि , हुय गय मर चतुरग ॥ छं० १११॥ 
पढ़ सुनकर मोलाराय भीम भी अपनी विशाल वाहनी लेकर रण क्षेत्र में जा गया तथा 
पृद्धासम्म हो गया ।' अस्ततोगत्वा दोनों दलों में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें भीमदेव सम्मर 
नरेंग पृथ्वीराज के हाथों वीरगति को प्राप्त हुआा । 
प्रसिद्ध इतिहासकार म० म० रायवहादुर गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने भीमबध के 
विधग्म में इस प्रकार लिखा है--'रासो का कर्त्ता लिखता है--'गुजरात के राजा भीम के हाथ 
में पृथ्वीराज का पिता सोमेश्वर मारा गया | अपने पिता का वैर लेने के लिए पृथ्वीराज ने 
मूजरात पर चढ़ाई कर भीमदेव को मारा और उसके पुत्र कचराराय को अपनी भोर से 
गद्टी पर बैठा कर गृजरात के कुछ परगने अपने राज्य में मिला लिए ।' 


यह सारी कया असत्य है, क्योंकि न तो सोमेश्वर भीमदेव के हाथ से मारा गया और 
न भीम पृथ्वीराज के हाथ स । सोमेश्वर के समय के कई शिलालेख मिले हैं, जिनमें से पहला 


वि० सं० १२२६ फाह्गून बदी ३ का विजोलियाँ का प्रसिद्ध लेख है" और अतिम वि० सं० 


१२३४ भाद्र पद खुदी ४ क! है +" पृथ्वीराज का सबसे पहला लेख वि० स> १२३६ आपाढ़ 
बदी १४ का है ।' वि० सं० १२३६ के प्रारम्भ में सोमेश्वर का देहान्त और पृथ्वीराज की 
गद्दी नशीनी मानी जा सकती है, जैसा कि प्रवंधकोप के अन्त की वंशावली से ज्ञात होता 

भीमदेव वि० सं० १२३४५ में गही पर बिल्कुल वाल्यावस्था में बैठा और फिर ६३ वर्ष 
अर्पातू बि० सं० १२९८ तक वह.जोवित रहा । इतनी वाल्यावस्था में वह सोमेश्वर को 
नही मार सकता और न पथ्वीराज ने उसका बदला लेने के लिये उस पर चढ़ाई कर उसे 
मारा था। गुजरात के ऐतिहासिक संस्कृत प्रन्यों में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है। 
राजपूताना म्यूजियम में भी भीमदेव का वि० सं० १२६५ का एक शिलालेख विद्यमान है ।* 
बाबू पर देसवाहा गाँव यें प्रसिद्ध तेजपल के जैन मंदिर की वि० सं० १२८७ की प्रशस्ति 


१ प्रथ्वीराज रासो ना० प्र० स० काशी, छं० १११, स० ४४। 
२. वही, छ॑ं० १२८४-२५, स० ४४ । 


है; 
श््‌ँ 


पृस्दोौराज रासों, मौसबध, चौवालीसवां समय, रासोसार १० १५९, नागरी प्रचारिणी 
सभा, काशी । 

४... उर्मेद्ल, रापल एशियादिक सोसाइटी, बंगाल, जित्द ५५, भाग १, सन्‌ १८८६ ई० 
पू० ४०-५६ । ह 

भावखदा गाँव का झेश ब्रिक्द्रोन्या हाल, उदयपुर में सुरक्षित । 

६. मझाट्टारों गाँव का छेप विफ्योरिया हाल, उठयपुर में सुरक्षित । 

3. प्ररंप विस्तामतति, ब० 7१२८ ॥ 

८. प्रदाष-सिम्तामणि, ए० २४९ 


है 


5... इंडियन ऐिडिक्येरों, लिल्‍द ११, पु० २२१-२२२ | 


[ १०९ ] 


के लिखते के समय भी भीमदेव विद्यमान था |" डॉ० बूलर ने वि० सं० १२९६ मागे मोर्ष 
बंदी १४ का भीमदेव का दान पत्र प्रकाशित किया है ।' इससे निश्चित है कि भीमदेव 
पृथ्वीराज की मृत्यु से अनुमानतः पचास वर्ष पीछे भी विद्यमान था ।"' 


श्री गोपाल नारायण वहुरा 'रासमाला'! ग्रन्थ के अनुवाद की टिप्पणों में भीमग्रध के 
विषय में लिखते हैं कि--' वास्तव में भीमदेव की मृत्यु इस युद्ध में नहों हुई थी, न पृथ्वीराज 
रासो में ही ऐसा लिखा है। रासो में इस प्रकरण को “भीमब्रंध! नाम से लिखा गया है 
जिसको सम्भवतः भीम वध समझ लिया गया है। इस युद्ध का निर्णायक पद्च नीचे दिया 
जाता है जिसका तात्पर्य यह है कि चालुक्य घायल हुआ भर पकड़ा गया । 


सिलह मद्धि खग धार , वीय उययो ससि सो । 
के नव वधु नखछित्त , काम कामिनि रस लोन ॥ 
मर्स चोर कत्तरी, दिसा दुत्ति तिलक पुच्च बर। 
के कूची स्यगार , सुभग भामिनि स्यंष्या कर ॥। 
सोभंति चन्द की कला नम , कल कलक सुम्भन तन । 
दुढंयों छत सामंत नृप , दुज्तलि राज तामस मन ॥ ७० ॥ 


चालुक्य के 'सिलह' अर्थात्‌ कवच पर लगी हुई खड्गधार अथवा तलवार की चोट 
ऐसी शोभित होती थी मानों द्वितीया का चन्द्रमा ही उदित हुमा है अथवा वह नववधू बे; 
नखछत के समान है । जो कामी और कामिनियों को रस लुब्ध कर देता है अथवा बोर की 
फत्ती ( क्री ) का मम ( रहस्य अर्थात्‌ धार है ) या पूर्व दिशा ( के माल ) का च,ति- 
मान तिलक है अथवा सुन्दरी सन्ध्या यामिनी के हाथ में श्रंगार ( पिटारी ) की कुन्जी हैँ । 
परन्तु, चन्द्रमा की कला तो नभ में शोभित होती है-यह कलक ( रूपी चोट ) शरीर पर 
शोभा नहीं पाती । ( ऐसे आधातयुकत ) नृप को सामन्तों ने रण क्षेत्र में दृढ़ निकाला जिससे 
राजा के मन का तामस अर्थात्‌ क्रोघ वुझ गया जयवा शान्त हो गया ।* 


श्री गोपालनारायण बहुरा ने उपयुक्त छन्द साहित्य संस्थान से प्रकाशित पृथ्वीराज 
रासों से लिया है। श्री मोहनस्हि ने भी लिखा हैं कि- भीमबंध' में पृध्णोराज ने पिता बी 
मृत्यु का बदला लेने के लिए भीम को बन्धन में ले लेने की प्रत्ल्ि की । ज्योतिषी द्वारा मुहत 





१. एपीप्रफिया इंडिका, जिल्द ८, पु० २१९१ 

२. इंडियन ऐंटोक्वेरी, जिल्द ६, पृ० २०६-२०८॥ 

३. म० मण० रायवहादुर गौरीशंकर होराचन्द ओझा. पृथ्वी राज रातों का नि्मपिषास, 
कोशोत्सव स्मारक संग्रह, पृ० ४५-४६ वि> सं० १९८५॥। 

४. फार्वस, रासमाला अनुवादक-गोपालनारायण बहुरा, टिप्पणी पू० २६३-२६४, मंगठ 
प्रकाशन जयपुर, सन्‌ १९४५८ ॥ 


[ ११० ] 


देखकर भी इस बात की पुष्टि की गई। कवि चन्द ने कहा कि इस समय पृथ्वीराज ओर 
विन्तीरेध्वर रावल समर सिंह विक्रम दोनों हो शक्तिशाली हैं ओर भारत की डांवाडोल बवस्था 
के समय भारत का भार इन्हीं के कंघों पर है | तत्पश्चात पृथ्वीराज ने गुजर प्रदेश पर चढ़ाई 
की । दोनों सेनाओं में सावरमती के तट पर भयानक युद्ध हुआ । युद्ध के अन्त में भोत्राभीम 
पथ्वीराज की दया का पात्र बना ( बन्धन में लेकर छोड़ दिया गया ) ।॥”' 


रामो के अनुसार पृथ्वीराज तथा भीमदेव के भध्य हुए युद्ध को डॉ० दशरथ शर्मा 
प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक मानते हुए लिखते हैं कि--“भीम चालुक्य गौर पृथ्वीराज के 
पररपर कलह फी बात भी अद्गाट्य है, पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के वर्णन से ही सिद्ध है 
कि पृथ्वीराज के मत्नी कदम्बवांसादि चौलुबयों को अपना शत्रु समझते थे।'* पार्थपराक्रम 
व्यायोग से यह सिद्ध है कि पृथ्वीराज ने भीम चौलुक्य के मातहत आयबू के राजा धरावप॑ं 
पर आक्रमण किया था ।' इसलिए आयू के लिए या आवबू के निकट दोनों राजाकों में युद्ध 
होना सिद्ध है । रासों में सलश् परमार का नाम मिलता है। बहुत संभव है कि वह राजा 
विक्रमसिह का पुत्र हो । जिसे सं० १२०२ के लगभग कुमार पाल ने भाबू की गद्दी से उतार 
दिया था ।' चोलुक्‍्य विरोधी चौहान संभवत: उसे अब भी आबू का सच्चा अधिकारी समझते 
पे। अ'बू का तत्कालीन राजा घारावप चोलुक्यों के मातहत था, और उसे गद्दी से उतार 
कर सलख अर्यात्‌ विक्रमसिह के पुत्र या किसी निकट सम्बन्धी को यदि पृथ्वीराज ने आधू 
को गद्दी पर बैठाने का प्रयत्न किया हो, तो कोई आश्चय नहीं । घारावर्प और पृथ्वीराज 
फे युद्ध का प्रभाव तो प्राध्य ही है । परन्तु वह युद्ध किस कारण से हुआ-यदि यह हम मालू# 
फरना चाहें तो सम्भवत: रासो की कथा हमारी कुछ सहायक हो | नागौर के निकट चौलुबयों 
केः विसद्ध, युद्ध का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। परन्तु बिकानेर रियासत के चरलू 
नामक एक ग्राम में कुछ शिलालेख मिले है, जिनमें लिखा है, कि आहड़ और अम्बराक 
नामक दो चौहान सरदार संवत्‌ १२४१ में नागपुर अर्थात्‌ नागौर की लष्टाई में मारे गये । 
यहुत सम्मव है यह युद्ध पृथ्वीराज ओर भीम चौलुकक्‍्य के बीच में ही हुआ हो । जिनपाल 
उपाध्याय रचित खरतरगच्छ पट्टावली में भी पृथ्वीराज और भीमदेव चौलुक्य के युद्ध का 
स्पष्ट निर्देश है । संवत १२४४ में भीभ चौलुवक के सेनापति जगदेव प्रतिहार ने मालवा पर 
आक्रमण किया था उसी समय सपादलक्ष मर्यात्‌ अजमेर राज्य का एक संघ तीर्थ यात्रा के 


« प्ष्वोराज रासो-्तृतोय साग-साहित्य संस्थान उदयपुर, संपादकीय पृ०, ४ ॥ 
पृभ्योराज विजय महाराव्य, एकाददा सर्ग । 
गायश्याड ओरिपन्टल सिरज में प्रकाशित इस नाटक को प्रस्तावना । 


«. लिन मष्टन गंषि, कुम्तारपाल प्रबंध, दयाश्रम महाकाय्य भौर सं० १२०२ का धारा- 
धर्ष का फेख । 


४. उदाध्याय मे सं० १२६२ में घटत्यानक नामक यूत्ति की रचना की । 


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[ १११ ] 


लिए गुजरात पहुचा। घामिक विद्वेप के कारण तदंशीय एक दण्डनायक ने उसे लूदना 
चाहा और जगद्द व की अनुमति चाही | सेनापति ने इस वात की स्पष्ट शब्दों में यह कहते 
हुए मनाही की कि अभी मैं बड़ी मुश्किल से पृथ्वीराज से संधि कर पाया हूँ । यदि तुमने 
सपांदलक्ष के संघ से छंड़छाड़ की तो तुम्हें गधे के पेट से सी दिया जायगा। भीम ओऔर 
पृथ्वीराज के बीच युद्ध का इससे अधिक स्पष्ट और क्या प्रमाण मिल सकता है ।”' 


उपयु क्त विवेचन से इतना स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वीराज तथा भीप चौलुक्‍्य के 
मध्य संग्राम अवश्य हुआ था। यदि यह भी मान लिया जावे कि पृथ्वीराज ने भोलाभोम 
चौलुक्य को बन्धन में लेकर मुक्त कर दिया था तो भी भोलाराय तथा सोमेश्वर के मध्य 
हुआ संग्राम विवादास्पद ही बना रहता है, किन्तु इतना स्पष्ट प्रमाणित है कि भोलाराय 
भीमदेव चौलुक्य पृथ्वीराज के समकालीन था तथा वाद तक जीवित रहा । डॉ० माताप्रमाद 
गुप्त भी उक्त विचार का समर्थन करते हुए लिखते है-'भीमदेव चालुक्य फे समय का प्रयम 
प्राप्त मभिलिख सं० १२३५ का किराडू का है, और अन्तिम प्राप्त अभिलेख सं० १२८७ 
का है। इसलिए यह स्पष्ट है कि वह पृथ्वीराज ( सं० १२३६-१९४९ ) का समकालीन 
था । दोनों में वैमनस्य के प्रमाण भी मिलते है। पृथ्वीराज विजय में पृथ्वीराज वे चौलुग्य 
को शत्रु समझने का उल्लेख हुआ है जिनपाल उपाध्याय ( सं० १२६२ ) द्वारा रचित 
'खरतरगच्छ पट्टावली” में पृथ्वीराज और भीम चौलुक्क के सेनापति जगह व प्रतिहार के 
बीच कठिनाई से हो पायी एक संधि का उल्लेख हुआ है । डॉ० दशरथ शर्मा ने चरलू 
(बीकानेर ) के मिले हुए शिला लेखों का उल्लेख किया है, जिनसे आाहड़ गौर अम्बराक नामक 
दो चहुवान सामंतों का सं० १२४१ के नागपुर ( नागौर ) के किसी युद्ध में मारे जाने का 
उल्लेख है । इसलिए दोनों में कोई युद्ध हुआ हो, तो असंम्मव नहीं है ।/' 


शहाबुद्दीन गोरी ने दिल्‍ली तथा कन्नौज के राजाओं को पराजित कर गुजरात की 
कोर ध्यान दिया । रासमाला कार ने लिखा है कि “सन्‌ ११९४ ई० में कुतुबुद्दीन में फौज 
लेकर गुजरात प्रान्त की राजधानी नेहरवाला ( अणहिलवाड़ा ) पर चढ़ाई की मोर 
चहाँ पर भीमदेव को हरा. कर अपने स्वामी की दुर्दशा का पूरा-पूरा बदला लिया । वह एुछ 
दिनों तक धनी नगरों को लूटता रहा परन्तु गजनी से वापस लौटने की आाज्ञा थाने पर 
उसको अचानक दिल्‍ली चला जाना पड़ा । 


दूसरी जगह वही मुसलमान इतिहासकार लिखता है कि जब कुतुबुद्दोन ने मपहिलवाटा 


१, डॉ० दशरथ शर्मा, पृथ्वीराज रासो को कथाओं का ऐतिहासिक ध्ापार--राजत्पानो 
भाग ३, अंक ३, जनवरो, १९४० कलकत्ता । 

२. डॉ. माताप्रसाद गुप्त, पृथ्वोराज रासो की ऐतिहासिकता मौर रचना तिथि, पृ०« ९६९ 
राष्ट्र कवि मेथिलोशरण गुप्त अमिननन्‍्दन ग्रन्य, १९५९॥ 


[ ११२ ) 


मे: बाहर आकर डेरा डाला तो भोमदेव का सेनाप्ति जीवणराथ उसको देख कर भाग गया। 
फिर जब, उम्तका पीछा किया गया तो सामने होकर युद्ध किया परन्तु वह मारा गया गौर 


उ्मककी फीज भाग गई। इस पराजय का समाचार सुनते ही भीमदेव भी अपनी राजधानी 
छाद कर भाग गया । 


फनवहीन की जीत अवश्य हुई, परन्त गजरात पर उसका स्थाई रुप से अधिकार न 
हो सका मोर हार होने तथा राजघानी से भगा दिये जाने पर भी भीमदेव की शक्ति में कमी 
ने आई, वहीं ग्रन्यकार लिखता है कि "दो वर्ष बाद (सन ११६९ ई० में ) कुतुवुद्दीन को 
समाचार मिला फि नागौर और नेहरवाला के राजा तथा अन्य हिन्दू राजाओं ने मेर लोगों 
के स्राध मिलकर मुसलमानों से अजमेर छीन लेने का विचार किया है। इस समय उस्तका 
लश्कर दघर-उधर के प्रान्तों में बिखरा हुआ था इसलिये जो कुछ थोड़े बहुत विश्वासपात्र 
सिपाही थे उन्ही को लेकर यथा शक्ति नेहरवाला की सेना की बढ़ती को रोकने के लिये 
रवाना हुआ परन्तु उसकी हार हुई । लड़ाई में वह कितनी ही बार घोड़े पर से गिर पड़ा 
भऔर उसके छह घातक घाव लगे, परन्तु बाद में उसके सिपाही उसको बरबस पालकी में 
शासकर रणद्षेत्र से अजमेर ले गये ।”' भीमदेव चालक्य सन्‌ १२१५ ई० में मर गया और 
बहीं मूलराज चालुक्‍्य के वंश का अन्त हो गया । 


रासमाला के अनुवादक श्री गोपाल नारायण बहुरा भोलाराय भीम की मृत्यु १२१५ ६० 

हीं मानते हैं, थे लिखते हैं कि 'यह सही नहीं है क्योंकि १२४० ई० का उसका ताम्रपत्र 

मिलता £है। भीमदेव के विपय में आगे लिखते हैं कि--"ऐसा जान पड़ता है कि भीमदेव 

(द्वितीय) पर बहुत-सी आपत्तियाँ आ पड़ी थी इसलिये वह निर्वल हो गया था। कीर्ति 

फोमुदी में आगे चलकर लिखा है कि “वलवान मन्रियों गौर माण्डलिक राजाओं के द्वोते हुये 
भी उसने बालराज के राज्य को क्षीण हो जाने दिया ।” 


सुकृत संकीतेन में लिखा है--''निरन्तर दान देते रहने से जिसकी लक्ष्मी क्षीण हो गई, 
बहुत ही घुश्न क्रान्ति वाली जिसकी कीति है, जिसने अपने वल से भूमंडल को वश में कर 
सिया है, ऐसा मप्लेप्वर भीम भूपति चिरकाल से बढ़ती हुई चिन्ता के कारण व्यधित 
बित्त हो गया । 


पोष सुद्ी ३ सोमवार सबत्‌ १२८० का ताम्रपत्र, डा० बूलर ने अपनी चालुक्य लेखा- 
बसी के पृ० ४८ से ६८ में दिया है, उसमें लिखा हे---शीमदणहिलपुर राजघानी अधिपण्ठित- 


| 
१. फ्ायस, रासमालछा, मनु० गोपालनारायण बहुरा, पृ० २६९, मंगल प्रकाशन जयपुर, 
सन्‌ ६९५८ । " 


यही, पृ० २७२ । 


क्र 





[ ११३ |] 


अभिनवसिद्धराज श्रीमज्जयन्तसहदेव” इससे ज्ञात होता है कि इस जयन्तसिह ने भोमदेव 
(ट्वितीय) का राज्य दवा लिया था परन्तु इसके वाद में सम्बत्‌ १२८३, १२८८, १२९५ 
ओर १२९६ के लेख भीमदेव के ही मिलते है । इससे यही जान पड़ता है कि भीमदेव ने फिर 
अपने राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया था ! 


चैत्र सुदी ६ सम्वत्‌ १२९८ के लेख से विदित होता है कि भीमदेव (द्वितीय) के बाद 
तनिभुवन पाल देव राजा हुआ ।”” अतः उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भीमदेव चालुवय 
सम्वत्‌ १२९८ तक जीवित रहा । 


श्री के० एम० मुंशी" जी के मतानुसार भीभदेव चालुवय की वशावली इस प्रकार थी-- 


चालुक्य वंश 
१-मूलराज सन्‌ ९४२-९९६ 
२-च!|मुण्डराय सन्‌ ९९६-१०१० 
३-वल्लभराज सन्‌ १०१०-१०१० 
४-दुर्ल भराज सन्‌ १०१०-१०२२ 
५-भीमदेव (प्रथप) सन्‌ १०२२-१०६४ 
६-कर्ण देव (प्रथम ) सन्‌ १०६४-१०९६ 
७-जयसिंह ( सिद्धराज ) सन्‌ १०९६-११४४ 
८+कुमारपाल सन्‌ ११४४-११७३ 
९--अजयपाल सन्‌ ११७३-११७६ 
१०-मूलराज (द्वितीया) .. सन्‌ ११७६-११७८ 
११-भीमदेव (द्वितीया) सन्‌ ११७८- 


डॉ० वासुदेवशरण" अग्रवाल भी भोलाराय भीम का समय सम्वत्‌ १२३४ से १२९८ मानते 
हैं जैसा कि उपयु कत कथन से स्पष्ट है-चालुक्यवंश की वंशावली उन्होंने इस प्रकार दी है--- 


१-मूलराज (पत्नी माघवी ) * विक्रम संवत्‌ ९९८-१०५३ 
२-चामुण्डराज विक्रम संवत्‌ १०४३-१०६६ 
३-वल्लभराज (छहमाम शासन किया) विक्रम संवत्‌ १०६६- 
४-दुल भराज - ह॒ विक्रम संवत्‌ १०६६-९०८० 





१. फादंस 'राससाला अनुवादक-ग्रोपाल नारायण बहुरा, टिप्पयी ए० २७१-७२ मंगछ 


प्रकाशन जयपुर, १९४५८ । 
2... पफल ठ]फ0ए प्रा४ ४०४ 0एएुंगवते०३ 20 वा शोर फिपे:७ कीउचशशड 


छ०णग्रा०8५, 5६ ८तींघ०ा) 4944. 
३. फार्वंस 'राससाल/ हिन्दी अनुवाद, सूमिका, पृ० ७, मंगर प्रकाशन जयपुर, सन्‌ १९५८॥ 


05 2] 


४>मीमदेव प्रयम (पत्ती उदघमती ) विक्रम संवत्‌ १०६०-११३२१ 
६-कर्ण सोलंसी (पत्नी मबणल्ल देवी) विक्रम संवत्‌ ११२२-११५० 
७-ज॑यमिह सिद्धराज विक्रम संवत्‌ ११५०-१२०० 
८-ड्ुमारपाल (पत्सी भूपालदेवी) विक्रम संवत्‌ १२००-१२२९ 
९-अजयपात (पत्नी नायकी देवी) विक्रम संवत्‌ १२२९-१२३२ 
१०-मूलराज द्वितीय विक्रम संवत्‌ १२३२-१२३५ 
११-भीमदेव द्वितीय (पत्नी सुमलादेवी) (मोलाभीम) विक्रम संवत्‌ १२३५-१२९८ 
१२-त्रिभुवनपालदेव विक्रम संवत्‌ १२९८-१३०२ 


उपयूवत दोनों विद्वानों के मतानुसार भी भीमदेव (द्वितीय) का समय संवत्‌ १२३५० 
१२९८ ठहरता है। बतः नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित 'पृथ्वीराज रासो' में दी हुई 
भोताराय भोमदेव की मृत्यु का विवरण पूर्णतया अनैतिहासिक सिद्ध होता है । 


मह॒देव अथवा महादेव--पृथ्वी राज रासो के अनुसार चौहान वंशकी तृतीय पीढ़ी में राजा 
सामन्तदेव के उपरान्त महदेव अयवा महादेव नामक राजा राजगद्दी का उत्तराधिकारी हुआ । 
रासोकार ने इनके नाम मात्र का उल्लेख किया है। रा० ए० सो० लन्दन की प्रति में भी 
महदेव नामक राजा का विवरण प्राप्त होता है। किन्तु उदयपुर से प्रकाशित तथा घारणोज 
की रासों की श्रति में इनका उल्लेख प्राप्त नहों होता है किन्तु एक स्थान पर पंडित सदाशिव 
दीक्षित नरदेव में विशेवण का आभास पाकर सस्कृत के श्रन्थों के आधार पर नरदेव को 
ही महदिव मानते हुये लिखते हैं-““प्रबंधकोप, हम्मीर महाकाव्य भौर सुर्जन चरित में 
दस व्वात्ति को नरदेव कहा गया है और रासों में इसको महादेव | वस्तुतः नरदेंव की 
अपेसा महादेव अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि नरदेव तो विशेषण-सा आभासित 
होता है । 


१० मदाशिव का मत कल्पना पर आधारित होने के कारण ग्राह्य नहीं है । 


महांसिह--'पृथ्वीराज रासो' के अनुसार चौहान बंश परम्परा की १६वीं पीढ़ी में राजा 
मादिवयराय भौहान के उपरास्त महसिह नाम का राजा उनका उत्तराधिकारी हुआ ।* 
सम्पूर्ण रासो में वंशवुद्ष के अन्तर्गत हो इनका उत्लेख हुआ है । सम्पूर्ण रासो इसके विधय में 
मौन है। रा० ए० सो० लन्दन की रासो की प्रति उपर्युकत्त मत का समर्थन करती है ।* 


१. दृष्दोगाज़ रासौ, नागरी प्रचारिणी समा कांगी, छं० ३८४, स० १३ 
२१ प्ं० सर'शिव दीक्षित, रासों समीक्षा पृु० ११२।॥ 

३. प्स्वोराज रासो, ना» प्र स० काझो, छं० रे८७, स० ११ 

ध् 


दामों की हस्तछिखित एवं अप्रकाशित प्रति, प्‌ृ० १०१ 


[ ११४ ] 


घारणोज की प्रति, बीकानेर की एक लक्ष अक्षर वाली प्रति! तथा साहित्य संस्घान ददयपुर 
से प्रकाशित रासो इनके विषय में मौन है । शिलालेख एवं संस्कृत ग्रग्थों में इनका नाम प्राप्त 
नहीं होता ।" 


पंडित सदाशिव दीक्षित रासो के महसिह को शिलालेखों तथा अन्य संस्कृत ग्रन्धों का 
'गूवक' ही मानते हैं । उन्होंने लिखा है--'हरष मन्दिर की प्रशस्ति का प्रारम्भ गवक से होता 
है । शिलालेख में भी इसका नाम ग्रृवक ही दिया है । पृथ्वीराज विजय में गोविन्दराज, सुन 
चरित में ग्रुजंर और रासो में महीसिंह इन भिन्न-भिन्न नामों से इसका स्मरण किया गया है । 
प्रबंधकोष गौर हम्मीर महाकाव्य इसके विषय में मौन हैं | पता नहीं पंडित जी ने इन सब 
नामों को एक ही व्यक्ति का नाम कैसे मान लिया। कुछ भी हो सामग्री अभाव के कारण 
इन्हें ऐतिहासिक व्यक्ति मानने में सन्देह ही रह जाता है । जब तक अन्य कोई तथा पूर्ण 
प्रमाण सामने नहीं आता, तब तक इनके विषय में कुछ निश्चित घारणा बनाना प्रम 
फैलाना ही है । 


सानिव्यराय-- पृथ्वीराज रासो” के अनुसार चौहान वंश की ९१वीं पीढ़ी में राजा 
अरिमंत के उपरान्त राजा मानिक्यराय हुये जो चौहान वंश मे अत्यन्त शूरमा थे । वंशावली 
के नामों की गणना करने पर वीर मानिक्यराय १५वीं पीढ़ी में भाते हैं। सम्भव है दीच के 
दो नाम वास्तव में नाम न होकर विशेषण हों । दो सकता है रासो-सम्पादकों ने न्लम वश 
विशेषणों को भी नाम मान लिया हो । ग्रन्थकार ने पृथ्वीराज रासो के आदि समय! में 
वंशावली का विवरण भ्रस्तुत करते हुये इनका नाम मात्र का उल्लेख किया है किन्तु “रासो 
समय ५७' के अन्तगंत कवि चन्द ने लिखा है कि 'एक वार सेमरा देव से वीर मानिवयराय 
को वरदान प्राप्त हुआ था कि यदि वह अश्वारूढ़ होकर जितनी भूमि की परिक्रमा कर 
डालेगा, उतनी भूमि चाँदी की हो जावेगी-- 


चढ़ी पव॑ंग पहुमि परिहेँ जितकक । 
अनषूट रजत हो है तितबक ॥ छं० २१२ ।* 


किन्तु सन्‍थ ही पीछे देखने का निषेध भी किया गया था। वीरवर माणिवयराय बारह 
कोष तक तो बिना पीछे मुड़े हुये चले गय किन्तु देववशात्‌ इसके उपरान्त इन्होने पोछ्े घूम- 





१. डॉ० दशरथ शर्मा, पथ्वोराज रासो की कयाओं का ऐतिहासिक आधार, पृ० ३, राज- 
स्थानी भाग ३. अंक ३, १९४०, फलकत्ता । 

देखिए, प्रस्तुत शोध प्रवन्ध परिश्विष्ट भाग । 

३, पं० सदाश्षिव दीक्षित, रासो-समीक्षा, पृ० ११४। 

४. पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काशी, छं० २८६, स० १। 


५, वही, छं० २१२, स० ५७। 


[ १५६ ] 


हरे देख लिया | वीर मानित्यराय का पीछे घूमकर देखना था कि सत्र भूमि चाँदी के स्थान 
पर हऊसर या नमक ही गई-- 

दादसहु कोय ऊतर कऋ्रमन्त ॥ 

भवतत्य. कौन में्ट निमन्‍्त ॥ 

मन आनि श्रर्ति फिरि देधि पच्छ । 

हूव॑ गयो लवन गरि सर प्रत्यच्छ ॥ छं० २१३ ।* 


'मुहणोत नैणसी की ख्यात' में भी खींची वंश की उत्पत्ति कथा का विवरण मानिक्य- 
राय के उपयंक्त कथा से समान प्रस्तुत किया गया है->''एक वार आसराव अपने पुत्र 
माणकराव से प्रसन्न हुआ और कहा कि तू प्रभात से सन्ध्या तक जितनी पृथ्वी में फिर आबे 
वह भूमि तुझकों दे दी जावेगी । तब माणकराव दिन निकलते ही चला भौर सम्ध्या तक 
बराबर फिरता रहा । वह सांभर का चढ़ा इतनी जगत गया नागौर, पट्टो के ८5४ गाँव और 
मारी महाण जहां इसने गढ़ बांधने का विचार किया । सन्ध्या होते जापल की तरफ निकला, 
वहाँ गयारे (बैल लादने वाली एक जाति) ठहरे हुये थे, उन्होंने भोजन की मनुहार की, यह 
भी दिन भर फिरता-फिरता भूखा हो गया था, कहा कोई पका-पकाया भन्न हो तो लाबमो । 
2स वक्‍त उनके खिचड़ी तैयार थी वह कटोरे में ले आये । माणकराव ने ऊंट की सवारी 
पर चहे-चढ़े ही वह चावल-मूंग की खिचड़ी खाई ओर सन्घ्या होते पिता के पास पहुंचा । 
पिता ने पूछा कितनी घरती में फिर आया ? उसने स्व हकीकत कह सुनाई । फिर पूछा कि 
कही गठ की बैठ भी निश्चय की है ? कहा महाणा के पास गढ़ बाँधने का विचार है । पिता 
बोला दिन भर में कुछ खाया भी ? उत्तर दिय। कि गवारों के यहाँ खिचड़ी खाई है| पिता 
में कहा तूने खिचड़ी खाई इसलिये तेरी सन्‍्तान खींची कहलावेगी और जो धरती उसने देखी 
थी वह उसको दे दी और महाणा व जायता में गढ़ बधवा कर दोनों जगह राजस्थान रखने 
कब वात दो | माणकराव ने वैसा ही किया । 


रातों” तथा 'द्यात” की उपर्युक्त कथाओं में कितनी समानता है यह कहने की 
बात नहीं है । 

(रासो के प्रायः समस्त संस्करण वीर मानिक्यराय के अस्तित्व को मानते हैं। रा० ए० 
मो८ सन्दन की रासों की प्रति के अनुसार भी वीर माणिक्यराय असिमंत के पुत्र थे ।" घारणोज 
वी प्रति में भी मानिवयराय नाम का उल्लेख मिलता है । बीकानेर की एक लाख अक्षर 


६ पधर्वाराज रासो, ना० प्र० स० काशो,४ं० २१३, स० ४७॥ 

२. रमनारायश दूगड़, मुहगोत नेणसी को रु्यात, पृ० श्४-८५, प्रथम साग, काशी 
नागरों प्रचारिणों समा, सं० १९८२ । 

३... रातों को हस्तलिसित एवं अप्रकाशित प्रति, ए० १० ॥ 

.. पधारक्षोन को प्रति, आदि फ्ये । 


[ ११७ ] 


धाली (पृथ्वीराज रासो' की प्रति के अलुसार वीर मानिवयराव, चौहान दंश वा आईि 
पुरुष था--- 


ब्रह्मा न जर्ग॑ अपन भुर । मानिकराई चहुआन सूर ॥॥/” 


डॉ० दशरथ शर्मा घारणोज की राप्तो की प्रति को प्रामाणिक सिद्ध करते हुये 
म्ानिक्यराव के विषय में लिखते हैं--'मानिक्यराव का नाम प्राय: सभी ही एयःतो और कुछ 
पुराने शिलालेखों में प्राप्त है उसका वशधघर धर्माघिराज सम्भवतः राजा चामुण्डराज हो ।”* 


इसके अतिरिक्त साहित्य सभ्थान उदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज रासो भी इन्हें, 
चौहान वंश का आदि पुरुष मानता है तथा इनके दस पुत्र होने का उल्लेख भो करता है-- 


चहुआना रे बसं, बोर मानिक्क पुत्र दस।' 


शिलालेख एवं संस्कृत के ग्रन्थों में इनके नाम का उल्लेख प्राप्त नही होता है, किन्तु 
पंडित सदाशिव दीक्षित शिलालेखों एवं संस्कृत ग्रन्थो के विभिन्न नामों को मानिक्यराय के 
नाम ही मानते हुये लिखते हैं-“इनका नाम शिला लेख में दुलंभ गौर पृथ्वीराजविजय और 
प्रवध कोष में दुल भराज कहा गया है। हम्मीर महाकाव्य में इनका नाम जयराज बतलाया 
गया है और रासो में माणिक्यराय । सुजंव चरित में इनके अवुल्लेख का कारण उसके कर्ता 
को हो बिदित होगा ।”' पता नहीं पडित जी ने यह सब कैसे सोच लिया । मानिवकराय 
चौहान के विषय में इतिहास सवंधा मौन है किन्तु 'रासो! के प्रायः सभी संस्करण इनके 
ध्यक्तित्व का समर्थन करते हैं । 


मोहन्त--प्ृथ्वी राज रासो के अनुसार चौहान वंश को चौथी पीढ़ी में राजा मह्देव 
अथवा महादेव के उपरान्त मोहन्त गद्दी पर वेठे । कंषि ने इनका विशेष विवरण प्रस्तुत 
नहीं किया है। रा० ए० सो० लन्‍्दन वाली रासो की प्रति में इनके नःम का उल्लेख नहीं 
प्राप्त होता है। साथ ही साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो तथा घारणोज की प्रति 
इनके विषय में सर्वथा मौन है। पंडित सदाशिव दीक्षित 'मोहन्त' को नाम न मान १९ 
'महादेव' का विशेषण ही बतलाते हैं--“रासो में महादेव का एक विशेषण “मोहन्त' कहा 
गया है, अर्थ का बोध न होते के कारण सम्पादकों ने उससे एक पृथक सलाम की पल्पता 
फर ली है।”' 





१. डॉ० दशरथ हर्भा, पृथ्वोराज रासो की कथाओं का ऐतिहासिक आधार. प्रृ० ४,राज 
स्थानी, साग ३. अंक ३, जनवरी, १९४० कलरकत्ता 

पृथ्वीराज रासो, साहित्य संस्थान, उंदयपुर, छ० ७० स० १ 

पं० सदाशिव दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० ११४ ॥ 

पृथ्वीराज रासो, घागरी प्रचारिणी सभा काशी, छं० र८४। स० २१। 

« पं० संदाधिव दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० ११२१ 


ुए४ €& ७० ० 


[ ११८ ] 


सम्भव है दीक्षित जी का मत सत्य हो, किन्तु शिलालेखों तथा संस्क्ृत के प्रन्‍्यों में 
इनका संकेत भी प्राप्त नहों होता है ।' 

मोहसिह--'प्रृध्वीराज रासो' के अनुसार चौहानों की २० वीं पीढ़ी में राजा प्रतापसिह 
चौहान के उपरान्त उनका पृत्र मोहसिंह उनका उत्तराधिकारी हुआ | इनका रूप अत्यग्त 
मोहक था तथा युद्ध भूमि में साक्षात 'प्रेतः के समान था ।' ग्रन्थकार ने इनका विशिष्ट 
परिचय प्रस्तुत नहीं किया है। रा० ए० सो० लंदन की रासो की प्रति उपयुक्त कथन का 
समयंन करती है । घारणोज की प्रति तथा साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित 'रासो' 
इनके विषय में सर्वथा मौन है । शिलालेख एवं संस्कृत ग्रन्थों में भी इनका नाम देखने को 
नहीं मिलता है । किन्तु पडित सदाशिव दीक्षित जी इन्हें सस्कृत ग्रन्यों मे दी हुई वंशावली 
फा गुवर' मानते हैं। किस आधार पर उन्होंने अपना मत व्यक्त किया है यह स्पष्ट नहीं 
फरते--'इनका नाम प्रशस्ति, शिलालेख, पृथ्वीराज विजय भौर हम्मीर महाकाव्य में 'गुवक' 
मुर्जंन चरित में ब्रज तथा रासो में 'मोहविह! बतलाया गया है। प्रबंध कोप में इसका 


मनुल्लेख है । दीक्षित जी का मत अनुमानपर आधारित होने के कारण मोहसिह का 
अस्तित्व संदेहास्पद ही वना रहता है । 


रामसिह--'पृथ्वी राज रासो' के अनुसार चौहान वंश में राजा अजयसिह के उपरान्त 
छठवीं पीढ़ी में राजा रामसिह उनके उत्तराधिकारों हुये ।५ कवि ते इनके नाम का उल्लेख 


चौहानों की वंशारली का विवरण प्रस्त्त करते समय किया है। रासो के अन्य किसी भी 
प्रत्ति में रामसिह का नाम नही मिलता है । 


पं० सदाधिव दीक्षित रामसिह एवं वीरसिह नामों को नाम ही नहीं मानते वरन्‌ 
अजयमभिह के विभेषण मात्र मानते हैं। “श्री ओझा अपने नवशे में रामसिह और वीरसिंह इन 
दो और नामों का रासों की तालिका में समावेश करते -परन्तु 


सुअआ अज्यासहू सिघह सुराय । 
मर बोर समिघ सग्राम ताय ॥ 
१,  देधिए प्रस्तुत शोघ प्रबन्ध, पन्शिप्ट राग । 
पृस्योरान रासों, ना० श्र. स० काशी छ« रझ८, स० ११॥ 


रे 


३. रासो को हस्तलिपफित एवं अप्रकाशित प्रति, पृु० १०॥ 

४. देशिए, प्रस्तुत शोध प्रवन्ध, परिशिष्य म,ग । 

५. प० सदाठिव दोक्षित, रासों समोक्षा १० ११५॥ 

६, पृच्योरान रातों, ना० पश्र« स० कानों, छ० २८५, स० १॥ 
७. ([१) रा० ए० सो- रूदन को रासो की प्रति । 


(२) म्ाहिस्प समान उदयपुर से प्रकाशित रासों को प्रति । 
(३) घारणीन को अप्रशाशित रामसो को प्रति । 





[ ११९ | 


इस अर्धाली में राय और वीरपिंह क्े पूर्व सुत, सुबन आदि पदों के प्रयोग म होने से 
इनकी पृथक सत्ता न त्तो तके की कसोटी पर सिद्ध होती है और न शिलालेख आदि की 
भित्ती पर ही | ये पद अरजयतिहूं के विशेषण है ।” 


रामसिंह के विषय में शिलालेख एवं समस्त संरक्ृत्त ग्रन्थ मौन है। अतः ऐसी विपम 
परिस्थिति में इनके विषय में कुछ निश्चित मत देना असंभव है, अमस्भव नहीं यदि यह कोई 
कृवि-काल्पनित माम हो । 


रंतसी अथवा रैनसिह--पृथ्वी राज रासो के मतानुसार दिल्‍ली अजमेर में अन्तिम हिंदू 
शासक पृथ्वीराज चौहान का एक मात्र पुत्र राजकुमार रैनसी था। 'विवाह समय ६५! के 
अन्तगंत पढ़ते हैं कि महाराज पृथ्वीराज का १३ वर्ष की अवस्था में दाहिमा से विवाह हुआ 
था।' इस विवाह का सम्पूर्ण रासो में अन्यत्र कहों भी उल्लेख नहीं हुआ है। सम्भवतः 
इसी रानी के गर्भ से राजकुमार र॑नप्ी का जन्म हुआ था क्योंकि 'कैमास वध प्रस्ताव 


५७' के अन्तगंत पढ़ते है कि भानजे रयनकुमार तथा मामा चामंडराय दाहिम में परस्पर 
अत्यन्त प्रीति थी-- 


दिल्‍ली वे चहुआम । तपे अति तेज पग्ग बर॥ 
चपि देश सब सोम। गंजि अरि मिलय धनुद्धर ॥ 
रघन कुमार अति तेज । रोहि हम पिट्ठ विसम॑ ॥ 
साथ राव च,सण्ड । करें कलि कित्ति अतमं ॥॥ 
मेवास धास गज द्रगम। नेहु नेह बड़ढें अनत ॥ 
मातुछह नेहू भानेज पर । मागनेय मातुल सुरत ॥ छ॑ १।' 


तथा उनकी परस्पर प्रीति देखकर घंदपुंडीर ने पृथ्वीराज के कान भरे थे । 

'बड़ी लड़ाई को प्रस्ताव ६६! के अन्तर्गत सूचना प्राप्त होती है कि गजनिपति शाह 
शाहबुद्दीन गोरी का प्रधल आक्रमण सुंनकर तथा स्वयं के पक्ष को निर्वेल समझकर महाराज 
पृथ्वी राज चौहान ने अपने पुत्र का राज्याभिषेक फर दिया था-- 


फरिये सुचित भर संब्ब। राज दिस्तेव द्वव्य भर । 
संगि सदन श्रगार । गज्जवबर पट्ट महू झर ॥ 
रपमनकुमर आमासि । दीन माला मुत्ताहुल ! 
असी बंधि निज पानि। बंदि कीनों कोलाहुल ॥ 


. 


१. पं० सदाशिव दीक्षित, रासो समीक्षा, प्‌ ११२-११३। 
२. प्रथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काशो छं? २, सर ६५१ 
है. वही, छं० १५ स० ५७१। 


[ *₹« ] 


गये है दान कष्चार निशा ? परस्य बंध सा सिधु क्रिय । 
4 | 
शोडिलिद बदि घराधान पट | 'रन्‍प काम मन्‍्नेव इय ॥ छं० ६०८। 


८४८ ्दिर भो सुधा है दायरा राजा रमनमी नाम प्रस्ताव ६८' के अन्तगंतत पढ़ते 
$ क दह्बोविण यौन को गोरों दरा बस्दी करके उन्हें गजनी ले जाने का समाचार पाकर 
छत शर कं गल्एी ते सघन मों (इ्न्मी) को राजगढ़ी पर विठाया- 


गाजदेध प्रोरिन | आय आामासि उचारं ॥ 
दिए ग्रे टिल्लरिय । होइ निःधार मपार ॥ 
सर्व सूर सामत | रन राजन आचार ता 
इलिय एश मन राब्य । रीति राजन व्यवहार ॥ 
गण दिवस लगन सिधासनह । धरि सूढ़ा ग्रादो सरिय॥ 
हद तिलुर सामत मिल्ि। मेघाडइमर सिर धरिय ॥ छ॑ ७।' 
हज गेटसी मे शाह गोरी तथा प्रस्वीराज चौहान की मृत्यु की सूचना प्राप्त कर, अपनी 
हदल गामरी मोटे ती को बुताकर, झाह सेना से बदला लेने का निश्चय किया औौर विपक्षी 
दस बी धरे" हर साडोर पर अपना अधिकार कर लिया- 
पजाय यान सब साहि सड़ि। 
उदधटाण सफल रयनस पहष्टि ॥ 
श्यि घ्रप साहि दिव्लिय मरान । 
अच्छे जु सूर तपि चहुमान॥ ५१ ॥ 
साहोर लोहू छडिय सुधाई। 
प्रिट संदि अध्य जनु पिट्टराई ॥॥ 
अटुृझान सबर दिन दिन प्रकार ॥ 
गोरों मरिद दर गई पुकार ॥ छं9 ५२ ।' 
पदररपजक सुचना गजनी पहुंचने पर शाह ने बुटकर खां नामक सामनन्‍्त को प्रतिनिधि 
(हट डा पारसयर्ष पर आाकमग्र करने का आदेश दिया। शाही सेना ने निरन्तर आगे 
बए ४४ यो दुर्ग डा पेरा डास दिया। सात माह दो दिन तक निरन्तर किला घेरने के 
हर एल ३ तब सो ने सुरंग सदा कर किले की दोवार उड़ा दी। परिणाम स्वरूप युद्ध अनि- 
बाज 20 उृ लदब दोगो और में तलवारें बन उठों +' अंत में रनसी अपने अपूर्व पौरुष का 





$2% 082 कारों, नाए प्र८ सम काशी, 2० ६०८, प्त० ६६ । 
ट ५388 77५ 3 75 अभञभछ ॥ 
कै. इड, एव ४६-४२, सर ६८ ॥। 


डर डी ह्+ ध्२न्भ्य ० ६८। 


[ १२१ ] 


परिचय देते हुए समर भूमि में कूद पड़े तथा फीरोजखां को मार कर क्पार साहस एवं 
वीरता का परिचय देते हुए स्वयं भी वीरगति को प्राप्त हुए ।' 


महा महोपाध्याय डाॉ० गौरीशंकर हीराचन्द ओला रंतसी को ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं 
मानते हैं। उन्होंने एक स्थान पर लिखा है कि “पृथ्वीराज रासो में लिखा है कि १३ दर्घ 
की अवस्था में पृथ्वीराज ने दाहिमा चामण्ड की बहन से विवाह किया, जिससे रंनसी का जन्म 
हुआ।' यह कथन भी निराघार कल्पित है क्योंकि पृथ्वीराज का पुत्र रैनसी नहीं, पिन्‍्तु 
गोविंद राज था, जो कि पृथ्वीराज के मारे जाने के समय बालक घा। फारसी तथारीयों 
में उसका नाम गोला या गोदा” पढ़ा जाता है, जो फारसी वर्णमाला की अपूर्णता के कार 
गोविंदराज का धिगड़ा हुआ रूप ही है। हम्मीर महाकाव्य में भी गोविन्दराज नाम मिलता 
है ।' युलतान शहाबुद्दात ने अपनी आधघीनता में उसे अजमेर की गद्दी पर बिठाया, परन्तु 
उसके सुलतान की आधीनता में रहने के कारण पृथ्वीराज के छोटे भाई हरिराज ने उम्र 
अजमेर से निकाल दिया, जिससे वह रणथम्मौर में जा रहा । हरिराज का नाम पृथ्वीराज 
रासो में नहीं दिया, परन्तु पृथ्वोराज विजय, प्रवंध कोप के अंत की वश्यावली भौर हम्मीर 
महाकाव्य में दिया है । गौर फारसी तवारीखों में ही राज या हेमराज मितता है ।" जो 
उसी के नाम का वियाड़ा हुआ रूप है!” किन्तु सुर्जंन चरित महाकाव्य में हरिराज के रपान 
पर मानिक्पराज मिलता है। वस्तुतः रंनसी के सम्बन्ध में अभी पर्याप्त अनुसंघान की 
आवश्यकता है । 


लोहधीर अथवा छोहसार-पृथ्वीराज रासो के मनुसार चौहान वंधावली की २६वीं 
पीढ़ी में राजा आनन्दराज चौहान के उपरान्त लोहधीर हुए तथा इन्होंने ही उत्तराधिएार 





१. पृथ्वीराज रासो, ना० भ्र० स० काज्ञी, छं० १७३-२१३, स० ६८। 
पृथ्वीराज रासो, विवाह समय (६५ वाँ समय), रासोसार, पृ० रे८प२ । 


हा 


३. तत्रारित पृथ्वीराजस्थ प्राक्पिन्ना तो निरासितः। 
पुन्नो. ग्रोविदराजाख्यः स्वसामर्थ््यत्तिविेनव: ॥ २४ ॥ 
हम्मीर महाकाव्य, सगे ४। 


४. जनेल आंफ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, पृ० २७०-७१, ई० सं० १९१३। 
५.  इलियट, हिस्द्री आव इंडिया, जिल्द २, १० २१९१ 


६. मभ० म० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, पृथ्वीराज रासो का निर्माण काल, फोशोत्सव 
स्मारक संग्रह, पृ० ४८-४९ ! 

नो८--'रासो' के प्रायः सभी संस्करण इस मत फो पुष्टि करते हैँ कि रमनसी पृषण्दीराज का 
पुत्र था। (१) पृथ्ठीराज रासो साहित्य संस्थान, उदयपुर, छं० ४, पृप्दोराज रासो के 
मध्यम संस्करण की हस्तलिखित प्रति, छं० ४ फंमास वध समय २९ । 


बन 


[ १५३२ ) 


) द्राख्श को । रामोकार ने इनका ताम माप का विवरण प्रस्तुत किया है। 
र० ह० सो० सदत वो रासो को प्रति से उपर्दूतत कथन का समरयंन हो जाता है ।' किस्तु 
बाय हे कषस्प मंस्श्स्ण जैसे घारणोंव की प्रति, बीकानेर की एक लक्ष क्रटार वाली प्रति, 
हया साहित्य संस्धान उदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज रासो उपयुंकत कथन का समर्थन 

कर्ता है। भिलालिेय एवं संस्यृत के ग्रन्थों में भी इनके विषय में घिवरण प्राप्त नहों 


होता है । 


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दाह पर पे मर 


अंक 


पडित सदाशिव का कथन है कि लोहधोर का शिलालेखों तथा संस्कृत ग्रन्थों में दुलभ 
भयदा दुसंभराज फे नाम से सम्बोधित किया गया है--/'इसका नाम प्रशस्ति तथा शिलालेख 
मे दुर्लम और पृथ्यीराज विजय में तथा प्रवन्ध कोप में दुर्लभराज कहा गया है, परन्तु रासो 
में इतफा उलत्लेय लोहसार-दइस नाम से किया गया है । यह विग्रहराज (आानन्दराज) का 
धनज था। हम्मीर महाकाव्य एवं सर्जन चरित में इसका उल्लेख नहीं है ।” प्रमाणों के 
ममाव में इस प्रकार के तकंहीन विचार ग्राह्म नहीं हो सकते है । 


विजयपाल-गाहट्वाल वंश का चक्रवर्ती सम्राट विजयपाल इतिहासकारों के अनुसार 
विजययनद्र ई० सं० ११५६-११७७ के लगभग कम्नौज का आधिपति था। रास्तो के अनुसार 


राजा जयचन्द का पिता यही था। हरिश्चन्द्र के दान पत्र में जयचन्द के पिता सम्राट विजय 
पाल गो एक घितिशाली नरेश लिखा गया है । 


मजनि घिजय चन्द्रो नाम तस्थान्नेरन्र । 
सुरपति इय चूमृत पक्ष विच्छेद दक्ष: ॥" 


राजा विजयपाल या द्वितीय नाम मललदेव भी था ।' इतिहास प्रसिद्ध पराक्रेमी राजा 
विजयपाल का चित्रण रासोकार ने भी बड़ा उत्कृष्ट रूप से किया है। समस्त उत्तरी भारत 
यो अ्रधिततत करते वाला यही पराक्रमी योदा मिजयपाल ही था +* अपने समस्त राज्यकाल 
में राजा विजयपाल को अत्यन्त क्षति, विग्रहराज वीसलदेव का सामना करने के फलहवदप 


१. पृष्योराम रासों, ना० प्र० सर काशी, छं० २८९, स० १ १ 

रासो फी हस्तलिणित एवं अप्रफाशित प्रति; १० १० ॥ 

देशिए, प्रस्तुत शोध प्रयस्ध, परिद्िप्ट माग । 

पं० सदाधिष दोचनित, रासो समोक्षा, पृ० ११७ ॥ 

टाइुर गोपाल सिह बदनेर, जपमल बंद प्रकादा, टिप्पणी १, पु० ४११ 


+ पु का ्क ण्णिं न्ना दा रा 
रम्ना मंटरी नाटक, हडूृमिका तथा पृख्वीराज़ रासो, नागटो प्रचादिणों सना काशा/ 
जिनद १, समय १३॥ 


ल्‍्श् 


बढ 


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जद 
स्‍ 


8. पदृष्योराज रासों, नागरोीं प्रधारिणी सना काशी, सझय १३ 


[ १२३ ] 


उठानी पड़ी जिससे गाहड़वाल वंश के हाथ से साम्राज्य का पश्चिमी भाग का महत्वपूर्ण 
प्रदेश दिल्‍ली निकल गया जिस पर कालान्तर में चौहानों का प्रभृत्व स्थापित हुआ ।' 


ग्रन्थकार के मतानुसार एक वार राजा विजयपाल ने दिग्विजय की कामना से दिल्लो- 
पति अनंगपाल तोवर पर आक्रमण किया-- 


दिल्‍ली वे अनंग, राज राजयं अभंग । 
ता उप्पर कमध्वज्ज सेन सज्जी चतुरंगंव॥। 
अग मबातस आनृत, पुदिठ बंध गजपत्तं । 
ता पुटुठ॑ं विजयपाऊ, समर सज्जे रन मत्तं ॥ 
अजनंज भोज नीसान दल, मनुवरसंत रज्जिय विपिन । 
करि कूय कूप उप्परघरा, वैंघ अतंर सपन ॥ ६१७।" 


राजा अनंगपाल ने कमघज्ज के आक्रमण की सूचना पाकर अपनी विशाल वाहिनी 
एकत्र कर कालिन्दी की उत्तर दिशा में मुकाम किया । इसी बीच अजमेर पति राजा सोमेश्वर 
अनंगपाल की सहायतार्थ दिल्‍ली की मोर मपनी विशाल चतुरंगिनी सेना लेकर अग्रसर 
हुआ । सोमेश्वर चौहान तथा तोवर अनगपाल की सम्मिलित सेना ने राजा विजयपाल की 
सेना को दबा दिया जिससे विवश हो राजा विजयपाल को हटना पड़ा- 


जित्ति भत्ति भारथ्य मौ, गो फिरि ग्रह फमरधज्ज । 
उप्परि अजमेर पेहु डोला पंच सुरज्ज ॥ 


विजयोपलक्ष एवं सोमेश्वर की सहायता के प्रति इतज्ञता प्रदर्शन हेतु दिल्‍्लीपति राजा 
अनंगपाल तोवंर ने अपनी एक पुत्री कमला का विवाह सोमेश्वर से कर दिया तथा दूसरी 
कम्या सुरसुन्दरी का काम्यकुब्जेश्वर राजा विजयपाल के साथ चिर मंत्री के फलस्वरूप 
विवाह कर दिया- 


अनंगपाछ पुत्नी उसनय । इक दीनी विजयपाल। 
एक दीनी सोमेस कौ। दीज बदन फलिकाल ॥ छं० ६८१॥ 
एक नाम सुर सुन्दरी। अनिवर कमला नाम। 
दरसन सुर नर द्ुललही । मनो सु कलिका फाम ॥ छं० ६८२।" 
रासो में ही विजयपाल की एक अन्य रानी का भो उल्लेख मिलता है जो राजा उय- 
चन्द के विमाता पुत्र वीरमराय की जननी थी । इसका नाम संरन्धी था । 





१. डॉ० रमाशंकर त्रिपाठी, हिस्ट्री आव कन्नौज, पुृ० ३२८७ । 
२. पृथ्वीराज रासो, ना० शभ्र० स० काशी, छं० ६१७, स० १।॥ 
३. वही, छं० ६८४१-८२, स० ११ 


, 


'बंधोरा जप घबरा विजम्पाल सपुत्तहु । 
सेरस्थों दर उनमे नाम यवोरम रावतहु ॥ 


इसके विपरीत इतिहासकार राजा विजयपाल की रानी रा नाम चतद्धतेया मानते है 
सथया कोवर बंगी राजा अनग्पास से उसके किसी सम्बन्ध को स्वीकार नहीं ररते हैं ।' 

प्रसिद्ध इतिहासवेसा डॉन भोसा विजयपाल तथा जयचन्द आदि नामों को छोशकर 
विजयधाल गो विधाहादि रासो' बणित घटनाओं को कल्पित मानते हुये लिखते है कि-- 
(समर लिखता है क्लि कन्नौज के राजा विजयपाल ते, जिसने दिल्‍ली के अनंगपाल की पुत्री 
मुद्री में विवाह किया था, विजय यात्रा करते हुये सतुबंध तक का सारा प्रदेश जीत लिया | 
बहन में राजा छीन हो गये, परन्तु पृथ्वीराज ने उसकी अधोनता स्वीकार न की । विजय- 
पाल ने सुखरी से दत्पम्न पुत्र जयचन्द ने भी जब राजसूय यज्ञ के लिये सब राजाओं को 
निमंत्रिय शिया, हब भी पृथ्वीराज न आया 77 


टस सम्पूर्ण कयन में विजयपाल के पुत्र जयचन्द के उसके पीछे गही पर बंट्ने और 
पृर्वी राज तथा जयचन्द की समकालीनता के सिवा एक भी ब्रात सत्य नहीं है। सोमेश्वर के 
समय अनगपाल दिल्‍ली की गद्दी पर था ही नहीं और न उसकी पुत्रियों का विजयपाल भौर 
मोमेश्यर से यिवाह हुआ था। कमला की सोमेश्वर के साथ विवाह की कथा के समान 
मुन्दरी के विजयपाल के साथ विवाह की कथा भी कल्पित ही है। विजयपाल के दिग्विजय की 
बया भी मिम ले है ।/”! 

इतिहासकारों के मतानुसार राजा विजयचन्द अथवा विजयपाल वैष्णव मतावसम्बी था 
बा उसने केक विष्णु मन्दिर बनयाये थे ।" उ० रमाशंकर त्रिपाठी तथा अनेक दानपत्नों के 
विवरणों के अनुसार वह परम महेस्वर या 0 बुद्धावस्था होने पर अपने जीवन काल में द्वी 
उमने अपना राज्य अपने परम प्रतापी पुत्र जयचन्द को सौंप दिया था ।' 

प्स्वीराण रासो का उपयुवत वर्णन भले ही कुछ कल्पना प्रसुत हो किन्तु उसके वर्णन से 
इतना स्पष्ट अवश्य हो जाता है कि राजा विजयपाल एक पराक्रमी शासक था जिसे इतिहास- 
हार भो रवीकार करते हैँ । विद्वानों को यह भी दुष्टि में रखना चाहिये कि रासो एक काव्य 
प्रस्प है, इतिज्ाम नहीं ।! अन; उसमें कल्पना का योग होना स्वाभाविक ही है । 


३ परध्वोराम रासो, साहित्य सस्यान उदयपुर, छ० ६१, स० ५८, जित्द ४, पुृ० ८०२ १! 
२. हाट रमांशर प्रिपादों हिसद्ी आब कन्नौज, पृ० २९६ । 

३... पस्वीराज़ रासों का निर्माण काल, कोगोत्सव स्मारक संग्रह, पृ० ४८ । 

४... जगदोहतिह गहलोत मारबाद का इतिहास, पृ० ८६ । 

४... डॉ ग्माश्ंशर द्रिपाटी, हिस्दी आब कम्नीज़ पृ० ३४७, जिल्द ४, पृ० श१८ ॥ 

५. 


धोने पराप्येम, रारत का यहल इठिहास, ६० ४११३ 


[ १९२५ ] 


वीरदण्ड---पृथ्वी राज रासो' के धनु 
वेशावली में १३वीं पीढ़ी में राजा वीरदप्ट हुये । रामोझार बेदख नाम कग इस्लेघ शरम्ट। 
विस्तृत विवेचन कहीं भी प्राप्त नहीं होता । राल हर सोढ परदम को रासों थी प्र, धार 


णोज की प्रति तथा साहित्य मंस्थान उदयपुर से प्रशाशित रास्तों इसने दिदय मे मर्द मप्े 


के औध्अ खत 


है। रासो का कोई भी अन्य संस्छरण वीरदण्ट मामक राहा झा समर्धन नही शग्सप है । 


मार राजा दीरमिह शे आपरशा झशौज़ानों «? 


पंडित सद्ाशिव दीक्षित 'बीरदण्श' को बीरसित का सिशेषश माद मानती है 
रासो के अन्य मंस्करणों में इनका उल्लेख मे होना सन्देश हो विएय है । एम दकार ह हद डि- 
राव मोहनपसिंह ने भी अनेक नामों को विशेपण माना है ।' ऐसी विपम ल्पिलिये एन विद 
में अधिक कुछ लिखना श्रम का प्रतिपादन मात्र होगा । 

वीरपसिह- पृथ्वीराज रासो' के अनुसार राजा बैरमिह थे: उपराच्य परौहान गापशस 
१स्‍वीं पीढ़ी में राजा वीरसिह हुये । प्रस्थध।र मे हनशा साम माप्र बापयही में प्राटह हि 
है । समस्त ग्राथ इनके विपय में मौन है। रा० ए० सो० सस्दभ शी रामो जी प्री पपय स्* 
कथन का समर्थन करती है ।" विग्तु घारणंज की रासो गो प्रति शघा सर्वर रास्ध 
उदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज रासो इनईे विषय में सवंधा मौन है। शिलाशिय ह३ ४7 पी 
संस्कृत ग्रन्थों में भी इस नाम का अस्तित्व प्राप्त नहीं होता है ।' 


पंडित सदाशिव पा नहीं किस आधार पर गोपेस्ध, गोशि्दराण, एयराद घर हर: 
नामों को वीरसिह के ही नाम मानते है योर नियते है शि->इनदा दाम शिल्ाहए #े 
गोपेन्द्र, पृथ्वीराज विजय में गोपेर्द्राज, प्रबन्धकोप में ग्रोबिन्दराज,वम्मोर महावदा: मे 
जयपाल चक्की और रासो में वीरसिह बतलाया गया है। यद्यावि उर्युगा मंधी एन्दों ४ 
इनके नाम में वैपम्य पाया जाता है, तथापि इनके नामों छी अमेशता से दोप शा परिशमाणएल 
हो जाता है और किसी की भी प्रामाणिकता में सन्देह का अवसर सदी रखता व वरदित हे 
फो भले ही सन्देह व रहा हो विस्तु पुष्ट प्रमाणों झे अभाव में यार एंसमन 
है कि यह सब नाम एक ही ब्यकिति के है। अतः वीरसिटू क्षाऊ भा विवाद हथ दष्य 
बने हुये हैं । 


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१. पृथ्वीराज रासो, ना» प्र० स० काशी, छं० २८६, सर १॥ 

२. पं० सदाशिय दीक्षित, रासो समीक्षा, १० ११०॥ 

३, फविरायव मोहनसिह, पृष्दोराज रासो को प्रामाणिशता पर पुनदियार, पुरनीर, इस ६५, 
राजरपान भारतो, भाग १, अंश २-३ पुस्मांक जुलाई-शस्टूशर । 

४. पृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० कादधोी, छघ० २८६, रू० ११ 

५. रासो की हस्तलिपित एयं अप्रशाशित प्रति, पृ० ६०१ 

६. देफिए, प्त्तुत शोष प्रवन्प, परिशिष्ट नाग । 

७, पं० सदाशिय दोक्षित, रापो समोक्षा, ए० १६१३-१४ ॥। 


[ १२६ ै 


बीसलदेव-- पृथ्वी राज रासो' के अनुसार चौहान वंश परम्परा को ३६वीं पीढ़ी में राजा 
प्रमाघिराज नोहान के उपरान्त बीसलदेव उनका उत्तराधिकारों हुआ। प्रारम्भ में कवि ने 
वीसलदेव का सन्लिप्व परिचय कुछ छन्दों में वणित कर दिया है' किन्तु उनका विस्तृत वर्णन 
आना (अर्पोराज) कि मां उनके जन्म कथा से लेकर दानव होने तक की कथा अपने पुश्र के 
क्षाग्रह करने पर इस प्रकार कहती है--' ऋषियों ने आबू पर्वत पर यज्ञ किया तथा उन्हीं से 
कालान्तर में राज्य प्राप्त हुआ । पर्याप्त समय के उपरान्त उसो कुल में महाराज धर्माधिराज 


ने जन्म ग्रहण किया तथा उन्हीं राजा के घर में कालान्तर से वीसलदेव नामक बालक ने 
जन्म ग्रहण क्रिया-- 


पुत्त मुनहु इह वत्त पुरानो। कहते होइ गद गद वानी ॥ 

अनल कुड आवू रिपि कीनों । राज उपाइ राजसिर दोनों ॥ छं० ३३७ ॥ 
ताफे कुछ ते उप्पन्नो । महाराज श्रमाधि॥ 

ताफे वीसलदेव नृप । सर्वे राज आराधि॥ छं० ३३८ 


राजा वीसलदेव के वड़े होने पर उन्हें उत्तराधिकार के रूप में अपने पिता धर्माधिराज 
चौहान की राजगद्दी आनन्द सं० ८५३१ शुक्रवार वैपाख मास में प्राप्त हुई । राज्यमहोत्सव में 
छत्तीसों वंग के छत्नरिय उपस्थित थे। अजमेर नगरी में उत्सव इस प्रकार मनाया गया मानों 
इन्द्रपुरी में उत्सव मनाया गया हो । राजा विसलदेव ने अपने अन्तिम समय में पट्टन पर 
माक्रमण करफे उसे अपने आघीन बना लिया तथा वहाँ पर छत्र घारण किया राजा 
धीसलदेव के घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम सारंगदेव या । राजा वीसलदेव 
स्वभाव से आयिट प्रिय था । एक बार मृगया के अन्तगंत एक अत्यन्त रमणीक स्थान देखकर, 


अपने समस्त मंत्रियों को एकत्र कर, उस स्थान पर एक सुन्दर सरोवर बनवाले की आज्ञा 
प्रदान की-- 


तबदेधि नरिन्द अनूप ठाम । निश्चर गिरिन्द घन अस्मिराम ॥। 
बुल्लाय लिए मन्नी प्रधान | सर रचो हहां पहुकर समान ॥ छं० ३६४ ।" 


यह सरावर आज भी अजमेर के निकट विद्यमान है| रासो के सम्पादक त्रय ने टिप्पणी 
में इस सरोवर के विपय में इस प्रकार लिखा है। “यह वीसल का तालाब अब तक अजमेर 
के पास विद्यमान है। उसके किनारे पर जहाँगीर बादशाह ने एक महल बनाया था जिसमें 


१. पृश्वीराज रासो, ना० प्र० स० काशी, छं० २९२-३०५ स० १। 
२. यही, छं० ३६७-३३८, स० १। ; 
३. यही, छ० ३३९, स० १। 

४, यही, छं० ३४०, स० १।॥ 

५... पही, छं० रेघडे, स० १। 


उसने ईग्लिस्तान के बादशाह जेम्स पहिले के एलचौ से मुलाकात को थी। इस दिप्यणों 
हमने इस तालाब के किनारे पर खड़े होकर लिखा है। यदि कोई परातत्ददेसा दस सद 
की वर्तमानदशा अपनी बांख से देखे तो उसको बढ़ा घोर और ब्राउचव होगा हि कह 
सरकार के राज्य में ऐसे प्राचीन स्थलों का जीपोंद्वार राजशोप के द्वरघ्य मे होहा 
रेलवाले अपनी रेल इस पर दौडा-दौड़ाकर उसक्रो नष्ट-प्नप्ट किये हामते है रिपाद पं 
घह समूल नष्ट हो जायगा ।”' 


हल क्‍ 


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राजा वीसलदेव के एक विशाल हरम था किन्‍्त राजा सर्वेश्वेष्ठ पाँयार जाति हर) ४८ 
रानी से अध्विक प्रेम करता था जिससे अन्य रानियाँ सपत्नीकटाह के. ढारण राजा बीमलटेय 
से खिन्न रहा करवी थीं-- 


सुरंगधाम अभिराम . तहां विश्राम राजहिप ॥ 
राय रय नाटक , विनोद सुथ महू बोल लिय ॥ 
पटरागिनि पांवर , रुपरनभा गुन जुब्दन ॥ 
प्रमदा प्रान समान , नहीं विस्तरत्त हृवक छिन ॥ 
रति भोग सुरति तिन सो सदा। फवहु आन न दिच्छ प्रिया 
पिश्लि सोति सकल एकन्र भय। पुर्पातन तिन ८ध दिये ॥ छ० ३७० ।' 


सपत्नीकडाह के कारण एक दिन सब रानियों ने मिलकर एक दूती को बुलाइर राजा 
घपीसलदेव का पुरुपत्व नष्ट करवा दिया-- 


मंगाइ अगिनि तब कियो होर । पर स्वास मांस प्रति पाप घोम । 
उच्चरयौ मंत्र आराधि इष्ठ। तत फाक नयी काम ते नप्द ॥ 
दस दिसा छग्यि इह फरीविद्धि । गत नो प्ररुषातन रहि न सिद्धि । 
दे द्रव्य कह्मौ भाता सिधाव। हहू सहर छंडि जनि सहूर जाव ॥ एं6 २३७३-३८ | 


९ 


राजा वीसलदेव का पुरुपत्व भग हो जाने पर उन्हें अपार बलेश हमा नपा दाद शा 
पालन करते हुये उन्होंने गोकरणेंश्वर महादेव वो यात्रा करने के किये गुजरात ही कर 





१. पृथ्वौराज रासो, नागरों प्रचारिणों सना फाहयो म्रयम समय, टिप्पशों पृ८ हे७ । 
२, वही, छ० ३७०, स० १। 
३. वही, छं० ३२७७-७८, स० ११ 
४. गोकर्णेश्वर महादेव की उत्पत्ति कथा स्कन्घ पुराण में मिछतों है- 
चमत्कारपुरोत्पत्तिः.. श्रुतात्वत्तो. महायते । 
तत्क्षेत्रद्यः प्रमाण॑ यत्तदस्मांश प्रकीतेंय ॥ १ ॥। 
यानि तन्न च पुष्यानि तोर्पान्याथ तनानि व । 
सहितानि प्रभावेतत नानि सर्दाषि कोतेम ४ २४ 


५ अल] 


प्रस्याम किया। राजा ने महादेव की निरन्तर आराधना करके अपना पुरुपत्व पुनः प्राप्त 
बर सिया-- 
पहूर रात पाछली राज आये डेरा मधि॥ 
बढ़ी फ़ाम फामना नई पुराषातन की सिघि शत 
प्रात काल करि न्‍हान घेन विप्रन को दोनी। 
पचा अम्रित घूष दोप सिव सेवा कीनी॥ 
तिहि बार हुकुम देवल करन पुर बसाइ वीसल धरह । 
मंगाद हस्ति असवार हुई फिरयो राजघर आतुरह ॥। 


राजा वीसतदेव फो महादेव की बाराधघना के फलस्वरूप पुरुपत्व त्तो प्राप्त हो गया 
झिम्तु उसकी कामगक्ति अत्यन्त प्रबल हो उठी। काम के मद में उसे उचित-अनुचित का 
भी ज्ञान न रह गया-- 
फाम लुबध बोलि सब कामिनि । च्यार जाग गई जागत जामिनी । 
सब नारिन को सोच उपन्नी। ऐसो कहा संभुवर दिल्ली ॥ 
सात दिवस एकस्ती काम कामना सु बढ़्ढिय। 
प्रीढ़ मुगध वय ब्रविद्ध सर्वे थरहरि यिम्त गढ़िढय ॥ 
परघरनी ले बोलि घरी नह विलंब लगाव । 
जो इदिलंब फरि रहे ताहि हनिबे की भाव 0 


ने भीोत फास विसराम बिन नाम सुनत ओढ़िक पर । 
अजमेर नयर बीसल निरपति प्रमदा देपत प्रज्जर ॥। 


गौर भी- 


जित॑ जाइ इह मान काम कामना सु बढ़िय | 
अबर ताहि उप्परह घयन सूरप पर चढ़िढिय ॥। 
पंचशोश प्रमाणन क्षेत्र ब्राह्म सत्तना। 
पमापाममस्पास तइचेय चमत्फारपुरोद्धव ॥ ३ ॥॥ 
प्रास्यां सत्या गमाशीर्ष परडिखमेन हरे पद । 
दक्षिघोत्तरपोटर्चेय.. गोंकर्णेदयर संज्ञिक ॥ ४ 0 
हाटकेश्वर शांश तू पूर्वधमासी दिनोत्तमा:। | 
ततछ्षेत्र प्रथितं छोफे सर्वपातकनाशन ॥ ५ ॥ 
एतः प्रभुति पिप्ेन्‍्पों दत्त तेन महात्मना। 
समनकारेण तत्य्यान नाम्ना श्याति ततो गते ॥ ६॥॥ 
वप्याय २६, स्कन्‍्ध पुराण । 


[ १२५९ ] 


तिन दिप्पत घर बसत मगि आप्पन युप अध्पहि। 
भवल्ला संग उल्लाद काहु की फानि ने रष्पहि ॥ 
दुज पत्रनि बस सुद्रह बरन, त्जे न किहू तक्‍रत मयन। 
चीसल नरिंद इहनय अफलि लह न कहूं निस दिन घयन ॥ 
नागरिकों के निवेदन करने पर राजा वीसलदेव ने अपने मन को अग्यत्न लगाने 
निमित्त से अपने प्रधानमंत्री करिपाल को बुलाकर भाना दो कि समस्त एस मग्दलि छेशर 
वीसल सरोवर पर डेरा करो तथा स्वयं ने अपने सव इृष्ट-मिप्तों को बोसल सासाद पर 
एकत्र करके गुजरातपति वाकुलराय पर बाक्रमण कर दिया । गुजरात नरेश बालदुराराय भी 
वीसलदेव का सामना करने के लिये अग्रसर हुआ ।' वीसलटेव ने क्पनी सेना को घत्रय्पुह में 
तथा वालुकाराय ने अहिब्यूह में अपनी सेना को युद्ध हेतु खढ़ा किया 4" 


] 


ग 
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नर 


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युद्ध का अन्त संधि में हुआ । राजा वीसलदेव उस स्पान पर महल तथा सगर दसाने ला 
आदेश देकर पुनः अजमेर लौट आया ।' इसी बीच एक दूत ने बोससदेव को समागार दिया 
कि यहाँ पर एक अत्यन्त सुन्दर वणिक पूृत्री है । राजा बीसलदेव में बीसहपुर में घानाए 
संवत्‌ ९८७ में प्रवेश किया ।* पुष्कर नगर में वह बणिक पुश्री उच्च सपर्या कर सौ थी 
राजा वीसलदेव उसे देखते ही मृग्ध हो गया । उस वणिक पृत्री ने नाना प्रकार मे प्रारंया शी 
किन्तु कामान्ध वीसल ने उसकी एक नसुनी और उसका सतीत्व नप्ट झर दिया । बलिय पूरा 
ने राजा के कुक्ृत्य से दुखी एवं क्रोघित होकर शाप दिया कि तू दानव होरर मर भपद 
करने वाला हो-- 
पुन्नी चनिक सराप दीय भर पुहकर नर लोइ।॥ 
अपर होइ वीसल नर॒पति नर पल चारो धहोद ॥ 86० ४९१।॥' 
तपस्वनी गौरी के शाप से राजा वीसलदेव की बुद्धि में घासबत्यता का गई € पगी 
बीच एक दिन उनके जूते में बैठे हुये सर्प के काटने से उनकी मृत्यु हो गई-- 
देषि राज फरि फ्रोध वान फी दष्ड परिय फर। 
घेघि पनय फन जिपफ परयो घर तरफत देसिर ॥ 


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१. पृथ्वीराज रासो, तागरी प्रचारिणी सना फाशी, छं० ४१८-४१., स८ !॥ 
वही, छं० ४४९, स० ११ 

वही, छं० ४६४-६८, स० १॥ 

चही, छं० ४७१, स० ११ 

वही, छं० ४७२, स० ११॥ 

बही, छं० ४९१, स० ११ 

वही, छं० ४०७, त्तृ० १॥ 


ढक यद व हृण 4० 


[ रत, 


छटूटि तिहिं बेर मंतग पेल देषन की धायी ॥ 
एक मोजरी मद्धि पनगा फन आनि लुकायों ॥ 
फिर राय आय हेँवर चढयी पहुरत मौजे पग डस्पौ । 
मंधितव्य बात आघात गति इतनी कहि राजन हस्यों ॥ छं० ५०९ ।* 


लाख उपाय किये गये किन्तु फिर भी वीसल न बच सका, इसी बीच रथी के मध्य से 
विप-ज्वालाएं उगलता हुआ एक दानव निकला जिसने मनुष्यों का भक्षण करना आरम्भ 
कर दिया-- 


राज मरन उप्पनो सब्य जन सौच उपन्नों । 
पटरागिनि पायार निकर्सि लव ही सतत दिल्नौंश 
तिन मुप इय उच्चरुयो होइ जादवनि सपुत्तय । 
मौ असीस इह फुरयों तुम्म भोगवहु घरत्तिय ॥ 
जिन रथी मद्धि ऊरठे असुर धव ज्वाल तिन मुप विषम । 
नर भपय जहां लसकर सहर मिले सनिप ते ते मपम ॥ छ० ५११।" 


जब सारंगदेव ने वीसलदेव की भसुरत्व की बात सुनी तो उसने युद्ध को तैयारी की 


किन्तु दुर्भाग्यवश सारंगदेव अपने दानव पिता के समक्ष न ठहर सका और वीरगति को 
प्राप्त हुआ--- 


एकादसयी दिवस प्रात दानव पुर आयो। 
सफल संन ले सस्त्र उद्ठधि लरिवे को धायो ॥। 
बे बाहेँ तरवारि इहै मुष पकरि सु कट्ट । 
ज्यों बेली द्र मं सघन देधि मरकट फल चुटटे ॥। 


किय पिता पुत्त जुद्ध सम असम गिर सी जनु सारंग गिरयो। 
मन ज़ानि असुर नर घुसि रहे सब हुढां दुदुंत फिरयो ॥ छं० ५१२ ॥ 


दानव वीसल देव दुंढ़-इुंढ़कर मनुष्यों को भक्षण करने लगा। अतः इसका नाम इसी 
रण से दुदा पड़ा । कवि ने लिखा है कि-- 
दूदि दूढि लापे नरन, तात॑ दूढा नाम । 
देव पुरी अजमेर पुर , रम्म करो ये रास ॥ छं० ५१७ । 


पृस्यीराज रासों, तागरी प्रचारिणो समा काशी, छं० ५०९, स्० १ ॥ 
यहाँ, छं० ५११ ० १। 
बही, छं० १२, स० ११ 
४. गह्ी, छूं० ५१७, स० १। 


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बम. ॥ 0 व ऋ 
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([ १३१ ॥ 


दानव दूँढा का बातंक चारों बोर फैल गया घा। भय के कारण होयों में दस्मेरग 
नगर खाली कर दिया। दानव जिस बन में रहता था उसमें छिम्तोी झीव हा प्रदेश ८ मे 
फारण न होता था, समस्त दिशायें शून्य हो चुकी घी। उसकी पोर हिमात्मरदा के सम 
मनुष्य और अन्य समस्त दीवों की क्‍या चर्चा सिह सदृश्य विकराए हस्त भी परमायम 
कर चुके थे--- 


सो दानव सजमेर घन, रहयो दोह पन बन्‍्त। 

सुन्‍न्त दिसानन जीव को, थिर घावर जग मस्त ॥ छं० ४२६१ 
तहें सिंह न म्रग्ग न पंछ्ति बनं, दिसि सून नई डरि जीय एन ॥ 
नह॒मातह मंत अमंत्त फिये, पिय को परनी रह तत छिप ॥ छं० ५२७॥ 
तहें ठाय भयानक सोच तय, तहें ठाप फलाकल सोषि पर । 
लतिह ठाय भय॑ नर नारि नरं, तिह ठाय न पंथिय पंथ फन ॥ एछं० ४श८ । 
तिहं ठायें गजवर वाजि ननं, तिहें ठाप न सिद्धप सतापफने । 
तिहें ठाय न दारिद्र द्रव्य गन, हिम मात में तात न मोह सन ॥ छ० ५२९ ।* 


ग्रन्थकार के अनुसार यह दानव सो हाथ ऊँचा था, हाथ में विकरास पष्य छिद्चे साधा 
या तथा मुंह से मिरन्तर अग्नि ज्वालाएँं फैका करता घा-- 


अगह भान प्रमान, पंच से हृष्प उनसे कह । 
छह ऊंचो उनमान, जिनय छ्टिउघनह पियेद हु । 
हथ्य षड्ग विकराल, मुप्प ज्यालधन सट्द ॥ छे० ५८० ।' 


राजा आना ने दानव की सेवा करने का निश्चय किया किन्तु उसकी माला ने झसे 
चहुत समझाया कि कुमंत्र मत ग्रहण करो । ढूंढा दानव जो इतना भोषणष है, पह तो मनुष्यों 
को दूंढ़-इंढ़ कर भक्षण करता है गौर नूम उसकी सेवा करने के लिये आाप्रह बरते हो-- 


पुप्र अमंत ज्ु सिष्पी, सिप्यो उरह इहुंत । 
दूढो नर दुई नपन, तू सेवनह फहुंत ॥ छं० ५२२ ।' 
आना ने अपने पिता सारंगदेव चौहान की मृत्यु का बदला लेने पी भादमा से सपा 
दानव फो अपनी सेवा भाव से प्रसप्त करने का निश्चय किया तेपा क्जमेर ये दसो में झाएर 
अपनी बुद्धि से निर्भयता पूर्वक उस दानव को प्ररुष्त बार लिया । परिणासरद शप दादद इुद्ा, 





पृथ्वोराज रासो, ना? प्र० स० फाशी, छं० ५२६-१५२९, स० १। 
«वही, छं० श्८०, स० १॥ 

घही, छं० ५२२, स० १। 

वही, छं० ५४२२-५१, त० ११ 


हुण्र० ८० 


राजा बता को सजमभेर का राज्य देकर आकाश मार्ग में उड़ गया ।' आकाश मार्ग में उठता 
हुआ बढ़ दानव नेमि तथा हारीफ मुनियों की प्रेरणा से निगमबोध में तोन सौ अस्सी वर्ष तक 
कठार तय में संलग्न हुआ । निममबोघ में उस उनच्र तपत्वी दानव की अपार महिमा हुई तथा 
यह सिद्ध महात्मा हो गया । दिल्‍लीपति अनंगपाल की पुत्री की सेवा से प्रसन्न होकर उसने 
उसको वीर प्रस्मविती होने का बरदान दिया ।' वर देकर ढुंढा दानव काशी की ओर उड़ 
गया ।* काशी में उसने अपने अंगों को काठ-काटकर हवन कर दिया ।' उसी के विभिन्न अगों 
से पृथ्वीराज (तृतीय), संगोगिता तथा अन्य सामन्तों ने जन्म ग्रहण किया-- 


दिमय बीसल वरदान, कुप्ष उपजे माहामर | 
चोर रस उत्तान, जुद्ध म्ड ने कोई नर॥ 
बोर जोति अवतार, भट्ट जिह्ला तन भारिय। 
नयन जोति संजोगि, पत्ति कुछ पति संघारिय ॥! 
दिप्पे सु नयन पुहकर प्रसिध, दियो पाप इन घअच करि । 
उप्पर्ज नारि अति रूप तिन, तेन लिन्न जाये सुधर ॥ छं० ५८२ । 
वर दिन्नी दुढा नरिद. जाय फासी तट सिद्धी। 
भरत लियो अवतार, भद॒द रसना रस पिद्धी ॥ 
सोमेसर परिगह, प्रबन्ध सित उपने पिति नर। 
हुये बीस अजमेर, किये उप्पने अपर घर ॥॥ 
सोमेसर बोर सुत पिथ्थ हुए, ठौर ठौर ऊपजि बलिय । 
विधि बिधि विनान अवलोकि गति, अबर सुर आये मिलिय ॥ छ० श८३ ।* 
इस प्रकार अपने पापों का प्रायश्चित कर अपनी आत्मा का उद्धार करके उसने 
पुनः इस पृथ्वी पर जन्म ग्रहण क्रिया तथा कवि चन्द बरदायी ने उसका छंदों में वृतान्त 
देन क्िया-- 
इस आतम उद्धार करि, जनम लिया भूम आय । 
सो यूतांत कवि चन्द फहि, वरग्यो कवित्त बनाय ॥ छ० ४८८ ।* 
दानव ढुंठा की कया का अन्त यहीं नहीं होता है । 'पृथ्वीराज रासो समय र२' के 


१. प्रस्वोरान रासों, ना० प्र० स० काशी, 58० ५५२-५३, स० १। 
२. यही, छं० ५५४-६८, स० १। 

३. यही, छ० ४५६९-७४, स० १। 

डे. घही, छ० ५७५, छ० ११ 

५६. यहों, छं० ५७६, स० १) 

६. बहीं, छं० शघ२-८३, स० १। 

७. यही, छं> प्रष८प, स० १॥ 


[ -पंडेड: | 


अन्तगंत हम फिर ढूंढा की कथा का वर्णन पढ़ते हैं। इसना ही नहीं उसमे म 
उसकी वहुन ढुंढिका का भी विवरण प्रस्तुत किया है । कया इस कार है । होली 
देखकर महाराज पृथ्वीराज ने कवि चन्द वरदायी से पृष्ठा कि होती का पर्व अयों बनाया 
जाता है--इस पर कवि ने उत्तर दिया “चौहान कुल में हुंदा नाम हा दानव मा, उनत 
छोटी बहन का नाम दुंडिका था, जिसके यौवन काल में ही खुखों की सन्धया को दरयों थो ।' 
ढुंडा वनारस गया तथा वहाँ पर वर्षो से मिसन्‍तर तप्स्या कर रहा है, यह मनगार दे हित ही 
भाई की सहायतार्थ पहुंची ।' ढुंढा दानव ने अपने घरीर को अग्नि में फम हर दिया, हिममे 


पृथ्वीराज चीहान तथा अन्य यूरमा उत्पन्न हुये ।' किन्तु दुहिका वहाँ सो दर्ष हु बंटी सर. 


केवल वायु का सेवन करते हुये उसने तपस्या की, उसी का बहास्त सुनो । उमझो लगन 
ओर तपस्या से प्रसन्‍न होकर पादंती ने उससे वर मांगने के लिये कहा ४ दडिका से बढ़ा णि 
मु यह वरदान दीजिये कि में बालक, युवा एवं वृद्ध सबको भनक्तनथ कर सब । था मुदग॒र 


पार्वती जी स्तम्भित रह गयीं तथा उन्होंने शिवजी में जाकर कटा छि ऐसा उपाय शवाएएे 
कि ढुंढडिका को वर तो मिल जाय परन्तु वह मनुप्य भक्षण न बार सहे + घगदान साशुनाप 
ने कहा कि उससे कह दो कि जो बिह्ुल तथा व्याकुल करने वाली वाधों में असरों ही भाव 
अनन्त प्रकार के शब्द करे उन्हें छोड़कर सबका अस्त कर सकती है। दृधर भगवान शिय ने 
पवन को आज्ञा दी कि पृथ्वी पर यह समाचार फला दो कि लोग फाह्युन मास में तीन |: 

तक विचित्र रग-ढंग कर लें, गदहों पर चढ़-चढ़कृर हुंसें, सिर पर सूप रेप, समृह दसाजर 
गलतियों में प्रमण करें तथा हो-हो शब्द फा उच्चारण करके शोर मचायें ' टृड्चिशा राहिसों 
ने आकर देखा कि लोग पागलों की भाँति गदहों पर घढ़ें हुये हो-हों शब्य बार रहे है, लाखोल 
बात कर रहे हैं, सिन्धूराग वजाते हुये 'नवला' गीत गा रहे है। होनो करके हान्हा हरते 
हुये वे विपरीत आचरण कर रहे हैं घर-घर में ज्ञाग जना रखी है, थे घर भौर ड्घपट 
रहे हैं तथा नाचते गाते हुये परस्पर काँख दिखाते हैं। फात्युन माल में बायु में एस प्रदार 
का भाव पैदा कर दिया, लाज तो चलो गयी किन्तु बिप्न भी दल गया । एस प्ररार छा 


>जज जज ल्‍ न क्‍ न्‍ हि रात 


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१. प्रृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणों सभा काशी, छं० ५ सन्‍ २२४ 
२. वही, छं० ६, स० २२॥ 

३. वही, छ० ७, स० २२। 

४.  बही, छ॑ं० ८, स० २२॥ 

भू, वही, छ० ९, स० २२ । 

६.  घही. छं० १०, स० २२। 

७. यही, छं० ११, स० २२ । 

८घ... पही, छं० १३, स० २२॥ 

९. वही, छं० १४-१५, स० २२। 

१०. वही, छं० १६-२०, स० २२॥ 


[ परेड ] 


ह_ई विपत्ति दूर हुई । सबके हृद्य का हन्द्र नप्ट हो गया, चैत्र का महीना जाया तथा घर-घर 
में आनन्द छा गया +' जाड़ा बीतने तया बचत आगमन पर लोग होलिका पर्व की पूजा तथा 
तुटिका राक्षिसी की स्तुति गान करते है-- 


गतेनु पार समये, बसंते चर समागमे ॥ 
होलिका प्रब्व पुज्यन्ते, दुढा देवी नमोस्तुते ॥ छं० २२।" 
इसी प्रकार की कया का विवरण भविष्य पुराण में भी देखने को मिलता है । पृथ्वीराज 
के ममान ही, इसमें युधिप्ठिर ने श्रीकृष्ण भगवान से होलिकोत्सव के विपय में जानने फी 
जिप्तासा प्रकट की । कृष्ण भगवान ने उत्तर दिया कि कृतयुग में महाराज रघु से पुरवासियों 
द्वारा बालकों को नाना प्रकार के कष्ट देने वाली ढोढी राक्षसी के उपद्रवः सुनकर गुरू वशिष्ट 
ने उमके बारे में पूछा था जिसके उत्तर में उन्होंने ढुढी की कथा कही थी।* 
काशी के विश्वनाथ पंचायम्‌ के होलिका दाह प्रकरण के अन्तर्गत भी ढूंढा राक्षसी का 
उल्लेघ हुमा है ।* 
कहने की आवश्यकता नहीं कि दुंढिका की कथा का विवरण किसी क्षेपककर्त्ता की कृपा 
का फन्त है। सम्मवत्त: क्षेपककर्त्ता को दुंढिका की कथा विदित रही होगी, उसी ने ढुंढा दानव 
हे: नाम सादृष्य पर हुंडिका को उसकी कथा में जोड़ दिया तथा ढंंढिका को उसकी बहन 
लिख दिया है । वीसलदेव के कोई वहन थी, ऐसा उल्लेख रासोकार ने कहीं नही किया है । 
बीसलदेव का उपर्युक्त विवरण प्रायः रासो की सभी संस्करणों में कम या अधिक मात्रा में 
प्राप्त हो जाता है । दुंढिका की कथा केवल बृहत रूपान्तर में ही देखने को मिलती है । 


पडित सदाशिव दीक्षित वीसलदेव को प्रामाणिक सिद्ध करने की चेष्टा करते हुये 
लिखते है--पृथ्वोराज विजय के अतिरिक्त समुपलब्ध सभी भाधारों से इसका नाम वीसल 
प्रतीत होता है, विग्रहराज नहीं । केवल जयानक ही इसे विग्नहराज (तृतीय) इस नाम से 
मवोधित करते हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से वीसल उपाख्यान अध्ययन करने के अनन्तर 
अनेक समीक्षकों का अनुमान है कि कदाचित्‌ इसका नाम विग्रहराज रहा हो, परन्तु अपने 
दुगायरणों के कारण इसमें वोसलदेव इस साम से सयाति पाई हो | प्रयोग शुद्ध, अत्याचारी 
शासक, धर्म नाशक, धरती घमक आदि के लिये किया जाता है । ,[वृ्ष धर्म लाति गृहलाति 
इति यपतल्त:, अयवा यृप॑ धर्म जुनाति छिनत्ति इति घपल: ।]" 





प्‌. एृग्यीराज रासो, नागरी प्रचारियों समा काशों, छ० २१, स० २२ । 
२. बही, छं० २२, स० २२। 

३, नविध्य पुराण, १३-३०, प्र० १३२॥ 

४... पिदयनाय पंचागम, होलिका दाह प्रकरण, १॥ 

५. दुं० सदाधिव दीक्षित, रासों समीक्षा, ए० ११९-१२० । 


[ १३५ ै 


डॉ० दशरथ शर्मा भी वीसल को कामस्ध एवं मदाग्ध देखशर उसको विश्नाराह माने 
हुये लिखते हैं कि---“उसका (धर्माघिराज) का पुत्र विश्नहराद तृतीय बास्तद मे गा्मी एड 
मदान्ध था । सम्बत्‌ १३४० से पूर्व रखित चघौहानों की बंशावली में भी उसे रही सग्पट 
बताया गग्मा है ।' प्रचन्धकोप के अन्त में दी हुई वंधावली के माधार पर श्री मदाशिय 
वीसलदेव के विपय में लिखते हैं कि--- 'इस विग्रहराज तृतीय में मालवाधीय उठ्यादिरउ श) 
समुन्नति की साधना के लिये अपने पूर्व वैर फो बिसार कर सारंग मामक क्षपना छठ ८ 
डाला था, जिसकी समुपलब्धि से उसने (मालवाधीश ने) गुजरात पर विजय पाई धो-« 
इसका उल्लेख पृथ्वीराज विजय के पचम सर्ग में स्पप्ट रूप से पाया जाता है+-- 
सालवेनोदयादित्येनास्मादेवाप्पतोन्नति: । 
सन्दाकिनीहृदादेव छेसे प्रणमब्धिना ॥७६॥ 
सारद्धए्य तरज्भू स ददो प्रस्म मनोमपम्‌ ॥ 
नहा च्ये: श्रदसं क्षीरत्तिग्घोरन्य; प्रयच्छति ॥७3॥। 
जिगाय ग्रुजर कर्ण तमब्य॑ प्राप्त माल्य:। 
लब्धानूस: सूररथ फरोति ध्योमलघनम्‌ ॥ 


घवीसलदेव के इस कृत्य से किसी ग्रूढाधिसन्धि का, किसी दर्भावना शा लोर रामोररर 
फे शब्दों में इसकी कामुकता का परिचय मिलता है । 
जग दुष्प घोर चीसल नरिंद, बहु पाप रत्त दरान अंप। 
फामंघ अंध सुज्यो न फाल, हुक अहूफ जोरि गिरि एबरुमास । 
धनसदन सदन भरि सब्ब जन्म, तिहि परत उद्विढ़ फ्िल्या फर्म । 
पृथ्वीराज विजयकार ने विग्रहराज तृतीय को भोगीरद्र-इस विशेषद से दिश्लूपिल बर 
उसकी कामुकता को अभिव्यक्ति जिस विशेषण से प्रदपित फो है वह वियेचनीय है+- 
'तस्य विप्रहराजित भोगीरदे णानुजन्मना ४ 
राप्तोकार के 'कामान्ध' इस पद से जिस चरित का आमास मिलता |, भोगोलड एच * 
वैसी ही अभिव्यंजना होती है। 'वीसलदेव' उपादयान कामास्ध भर भोगीर इस इश मे 
पूर्णतया परिपुष्ट हो जाता है ॥ 
अन्यन्न पंडित जी ने-वीसलदेव का ही नाम विग्रहराज होने हे हर्मा में इस इशाद लियः 
है--'प्रवन्ध सिन्तामणि में लिखा है कि एक बार अजमेर छासक पा एवं छामारय री डमार 


> नि 2०202: 2 इक कप के परम क 022 
पाल भूपाल की सभा में पहुंचा । राजा ने उससे पूछा कि आपके रदासी हुफल मे ह7। 





१. डॉ० दशरथ दार्मा, पृथ्वीराज रासो की दायाओं एग ऐठिटरासिश जाएगा, ६० ४ 
राजस्थानी, भाग हे, जंफ ३े जनवरो, १९४०, कत्शत्ता। 
२. पं० सदाशिव दोक्षित, रातो समीक्षा, पू० १२०-६२१५ 


[ १३६ 3) 


इस पर उसने उत्तर दिया कि 'विश्व के ग्रहण करने के कारण जिसका नाम विश्वल (वीसल) 
पट़ गया हो, उसके विजय में संदेह करना व्यर्थ है ।! इस पर राजा के कपर्दी मंत्री ने कहा कि 
तुम मूल करते हो, गमनायंक श्रव्य अबवा श्रल धातु से इसकी निष्पत्ति हुई है। अतः पक्षी 
: समान फूदकने वाले पुरय का नाम विश्वल (वीसल ) है ।” इस प्रकार अपने नाम में दोप 
देखकर राजा ने पटितों को सम्मति से अपना नाम विग्रहराज रखा। दूसरे वर्ष जब भरी 
फूमारपाल के सम्मुख यह नाम बतलाया गया तो कपर्दी मंत्री ने फिर कहा कि “विग्रहराज का 
पद को निष्पत्ति दो पदों से हुई है विश्र और हराज, जिससे इसका अर्थ होता है जिसने हर 
(रद्र) जौर अज (नारायण) को नासिकारहित कर डाला हो ।” इस पर राजा ने अपना नाम 
कवि वान्धव रखा ।/! 

जहाँ एक ओर पंडित सदाशिव, दीक्षित डॉ० दशरथ शर्मा आदि वीसलदेव को प्रमाणिक 
व्यविन्न सिद्ध करने में भगीरथ प्रयत्न कर रहे हैं, वर्हा दूसरी ओर रायवहादुर गौरीशकर ही राचम्द 
बोझ जैसे व्यक्ति वीसलदेव को पूर्णह्पेण अरनेतिहासिक तथा उससे सम्बन्धित समस्त घटनाओं 
को काल्यनिक मानते हैं | उन्होंने एक स्थान पर लिखा है कि “पृथ्वीराज रासो में वीसलदेव 
की गही नशीनी फा संवत्‌ ८२१ दिया है और लिखा है कि उसने शन्रुओं से अजमेर लिया 
ओर उसके बुलाने पर बीसल सरोवर (वीसलिया नाम का तालाब, अजमेर में) पर अन्य 
राजा तो भा गये, परन्तु गुजरात के चालुक्य राजा वालुकाराय के न आने के कारण वीसल- 
देव ने उसकी राजघानी पाटन पर चढ़ाई दी। बालुकाराय के मंत्रियों ने उससे मिलकर 
संधि कर ली । 

यह सम्पूर्ण कघन भी निराघार है। अजमेर बसने के बाद वीसलदेव नाम का एक ही 
चौहान राजा (सोमेम्वर का बड़ा भाई) हुआ, जिसने अपने नाम से वीसलसर तालाब 
बनवाया बोर उसके समय के शिलालेख वि० १२१०, १२११ और १२२० के मिले हैं (संवत्‌ 
१२१० मार्ग शुदी ५ आदित्य दिने श्रवण नक्षत्र मकरस्थे चन्द्र हर्पणयोगे वालवकरणं हर 
केलि-नाटक समाप्त ॥ मंगल महाश्री: ॥ कृतिरियं महाराजाधिराज परमेश्वर श्री थिग्रहराज- 
देवस्य'***** (शिलाओं पर खुदा हुआ हरकेलि नाटक, राजापूताना म्यूजियम, भजमेर में 
मुरक्षित ) । 

(ऊं॥ संवत्‌ १२९१ श्री: (श्री) परमपासु (शु) वताचायेन ( ण ) विश्वेश्वर (प्र) 
शेन श्री वीमलदेव राज्ये श्री सिह प्वर प्रासादे मण्डपं (भूषितं)। (लोहारी के मंदिर का 
लेख, अप्रकाशित ) । 

(ऊं॥संकत्‌, १२२० बैशाख शुति १५ शांकम्भरी भूपति श्री मदनल देवात्मण श्री 
सद्धीमतदेवस्यं !! (टंडियन ऐटिवेरी जिल्द १५ पृ० २१८) । 

जिनमें वि० सं० ८5२१ अर्थात्‌ पंदुचा जी के अनद संवत्‌ के अनुसार वि० सं० ९३१ में 


६. पं० रूदादिव दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० १२२ । 


[ १३७ ] 


उसका राज्याभिपेक होना किसी प्रकार नहीं माना जा सकता । इसी पांदया ही ई मापे +४ 
संवत्‌ तक पाटन में सोलंकियों का अधिकार भी नहीं हुआ घा। उस समय तो हेमरार 
चावड़ा गुजरात का राजा था | वि० सं० १०१७ में सोलंकी मूलराज ने कपने मामा गामसत- 
सिंह को मारकर पाटन का राज्य लिया कर चावट्रा बंध क्री समाप्ति ही । दासमशाराम नाम 
का सोलंकी राजा गुजरात में कोई हुआ नहीं । ड 


विग्रहराज (बीसलदेव) नाम के चार घौहान राजा हुये, जिनमें में तीस को सर मेर 
बसने से पूर्व हुये थे । दूसरे विग्रहराज ने, जिसके समय की घि० सं० १०३० शी हर दंनाट 
मन्दिर की प्रशस्ति है, मूलराज सोलंकी पर जिसने १०१७ में १०५४२ तह राज्य शिया था 
(राजपूताने का इतिहास, जिल्द १, पु० २१४-१५) शाकंभरी (सांभर) में चद्राई पोणों। 
इस चढ़ाई का वर्णन पृथ्वीराज विजय, हम्मीर महाकाव्य और प्रवन्ध विन्तापपि में मिलदा 
है, परन्तु पृथ्वीराज रासो के कर्ता को तो केवल एक बीसलदेव का शान पा जिसमे बौसहर 
बनाया था । वह मूलतः चतुर्थ वीसलदेव था । वीसलदेव (दूसरे) की सोलशी राजा प्रलगाण 
पर चढ़ाई करने की परम्परागत स्मृति से रासो के कर्ता में चीपे बीसलदेय वी मुएराद पर 
चढ़ाई लिख दी और वहाँ के राजा का ठीक नाम ज्ञात न होने से उसवा नाम दाधुशाराय 
घर दिया ।/! 


रासो के 'वीसलदेव” में सत्यता का अंश कितना भी ही डिन्‍्तु यह निवियाद सरय है हि 
वीसलदेव ऐतिहासिक पात्र है। वास्तविफता यह है कि वत्तमान रासो में घटृत छपिक ऐएर 
होने के कारण मूल कथा का बत्तित्व विलीन प्रायः हो गया है। सम्भवतः मूल राशो मे 
इस प्रकार की बहुत-सी बनर्गल बातें न रही होंगी । जब तक रासो थे; समस्सय सरशरणों शो 
लेकर उनका वैज्ञानिक रूप से सम्पादन प्रस्तुत नहीं किया जाता त्व तझ रासो दिदाई पा 
विपय ही बना रहेगा । कोई भी विद्वान मटवाल भिड्टाने के मतिरिक्त कर हो स्या सश्ता हैं 


वर्रासह-' पृथ्वी राज रासो' के अनुसार राजा संकाविट्टार के उपरान्त खोटान यंशाश्पी 
में ११वीं पीढ़ी में राजा वैरसिंह हुये ।” रात्तोकार ने केवल इनके दाम था हो उस्लेय शिया 
है । रा० ए० सो० लन्दन की रासो की प्रति भी उपयु बत कपन की पुष्टि परतो है । पारणेए 
की प्रति तथा साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो इनके विषय में मौन है। एिलाहिए 
एवं संस्कृत ग्रन्थों में दिये हुये 'चन्द' नाम को ही पंडित सदाशिव दीक्षित बेरशिर मारे ह- 


श् 


उन्होंने लिखा है कि--'शिलालेस में ये श्री चन्द एस सकेत से सम्दोणित डिये नये हैं शोर 





१. मभ० म० गौरोशंकर हीराचन्द मोघा; प्रृथ्दीराज रासो एो निर्माए शार, पुर ५६-४१ 
कोशोत्सव स्मारफ संग्रह, नागरी प्रचारिणों समा फाशी, सं० १६८४५ । 


२. प्रृथ्वीराज रासो, ना० प्र० स० काशी, छं० २८६, सर ११ 
३, रासो फी हस्पलिप्ित एवं अप्रकाशित भ्रति, प्‌ १०। 


४] 


पुरवीराज विजय, प्रवन्धकोप और हम्मीर महाकाव्य में चन्द्रराव इस नाम से । सुर्जनचरित में 


में च 
इदशा नामान्तर सामन्दसिह दिया गया है और रासो में वरसिह |” 


पता नहीं पंडित जी ने यह सब कल्पना किस आधार पर कर ली । सामग्री अभाव के 
छारण वैरसिह की प्रामाणिकता एवं ऐतिहासिकता के विपय में कुछ भी लिखना अत्यन्त 
कठिन है । 

संकाधिठार--- पृथ्वी राज रासो' के अनुसार राजा उद्दारहार के उपरान्त चौहान वंशा- 
वली में १०वीं पीढ़ी में राजा संकाविडार हुये ।' ग्रन्यक्रार ने इनका नाम वंशावली में गिना 
दिया है, इनका सतिरिषत कुछ भी विवरण प्राप्त नहीं होता । रा० ए० सो० लन्दन की 
प्रांत उपयुक्त कथन को पुष्टि करती है ।' घारणाज को प्रत्ति तथा साहित्य धत्चान उदयपुर 
से प्रकाशित पृथ्वीराज रासा इतके विपय में कुछ भी उल्लेख नहीं करता । शिलालेख एवं 
समस्त प्राचीन सस्कृत के ग्रस्य भी इनके विपय में मौन है ।" सकाविडार को पंडित सदाशिव 
दीक्षित राजा विन्दसार का विशेषण मात्र मानते हैं ।" 


ऐसं। स्थिति तथा स्रामग्रो अमाव में कुछ भी विश्वासपू्वक कहना कठिन है | अत: इन्हें 
ऐसी ही स्थिति में छोड़कर, विवश होकर रातोष करना पड़ता है । 


संप्रामसिह--पृध्वी राज रासो! के अनुसार चौहान वश परम्परा की १७वीं पीढ़ी में 
राजा महपिह के उपरान्त राजा संग्रामसिह चौहान उनके उत्तराधिकारी हुये ।" कवि ने इनका 
नाम वेशन्युक्ष का उल्लेख करते हुये ही किया है, अन्य स्थानों पर कवि सर्वेथा मौन है । 
रा० ए० सो० लब्दन की श्रति के अनुसार संग्रामसिह महसिह का पुत्र था तथा इनके उपरान्त 
रॉजगही पर बेठा । संक्षेप में उपयुक्त कथन की पुष्टि रासो की उक्त प्रति से हो जाती 
है ।' घारणोज की प्रति तथा साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित 'रासो/ इनके विपय 
में मौन है । 


पं० सदाशिव दीक्षित इन्हें काल्पनिक व्यक्ति मानते हैँ | इनके विपय में उन्होंने लिखा है 
कि शथीओतला जी ने अपनी तालिका में एक और 'पंग्राम' नाम की कल्पना की है जो कि 
रासो के परिशीलन करने पर अनर्गल प्रत्तीत होता है । रासो में लिखा है-- 


१. १० सदाक्षिव दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० ११३ ॥ 

२, प्ृश्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणी समा फाशी, छं० २८५, सं० १। 
३. राप्तों को हस्तलिखित एवं अप्रकाशित प्रति, पृ० १०१॥ 

४. देधिए, प्रस्तुत शोध प्रवन्य, परिद्िष्ट नाग । 

५. पं० धदादिद दीक्षित, रासों समीक्षा, पृ० ११३ ॥ 

६. प्ग्वोराज रासो, नागरो प्रचारिणों सना काशी, छ॑० २८७, स० १॥ 
है 


गासों को हसलिखित एवं अप्रक्ाशित प्रति पु० १०१) 


[ १३९६ ] 


जुध इप्ट सुवबन ता सहस मयथ। 
मसहिसिघध सिंध संग्राम पयुव ॥7* 


संग्रामसिह की पुष्टि शिलालेखों एवं संस्कृत के प्राचीन ब्रन्पों से भो नहीं होदी । सभद 
है यह बनेतिहासिक व्यक्ति हो तथा भाटों की कल्पना बग फल हो । 


... सम्प्रतिराय-पृथ्वीराज रासो' के बनुसार चौहान वंश परम्परा में स्स्यों दीदी भे 
राजा सेनराय अथवा सेनराज के उपरान्त उनका पुत्र सम्प्रतिराय राज्य शा उतराधिशाश 
हुआ ।' कवि ने इनके विपय में अन्य कोई उल्लेखनीय घटना छा विवरप प्रस्युत मी शिया 
है। रा० ए० सो० लन्दन की रासो की प्रति उपयुक्य कपन की पूष्टि झरती है ।' भ्राशणोए 
की प्रति, बीकानेर की एकल अक्षर वाली प्रति एवं साहित्य संसघान उदयपुर मे प्रशातीत 
रासो में इनका उल्लेख नहीं हुआ है । धिलालेख एवं संरक्ृत प्रग्प भी इसईे। विधय से शो 
सूचना प्रस्तुत नहीं करते हैं । 


पंडित सदाशिव एक स्थान पर इनके विषय में लिखते है शि---“एनशा साम प्रशहित 
में वाकपतिराज, शिलालेख में वष्पयराज' पृथ्वीराज विजय में वाक्पत्ति' प्रयग्प शोप से 
वत्सराज' हम्मीर महाकाव्य में 'वप्रराज' सु्जंन चरित में 'विश्वपति' तपा रासो में |मम्पि- 
राज' कहा गया है। इसने तन्प्रपाल का पराभव कर सांभर से दिघ्यांदल सबः ऋपना शा 
कार जमा लिया था ।* वि० ८५७ से १०५७ के बीच समुत्पन्न सम्पूर्ण घाह्मान राशओों में 
यह श्रेष्ठ माना जाता है| परन्तु यह जाश्चयं की वात है कि एतने प्रसिद्ध राडा पा नाम भी 
प्रत्येक ग्रन्थकार ने भिन्‍न-भिन्‍न रूप से दिया है । कुछ थोगों ने रासो में डल्तिग्रि साधिइर- 
राय से इसके एकीकरण का प्रयास किया है, परन्तु प्रमापाभाव से इस मत दी उपापेयण 
मिस्सार प्रतौत होती है । पांच पीढ़ी पूर्व समुत्पन्न माघिदयराय से सम्पत्तिराड शा एरशरण 
असम्भवित है। जो हो, इसमें सन्देह नहीं कि वावपति के कानिप्ठ पृष सध्मण ने दिल छ# 
१००० में नाडूल में इसी कुल की एक स्व॒तन्त्र शाखा स्पापित की । सिरोही राम्य हे बदघार 
राजा अपने को इसो शाखा फे वंशज मानते हैं ।'* 


पता नहीं पंडित जो ने वाक्वतिराज, वष्पयराज, बावयति, यत्सरःड, पप्रराज, दिभ्वर्शीर 
आदि नामों के साथ सम्प्रतिराय का एकीकरण कंस कर लिया । बह्यना परे छाष्टरादित हरे 





पं० सदाशिद दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० १६४॥। 

देखिए, प्रस्तुत शोध प्रबन्ध, परिध्चिप्द नाग ॥ 

पृथ्वी राज रासो, नागरी प्रचारिषी समा फाशी, छं० २८८, पर ६९॥ 
रासो की हस्तलिसित एवं लप्रकाशित प्रति, प० १० । 

देखिए, प्रस्तुत शोध प्रबन्ध, परिशिप्ट भाग । 

पं० सदाशिव दोक्षित, रात्ो समीक्षा, पृू० ११५४-१६ ॥ 


ही टन हु १० ४० ५० 


[ १४० ]] 


के: फारण उनका मत अधिक ग्राह्म नहीं है। सामग्रो अमाव के कारण इस विपय में निश्चित 
मत प्रस्तुत करना अत्यन्त कठित है । 


सामन्तदेव-कवि चन्द्र वरदायी के मतानुसार चाहुवान जी के उपरान्त उनके वंश में 
सामन्तदेय नाम का राजा हुआ ।” कवि ने वंशावली का उल्लेख करते हुये इनका नाम मात्र 
या विवरण प्रस्तुत किया है। रा० ए० सो० लन्दन वाली रासो की प्रति में भी इनके नाम 
का समर्थन किया है, किन्तु साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित 'रासो' में तथा घारणोज 
की प्रति में इनका उल्लेख प्राप्त नहीं होता है | किन्तु शिलालेख, पृथ्वीराज विजय महाकाव्य 
तया प्रचन्धकोप में इनका नाम रासों के समान ही मिलता है । अन्तर केदक इतना है कि 
पृथ्त्रीराज विजय में इनका नाम सामनन्‍्त राय है तथा रासो में इनका नाम सामन्तदेव । 
विजीलियाँ के शिलालेस में लिखा है कि-- 


विप्र श्रीवत्सगोत्रेइमृद हिच्ठश्रपुरे पुरा । 
सामन्तोषध्नन्तसामन्तपूर्णतत्ली नृपंस्ततः ५ १२ ॥॥ 


पं० सदाशिव दीक्षित ने एक स्थान पर उपयु'क्य श्लोक का अर्थ स्पष्ट करते हुये तथा 
पामन्तदेव का अस्तित्व स्वीकार करते हुये इस प्रकार लिखा है--''इस साधारण श्लोक के 
अर्थ करने में अनेक पुरातत्ववेत्ताओं ने अपनी प्रतिभा का अपव्यय किया है । कोई विश्र को 
थिप्र मानकर साम्त को ब्राह्मण सिद्ध करने का भगीरथ प्रयास करता है, भौर कोई पूर्णतल्ल 
फो विशेषण मानकर उसे सामन्‍्त का सुत सिद्ध करने का द्रविड़ प्राणायाम करता है। वस्तुत्त: 
इस एलोक का सीधा-सादा अर्थ यह है कि “पूर्व काल में श्रो वत्स नामक ब्राह्मण के गोत्र में 
अनन्त सामन्तों से पारिवुत्त सामन्‍्त नामक एक राजा भहिच्छत्न पुरी में हुआ था। अनेक 
बातों पर विचार करने से यह प्रतीत होता है कि मुसलमानों के आक्रमण का प्रतिकार करने 
ओर आय॑ संस्कृति की रक्षा करने में वाप्पारावल के समान ही तत्कालिक सामन्त के उत्कप 
की कथाएँ किससे अपरिचित है । रासोकार ने 'अरिनेंह मंत जित्तो जुरेव से इसका सकेत कर 
दिया है । इसका शासन, काल वि० ८०७-८३४ के लगभग बतलाया जाता है । ऐसे इतिहास 
प्रसिद्ध व्यक्ति का उल्लेख न करके हम्मीर महाकाब्य तथा सुजंन चरित के प्रणेताओं ने अपनी 
इनिहासानभिन्षता प्रकट कर दी है ।/' 


सारंगदेय-- १ व्वीराज रासो' के अनुसार चौहान वंश परम्परा में ३७वीं पीढ़ी में राजा 
बोससदेव चोहान के एफ मात्र पुत्र सारंगदेव पैदा हुआ | राजकुमार सारंगदेव का जन्म राजा 
वीसलदेद की परम प्रिया पटरानी परिहारनी के गर्म से हुआ था किन्तु दुर्भाग्यवश इन्हें मा 
है, पृथ्वीराज रासो, नागरी अ्चारिणी समा काझी, छं० २८४८, स० १। 
२. १० मदाप्षिद्र दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० १११६ मोतीलाल बनारसीदास, संस्कृत 
पुःतराक्य पो- यो नें० ७४, नैपाली एवपडा, वाराणसी । 


[ १४१ ] 


का प्यार न मिल सका | इनका लालन-पालन एक वणिक्क र्रो ने किणा । < ्द् + 
के एक गौरी नाम की कन्या थी । राजकुमार सारंगदेव ठथा गोरी एर रुथा ्ः 


दर छू साफ 
एक ही स्थान पर बड़े हुये थे । सारंगदेव नी वर्ष तक कन्या गोरी के साथ सो रहिए 
उपारान्त राजा वीसलदेव ने उस कन्या का विवाह कर दिया । विवाहोपरान्स ए 
का पत्ति बन में गया, जहाँ पर उसकी हत्या एक सिह ने कर दौ--- 
पट रागमिनि परिहार, पग्रन्म सारंग उपसन्तों । 
पुत्र होत भइई मृत्य, बाल बानिका फी दिस्नोँ।ा 
ता वानिक नंदिनिय, नाम गोरो सारंग सने। 
हृपषफ थान पय पान, इक्क सिज्या इक आसन ॥ 
नथ बरस लगिग फन्‍्या रहो, व्याह्‌ राज घोसल कढियों । 
विवाह हुये वर वन गयो, तहां सिघ घर विनसयों ॥ छ० ३४७॥* 
राजकुमार सारगदेव अपने बहनोई (घा-बाहन के पति) की शेर द्वारा उह्या मुदेझर 
विरवित से भर उठे तथा बौद्ध-धर्म ग्रहण कर अस्प्र-्शस्प्रों का परित्याग रार दिया | उब मे 
सूचना राजा वीसलदेव (विग्रहराज) ने चुनी तो अत्यन्त दुः्यों हृये-- 
भमति दुचित भयो सारंगदेव ॥ नित प्रति फरं मरहत सेय ॥ 
बुध ध्रम्म लिया बंध न तेग | सुनि क्षयन राज मन मो उदेग ॥ ३४८ ३॥ 


ल्श्डु 


राजा वीसल देव ने राजकुमार को बुलाकर सम्मान बिया तथा पूष्ठाशि हुमद ४ 
धर्म क्यों ग्रहण कर लिया | तुम अपने मन फी शर्म को छोट़ू फर दततलालो, बया दणिश पृ" 
के लिए ही तुमने यह धर्म ग्रहण किया है। बौद्ध घर्म का ज्ञान, नप्द शान है, इसे संदेश शर 
से भी दोष होता है। यह पुरुपत्व का परण्डन करने बाला तथा छीति ढो हानि परुचाद 
वाला है| तुमने राजवंश में जन्म लिया है, तुम राजाओं मे साप दुर्गंम बसों में मुझ मा 
मामन्द लो | बौद्ध धर्म के ग्रन्थों की शिक्षा का परित्याग कर दो तथा रामापण जौर मा 
भारत को श्रवण करो, तथा चारों प्रकार के राज कार्यो को फरो-- 


जड़ 


बुल्लाइ कुआअर सनमान फीन । किहि राज तुम्म यह ध्रम्म छोन ॥॥ 

तुम छंडि सरम हम कहो घत्त । वानिकक पुत्र हन ते इचिसावा एं० ४५% । 
«. इह नष्ट ग्यान सुनियें न कान । पुस्पातन भण्जे कित्ति हासन ॥ा 

तुम राजवंश राजनहू संग। मृगया सर ऐली दम इरग ॥ छ० 5४११ 

परमोष तजो बोधक पुरान। रामाइन सुन भारप निदान । 

अभिसान दान रिन सरन ध्रम्म । चारपों प्रषार सुमि राहप्र्म॥ ह० १४६३ 





१. पृथ्वीराज रासो, नागरों प्रघारिषो त्तमा फाशोी, छं० ३४७, हर ६) 
२. पघही, छं० रे४ं८घ, स० १॥ 
३. वही, छं० ३५०-३५२, त० १॥। 


[ (४२ ] 


राजा बीसलदेव ने उप्ुक्त उपदेश देकर राजकुमार सारंगदेव का चित्त बौद्ध धर्म की 


भोर से फिराकर तत्कात दान कादि देकर उसे अस्त्-शधस्थ घारण करने को दिए तथा राज- 
धर्म का अनुसरण करने के लिए साम्मर प्रदेश का शासक नियुवत करके भेज दिया- 


परमोध मानि राजन कुमार | ततकाल मंगि बंधे हयूयार । 
भय प्रसन राज फौनी पसाव। संसरि रजघानी करहु जाव।। छं० ३४३ ॥।' 


कालान्तर में राजा वीसलदेव, वणिक पुत्री गोरी के शापवश दानव होकर अजमेर के 
बनों में विचरण करते हुए मनुष्यों का भक्षण करने लगे । राजा सारंगदेव ने जब अपने पिता 
फी ऐसी अवस्था का वर्णन सुना तो उन्होंने अपनी रानी को रणयम्भ भेज कर स्वयं पिता से 
युद्ध करने का निश्चय किया-- 


सुनिय बात तो तात तब। हों .पठई रिन थंन। 
मंचि वह्धि तिन तेग वरू। जुद्ध जुरन आंरम्म ॥ छं० ५१२॥' 


राजा सारंगदेव चौहान ने एक सहस्त्र श्रेष्ठ योद्धालों को अपने साथ लेकर अजमेर दुर्ग 
को घेर लिया-- 
एक सहस सरि सयूथकरि। सवल सकर दिय फेरि। 
दे निसान चहुवान चढ़ि। पहुंचिय गढ़ अजमेर ॥ छं० ५१४ ॥' 


राजा सारंगदेव तीन दिन तक दानव (वीसलदेव ) ढुंढा की प्रतीक्षा करता रहा, किन्तु 
साक्षात्कार न हो सका । अजमेर की अस्त-त्यस्त दशा देखकर राजा सारंगदेव को अत्यन्त 
फप्ट हुआ तथा उनको आँखों में माँसू भा गये। अन्त में उन्होंने अजमेर को पुनः बसाने का 
निर्णय किया-- 


म्रति उद्यान सवदयान। भये मढ़ घाम भयानक ॥ 
दिप्ट  देखि सारंग। देव चिते तब वानिक॥ 
| ताफे कुछ उपनोय । तपनि हम को कुब पोयो | 
तात प्रुकारे नीर। भरे नैननन्‍्ह घन रोयौ॥॥ 
दिन तीन रहत हुआ फोट सधि | असुर नयन दिव्यो नहिय॑। 
तव सुचित नए सारंगदे। पुरी वचसालौ इह कहिय ॥ छं० ५१५ ।' 


पृस्थोराज रासो, नागरी प्रचारिणी समा, कापन्नी, छं०३४३, स० ११ 
२. यही, छ० ५१२, स० १॥। 
३. यही, छं० ५१९४, स॒० है । 
४. यहां, छ० ४१४, स० ११ 


[ १४३ ] 


प्रातः:काल ही दानव ढूंढा (वीसलदेव ) ने नगरी में प्रवेश किया । राजा सारंमदेद 


गंदद है| समझगरल 
सेना दानव को मारने के लिये अग्रसर हुई । इधर योद्धायण तलवार दा प्रहार गग रहे पे, 
उधर वह दानव उन्हें अपने मुह द्वारा समाप्त कर रहा घा। डिस प्रकार में शोई शह्इर 
वाटिका को उजाड़ कर देता है, उसी प्रकार देखते ही देयते दानय दुंद्ा ने मेना की हास- 
नहस कर दिया । अन्त में पिता-पुत्र का विकट संग्राम हुआ जिसमें सारंग्ररेव परामय के 
प्राप्त हुआ--- 
एक दसमी दिवस । प्रात दानय पुर आयो। 
सकल सेन रू सस्त्र । उटिठ लरियें फो घधायो॥ 
वे बाहे तरवारि। हहे मुपष पकरि सु फटट। 
ज्यों वेली द्रम सघम | देषि मरफट फेर चुट्ट ॥ 
किय पिता पुत्त जुंध समर असम | गिर सों जनु सारंग वियो। 


मन जानि असुर नर घुसि रहे। सब दुद्या दुढत ढियो॥ छं० ५१६॥ 


रा० ए० सो० लन्दन की रासो की प्रति उपर्युवत्त फपन का शुछ्ठ अगमों में समर्भन शर्त 
है ।' किन्तु घारणोज की प्रति तथा साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित पृष्यीराज रासो मे 
इनका नामोल्लेख तक नहीं हुआ है। बीकानेर की एकलस्ष अक्षर याली प्रति में सारटदेद 
को वीसल का पुश्र होना लिखा है। इसी प्रति के आधार पर डॉ० दशरप इर्मा ने लिया 
कि सारंग उसके (विग्रहराज अथवा वीसलदेव) पुश्र॒ पृथ्वीराज का नाम हो सडझडा है ।' 
शिलालेख एवं संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थ जिसमें चौहानों की बंशावसी दी हुई है इनहे दिप्य 
में मौन हैं ।* 

पंडित सदाशिव दीक्षित ने एक स्थान पर लिखा है कि--'एनके तीन नाम है>-छूजप 
देव, आल्हुणदेव भौर वल्हण । भजयदेव, भ्जयराज बोर बजय पी एफ्नामता उठनी हो झुश् 
है जितनी आाल्हणदेव तथा आल्लणराज की एक रूपता । अजेय तथा सारदेव एड ही सय ९ 
हैं--इसका भप्रतिपादन रासो के आधार पर अति मुगमता से स्पस्टतया बिषा जा सदता है । 
. सुर्जन चरित में इसका नाम वल्हण है।'” पता नही पडित जी ने कजेयप गए मारगटद 





१. पृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणों सना काशी, 8« ५१६, छ* १॥। 

२. रासो की हस्तलिखित एवं अप्रफाशित प्रति, पू० ११ 

३. पृथ्वीराज रासो की कथाओं का ऐतिहासिर आपार, पृ० ४+ राजहपनों, एश ६, 
भाग ३, जनवरी १९४०, कलकत्ता 

४. देसिए, प्रस्तुत शोध प्रबन्ध, परिशिष्द भाग । 

५, पं० सदाशिव दोक्षित, रासो समीक्षा, पृ० १२३ । 


[ वडेंड ] 


को एक ही व्यक्तित कैसे मान लिया है। पंडित जी का मत मधिक स्पष्ट न होने के कारण 
ग्राग्य नहींहीं सकता ! 


सम्भव है टॉ० दशरथ शर्मा के कथनानुसार सारंगदेव, वीसलदेव अथवा विग्रहराज के 
पुत्न पृब्वीराज का नाम रहा हो । सम्भव है मूल रासो में इस प्रकार की गलती न हो । 
जब सके रासो का वैज्ञानिक रूप से सम्पादन कर कोई संस्करण सामने नहीं आता तब तक 
पारगदेव सनन्‍्देह का ही विपय बने रहेंगे । पृथ्वीराज रासो के सारंगदेव पर अब भी प्रश्न- 
वाचक चिन्ह लगा हुआ है ! 


सेनराय अयया सेनराज--'पृथ्वीराज रासो! के अनुसार चौहान वंश परम्परा में २१वीं 
पीड़ों में राजा मोहसिंह चौह्तान के उपरान्त उनका पुत्र सेनराय अथवा सेनराज उनका उत्तरा- 
घिकारी होकर गद्दी पर बैठा ।' कवि ने इनका विस्तृत विवरण ग्रन्ध में प्रस्तुत नहीं किया 
है । रा० ए० सो० लन्दन की प्रति उपर्युक्त कथन का समर्थन करती है ।" घारणोज एज 
साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो की प्रतियाँ इनके विपय में मोन हैं। शिलालेख 
एवं संस्कृत ग्रन्थों के अनुसार भी सेनराय अथवा सेनराज नाम का शासक चौहान वंश में नहीं 
टआ ।* किन्तु पंडित सदाशिव 'चन्दन' नामक शासक में सेनराय का आभास पाकर इस 
प्रकार लिखते है--'इनके नाम प्रशस्ति गौर शिलालिखों में 'चन्दन” पृथ्वीराज विजय में 
घन्‍्दनराज हम्मीर महाकाव्य में नन्दन तथा रासो में 'सेनराज” लिखे गये हैं ॥ प्रवन्धकोप तथा 
मुर्जन चरित में उसके अनुल्लेैख का कारण अवगत नहीं ।7” पता नहीं पंडित जी यह सब 
अटकल किस प्रक्रार लगा लेते हैं। स्पप्ट एवं पुष्ट प्रमाणों के अभाव में पंडित जी का मत 
ग्राह्म प्रतीत नहीं होता है। चोहानों के विषय में कोई प्रामाणिक ग्रन्थ न होने के कारण ही 
विद्वानों को ऐसी निराधार कल्पना करने का अवसर मिल गया है । सेनराज के विपय में कुछ 
भी मिश्चित रूप से लिखना कठिन है । 


सोमेश्वर--रासो के अनुसार मजमेरपति आनन्दमेव का पुत्र सोमेशवर उनके उपरान्त 
अजमेर की राजगद्दी पर बैठा । सोमेश्वर की वीरता एवं पराक्रम का वर्णन कवि चन्द ने इस 
प्रकार किया है-- 


जिह. सोमेसर सूर। सूर जित्त पुरसानी | 
जिहि सोमेसर सुर । चढिवि गुज्जर घर मानो ॥। 


पृस्यौराज रासो, नागरी प्रचारिणों सना काशी, छं० रघ८, स० १॥। 
रामो की हस्तलिस्तित एवं अप्रकाशित पति, पृ० १०१। 

देशिए. प्रस्तुत शोघ प्रबन्ध, परिशिष्ट भाग । 

पं० मदाद्विद दीक्षित, रासो समीक्षा, पृ० ११५। 

- प्श्योरान रासो, नागरी प्रव्रारिणी सभा काशी, छं० ६१३, स० १। 


मंदी आए 8७ २ डक 


[ १४५ ] 


जिहि सोमेसर सूर। लियो नाहर परिटहारिय। 
फल उप्पम फवि घन्द । चन्द राहा जिम मारिय ॥। 
घर घीर घीर घारह पनो । संभरि घेरिन भंजपी 
इक दोरि गोर राजोर यह । पां बढ़ गुज्नर गंजयो ॥ छं० ६१६ ।+' 


एक बार दिललीपति अनंगपाल पर फप्नौज के राजा विजयपास में बाहमद शिया ।* 
राजा अनंगपाल ने भी बाई हुई विपत्ति का सामना पारने के छिये जमुना नदों के उसर मे 
मुकाम किया ।' जब अजमेरपति ने राजा अनंगपाल पर धाक्रमण की बात सुनी हो था बुझा 
ही एक विशाल सेना लेकर उनकी सहायताथं दिल्‍ली की कोर चत पटा-- 


मनन्‍नेव सुर भर मेंत्र बाम। धुस्मेर नह मीसान ताम। 
घढ़ि चल्या सेव सजि चहुवान । उप्पटे जानि सत सिपुपान ॥ छ० ६२१॥ 
आग्गे सु सोम दिल्‍ली सहाय | बग्गेव विप्प हर एंठ छाप । 
अग्गे8ष सनी लम्मी फुनिंद । मग्गेव सरद निरसि उग्यि खंध ॥ 8० ६२२॥+' 


राजा अनंगपाल ने राजा सोमेश्वर फी सहायता से विजयपाल से घोर मंग्ाम विशया । 
राजा सोमेश्वर ने इस संग्राम में अपने अपार पराफ्रम एवं शौर्य का परिद्रय दिया हृधा 
विजयपाल कमधज्ज को युद्ध में परास्त कर दिया । विजयपाल कमधर्जड शो परार्त सर 
राजा सोमेश्वर अजमेर की भोर प्रत्यावृत्ति हुये । 


जित्ति भत्ति भारयूथ भौ।गो फिरि प्रह फमपण्ज ॥ 
उप्परोे अजमेर  पहुँ । डोला पंच. सरज्ज ॥ छं० ६६९। 


राजा अनंगपाल ने सोमेश्वर की वीरता से प्रसप्त होकर अपनी एश एथी कमला शग 
विवाह उनके साथ बड़े धूमधाम से कर दिया । कालान्तर में एसी रानी मे; गे मे इज हे 
अन्तिम शासक दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान ने जन्म ग्रहण क्िया- 


सोमेतर तोमर घरनि, अनंगपाल पुभ्नीप । 
हिन सु पिब्य गर्भ घरिय, दानव पुल छप्तीयता छ० ६६५ । 
१, पथ्वीराज रासो, नगरी प्रचारिणों समा, छ० ६१६७ पत० १॥। 
२. वही, छं० ६१७, स० १॥ 
३. चही, छं० ६१८, स० १॥ 
४. वही, छं० ६२१-६२२, स० १॥ 
५. बही, छं० ६६९, त० १॥ 
६. बही, छं० ६प८१-६८३२, मत १। 
७... यही, छं० ६८५, त० ११ 


दुत्त जन्म के उउतक्ष में राजा सोमेश्वर ने नाना प्रकार के उत्सव मनाये तथा अनेक 
प्रदान हे दान किये-- 
सुनि सोमेस बंधाइ दिय, हैं गे चोर गुराव । 
मति उछाह्‌ अनन्द नरि, नर॒प मुस चढिढय आवब ॥ छ० ६९१ ।' 
मोमेश्वर शिव उपासक थे । बह प्रातः नित्य सोने का तुलादान दिया करते थे ।' मण्डो- 
बर का नरेश नाहरगाय राजा अनंगपाल के अधीन था। एक बार दिल्‍ली आने पर, वहाँ 
पृस्व्ीराज फ्ो देखकर इन्होंने अपनी कन्या का विवाह करमे का बचने दिया था। पृथ्वी- 
राज की ११९ वर्ष की आयु होने पर अजमेरपति सोमेश्वर ने नाहरराय के पास दूत भेजकर 
अपने पुत्र का विवाह करते का सन्देश भेजा किन्तु नाहरराय ने अपना बचन तोड़कर विवाह 
फरने से इन्कार कर दिया तथा पत्र द्वारा सूचित कर दिया कि तुम्हारा कुल हमारे अनुकूल न 
होने के कारण ही यह सम्बन्ध स्वीकार नहीं ।' सौमेश्वर इस अपमान को सहन ने कर सके । 
दोनों दलों में संग्राम असम्भावी हो गया । युद्ध में महाराज सीमेश्वर की विजय हुई । सेना 
द्वारा तूट का घन सोमेमग्वर ने समस्त सैनिकों को वाँट दिया ।* 


सोमेश्वर ने अपनी राज्य सीमा की अभिवृद्धि की कामना करते हुये एक बार मेंवात- 
पत्ति मुंगल (मुद्गल) को एक पत्र द्वारा सूचित किया कि या तो तुम हमारी आधीनता 
स्वीकार कर, हमें कर दिया करो अथवा देश छोड़कर समुद्र पार चले जाओ ॥" राजा मुंगल ने 
भो वीरोचित उत्तर देकर राजा सोमेश्वर को चुनौती स्वीकार कर ली । अतः दोनों दलों में 
युद्ध होना आवधष्यक हो गया। एक दिन सोमेश्वर ने अपने समस्त सामन्तों को एक्श्र 
कर शुभ मुहूर्त देखकर मेबातपति मुंगल पर आक्रमण कर दिया ।' जिसमें सोमेश्वर ,,”'की 
दी विजय हुयी । 






एक थार महाराज पृथ्वीराज चौहान के चाचा कन्ह ने भोलाराय भीमदेव के | बच्चे 


उसने अपने मान्ययों से कहा “अब मैं शग्रुओं को कुचल डालूंगा तथा समस्त पृथ्वी पर एक क्र 


सनन-नजी ५3 +र 





पवृष्योरान रासो, नागरो प्रचारिणी समा काशी, छ० ६९१, स० १॥ 
वही, छं० १-५, स० ७१॥ 

वही, छं० २६-२९, स० ७ । 

यही, छं० १, स० ८। 

यही छं० ३२,मण्ध।] 

६, यहां, एं० ४, स० ८ । 


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७... प्ग्दीरात रासो, साहित्य संस्यान उदयपुर, करहू पट्टी समय । 


[9४8 . 

राज्य करूगा ।” इसी भावना से प्रेरित होकर भोशाराय भीमदंद धाहुह्य ने सोमेग्दर 
राज्यसीमा पर आक्रमण कर दिया । ज्योंही सोमेंम्वर को सीमा में घातुतयराज वी मेगा | 
प्रवेश किया त्योंही वहाँ के नगर निवासी घर-वार छोहुकर भाग निरके शथा भदा में लुट 
मचा दी । अपनी प्रजा की पुकार सुनकर सोमेश्वर भी पोऱे पर घदुऋर छसी प्ररार गाए 
तैयार हो गया जिस प्रकार सती अपने पति के साथ जाने को तैयार हो जाती है । दोनो इस 

में घोर संग्राम हुआ। राजा सोमेण्वर ने स्वयं युद्ध में भाग लिया ठमा मारबाट मणा हे । 

अन्तिम समय में महाराज सोमेश्वर युद्धस्थल में मरना मिश्चय कर, महाभारत हे योटडाएों हे 
समान भिड़ गया, जिसमें अनेक हाथी-घोड़े तथा कितने ही सेनिक धराशायों एयथे । पर रर४« 
रंजित होकर समरभूमि में शस्त्र चलाने लगा। उसने हुद्लार कर तथा घूमरुर शपु मा श। 
काट दिया । योद्धाओं के प्राण प्चेर् उड़-उटुकर सूर्यमण्दल में मिलने सये ।॥ वीर-्बाय ग्रप्द- 
खण्ड हो रुधिर में सन गये । कितने ही रुण्ड युद्धस्वल में पट्टे हुए प्रसप्न दिययाई पटें-- 


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हय गय नर भर परिय, निरिय भारत्य समान । 
सोमेस्वर घितयो, भमरण निरर्द रण पान ॥ 
रत्त रंग सह अंग, जंग सारहू उच्मारं | 
हषिक मार घफि सार, घुमि झुकि घुडसुप्तारं ॥ 
फल हुंत मंफ अनभूत हुव, उड॒हि हंस हसहि मिछहि । 
तन तुट्टि रुधिर पल हड्ड सनि, छियया फर्मंप उठि रण बिछहि ॥ एं० ३७१" 
राजा सोमेश्वर ने अपने ही समान श्रेष्ठ एक सहस्त्र घुष्ठ सवारा की युद्धनतेत में छद्चसर 
किया, उनमें से पचास घीर महाभारत के योद्धाओं के समान पे । उनमें से ३९ योद्ा पारगरलि 
को प्राप्त हो गये । राजा सोमेश्वर युद्ध छलेत्र में पिर गये । गिद्ध-सिद्ध द॑तासादि ने उसरी 
प्रेमपूर्वक मन में आराधना की । उसने अद्भुत शवित से मुकित पा साधन डिया। समझा 
प्राण सूर्य में जा मिला । राजा सोमेश्वर ने चन्द मण्डल में जाकर गति प्राप्त ॥)। ससदा 
पंच भौतिक शरीर पंचतत्व में मिल गया- 


घाज नव सोमेस, सहस घर हृपक प्रमाने । 
तिन मज्सह पंचात, बोर भारत भर जाने ॥॥ 
तोन तोस छादु परे, परये सोमेसुर हझेत । 
गिद्ध सिद्ध बयताल, इनहि पूजयों मन हेते ॥ 
सद्धीस मुक्ति अदुनुत जुगति, हुंसु हूंडि हूंसहि मित्यक। 
सोमेस करी सोमेस गति, पंचतत्त पंचह मित्यझ् ॥ छ० ६८॥' 





१... प्रृष्वीराज रासो, साहित्य संस्पान उदयपुर, सोमदप रूमय । 
२. घही, छं० ३७, स० ३५१ 
३. घही; छं० २८, स॒० रे० १ 


[ ईद ॥] 


हासो के अनुमार सोमेश्वर, चालुक्य राज भोलाराय भीमदेव के हाथों पंचतत्व को 
प्राप्त टृत्ना । 


रासों के अतिरिक्त भी अन्‍य समत्त ग्रन्य इस बात की घोषणा करते हैं कि सोमेश्वर 
पृष्वीराज (तृतीय) का पिता था। इतिहासकार भी इस विषय में एक मत हैं। सम्भव है 
रासो की सोमेश्चर सम्बन्धी समस्त घटनाएँ इतिहास से मेल न खाती हों, फिर भी सोमेश्वर 
को एतिहासिक व्यक्त मानने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है । डॉ० गौरीशंकर ही राचन्द 
ओझा संमेश्वर तया मेवातपति मुंगल के युद्ध को अनेतिहासिक मानते हुये लिखते हैं कि-- 
"रासों में लिया है कि सोमेम्बर ने मेवात के मुंगल राजा (मुद्गल राय) से अन्य राजाओं 
के समान कर माँगा | उसके इन्क्रार करने पर सोमेश्वर ने चढ़ाई कर दी । पृथ्वीराज भो 
कुछ समय बाद अजमेर से चला और रातोरात मुंगल सेना पर उसने आक्रमण कर दिया | 
युद्ध में मंगल पराजित हुये । मुंगल राजा का ज्येप्ठ पुत्र वाजिद खां मारा गया भौर वह 
स्वयं कंद हुआ । 


यह कया भी कल्पित है। सोमेश्वर के समय में मेवात प्रदेश अजमेर के राज्य के 
यस्तर्गत था । वहाँ कोई स्वत्न्त्र राजा नहीं था भौर मुगलों का जो क्या, अन्‍य मुसलमानों तक 
का उस प्रदेश पर अधिकार नहीं था। सोमेश्वर की जीवित अवस्था में पृथ्वीराज इतना बड़ा 
नथा कि युद्ध में जा सकता |”! 


बोझ जी के उपयुंक्त मत के विरुद्ध कविराव मोहनसिह पृथ्वीराज तथा मुंगल नरेश 

के युद्ध को ऐतिहासिक मानते हुये लिखते हैं कि “मेवाती मुगल क्षत्रिय था, सोमेश्वर तथा 

पृथ्योौराज के साथ इसके युद्ध होते रहे । बाद में महामन्त्री कमास के दो बहिने थी, उनमें से 

पक मुगल को तथा दूसरी पृथ्वीराज को व्याह दी गई । इस प्रकार सम्भव है उस दक्ष मन्त्री 

कमास ने ज्ञापसी विद्रोह की समाप्ति की ।" कविराव मोहनसिह ने मुंगल तथा कैमास को 
देने की विवाह की बात रासो के आधार पर ही की है 


डॉ योरोगंकर होराचन्द ओझा एक स्थान पर सोमेश्वर की मृत्यु के विषय में सन्देह 
करते हुये लिखते है कि "रासो का कर्ता लिखता है गुजरात के राजा भीम से हाथ से पृथ्वी- 
राज का पिता सोमेफ्वर मारा गया । अपने पिता का बैर लेने के लिये पृथ्वीराज ने ग्रृजरातत 


तर बढ़ाए कर भोगमदेव का मारा ओर उसके पुत्र कचराराय को अपनो मोर से गद्दी पर विठा- 
हर गुदस्ात के कुछ परगने अपने राज्य में मिला लिये । 


नल 5 अमक 
जबबजन०- 


६. म० स० गोरीधंशर हीराचन्द ओप्ता, पृस्वीराज रासो का निर्माण काल, पृ० ५७, 
कोटोस्सद स्मारर सप्रह, । 


न्शँ 


पृस्वाराज़ रासो, प्रथम्त माग, सम्पादकोय पृ० १२, साहित्य सस्यान उदयग्रपुर 
स० २०१२१ 


३. प्ृष्वोराज शरासों, साहित्य संस्यान उदयपुर, छं० १०, स० १६॥ 


[ १४९५ | 


यह सारी कथा भी असत्य है, वयोंकि न तो सोमेम्बर भीम के हाथ मे सारा गया झोर 
ते भीम पृथ्वीराज के हाथ से | सोमेश्वर के समय के कई शिलालेख मिस रे 
वि० सं० १२२६ फाल्गुन वदी ३ का विजोलियाँ का प्रसिद्ध ठेय है ज्ौर तस्तिय दिल ह« 
१२३४ भाद्र पद सुदी ४ का है। पृथ्वीराज का सबसे पहला लेख बिल स० ६६६६ ऋापाद 
बदी १२ का है। वि० सं० १२३६ के प्रारम्भ में सोमेश्वर बस देहास्त ओर प्रस्दोराज हा 
गद्दी नशीनी मानी जा सकती है, जंसा कि प्रचन्धक्रोप के अन्त की बंशायसी मे शाह गोल 
है । भीमदेव वि० सं० १२३४५ में गद्दी पर बिल्कुल वाल्यावस्था में वैदा और ६६ बर्ष हार 
वि० सं० १२६८ तक वह जीवित रहा । इतनी बाल्यावरथा में था सोमेश्वर भो मार नए: 
सकता और न पृथ्वीराज ने उसका बदला लेने के लिये उस पर चढ़ाई रूर उसे मारा था । 
गुजरात के ऐतिहासिक सस्क्ृत ग्रन्थों में भी कही इस वात काया उस्लेय नहीं है। राजप्तादा 
म्युजियम में भीमदेव का वि० स० १२६५ का एक घिलानेय विद्यमान है । छोड़ पर देश दाएा! 
गाँव के प्रसिद्ध तेजपाल के जैन मन्दिर का वि० स० १२८७ पी प्रगस्ति दे: शिफने मे सम: 
भी भीमदेव विद्यमान था । डॉ० बूलर ने वि० सं० ११९६ मार्ग शोर्ष ददी ९४ शा। भीमरेद 
का दानपत्र प्रकाशित किया है। इससे निश्चित है कि भीमदेय पृष्वोगाज गो मुगयु दे पट 
मानतः पचास वर्ष पीछे भी विद्यमान था ।"' 

सम्भव है सोमेश्वर से सम्बन्धित कुछ घटनाओं में कल्यतना का गोग हो, छिए भो पा 
निविवाद सत्य है कि यह ऐतिहासिक पात्र है जिसकी सत्ता में एइतिहासवैसाशों थो भी गरदे? 
नहीं है । डॉ० गौरीशंकर हीराचन्द बोघा, पृथ्वीराज विजय महावास्य के शापार पर छिप 
हैं कि “पृथ्वीराज (द्वितीय) के पीछे मन्धियों ने सोमेश्वर को राज्यसिहासन पर दिराया, 
जिसने तव तक सारा समय विदेश में बिताया घा और अपने नामा जमघमिह में शिक्षा पाई 
थी । सोमेश्वर ने चेदि (ज्वालापुर जिला) की राजधानी श्रिएरा में शाबार बेटिराह़ री 
कन्या कपू रदेवी से विवाह किया, जिससे उबत काव्य के चरित्र नामगः पृष्वीराड छोर सरि- 
राज उत्पन्न हुये । अजमेर की गद्दी पर बैठने के पोड़े ही समय पोछे सोमेगयर शा देतरा हो 
गया, और अपने पुत्र पृथ्वीराज की नावालिगी में अपने मन्धों कादम्माप्त (पाददिदाग) शै। 
सहायता से कपू र देवी राज-फाज चलाने लगी । 

मत: अब सोमेश्वर फी ऐतिहासिकता में किसी प्रशार हे; संदेह शो रणने सर 

रहता है | 

हरिहरराय--'पृथ्वीराज रासो' के अनुसार घौहानों की ३३वो पड़ी में राश हाघरार 
चौहान के उपरान्त उनका एक मात्र पुत्र हरिहर॒राय उनका दत्ारापिशारा [झा झा मर प्य। 
में बुद्धि वाले प्रसिद्ध थे । कवि ने इनका विप्लेपष परिचय नहीं दिया है। शान एव मार 





१. डॉ० गोरीशंकर हीराचन्द्र मोषा पृष्दोराज रासों छा निर्माण णाह्, पृ० ४४०४६ शोर 
त्सव स्मारफ संग्रह, । 

२. यही, ए० ४६॥ 

३. पृथ्दौराज रासो, नागरी प्रधारिणों समा छाशी, 8० २९०, सर १7 


[ 4४० | 


तन्दन फी रासो की प्रति उपर्युक्त कयत का समर्थन करती है ।' किन्तु घारणोज की प्रति, 
बोहानेर की एकल अश्नर वाली प्रति, साहित्य संस्थान उदयपुर से प्रकाशित रासो फी प्रति 
इनके वियय में कोई उल्लेख प्रस्तुत नहीं करती है। शिलालेय एवं संस्कृत के ग्रन्य भो उक्त 
नाम फे किसी व्यक्ति की पुष्टि नहीं करते हैं ।* 
पंडित सदानिय दीक्षित इन्हें काल्पनिक एवं निराधार बताते हैं। उन्होंने लिखा है कि- 

"बनेफ धिद्यानों ने इसके अनन्तर रातों में 'हरिहरराय” इस एक भौर नाम के दर्शन किये हैं, 
परन्तु रासो के परिशीलन करने पर उनका मत अ्रमात्मक प्रतीत हुये बिना नहों रह सकता, 
बगोंकि रासो में लिखा है-- 

सुअभ किसने राज जस फ्रिस्न चित । 

हरिहरदद राह भट विवुघ संत ॥! 


प्रमाणों के अमाव में हरिहरराय को ऐतिहासिक अथवा प्रामाणिक मानना अत्यन्त 
पठिन है । 





दासों की हस्ततिपित एवं अप्रकाशित प्रति, पृ० १० । 
देश्िए, प्रस्तुत शोध प्रदाघ, परिशिष्ट साग । 
, पं० सदाशिव दीक्षित, रासो समोक्षा, पृ० ११८ । 


अक्ा. >> >्चक 
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हिन्द पात्र : सान्‍्मत वर्ग 


पृथ्वोराज रासो मूलतः भारत वर्ष के अन्तिम हिन्दू शासक महाराद प्प्वीराड घोटाद 
( तृतीय ) फा जीवन चरित्र है। यही कारण है कि कवि ने महाराज पुध्वोराज घौदान # 
विस्तृत वर्णन के साथ ही साथ उनके सहयोगी घूर-वीर सामम्तों) का भी विरत्य बम 
किया है। इतना ही नहीं, कवि ने पृथ्वीराज चौहान के तत्कालीन महान प्रतिद्नरी गरजेप्यर 
भीमदेव चालुवय, कान्यकुब्जेश्वर जयचंद गाहड़वाल तथा गजनापिपति छाए शाहाइ 
गोरी का चित्रण भी पृथ्वीराज चौहान की महानता प्रदर्शन करने के लिए ही किया है। 
युद्ध प्रघान काव्य है तथा इसी कारण उस समय की आदर्श बीरता का इसमें वितरण रिया 
गया है। पृथ्वीराज चौहान के जीवन चरित्र लियते समय उनके सहयोगी सामस्तों शा पर्ण न 
करना भी आवश्यक हो गया धा। यही फारण है कि कवि ने पृष्वोराज घौट्ान ने सामणो 
का चरित्न-चित्रण जन्म से मृत्यु पर्यन्त नहीं किया है। किन्तु भसंगानुसार छाप छर्म हपा 
स्वाभि घर्मं पर मर मिटने वाले सामनन्‍्तों का रासो के अनुसार परिष्रय प्राप्त शर रेल 
अनुचित्त व होगा । 


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अचलेस घौहान-- पृष्वीराज रासो' के अनुसार यह पृम्यौराड चौहान गा प्रस्शि 
सामन्त था। संयोगिता अपहरण सम्बन्धी संग्राम में वीर अत्हनकुमार वी मर्यु हे पादार 
पृथ्वीराज चौहान ने अचलेस चौहान को युद्ध-भूमि में रग्नसर होने का छाद्रेश दिया-- 





१, “राज्य फी आय के आधार पर राजा के एई नेद शिए गए है। डिस शाहा शे र््य 
से प्रति ध्ष प्रजा फो पीड़ित किए दिना एक छाप रुप ( एश प्रशार दा मिश्रा ) 
संचित होता है। उसे सामनन्‍्त कहते हैं ।” 
डॉ० राजदली पाण्डेय, हिन्दों साहित्प का पहुत्‌ इतिहास, प्रषम शाश, पुए ७६-२२, 
नागरी प्रदारिणो सभा काशी, प्रपम संस्करण, सं० २०६१४ दि० । 


के ब्की 


[ १४२ ] 


तब जंप॑ प्रथिराज। सुना अचलेस संभरिय। 

इह सु सुर आचरन। नहीं सामंत संभरिय ॥ ध् 
मेन सर घरि कघ। राहु संधित गया घन। 

इह अचंसम आचरन | देव दानव देतानन ॥ 

मुनि दानव परहरि पर । अपर जुद्ध संधि पंगुर दछह। 

सक ही सामि संफद पर । सकल कित्ति कित्तो चलहु ॥॥ छं० २३०२१" 


पृथ्वीराज के वचन सुनकर अचलेस चौहान ने अपना मस्तक नवा कर युद्ध क्षेत्र का 

मार्ग ग्रहण किया । वीर अचलेस ने अपने पराक्रम तथा रण-कुशलता से अनेक शत्रुओं का 
सफाया कर दिया तथा स्वयं ने भी अपूर्व संग्राम करते हुए स्वामि धर्म हेतु स्वर्ग लोक 
की राह ली-- 

फरि वित्रज अचलेस ।सु छल चहुआन जग्ग गहि। 

बरि दल वल सहर॒यो। पुरि धर मरित राधिर दहि। 

भमच्छति हेवर तिरहि । कच्छ गज कुंभ विराजहि ॥ 

उभर हंंत उड़ि चलहि | हस मुख फमलहि राजहि । 

चबसदिठ सह ज॑ जे करहि। छम्रपति परि संचरिय | -. 

वोहिधूथ वीर बाहर तने । दिल्‍लीपति चढि उत्तरिय ॥ छं० २३१२ । 

सुनत धाव विहयो सघन । दढह्या अचल . चहुआन । 

भयो मोह फमधच्ज दल। परे पच से यात ॥ छं० २३१३ । 


अमरसिह सेवड़ा-अनर सिह सेवड़ा, गुर्ज रेश्वर भीमदेव चालुकय का प्रधान मंत्री था ।' 
मंत्री सेंवड़ा तम्र-मंत्र शास्त्र में मत्यन्त निपुण था। इसने जायसी के पद्यावतता के राधव- 
चेतन की भाँति अपनी सिद्धि के वल पर अमावस के दिन चन्द्रमा दिखा दिया था तथा 
दष्डस्वरूप योग्य ब्राह्मणों के सिर मुटवा दिए थे, इतना ही नहीं यह अत्यन्त पराक्रमी भी 
था, इसने दक्षिय सथा पश्चिम के अनेक देशों को विजित किया था । 


जिन क्षमर्रसह सेवरा , चन्द्र मावस उग्गाइय। 
मिन अमरपसिह सेवरा , विप्र सब सीस मुडाइय । 


........ +>++ “० +«००+ जन जल ज+ी। + 


पृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणी सना काशी, छं० २३०२, स० ६१। 
कही, 8० २२१२-१३, स० ६१ ॥ 
दही, छं० ८५, स्ू० १२१ 
४ राघव पूणि जासिती, दुृइन देखाएपि सांक्ष। - 
येद पंथ नहि चलहि, ते मूर्लाहि वन माँझ ॥-३८, २ ॥ जायसो, पद्मावत । 


ल्‍पँ 


4७ 


[ १५३ ] 


कहर फू्र पापंद , चंद चारन सिद्धि यस॑। 

ट्रंज॒ दो पंजर हेम , देहि उत्तर घन हिसे। 

नर नाग देव छंदा चले , भाकर्५ष बादंत . णएर । 

पघिहरम्न देस दष्पिन दिस्ता , सद जित्ती पच्चिम मुपर ॥ छ० ६ | 
तथा-- 


पट उमय फोस उद्योत हुम | पिप्रतीस मूडिय सबसे ॥ 
घित्त मंत प्रम भाध्रम घर । सुबर मंप्र किम्मे सझाद ॥ छं० २१४१" 


गुज रेश्वर भोलाराय भीमदेव चालुबय (ट्वितीय ) का सर्देश लादपति सतपराण ४ 
पास ले जाने वाला प्रधाव सम्भवत: यही था, रपप्ट नाम ये अ्ाद मे निश्चित झूप मे बहन 
तो कठिन है, किन्तु इच्छनी फा विवाह भोलाराय भीमदेव के साप फराने में यह दर्मशाप मे 
असफल रहा । 


पृथ्वीराज ( तृतीय ) में अपने कुशल मत्नी बकमास को नागोर में घातुग्य भोराभीम मे 
होने वाले युद्ध का भार सौपा | मंत्री ने राजा भीमदेव ( द्वितोम ) शो मंत्रणा ही। हि (४ 
ही साथ पृथ्वीराज तथा गोरी दोनों पर क्राक्रमण करना घाहिए। उधर नागौर भेर्ेमाश 
अपनी मोर्चा वंदी कर रहा था, इधर अमरपिह उसे मंत्र दस से बंदी दसाने थे लिए सागा- 
प्रकार के तांभ्रिक धनुप्ठान में दततचित्त लगा हुआ पा। मंत्री बैमास मागौर से मद्धसर हो 
कर भीमदेव चालुवय की सेना पर आक्रमण करना ही चाहुता पा कि इसने में ही छमगररिए 
सेवरा का भेजा हुआ भाट बड़े साजवाज से नागौर जा पहुंचा। उसने पमास मे मिल हार 
अमरपिह की दी हुई एक बहुमूल्य मोतियों फी माला नजर फी तथा सह्तिपत प्ररदद शिएा । 
उस पत्र में शिप्टाचार पूर्ण शब्द लिखे थे, उत्के बाद बहुत कुछ बढ़ाए लिएगर एश गुग्दरी 
स्त्री का चित्र लिखा हुआ था बोर लिखा था कि तुम एस स्थो को सेदार छान्‍नर शव 
अमरपसिह के मन्न वल से वशीभूत होकर पह चित्र पर एसा मोहित ही। छंदा एिः इस सशय 
से कैमास, जैन मंत्री की इच्छा के विरुद्ध फोई भी कार्य करने में सम ने रह गा ॥# मार, 
अमरप्तिह द्वारा भेजी हुई अत्वस्त सूपदतती लाले सत्रायी में ऐसा मुग्प रद हि हारने रदाशि- 
धर्म फो भी भूल वैठा । पृथ्वीराज के नाम को भी भूख गया हपा भीमदेद शी झाटश्टा शा 
निपटवशवर्ती बन गया, तथा समस्त नागौर प्रदेश पर भोलाराय भीमदद ( दिगेश | ह। 
दुह्ाई भिर गई ।' 





१. पथ्वीराज रासोः नागरी प्रचारिणी सना पायी, छं० ९ तथा २६८, हल ६२१ 
२. घही; छं० २३६-३७, स० १२१ 
३. वही, छं० २६६-६७, स० १२४ 


[ (४४ |] 


कथि चन्द्र बरदाई ने उपर्यकत घटना की सूचना स्वप्म में पाकर नागौर की ओर 
प्रस्यान किया तथा बहाँ पहुंच कर प्रत्यक्ष भी देखा ।' चन्द्र ने भैंरों तथा देवी का अनुष्ठान 
झर जन की माया को पराजित करने का वरदान माँगा- 


आई तू उमया अखंड तनया दाता दुरी चासिनी। 
संतुप्टा सुर नाग किनर गना देत्यानि सन्‍नासिनी ॥ 
यरया चार चंतति चाय कमल संतु॒प्टयं साधुन॑ । 
जन यद्धास वर्दयाइ चरन जे जे सुजिवहासन ॥ छं० २८२।' 


यह समाचार पाकर अमर सिंह सेवरा ने चन्द का मंत्र नप्ट करने के लिए मंत्र प्रयोग 
क्रिया तथा घट स्थापित किया ।* अमरसिह के मंत्र वल के प्रभाव से एक क्षण के लिए चन्द 
भी भ्रम में पड़ गया किन्तु शीघ्र ही सम्मल कर अनुष्ठान करने लगा तथा योगिनियों को 
जागृत करने का मत्र प्रारम्भ किया । अमरसि]ह ने अनैकानेक पाखण्ड किए किन्तु कवि चन्द 
ने अपने मंत्र बल से उसे परास्त कर दिया तथा मग्नी के मास का उद्धार किया-- 


घर पापंड न पुज्यमी , किये अमर घन तंत। 

को जित्त फविचन्द सों , द्रगा सहाइक मंत॥॥ छं० ३०२॥ 

जो पापंड बहुत अम्यासे , चन्द मीन विष ज्यों ग्रहि ग्रासे । 

छिनक एक विद्या गुन सघी , चर पापड मंडि कवि बंधी ॥ छं० ३०३॥। 

यद्धा जन सुजेन लंगि , जीत चद चारित्त । 

सासों मट॒ट सुमन्‍्त किय , सरन जियन करि छहित्त ॥ छं० ३०४॥। 

चुदिट छये पापंड सब, छुटि मत्रोी फंमास। 

हर हुरंत आयास लगि , चन्द न घंडे पास ॥ छं० ३०५।' 

उपर्युवत विवेचन से इतना स्पष्ट हो जाता है कि मंत्री अमर सिंह सेवरा जैन मता- 

बलम्दी था। ब्राह्मण धर्मावलम्वी कवि चन्द मे जैनों के सेवरा पंथ पर बड़े ही व्यंगात्मक 
दंग से लिखा है-'द्वारिकापुरी में गोमती में स्तान करके जो अपने को शुद्ध नहीं करते, वे 
पुनः जन्म लेने पर सेवरा होते है, उनके केण लुच्ठन किए जाते हैं, वह न मुंह घोते हैं, न 
विद्ेक पूर्वफ अपने वस्च्रों को साफ करते है, अश्रु प्रमाव पर अनेक उपवास करते है, देवताशों 
के दर्गन नहों करते, गंगा, गया श्राद्ध आदि कर्म में विश्वास नहीं करते, इस मार्ग पर भ्रमण 
पःगने बाल व्यवज्ित की ने जाने कैसी गति होती होगी- 


१. पण्वोरान रासो, नागरो प्रचारिगी सना काशी छं० २७२-७६, स० १२ 
२. वहां, छ० २७७३-८१, स० १२॥ 

३. यहाँ, छं० २८६२, स० १२ ॥ 

४. दही, छं० २८७-२८८, स० १२॥। 

भर यहा, ३०२-३०४, स० १२। 


[ १५५ ॥३ 


नद्र मेघ नह हुए। जाइ गोसत्ति न झाय। 

तजज न प्रम सेवरा । होई फरि फेस छुत्चा्य ॥, 

मुष पावन हुन परे । धस्घम पधोवये से पिदेशं। 

आासूं पं परंत | एरत  उपचास . अने्॑॥। 

परसम्न॒ देव माने नहीं। गंगा गया न घाद्ध प्र । 

कवि घन्द फहत इन फटा गति । पाहि मारग छग्मे सुक्रम ॥ एछं८ ४६ 


द्वारिकापुरी से प्रत्यावतित होते हुए कवि घन्‍द भीमदेव ( टिलीय ) पाुरम श। 
राजधानी पट्टनपुर आया | गुजरेम्वर भोलाराय भीमदेव ने चन्द तथा क्पने न मद्ी हशर- 
सिंह सेंचरा से शास्त्रार्थ कराया, जिसमें कवि चन्द्र की विजय हुई तथा छमर्रा गत 
परास्त हो गया-- 


तब ॒पुच्छिय भीमंग , तुम घरदान सु दिहिय। 

वाद वहि देयंग , घुपन पिष्पिपय सन सिद्धिय ॥ 

चंद देव फिय सेव , तिन सु बमरा बुल्लाएय। 

थूल रथूथ आर , चन्द मसमान घलाइय ॥ 

तरवर सुपंतच थेंठो तिनहू , फिरि ने पाद दोनों प्रिय । 

नटुटी जु सप्री उपजोी अनल , सुरस पंदि नो एछिय॥ एं० ६९। 


तीतवा वे जीता चदानं, परि पिप्पिय रष्पिय रंमान॑ । 
मुप दुल्ल जे जे घहुआन॑ , नाटिका फारि मंच निपान ॥ छं० ६२। 


हल हलंत तंबू हु हिलियं , यंदि भरत है गे पति घछियं । 
चद मंत्र पट्टन चल चलियं , मनो भव ताराशन हुछिय ॥ ० ८१ । 


अमरसिह वास्तव में जैन घर्मावलम्बी पा | सेवरा शब्द का प्रयोग ऊँत पे छिए दिए। 
गया है। दिल्लीपति बादशाह अकबर के शाही फरमान में जन मुनि हरिविए८ पुगि शो) 
सेवड़ा कहा गया है-- "४ * इससे योगाम्यास करने वालों में ट्रीरदिजशय शूरि मेशरा घौर 
उनके धर्म के मानने वालों की जिन्होंने हमारे दरवार में हाजिर होने शो इश्झत पाए 
और जो हमारे दरवार के सच्चे हित्तेच्छु हैं-योगाध्यात की सचाएई, दुृद्धि कौर धदर शो 7 
पर नजर रख कर हुवम हुआ कि उस शहर ( उस तरफ ) के रटने एल में मे गाय ४। 
उनको हरकत (६ कष्ट ) न पहुंचावे और इनके मंदिरों ठपा उपाधयमी मे भी बड़ न 
उतरे" ( सूुरीश्वर भौर सम्राट अकबर पृ० ३७६, परिशिष्ट (ह ) पर्माद 


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१. प्रृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणों सभा कादयोी। छ० ४९, सर ४२१ 
२. वही, छं० ८१-परे, स० ४२१ 


[ १५६ ] 


अनुवाद ) ।' गउ्येताम्त्र जैन साधुत्रों फे लिए संस्कृत में श्वेत्पट' शब्द है। इसी का अपभ्रश 
भाषा में सेवा रूप होता है, वही रूप विशेष बिगड़ कर सेवड़ा हुआ है। सिवा शब्द का 


प्रयोग दो तरह से होता है-जैनों के लिए और ज॑न साधु्ों के लिए। बब भी मुसलमान 
पाई लोग प्रायः जैन साधुओं को सेवड़ा कहते है (विद्या विजय) । 


डॉ० विपिनविहारी त्रिवेदी एक स्थान पर तात्कालिक जैन धर्म पर प्रकाश डालते हुए 
तिखते हैं कि--'१४वीं प्रताव्दी में अर्थात चंद के समय उत्तरी भारत में राजपूताना और 
गणरात में जैनों के अनेक धर्म प्रव्तक प्रवल केन्द्र स्थापित हो चके ये तथा जैसा कि गुजरात 
फे इतिहास में. देखते है वहाँ जैनाचार्यो का प्रावल्य था, गुर्जर नरेश जैन न होकर भी इन 
आचार्यों को सब प्रकार से सहायता दिया करते थे तथा अधिकांश जनता जैन धर्म ग्रहण 
झर चुकी थी । ऐसी परिस्थिति में आए दिन प्राचीन समय के स्थापित ब्राह्मण धर्म के 
काचायों तथा जैनाचार्यों में घामिक मुठभेड़ होना स्वाभाविक था। इन वाक्‌ युद्धों में येन- 
केन प्रकारेण अपने पक्ष को ऊँचा सिद्ध करना, विपक्षी को पराजित करना तथा उसके विफल 


होने पर दण्ट स्वरूप उसके सिर मुंडन आदि के विघान होने के हम तत्कालीन साहित्य में 
बनेक प्रमाण पाते हैं ।/! 


उपयुक्त विवेचन से स्पप्ट हो जाता है कि गुजंरेश्वर भीमदेव चालुक्य के समय में जैन 
धर्म का बोल बाला था । सम्भव है भीमदेव का मंत्री अमरप्तिह 'सेवरा' ही रहा हो। अमर- 
सिंह सेबरा के विषय में इतिहास सर्वया मौन है। किन्तु पृथ्वीराज रासो के प्रायः समस्त 
संस्करण अमरपसिह सेवड़ा का विवरण प्रस्तुत करते हैं। तात्कालिक स्थित्ति पर दृध्टिपात 
परते हुए करम्मव नही है यदि कोई ममरसिह नाम का व्यक्ति रहा हो । अन्य ऐतिहासिक 
सामग्री के अभाव में निश्चय पूत्रंक मत प्रकट करना अत्यन्त कठिन 


अत्टूपकुमार--अल्ट्रण कुमार पृथ्वीराज चौहान ( तृतीय ) के १०६ अथवा १०० 
प्रसिद्ध सामस्तों में मे एफ था। इनका विशेष विवरण 'कनवज्ज समय ६१” के अंतर्गत प्राप्त 
होता है । जब पृथ्वीराज संयोगिता का अपहरण करके ले आये तो संयोगिता युद्ध से भयभीत 
हो ठठी। उसे शंकातुर देख कर वीर अत्हन कुमार ने उसे समझाते हुए -कहा-- 

तब बोर्ल अत्हटून कुमार | सत्य ब्रह्मांट वीर वर | 


ज़िहि मिल्त चर सुमर | हीहि तन मत्त बीर सर ॥ 





३, डॉ० दिपिनयिहारी थिवेदी, चन्द वरदाई और उनका काब्य, पृ० ४०४/ हिन्दुस्तानी 
एकेडमी, उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद-१९५२॥ 

२. वहीं, ए० ४८) ॒ 
बहू, पृ० ४७ । 


[ १५७ ] 


मिले सरित सब गंग। होए ग्रगा सद कगा।। 

भर्ग सब परपंच। मिल ब्रह्मा सद्म हू भभ्गावा 

ऐसे सुदोर सामंत सो। दोल बोर बोफे घदन॥। 

जने न वत्त बर बंध की। पहुंचावे दिल्‍्दों सुपव ॥ छह ६३००१ 
ओर भी-- 


फुनि जंप्यो अल्हुन कुमार | सुत्रि सुख्दरी सर बस । 

बर अगनित्त अंजुली | पंय सो से समद दस ॥ 

सार मेघ बृठठते । थीर ट्ट्टी पिच्छोर ॥ 

वर दम्पति संयोगि ! बंधि द८ मौत मे छोर गा! 

उप्पारि सस्त्र गो ब्रद्धनहु। निरुप रपि ग्रस्जी नेम ग ॥ 

फमधज्ज इृद बुढ़्ढे प्र पुनि । सुमन संघ जाने. सर्द ता ए० ११०४ 

जयचन्द तथा पृथ्वीराज के मध्य विकट संग्राम छिएने पर हथा मरसाह सा भोतान 

की मृत्यु के उपयंत वीर अल्हनकुमार युद्ध क्षेत्र की ओर अरसर हर! । सहामाया का इमर्ण 
कर तथा जाप करके उस अदभुत पराक्रमी वीर ने कपने हाथ में ऋपता सिर बयटा हए। 
पृथ्वीराज के पास उसे छोड़ फर उसका घड़े कपने दायें हाप में पदार सेझर इंद्ध हे लिए 
अग्रसर हुआ तथा पंगदल को अपनी भीषण मार-काट से विघलित शर दिया" 


मह साइ चित चितीस आल | जंप्योँ सु मध देयो एराझ ॥ 

आश्रम्र देवि किय निज्ज धाम । फट्टयों सौस निज हुमूथ ताम ॥ ४०३२८६। 
मुवकयों सोस निज अग्ग राज | हुंकार देवि फिप निम्त माह । 

धायो तु धरहू बिन सीस घार। सगप्रहुयो बांहू दार्य रटार ॥ एं* ६२६७ । 
उच्छयौ पग्ग बर दच्छपानि । संमृहों घीर पायो परादिवा 

फौतिग्ग सब्ब॒देपत सूर । दिप्यो न दिदुठ कारन परार वा छंढ स्श्घ८ । 
साझी पयट्ठ सा सेन पंग । उण्जे फरार यम्जत जगवा 

फौतिग्य सूर देपंत देव । मारह्‌ रद्द रस हुंत एद॥ए० २६०८९ ! 
घर पर॑ धार तुष्न सु थार । हल हुछे पंग सेना सुभारता 

दृष्पनिय राय.पीरया माप । गज घदयों शुद्ध सम्पदु सराप ता छ* २२९६ ४ 


इस प्रकार इस पराक्रमी योदा का रंड अपार प्रासम दखाइर गा ८: ४: 
धौर बल्हन कुमार पंचतत्व को प्राप्त हुबा-- 





१. पृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिषों सना एाधी, छं०2 (३००, गे? ६६॥ 
२. वही, छं० १३०४, स० ६१ ॥ 
४. पघही, छं० २२८६-२२९१, स* ६९५ 


[ १५८ ] 


प्रिर तुट्ट रुष्याी गंपद ॥। कदयो फट्टारो। 

तहां सुमरिय महमाइ। देवि दोनो हुंकारों॥ 

अमिय सह आभास । छयो अच्छरिय उछंगहु ॥ 

तहां सु भइ परतप्पि । अरित अरि कह॒त कहंगह 0७ 

अह्हुन कुमार विश्वम सुन्योी । रन कि विमानह मनु भनन्‍यों ॥ 

तिहि दरपति तिलोचन गंगधर | तिम संकर सिर धर धुन्यो ॥ छं०२२९७ ॥* 


ढों० माताप्रसाद गुप्त वीर अल्हृव कुमार चौहान की ऐतिहासिकता पर विचार करते 
हुए लिखते है कि--“कहा गया है कि यह प्रथ्वीराज का एक सामन्‍्त था, जो शहावुद्दीन के 
विगद्ध उसके और प्रृथ्वीराज के एक युद्ध में लड़ा था, यह पहले भीम का भट था, यह पृथ्वी- 
राज के साथ कन्नौज गया घा और वहाँ पर युद्ध करता हुआ मारा गया । सं० १२०९ का 
फिराडू का एक शिला लेख है, जिसमें नाडोल के चाहमान महाराजा आाल्हण देव फो चौलुक्य 
ठुमारपाल का सामन्‍्त कहा गया है। इसके समय के नाडोल के दो ताम्रपतन्न सं० १२१८ 
के भी प्राप्त हुए है। और सं० १२२० का वामनेरा का एक ताम्रपत्र इसके पुत्र कल्हण 
को प्राप्त हुआ है, जिसमें उसने अपने को महाराज कहा है । इसलिए आल्हण का देहान्त 
मं० १२१८ तथा १२२० के बीच हो चुका धा। यदि 'रासो' का अल्हण यही गाल्हण है, 
तो वह भीम और पुब्बीराज के राज्याभिषेक (सं०१२३५ और १२३६) के पूर्व ही दिवंगत 
हो चुका घा । 


मदनपुर का एक शिला लेख सं० ९२३५ का महाराजा पुत्र आल्हण देव का अवश्य 
प्राप्त है, जो विकौर का शासक था। 'रासो' का अल्हन भी 'कुमार” है इसलिए दोनों .एक 
प्रतीत होते है | किन्तु यह आल्हणदेव भीम का सामन्‍त किसी भी समय हो सकता था, 
इसमें संदेह है, क्योंकि विकौर वर्तमान मध्य प्रदेश में है ।'* 

ऐतिहाम्रिक तथ्य कुछ भी हो, किन्तु इतना निविवाद सत्य है कि यह निश्चय ही 
अद्विनीय पराक्रमी योद्धा या | इस युग का इतिहास मन्धकारमय होने के कारण निश्चित मत 
प्रवट मरना सम्भव नहीं है । 


आरणग्शपिहु-धपृख्वी राज रासो के बनुसार बारज्जसिह ने 'वड़ी लड़ाई प्रस्ताव समय ६६! 
हे अन्र्यत महाराज पृष्वीराज चौहान के पक्ष से शाह शहाबुद्दी गोरी की सेना से युद्ध किया 
या ! इनहा विस्तृत विवरण प्राय: प्राप्त नहीं होता है | पराक्रमी आरज्जसिंह मे विकट युद्ध 
हरके शाही सेना में कोहराम मचा दिया, किन्तु दुर्भाग्यवश एक मुसलमान सरदार ने पीछे से 


सबक 


१. इहृग्वोराज रासों, नायरी प्रचानरिणी समा काशी, छं०२२९७, स० ६१। 


२. हडॉ० माताप्रसाद गुप्त; पृष्वीराज रामो की ऐतिहासिकता और रचना-तिथि, राष्ट्रकवि 
मेदपिदादारण ए्प्त, अभिननम्दन प्रन्य, पृ० ०५४, अक्ट वर १९५९ | 


[ १५९ ] 
आकर ऐसा घातक प्रहार किया जिममे बारज्जमिट संगत ने सका दा ८5 शक कह! 
प्राप्त हुआ- 
दिप्पो साह संमीप साहप धांन । चपेी कष्व पायी चयी पममटमन॥! 
तमे आय पुट्टी हुए अस्सि ताम । बर सोस तुट्दयों दिरयों हम दस्त । घत्११ञा३३ 
सनंमुप्य साहाव संमीप मश्नो । दिना सोस पायों परे कम उममें ॥ 
हये पड झांक हय कघ ठुदुयों । हुय॑ जूत्त साहाद साम्षवि सु दी ॥६8०१६*६।) 


गिरयौ सूमि आरज्ज सारज्ज पर। फुसम सुमवे गिर देव इन वाट « 


अल्हा-झदरलू-पृथ्वीराज रासो के 'महोव। समय! के अनुसार साफ़ गधा उच्ज दान; 
चन्देल राजा परमाहिदेव के सामनन्‍्त थे । एसको पुष्टि आधान छाब विशवित पम्माद २5 
तथा जयगनिक विरखित 'आाल्हा संड' से भी हो जानी है । बात्टा पष्द वो प्मिय मे कार 
तथा ऊदल का जीवन वृतान्त वर्णित है, उसी के बवृसार यहां पर मम: प्रगटग सा दस" 
राज की स्त्री देवकुंवरि के गर्भ से माल्हा का जन्म हुआ । महाराज प्रिमाव हर गाज 
मल्हना ने बड़ा उत्सव किया। दस्सराज वीर बच्छराण दोनो भाइयों मे बठा छाग: 
राजा परिमाल ने ज्यौतिषियों को बुलाया, वालक के लक्षण पूछे तद परादतों मे शत है 5४ 
वालक सिंह लग्न में उत्पन्न हुआ, सब राजाओं पर सिह समान गरजेगा, एंसशा न!म धाा।। 
जगत में प्रसिद्ध होगा । इसका नाम युगो तक प्रसिद्ध होगा और इसके गास हे माय हार 
राजामों का नाम वीरता के साथ बखाना जायगा, यहू सुनकर राजा परमास बुश प्रसप्त हू 


$$ 


<0 ४ 6७ 
मद! । 


भर ज्योतिषियों को अनेक रत्न देके बिदा किया। अल्हा जब मारो में छडने शाप * 
व भी 


बदला लेकर महोबे जाए तब वहा से पंच मब्दा हाथी, पोद्ा परीहा सामे सो मे 
पवारी में हाथी और पपीहा पोढ़ा भी रहा । बाह्द्दा का विवाह मैनागढ़ दे घाटा देवास 
कन्या सुनमा (सुलक्षणा) से हुआ था । मुनमा का दूघरा नाम मदुप्रा थो। मासवशट 
इड्ों में विजय पाते रहे कहीं हार न हुई, बेला के सवो होने पर एड मे महातीप हरे 
आत्हा ने भगवती की दी हुई खड्ग को म्यान से निकाला, उस पदटर हे एटाहि हे उप हर 
उसकी आशा पड़ी वहां तक के सब वौर प्र हीन हो गये । कपल पयोराड होर एच हद 
वृक्ष की ओट में शेप रहे, उसी समय में श्री गोरपनाप जी ह। गये और फाः चर शाप; 
पकड़ लिया फिर बोले कि ऐसा मत करो । इस पदग को दगा हरो । इस प्ररार थ। के, 
जी ने पृथ्वीराज के पास जाकर बहुत समपाय-इृसाय दिल्ली सो भेछ दिया शोर शाप है 
साथ लिए तप करने के अर्थ वन को चले गये । काह्हा में देशों जो गो हैक 8 
अमरत्व वरदाव पाया था। बाल्हा युध्धिप्ठिर डी के झबतार है हो पाहदों में शदमे श्र 
भौर प्रतापी तथा सत्यवादी थे” ।१ 


3 । 





९, पृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिषी सझा एाशो, छं० ६६९७-६३६६, घर ६६४ 
९. फेमराज श्री कृष्ण दास, झात्हा रष्ड, पृ० ४८-५९. थो एेए्टेशपर स्टोम प्रेंद मंद + 


[ १६० ॥ै 


धत्हा झा जीवन बत्त संक्षेप में आत्हा खण्ड के आधार पर दिया गया है । ऊदत 
का जीवन बत्त भी बाल्हा खण्द के आधार पर इस प्रकार है-- 


“द्मस्सराज की रानी देवकुंवरि के गर्भ से भीमसेन जो ने आकर जन्म लिया । राजा 
परिमात ने पुत्र जन्म सुन कर आनन्द माना | परन्तु देवकूंवर ने अपने पति के शोक में उस 
पृत्र का होना मच्छा नहीं समझा, अपनी वांदी को तुरन्त दे दिया जौर कहा कि इस पुत्र को 
ले जाकर कहीं फेंक दे । विधवा होने पर मेरे यह पुत्र हुआ, इस कारण मैं इस पुत्र को नहीं 
घाहती । बाँदी ने बहुत कुछ कहा-सुना परन्तु देवकुंवर ने यही कहा कि इस पुन्न को मेरे 
मामने से ले जा । तव वाँदी ने उस पुत्र को ले जाकर मल्हना को दिया और सब हाल कहा, 
मन्‍्हना ने उस पुत्र को ले लिया और पालन करने लगी । राजा परिमाल ने ज्योतिषियों को 
बुलाकर उस बालक के लक्षण पूछे तब पंडितों ने कहा कि यह पुत्र बड़ा बलवान होगा, रण- 
क्षेत्र में किसी से नहीं डरेगा । इसका नाम ऊदल प्रसिद्ध होगा । यह अपने बाल्हा भाई के 
ताम के साथ प्रसिद्ध होगा, इसके नाम को जगत में लोग बड़ी वीरता के साथ लेंगे । और 
एसका यश गावेगे । यह सुनकर परिमाल बहुत प्रसन्न हुए, मल्हना रानी ने अपने पुम्न ब्रह्मा 
फे साथ-साथ ऊदल की भी पालना की, एक सिंहिनी नाम वाली महिपी थी उसका दूध 
पिला फर ऊदल को पाला, जब ऊदल बारह वर्ष के हुए तब अस्प्र घारण कर बन में शिकार 
पैलने को जाने लगे और बाललीला करके सबको सुख देने लगे | एक दिन देवी की पुजा 
फरते-करते अपना सिर काट कर देवी जी को चढ़ाने की इच्छा से खांडा लिया उस समय 
देवी जी की आभा बोलो हे पुत्र ! ऐसा मत करो, हम तुझसे प्रसन्न है, तू संसार में महावली 
प्रसिद्ध होगा भौर रण में जा कर तू किसी से नहीं डरेगा। तेरी मृत्यु ब्राह्मण के हाथ से 
होगी यह सुन ऊँदल प्रम्नन्न हुए ब्राह्मण के हाथ से अपनी मृत्यु जान कर सन्तोष किया । 

ऊदनस्य कृत फर्म के एवं मानवेपु च॥ 
रणे कुमद्द्वितोयो यः शुरसामन्तघातिनम्‌ ॥ १७ ॥ 

कर्यात घूर सामन्‍्तों के मारने वाले ऊदल के लिए कर्मों का कौन ऐसा दूसरा मनुष्य है 
जो कर सके ।/ 

'रासी' के अनुसार वीर बाल्हा तथा ऊदल दोनों ही महोवापति परमाल के सामन्‍्त थे । 
समाहित की ईप्यॉदरयं चुगलियों के परिणाम स्वरूप स्वामिभक्त होने पर भी चन्देल राज ने 
हाहँ महोबा से निर्वासित कर दिया था । अन्यायपूर्ण इस अपमान से क्षुव्ध हो कर उन्होंने 
एन्नोनयति राजा जयचरद का आश्रय ग्रहण किया, जहाँ उन्हें पर्याप्त सम्मान प्राप्त हुआ- 


आनहा गया फनवज्ज छाट्टि परिमाल- वास यबह। 
नोपति फ्री जागीर वाघध उज्जार जारि घर।॥ 


नीता + + हज अनिल नि ता चलज-5 


4... शमराज को कृध्य दास, आत्हा घंट, १० ६८-६९, श्री बेंकटेदवर स्टीम प्रेस, मंबरई । 


[ १६१ |] 


फरि आदर जे चनद दियव, बढ़ देस घसभारिय। 
घोरे पांच मंगाय , दोय हथधियय हित दारिय | 
मोतिन मार उंतग अति , हीरा पहुंची मद्धदिदा 
दस-राज सुतन मरयो अधिक मिलि साय मंगद मरिय ॥ छ० १४५७१" 


माल्हा तथा ऊदल दोनों पराक्रमी सहोदर पंगराजण छग्रचन्द् में छाप में गहने ले । 
इसी बीच दिल्‍लीपति चौहान पृथ्वीराज ने महोद्या पर प्रदल शाझममण शिया | हुये निद दिर- 
चित प्रसिद्ध 'आल्हा खण्ड तथा 'रासो' के 'महोवा समय दोनों में मतोदा पर प्रचार 
हारा आक्रमण करने के भिम्न-भिन्तन कारण दिए हुए है | महोदा पापट हे हतुसार पृद्ध पा 
कारण इस प्रकार है--'समुद्रशिखर गद की मुन्दरी प्ममावती छा हृपहरपण गर ४ गे आर 
होते समय चौहान पृथ्वीराय को शाहवुद्दीन गोरी ने था पेरा। घोर संग्राम ते गयाद 
पृथ्वी राज ने उसे बन्‍्दी वना लिया तथा ब्लाठ भहस्प्र पोड्टो दप्द रपसाय सेशर उसे एन: 
फर दिया। पृथ्वीराज चौहान सकुधल दिल्‍ली पहुंच गये, बिस्तु सेदा पे ह८ हाथ मोड 
मांग भूल कर भटकते हुए महोवा जा पहुंचे। समन्प्या पा समय था, प्र इट्ट ४ 
साथ वर्षा हो रही थी, जिससे घायल जौर भी ध्याक्षत हो गये । समीप हो राडः पर्मिद 
फा उद्यान था, उसमें घायल योद्धा अपनी रक्षा के निमित्त जाने सगे, बाग दे रहार मे गशा 
इस पर एक घायल योद्धा ने उसका सिर काट डाला । माली शी रधी में छाइर भस्ददा रद 
से कहा, रानी ने राजा को सुनाया, राजा ने कुछ मेना भेजरर घायलों हो निशासन हा 
आदेश दिया किन्तु पायल योद्धाओं ने लड़कर उस सेना के समस्त दुरदेतों एो मार दिशायः 
तब राजा परमाल ने फ्रोघित होकर अपने स्वामि भक्त सामत्त उप्ल फा इंटा हुए प्रादात 
वीरों को बन्दी बना कर मार ठालने का आदेश दिया। ऊदल ने बात मनिदा पर प्रषार 
करने एवं बन्दी बनाने का प्रतिवाद करते हुए निवेदन फिया- 


ल्‍्+ 
हु । 
३ 
हुई 
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पर 


है 


फहै तथ उदिंल वन प्रसिद्ध सुनौ नूप ए रजएुवत सगर । 
नहीं ढ़ राजन फो ध्रम ताक, करो इनरी अब भूछ सु माए व ८ गंध य' 


ऊदल का उत्तर चुनकर माहिल ने दस्सराज के पूप्तों गे विश्य राणा परिमार दो शग 
फह कर भड़काया कि ऊदल फायर तथा मुद्ध भोरू है, एस ढारध एप्पोराह हे शाह ए:ह 
को मारना नहीं चाहता । कान के कच्चे राजा परमाल ने क्रीघारए गी परत हो सपने भाहए 
को शीघ्र ही कार्यरूप में परिणित करने का, पुन: ज्ादिध दिया | छशागारी एएं दिए! ५६४ 
ने राजा की आज्ञा शिरोधाय॑ फरते हुए एक बार पुना बाहत सेनिश! दे जद दाग है सि- 
अनुनय की-- 





१. पृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिषों सभा फाशी, छं० १४७, रू ६९। 
२... बही, छं० ३४, स० ६९। 


[ १९६३ |] 


तथ उहिल उच्चरिग छचुनह परिमाल अरज इक | 
घाइल कह अबद्ध, कहिय परमात व्यास बकी।ता 
होइ योध चहुआत, रोस सामन्त समारिय। 
अतुल तेज प्रथिराज, फरों बिनती हितकारिय | 
चस्देल राइ मानहु अरज अरय सरे सोह कीजिये। 
रजपूत दूत हनिये नहीं, जीव दान नृप दीजिये ।॥ 8० ३६।”" 
मुसम्मति की किसी प्रकार सुनयाई न होने पर, विवश हो वीर ऊदल ने पृथ्वीराज 
घोटान मे: लाहत सैतिकों को युद्ध में परात्त कर, मार डाला । इस दुःखद घटना के उपरान्त 
ही माहिल की दुष्दता एवं चुगलो की आदत के कारण आह्हा-ऊदल को महीबा छोड़ने पर 
विवश होना पद्ठा | यही युद्ध परिमाल के विनाश का कारण भी सिद्ध हुआ । 
महोबा समय! मे अनुसार परिमाल तथा पृथ्वीराज की शत्रुता का मूल कारण अ।हत 
सैनिकों का बच्च है । किन्तु 'भाल्हा खण्ड' के बनुसार शब्रुता का कारण भाल्हा के घोड़ों तथा 
हाथियों का पृय्व्रीराज चोहान द्वारा माँगा जाना तथा राजा परिमाल के अत्याधिक अनुरोध 
फरने पर भी आतल्टा का स्वाभिमान रक्षा हेतु अपने प्रसिद्ध घोड़ों एवं हाथियों को पृथ्वीराज 
को न देना हो मद्दोबा पर आक्रमण का मूल कारण है । | 


कारण कुछ भो रहा हो, पृथ्वीराज चौहान द्वारा महोवा पर आक्रमण की पुष्टि दोनों 
प्न्य फरते है । आहतों के बध की सूचना प्राप्त होने पर दिल्‍लीपति चौहान ने महोबा को जा 
घेरा। पृथ्वीराज चौद्ान का आक्रमण होने पर परमाल को महोवा बचाने की चिन्ता हुई । 
किन्तु आत्हा तथा ऊदल जैसे पराक्रमी एवं स्वामिभक्त सामन्‍्तों की अनुपस्थिति और भी 
गहने चिन्ता का विधय बस गयो । गहने चिस्ता की स्थिति में परिमाल की रानी मत्हनादे ने 
बाह्टा तथा ऊदल को कन्नौज से पुनः बुलाने की अमूल्य सम्मति दी । साथ ही दिल्‍लीपति 
घोहान पृथ्वीराज को दो मास तक युद्ध स्थगित करने के लिए भी अनुनय का परामर्श दिया । 
रानी मत्हनादे के परामशलुसार राजा परिमाल ने कप्तीजपति राजा जयचन्द गाहुड़वाल को 
बाहटा-ऊदस भेजने के लिए प्रार्थना पत्र लिख भेजा-- 
राजा जगनक कनबज पठयो जहां बनाफर झुठ सु बढ़यों। 
भात्हा आए जुमा विचारी जो पीयछ क्षत्री श्रम छारोताछं० १४२१ 
शरणादत बत्सल दिल्‍लीपति पृथ्वीराज चौहान ने महोबापति राजा परिमाल की अनुतय 
यो मान लिया तथा युद्ध को दो माह की अवधि तक स्थगित कर दिया । 
जायनिक भट्ट द्वारा अपने आर्त्रण की वार्ता जान कर स्वाभिमानी आल्ह्ान्ददल ने 


जे जौ क्पर 
है ४ है; 


टीदा जाने मे दर्शाद कर दिया तथा भट्ट को परिमाल के दुब्यंबहार पर बहुत कुछ घरी- 


कक “जननरड जना--ल + *० लेटर तक 





१. प्रस्वोराज रासों, नागरो प्रचारिणी समा फाशी, छं० ३६, स० ६९ । 
२. बड़ों, छं> १४२, स० ६९% । 


[ (६६४३ ] 


खोटी युनाई । किन्तु अपनो वीरांगना माता द्वारा-ठसी साला द्वारा बिसने दरभग्भाय 


न्न छ्ूमास शी दल 
हेतु महोवा त्यागने का कदेश दिया घा--अपने पत्नी को स्थदेश प्शा। एय स्शामि एम 
धिरक्त होते देख कर स्वयं को हवभाग्य कह पर विनाए करने पर तल्ात हो दोनो मा 
महोवा की सहायनार्थ सम्नद्ध हो उठ । शोध्र हो महोदा प्रयाण हेतु रु सम्डा सडा आग बॉ 


भाई पंगराज फीो सभा में आज्ञा लेने जा उपस्थित हुए- 


हे #* क्रब.. ुर 


+ 


घलन महीवे फीन मत देवल प्तीष उपाय । 
अरज फरन जयचन्द सो घले सु दोनों भाप ॥ ए० ६६४१ 
दोनों प्रताओं की रण-सज्जा देख वार आप्चर्य घकित हो. पंंगगाज राणा एप्पाट 
द्वारा आकारण विरोचित वाने का कारण पूछने पर निर्मके दमाफर सरदारों 
उत्तर दिया-- 


जपर 


छह 


दिखदाजाा मै 


इस कही उघनाफर जाहकर, लेन सु जगनक बआादइयय। 
प्रिथिरान महोदे जुद्ध पहु, हम परिभाल बुलाइ्यय ध८० १५५+ 
भर्थात-पृथ्वी राज चौहान मे महोद्या पर ज्राक्मण बार दिया है, पा राजा परिझाल 
में जगनीक भट्ट को भेज कर सहायतार्थ वुलवाया है । बत: महोबा जाने हा मुदर शारए 
यही है । 
यकायक इस प्रकार दोनों भाइयों को महीवा जाने फी तत्पर देख कर गाग्यटुइजे पद र 
राजा जयचन्द ने महोबा जाने का प्रतिरोध फिया तथा क्रीधित होकर बोसा- 
नयन रत झारि बुल्ज्य घानिय, मरिये परज महोधे श्निय। 
अच्चल गढढ हमारो पायो, घन्देलन ट्रिग छगहू छागो हां ९९७ 
सगरी नाव जाय बंध किज्जिय, आल्हा उदिल उत्तरत माह दिः्शप। 
छावनि फरो हमारे पास, छाड़ों मद महुए फी भाप ॥ छं ० १९८ ४ 
बनाफर वीरों ने अपने मार्ग को इस प्रकार बवरुद्ध होता देखवार करा मे उन्मत हर 
स्वाभिमानी आल्हा ने पंगराज जयचन्द को निर्भीक उत्तर दिया- 
तब आह्हन रस फोन सनैनहू, सुनि जयचन्द तृषति मे देनहू । 
फनवज लूटि अहिद सब दरिहों, पीछे. जुद्ध भहोदे फरिटरो 0 ४०६९९ 
बैमनस्यता के ऐसे उग्न समय में हो जगनोदा भद्द द्वारा पास्यइूस्डेश्यर राणा पर्दा: 
फो महोधापति परिमाल द्वारा प्रेएित पत्र प्राप्त हो गया, डिसे पद पार पथराहओ मे सथप 
2 मटर 
पृथ्वीराज रासो, नागरो प्रदारिणों ना फछाशी, छं० ९९४, स० ६९ | 
वही, छं० १९६, स० ६९ ) 
चही, छं० १९७-६९४८,स० ६९१ 
. यही, छं० १९९, स० ६९५१ 


व हुह दण 2७ 


[ १६४ 3] 


विा-कद ते को सहर्य अपनी सेना सहित परमाल की संहायतार्थ शीघ्र जाने की अनुमति 


बच्चि अरण जयचन्द नृप बोलि दिवान जरूर । 
विदा करो सेना सजी आतल्हा संग गरूर ॥ छं० २०२ ।* 

घोर आहहा को विशेष रूप से सम्मानित कर तथा शिरोपाव प्रदान कर अपने म्र.तृज 
पापनसिट सहित, कास्यकुब्जेश्वर राजा जयचन्द ने महोवा प्रस्थान करने की भाज्ञा प्रदान 
वर दी । ह 

जयचन्द के लाश्षय में रह कर इन वनाफर वीरों ने गांजर, संवागढ़, विजहट, कड़॒हर 
तया बंगा आदि युद्धों में अपार पराक्रम एवं शौर्य का प्रदर्श किया था और महोबा भा कर 
दिल्‍्लीपति चौहान की सेना से जूझ पड़े | महोबा समय” के इसी युद्ध में वीर ऊदल भपार 
पराक्रम एवं वीरता से युद्ध करता हुआ पेराभव को थ्राप्त हुआ तथा आल्हा मपने भयंकर 
पराक्रम तथा तंत्र-मंत्र प्रयोगों द्वारा चमत्कारिक युद्ध कौशल दिखाने के उपरान्त, अन्त में 
अपने गुर गोरसनाथ के आदेशानुंसार रण से विमुख होकर जंगल में तप हेतु चला गेया । 

भाल्हा-ऊदन के व्यक्तित्व ऐतिहासिक दप्टि से अत्यन्त विवाध्पद है। जनरल करनिंघम 
के मतानुसार जब पंगराज राजा जयचन्द ने अश्वमेघ यज्ञ किया था, तव जाल्हा-ऊदल ने भी 
महाराज पृथ्वीराज चौहान से युद्ध किया था ।' किन्तु उक्त कथन ऐतिहासिक तुला पर पूर्ण 
नहीं उतरता । यह सम्भावना व्यक्त अवश्य की जा संकती है कि जयंचन्द के यज्ञोत्सव में राजा 
परिमान के साथ बाल्ह्ा-ऊदल अवश्य गए होगे, कितु जंब संयोगिता द्वारा पृथ्वीराज चौहान 
का यरण हो गया होगा, तब सभी राजा-महाराजा अपने-अपने स्थान को लौट गये होगें । 

रटा-ठदल भो महंावा परमाल के साय आ गये होंगें। उनेका पृृथ्वीरोज से युद्ध करना 

ऐपिहासिक एवं प्रमाशिक नहीं जान पढ़ता | एक अन्य स्थान पर श्री केशवचन्द्र मिश्र ने 
सिखा है कि जब भारतवर्ष पर तुर्को ने आक्रमण किया, तब राजा सोमेश्वर ने अन्य राजाओं 
में महायता लो, तो चन्देल सेना के साय आल्हा-ऊदल ने भी इस युद्ध में भाग लिया था ।' 
किन्तु ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में निश्चित मत देना अत्यन्त कठिन है । 


पद्धपि आह्हा-झदल का नाम किसी भी शिला लेख में प्राप्त नहीं होता है, फिर भी 
इसके मम्बस्ध में इतनों प्रवल जनश्रति होने के कारण, इन्हें काह्पनिक भी नहीं माना जा 
गुझवा । दुतिहासिक गप्रन्व इन दाता वीरों के सम्बन्ध में भले ही चुप हो, पर महोबा समय, 
फरमाल राम, बाहट्ा यण्ट, तथा बाल्टू-राइछो ज॑से प्रसिद्ध काब्य ग्रन्यों एवं महोवा, नेनागढ़ 
सदा रिजागरी भादि सस्‍्यानों में सुरक्षित प्रबल जन-श्रुतियों मे ये सदा अमर रहेगें। 
१, पुस्वीरात रासों, नागरो प्रचारिणी समा काशी, छं० २०२,स० ६९ 
२... गतरस फर्निधम-आशंछिानिशुल सर्वे रिपौर्ट, निहद-१, पृ० १८३, १८६२-३ ॥ 
३. क्री कशवचल मिश्रन--धन्देलों का राजस्य काछ, पृ० १३१ । 


[ १६४५ |] 


कैचराराय-गुंजरेश्वर भोलाराय भौमदेव चालुरय के हाथ से महशाराहा पर5 


न 
व 


पिता सोमेश्वर की मृत्यु हो गई यी । अपने पिता का बैर वेने के लिए मद्ाराड़ पंण्वोगक हे 


द्ीशण 
गुजरात प्रान्त पर आक्रमण कर भीमदेव को मादा तथा उसके पृष्र पचराराय हो झपनी #8 
से गद्दी पर विठा कर गुजरात के फूछ परगने अपने राज्य में मिला झिए 


पृथ्वी राज रासो' के अनुसार वीर कबराराय मोलाराय भीमदेव चादुब्य गदर था 
तथा गुंजरेश्वर की मृत्यु के उपरांत पृथ्वीराज द्वारा इसे गुजरात छा शाशन गधा था | 
उसी समय से कचराराय पृथ्वोराज की अ धीनता में रहूता था तथा उनके प्रसिद सामगा मे 
इसकी भी गणना होती थी । संयोगिता मवहरण सम्बन्धी दुद्ध में बीर हयराराद से र्रर 
की ओर से भाग लिया था । पृथ्वीराज के दल से पहाहराय सोमर ही यूरप्‌ ने! झरराल थोर 
फचराराय युद्ध क्षेत्र की ओोर अग्रतर हुना तथा विपक्षी दत्त के महादेवराद से पायार इसपर 
युद्ध करके वीरगति फो प्राप्त हुलआ--- 


फच्चराराय चाउुयक घीर ॥ आयंत देपि दछ घश्मि पीर । 

सिरनाह राज प्रथिराज ताम । चल फलिय घदन उरणंश शाम ॥२४०७॥। 
एक घार पहिल रूग्गे सुधाप । जितए सुमर तिन पगराई ॥। 

संजोगि नेग दिय बांठ माल । पहिराइ्द फड बग्ली भुझारर४८८।॥। 
गज्जियो भीस जिम सुक्नन भौम । पेपेय जूहू मनाहरि एशेम ॥ 
फस्सियो तंग बज्जी स मेत। संफ्झूपि सतीस प्रथिरान ऐैत ॥२८०६ । 


0 ०0 0 


धघाइयो ताम महदेव त्तम्म | घालुवश हुयो संगी उरस्म। 
दुम लग्गि योर मित्ति विषय घाव आवबद्ध तुट्टि हुम घोर ताद वरध[४!॥ 
लग्गे सु चप्य समयय सरुप । डुअ जद॒ठ  दरप दुभ सक्‍्ग्म द्रूप। 
छग्गे सु फंठ अति उ्ठ ताम | दुम पुज्चि नूप दुस सामि राम कर श छा 
घुम घलछे मुक्ति सारग्ग सग्ग। विम्मान जानि तिथि पिशिष्र सग्य 
अच्छरिय उंच रुधे सु नेव। जप जय घर्ंत मंधि एुगूम देश मणए इधादा 
इस प्रकार घोर कचराराय अपार पराक्मम दिया एार स्वामि एम रेदु गरते प्रणा: ह। 
उत्सग फरके स्वर्ग लोफ़ को गया-- 
संग राय भानेज । राय बाचरा धरि एरुपर पा 
घर्म प्र स्वामित्ता सार घंमुट रन झब्दर॥। 





१. पृष्वौराज रासो, नागरी प्रदारिणो सभा दाशी, नोम एए, छलए ४४ । 
२. बही, छं० २४०७-२४०९ तपा २४१७--२४९६, छ८ ६१॥ 


[ १६६ ] 


पटून सिर अब पदटुट । गंग घटटहु घन नष्यपों ता 
जज जे छऊपि सहू। नह त्रिभुअनपति भप्प्यो। 
पप्परत पल्िय वज्जिय विहर । उग्र राय रठठौर घर॥। 
चालुक चलंत सुन स्वरगमन | ग्रह्म अरघ दोनों सुधर ॥8० २४३१॥' 


प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डा० गौरीशंकर हीराचन्द भोझा के अनुसार पृथ्वीराज द्वारा 
भोलाराय भीमदेव चालुक्ाप को मारना तथा उसके पुत्र कचराराय को गुजरात राज्य देने 
बाली कथा 'रासो! में काल्पनिक है। उन्होंने अपने प्रवल एवं तथ्य पूर्ण तर्को द्वारा अपने मत 
का समर्थन इस प्रकार किया है-'“वह सारी कथा असत्य है, क्योंकि न तो सोमेश्वर भीमदेव 
के हाथ से मारा गया और न भीमदेव पृथ्वीराज के हाथ से । सोमेश्वर के समय के कई 
शिलालेख मिले हैं, जिनमें से पहला वि० सं० १२२६ फाल्युन बदी ३ का विजोलियां का 
प्रसिद्ध लेख है (दि जनंल बाव ऐशियाटिक सोसाइटी आफ वंगाल, जिल्‍्द ५५, भाग १ ई० 
सं० १८८६, पृ० ४०-४६) और अंतिम वि० सं० १२३४ भाद्र पद सुदी ४ का है (भआांवलदा 
गांव का लेख ( अप्रकाशित ) यह लेख उदयपुर के विक्टोरिया हाल में सुरक्षित है )। 
पृथ्वीराज का सबसे पहला लेख वि० स॑० १२३६ आपाढ़ बदी १२ का है (लोहारी गांव का 
लेख, विक्टोरिया हाल उदयपुर में सुरक्षित ) । वि० सं० १२३६ के प्रारम्भ में सोमेश्वर का 
देहान्त और पृथ्वीराज की गद्दो नशधीनी मानी जा सकती है, जैसा कि प्रवध कोप के अन्त की 
बंधावली से ज्ञात होता है (प्रबंध चिन्ता मणि, पुृ० ५४) | भीमदेव वि० सं० १२३४ में 
गही पर बिलकुल वाल्यावस्था में बैठा और ६३ वर्ष अर्थात्‌ वि० सं० १२९८ तक वह जीवित 
रहा (प्रबंध चिन्तामणि पृ० २४९) | इतनी वाल्यावस्था में वह सोमेश्वर को नहीं मार 
सकता गौर न पृथ्वीराज ने उसका बदला लेने के लिए उस पर चढ़ाई कर उसे मारा धा। 
गुजरात के ऐतिहासिक संस्कृत ग्रन्यों में भी कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है । राजपूताना 
म्युजियम में भीमदेव का वि० सं० १२६५ का एक' शिलालेख विद्यमान है (इन्डियन ऐंटि- 
बवेरी, जिल्‍द ११, पृ० २२१-२२२) । आभादू पर बेलवाड़ा गांव के प्रसिद्ध तेजपाल के जैन 
मदिर की वि० सं० १२८७ की प्रशस्ति के लेख के समय भी भीम देव विद्यमान था 
(एपीग्रे फिया इन्डिका, जिल्द 5, पृ० २१९) । डॉ ० दूलर ने वि० सं० १२९६ मार्गशीप॑ 
बदी १४ का भीमदेव का दानपत्र भ्रकाशित किया है (इन्डियन ऐंटिक्वेरी, जिल्‍द ६, पृ०२०६- 
२०८) । इससे निश्चित्त है कि भीमदेव पृथ्वीराज की मृत्यु से मनुमानत: पचास वर्ष पीछे भी 


॥7 5 


विद्यमान था ॥ 
बतः भोझा जी के उपयुंक्त कयन से यह भी स्पप्ट हो जाता है कि कचराराय वाली 





१. पृण्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणी सना काज्ञी, छं० २४३१, स० ६१। 
२. म० म० रायबहादुर गोौरीगंकर हीराचनद ओझा, पृथ्वीराज रासो का निर्माण फाल, 
फोगोत्सव स्मारक संग्रह, पू० ४५-४६, वि० सं० १९८५ । 


[ १६७ |] 


घटना भी ऐतिहासिक नहीं है वर्योकि जब पृथ्वीराज ने भीमदेव घासुम्य गो मारा क) कहो 
3 6६॥ दूत: बधरार.८ | 5५८४ 


फोई भी निर्णायक मत देना अत्यन्त कटिन है | सामग्री दे: क_्षाव में पं धराराद बड़ प८ तर 
संदेहास्पद ही अधिक जान पढ़ता है । 


४ 


फनकराय वडगुज्जर :' पृथ्वीराज रासो के अनुसार कनकराय बदगुएर 
चोहान का सामन्त था, जिसकी गणना उनके श्रेप्ठ १०६ छघवा १०८० साझरों भे 7+* 
थी । संयोगिता अपहरण सम्बन्धी युद्ध में जब पृथ्वीराज पा श्रे'द मामगा मारित घोर्श 
को प्राप्त हो गया तब पराक्रमी कनकराय बडगुग्जर ने विपक्षी दल या सामदा रिया 
फनकराय बडगुज्जर स्वामि पृथ्वीराज को मघ्तक नवा कर गुद्ध छेष्र रो धोर झप्गर 
हो गया-- 


>, 
«0 (० ९५१८७ 
कथा 
4 


भो आयस प्रथिराज) फनपा नाथो घड़गुम्शर। 
हम तुम दुस्सह मिलन । स्वामि इुज्ज मु अप्प घर ॥ 
हो रवि मंडछ सेदि | जीय छगि सत्त नपड़ों। 
पंड पंड फरि रूड | मुद हर हार सम मंशो। 
इन बंस भग्गि जाने न को । हो पति पंप असुसाययों । 
इम जंपं चन्द वरहिया। फोस पटुट चहुधान गो | छह २१६४ ।' 
विपक्षी दल से वीरमराय कमधज्ज कनकराय बड्गुजर का मामता ररने मे. हिए 
अग्रसर हुआ । भीषण युद्ध के परिणाम स्वरूप दोनों हो वीर बपू्ई कौशल प्ररशित इसरद रु" 
वीर गति को प्राप्त हुए-- 


फर घाम चंप्पी निजं सीस बप्पं । परे परम पायो संभरिग्भ पए३। 
फरी ढाहि ढंढोरि साप्ती फनवफे | ढुऐे फोई दार एसवये साप्पनरे ।/ छंन २५०४६ ॥) 





१. फरनछ टाड ने बडगुज्जरों फे विषय में लिया है कि “बह्गुम्नर सूप | हथा पे 


लोतों फो छोड़कर फेवल यही एक वंश ऐ - हैँ, जो क्षपर्रे रो र.म कद हे छई ऐट एड 
'से निकलना बतलाता है , बड़गुम्जर लोगों फे य६-दरे रागरे हृदश (कघरगगााय) के 
थे और माचोड़ी (अलयर फे राजाओं का पूल रघान) ये। राण्य मे (राशंगएवशा 
पहाड़ी किला उनकी राजधानी थी। राजगढ़ और मदर नी पमऐ शदिश मै छ। 
जब बड़गुजरों फो फछवाहों ने उनके रिघास रुघानों से निशाय दिएा हे र 
एफ दल ने गंगा किनारे जाकर शरण छो तथा पहां पर नया शिदास ग्राम भटुप शहर 
बसाया । टॉड, राजस्थान, जिल्द १, पृ० ईधृल्‍न्‍्थर व 

भोट-पुहिलोत वंशी राजा अपने को रामउरड पे यह पुए छू शे धप में रटी घान धरा है 
वंश में मानते हैं। फर्नेल टॉड ने यह सम्भदताः झूम पणश गिस दिया है । 


आम 


२. पृष्यीराज रासो, नागरी प्रदारिषी सझा पाशी, छर ११६४, एर« 


[ १६८ ॥] 


बरी अच्छरा थिंद साचीनि भन्‍्ते | दुरुपी फन्‍्नकू घार सो घाई घन्ने ।॥। 
सं पंच सारद्ध बौरम्न सयूथे । परे पेत पदे कनवकू सु हयूयें ॥छ० २१७७ ॥" 


कन्हू (कर्नाटक नरेश)-प्ृच्वीराज रासो के रचयिता के मतानुसार कर्माठक नरेश कर्ह 
किल्टण पंगराज का आधीनस्त नरेश था। इतिहास में इस नाम के किसी भी शासक का 
बस्तित्व प्राप्त नहीं होता है। रासोकार के अनुसार अपनी दिग्विजय में फन्नोजपति राजा 
जयचरद ने सुदूर दक्षिण तक के प्रदेशों को आधीकृत किया था, फलस्वरूप कर्नाट-पति फन्‍्ह 
किल्हण भी पंगराज की आधीनता स्वीकार करता था। संयोगिता अपहरण के समय पंगराज 
तया चौहान प्रृथ्वीराज के मध्य होने वाले विकट संग्राप्त में कर्नाटक नरेश ने कान्यकुब्जेश्वर 
के पक्ष से अपार युद्ध किया था-- 


चदे कफिल्हन॑ कनहू फ्रम्ताट राजी । 


उठी वंफ मुच्छे ससी बीस लाजी ॥| 


नवमी के युद्ध में घोर संग्राम करता हुआ वीर कर्नाटक नरेश कन्ह किल्हण वीर गति को 
प्राप्त हुआ । 


रासो का उक्त वर्णन इतिहास से मेल नहीं खाता है। कर्नाटक प्रदेश पर कनन्‍्ह किल्हण 
नाम के फोई भी राजा राज्य नहीं करता था । “कर्नाटक में लगभग दूसरी शताब्दी ई० से 
गंगवंश के शासक राज्य कर रहे ये। लगभग ८१९ ई० में राज मल्‍ल गंगों का राजा था, 
जिसने अपने प्रदेश को राष्ट्रकूटों के प्रभाव से सर्वंधा मुक्त कर लिया था। सन्‌ १००४ ई० 
में तंजोर के चेलों ने यंग शासकों से राज्य छीन लिया, परन्तु गंग वंश का पूर्णतया अन्त नहीं 
हुआ । गंग वंश की कलियग शाखा ने १६ वीं शदी के मध्य तक शासन किया । घोलों ने सन्‌ 
१००४ ई० में तल्काड पर अपना अधिकार स्थापित किया” “इनका राज्य “चोल मण्डलम्‌! 
फहलाता था जिसके अन्तगंत आधुनिक तंजौर तथा ध्रिचनापल्‍ली के जिले तथा पहुकोट॒ट के 
राज्य का भी कुछ भाग आ जाता था ।”' 


“चालुक्यों के साव चोलराजाओं का संघर्ष ११ वीं शदी से ही प्रारम्म हो गया था । 
चातुक्‍्यराज सोमेश्वर के समय में यह संघर्ष चरम सीमा को पहुँचा, किन्तु अन्ततोगत्वा संधि 
थे; रूप में परिणित हुआ । अन्तिम चोल शासक अधिराजेंद्र की हत्या के उपरान्त सन्तान हीन 
होने के कारण उत्तराधिकार का प्रश्न उठने पर चालुक््य राजकुमार कुलोतुंग चोल--राज्य का 





१, प्रुस्थोराज रासो, नागरों प्रचारिणों सना फाशी, छ० २१७६-७७, स० ६१ ॥ 
२. झो नेश्न पाष्डेय--मारत का वृहत इतिहास, १० ४४५ ॥ 
३. वही, पृ० ४ेशर । 


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७ 
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४] ] 
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णासक हुआ । १३२ वीं शताब्दी का समय संधर्षमथ बीवा। १६ ६ 
अधिकांश भाग होयसल वंश के हाथ में जा गया घा |" 

इतिहास के उपयुंवतत विवरण से स्पष्ट हो झाता ही कि रामों दशित अऋघतन शरद: 
मनतिहासिक एवं कल्पना मात्र है। अतः स्पष्ट सर से एवं विश्दास हे. साय बड़ा ए) ४-५: १ 
कि फर्नाटक नरेश कन्ह किल्हूण एक कवि कल्पना प्रसूत पाप है, शिसदा इलियंक भे *7। ४ 
अस्तित्व नहीं है ॥ 

फन्‍्हू चौहान--'पृथ्वीराज रासो' के ननुसार बन्ह चौहान करमेसत मोमिादः ने न: 
भाई तथा पृथ्वीराज चौहान फे चाचा थे ।' कन्‍्ह की प्रदिश्या पो कि उनसे. समल आई के 
व्यक्ति मूछों पर ताव नहीं दे सकता था । यदि फोई कतानदंश ऐसा मारता भी था ० हए* 
उनका कोउ-भाजन वनता था। एक बार गजजरेग्वर भोलाराय भीमदेंद बादाय मे हपण मा 5 
चचेरे भाइयों को हाथी मारने के अपराध में गुजरात से निवाल दिया था + बष्दोराह हां 
यह ज्ञात होने पर उन्होंने सातों भाइयों को अपने दरघार में दुला बर आएय दे रगए गम्ग:- 
नित किया तथा अनेक ग्रामादि दिए ॥ एक दिन खुंवर प्रतापसित पृस्योराज थी राप्य शण £ 
आाया तथा चाचा कन्ह के सामने चेंठ फर बपनी महों पर ताय देते लगा | पाप; शपल हे: 
यह देखकर एकदम क्रोध उमड़ बाया त्तथा उन्होंने तुरन्त टी मरे दरबार भे उसाए शंख ए० 
से अलग कर दिया ।" परिणाम स्वरूप अन्य छः भाई भी मृद्ध करते शरण बारां घोटाद हे 6 ४) 
पराभव को प्राप्त हुए । चाचा फनन्‍ह की इस विद्रहू में विदय १ई-- 


कं 
कर 
कक 


परि सुमि पायार। उररि भंजन बियार इम। 
तब लगि फन्‍ह तमफि । बाइ पहुँचो वत्त एसुस ध 
फुक्कि रोस असि तमसि । धाई सिर जाई रहो एत। 
सनहूं सक्ति वल्ल देव । अग जनु एन्या झा एुत ॥ 
तिन हनत.. सिभु पुन हुनिय सिर। हदाजप्रेट रंपि समर हए४। 
हुल हलकि. मच्चि फोलाहूडहू । हापनाय दरणर हल गए० ६१.३ 


१. जयचन्द-भारतोीय एहृतिहास फी रुपरेया, पृ० ५६॥ 

सोमेश्यर फे छोटे भाई अर्थात्‌ पृथ्दीराल पे चाडा [रासों सग्गे है, एशोडिफड 

नेम समप--[ 3हउपंट वु०णायातो, ४णे, ७४, 7०0०० ८74. ] 

पथ्वीराज रासो, एन्‍्हू पट्ढठी समय, साहित्य छंरघान उस्यपुर, छू ५. हू ५ । 

पही, छं० ११, स० १९। 

बही, छं० १३। स० १९१ 

पहो, छं० २५॥ स० १९, तथा पृष्यीराज राशते मागर। द्रषाएणीं एश८्ा धाह£ ८; 


४३, स० ५) 


42 


दी हर «4 4० 


[ १७० ॥] 


चादुपय-भादयों के वध की सूचना पाकर राजा पृथ्वीराज अत्यन्त भाकुल हुए । अजमेर 
में हडताल को गई तथा सात्त दिनो तक दरवार में दाचा कन्ह के न थाने पर संभरेश स्वयं 
हों चल कर उनके घर गये तथा चाचा कन्ह को सम्मोधित करते हुए कहा कि अपने घर अध्ये 
टुओ के साथ बापने ऐसा व्यवहार क्रिया, यह दोप जापकों लग गया त्या इस बराई से 
संसार में अपयश होगा-- | हे 
आएति विष अप्पन सुधर। सो रावर ऐसी फरिय | 
इह दोस अप्प लूग्ग्यों सरो। बत्त वित्तरिय जग बुरिय ॥ छं० ९०१' 
पृथ्वीराज ने दरवार की निन्‍्दा मिटाने हेतु तथा शरणागत की हत्या के प्रायश्चित 
स्वछप 'चंप बघ पदटट रतन! का प्रस्ताव करके उनकी आंखों पर पाव लाख मूल्य की एक 
पट॒टी बंधवा दी । यह पट्टी हमेशा करह के नेत्रों पर वधी रहती थी केवल युद्ध के मवसर 
पर अथवा रनवास में ही पट्टी खोली जाती थी- 
सो पट्टी निस दिन रहे, छोरि दई हैं ठाम । 
फे सिज्या बामा रसत, के छुटुठत संग्राम ॥ छ० ४७" 


चाचा फनन्‍्ह पृथ्वीराज चौहान के साथ हमेशा रहे तथा उराके ऊपर छाया की भांति 
मटराकर रक्षा करते रहे | नरनाह कन्ह अत्यन्त पराक्रमी योद्धा थे। इनके पराक्रम के विपय 
में रासोकार ने लिखा है-- 


परिय संझ जग मंझ । टरिय कंकन रंकन घन। 
भरिय पत्र जुनिनीय । करिय सिंव सीस माल घन ॥। 
मुरिय न ध्लवित चालुक | धरिय रस रोस फन्‍्ह हिय । 
पर चलिय दरवार । सीहु गज घटिंटद उहटिटय ॥ छं० ७९ ।' 


क्षस्त में खाचा करह का रोदर रूप “कनवज्य समय ६१* में दिखाई देता है । पृथ्वीराज 
ने जयचर्द की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर लिया। फलरवरूर युद्ध के नगाड़े निनादित 
हो उठे । छग्गन के युद्ध में मारे जाने के उपरान्त वीर पराक्रमी नरनाह कन्ह की आंखों से 


क ्‌ 


पट॒टो हुदा दी गई तथा पदटी हृदते ही उन्होंने भीषण मार-काट मचा दी-- _ 


पटुर्ट पल छुटूटत । फन्‍ह धाराहर वज्जयी ॥ 
जनुफि सेघ सशलिय | बोर बिज्जुलि गहि गज्यी॥। 
हय गय नर तुट॒टंत ॥ विरह्‌ तुदिटिय तारायन 
तुद्गटिय पोहनि पंग । राय क्षोनिय मारायन ॥। 





पृस्थीराज दरासो, नागरी प्रचारिणी सना काज्ी, छं० ९०, स० ५। 
पृज्वीराज दात्तो, साहित्य संस्थान उदयपुर, छं० ४७, स० १९॥। 
दृष्वोराज़ रासो, नागरी प्रचारिणी सभा काशी, छं० ७९, स० ५। 


सज #औ नाथ 


[ १७१ ] 


हल हलिय नाग नागिनि पुरत | नामित सिर इदयों सर व 
आवहि न संग सिगार मन । मननि सीस झुव॒रों रे घर ॥ एन ६ 


बे 

करता 

बज 
मन 


परिणाम स्वरूप पृथ्वीराज चौहान सयोगिता को खेर दिल्दी ४ छोर इसे £2 ४ 
अग्रतर हो गया-- 
दहं फोहसा स्वामि माराम छुट्टी । पछं पंग रा सेन काइस उद्धों ॥ ए५४ २६६५7 
भीपण युद्ध के परिणाम स्वरूप नरनाह झ्न्‍्ह चौहान का सिर छद ने घटण को २९३ 
किन्तु फिर भी उनके धड़ ने तीन घड़ी तक विकट युद्ध किया ठथा धोने हजार दाजएं २ 
फाट डाला-- 
लरत सीस तुट्यी सु हर । घर उद्थी फरि मार 
घरी तोन लों तीस विन पाट्ट तीस हजार ॥ छं० २२५१ । 
घिन सीस इसी तरवारि बह । निघर्ट जन साथम पास मां । 
घर सीस निरात हुंअत इसे । मुन राजनु राहु संपत दिसे कर प्र २५४४ 


इस घड़ की रण क्रीढ़ा [निरन्तर रूप से तव तथा चलती रहो झए शह हा एइ-« 
टुकड़ं होकर छिन्न-भिन्न न हो गया-- 


इहि विधि सु फन्‍हू रिन फेलि फिदश्न। 
परि अंग अग होइ छिप्न-निप्न ॥0० २२०१ ।' 
कन्ह की एस संसार में अपार सुकुरति फैली तपा उन्होंने पंगराह वी मेगा दे 7श कद 
सत्तर हजार सैनिकों को काट कर मोक्ष पद प्राप्त किया- 
एक लप्प सित्तर सह ! पट्टि छिपे क्रि बगा। 
दोय दीन पप्पं सु इम | घनि पतन्नि नृप्प सु एम ॥ 0० २४६६ ॥ 


| 


फान्हु फ्रधज्ज-रासों के अनुसार फान्ययुब्जेश्यर के सभी सुमत हो शूहु हे एप * 
फान्हू फमधघज्ज फो ही उक्त गौरवधाली पद सौंपा गया मा।' हरदइण मआए ६९४० 
के पूर्व 'सामन्‍्त पंग युद्ध समय ५५४ के बनन्‍्तर्गठ सबंप्रपम दाग्र हे शो एड शरार्त ३; 


परिचय प्राप्त होता है। 





पुष्वीराज रासो, नागरी प्रचारिषों सभा छागी, छघं० इम्रे२, रू। ६! । 
वही, छं० २२३७, र० ६१॥ 

घही, छं० २२५३-२२५४, स> ६६१॥ 

पही, छं० २९७१५ स० ६१। 

यही, छं० २२८२ स० ६१। 

घह्दी, छं० १४३६, स० ६११ 


दी खुह व कट द० :? 


[ १७२ ] 
किरिय कानन्‍ह जनु फान्हू गिरि, सिरन भुप भर पंगे। 
ज्नु दव लग्गी सचिव चनहु, भर छ पंणिय जंग 'छं० १४२ ४ 
उपयुक्त युद्ध में वंगराज की पराजय के अवसर पर कान्ह कमधज्ज बुरी तरह से घाग्र॒ल 
हेआ था। उसी स्थल पर बीर कान्‍्हू को कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द का श्रातृज्य होने का कवि 
में सकते दिया है- 
फान्ह मतीज उठाय लिय, हुये नप्यों वर अग्ग । 
पंग दृढि भारण्य भर, सहू मिद्यी जुरि द्रग्ग ॥ छं० १०८।* 


आहत प्रातृज कान्ह को उठा कर पंगराज जयचन्द कन्नौज की ओर प्रात्यावतित 
हुये थे । 


ण्ठ्प 


'आह्ड़ा षण्ट' के अन्तर्गत भी कारह कमंघेज्ज को चौहान पृथ्वीराज ने 'भारीशुर 
फम्नोजी राय! कंह कर सम्बोधित किया है । 'कन्नवज रामय ६१ के अंतर्गत दिहलीपति 
पृथ्वीराज चोहान पक्ष के प्रसिद्ध सामन्‍्त सलख प्रमार, कनकराय, रंघुवंणी, लप्पन बघेला, 
पहाहुराय भाटिया तथा पंचाइन चौहान आदि को युद्धाग्रसर होते देखकर, इस पराक्रमी योद्धा 
कान्हू कमघज्ज ने स्वयं संग्राम करने की इच्छा प्रकट की थी | किन्तु कान्यकुव्जेश्वर जयचन्द 
द्वारा तत्काल मंत्री पद पर नियुक्त किये जाने के कारण युद्ध में सक्रिय भाग लेने से रोक 
दिया गया-- 

बज्जे सुनवरि पंगसुर रुप, चक्रित चित भूपाल सू कूप॑। 
पुब्कारे बर उन निप अगं, अरि गौ भंजि पान सुर भंज॑ं।। 
अग्गे सुपर बज्जीर बीर, फुरमान अप्पि अरि गहन मभीर। 
बंधि सिलह कन्हू उम्मे फरकूर, मनुघार छुटिट मद्द वत्तिसुर ॥ छं० १४३६ 
संग्रोगिता अपहरण सम्बन्धी दिल्‍लीपति पुथ्चीराज तथा कनप्नीजपति जयचंद के मध्य 
दोने वाले घोर संग्राम में नवमी के युद्ध में अन्य रावतों के साथ वीर कानन्‍्ह कमधज्ज भी 
बोरगवि को प्राप्त हुआ । 'नृप कन्हराव मरह॒दट वे । तथा पंग सेना ने पराजित हो कन्नौज 
दिशा को पत्लायन किया । ह 

फाश्ी नरेश-पृथ्वीराज रासो में कवि चन्द्र ने गाहड्वाल राजा जयचन्द के सहयोगियों 
में काशी नरेश का भी उल्लेख किया है। ग्रस्थकार ने इस नरेश का नामोल्लेख कही भी नहीं 
शिया है, एक स्थान पर 'कासह नरिंदर रविबंश घोर! कह कर धंयंबान काशी नरेश को 
यूयंवंणी होने का संकेत मात्र प्रस्तुत किया है। महाराज जयचन्द गाहड़वाल के पूर्वजों के 


१, पुस्थीराज रासो, नागरोी प्रचारिणी सभा काशी, छं० १४२, स० ५५॥ 
हल 


वही, छं० १०८, स० ५५। 
३. यही, छं० १४३६, स० ६१ । 


[ (१७६ ] 


प्धिकार में वाराणसी प्रारम्भ से ही घी। बतः तस्कालीन सामदिंद प्रदा शो एप मे सपने 
हुए, ऐसा अनुमान करने को बल मिलता है कि वह वास्यशुदतायर पयधाई ही फट मे 
फाशी राज्य का प्रवंधकर्ता कोई रघुवंशी क्षत्रप रहा होगा। काशी नरेंद्र रंप्रोडप न १०४१ 
जयचन्द के प्रवल सहयोगी के रूप में 'कप्नवज्ज खड' में पुस्वी राह चौताल वे दिग्द पशरगण 
फे पक्ष से युद्ध करता हुआ दृष्टिगोचर होता है- 

फासिराज सज्जयो सुदझ , फुनि क्ग्पा दिये पंग । 

गाजें मौर अनोर रनि, थाने दिपम स्‌ रंग !२०३३ ४ 

कविचन्द ने काशी नरेश के संन्‍्य दल छा विस्तृत बिवस्थ प्रस्णुद शिया मै ।रपह१ हे 

कि काशी नरेश संयोगिता नपहरण सम्बन्धी पृथ्यीराज चौहान शमा पशरार है मापतवाई 
धाले संग्राम में पंग की सहायता् उपस्थित था- 

फासिराज दल विपम, भद्धदि जानुत्तार बिटुट्टिय । 

भिरिनि हार जुध धार, बढ बदहु छिय रंगिय | एर २०६६८॥ 

काशी नरेश का सामना विपक्षी दल चौहान पृघ्वीराज हें सामरा वादा रग्गीर 

हुआ । दोनों ही अपार पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए बीरगति यो प्राप्य रए- 

हाडाराय हलक उत्त , फासि राजहु पर पर फस । 

जोमिनिपुर सामत , बहुत फनपण्ज योर रस ॥ 

वियो घोर आहुरिय , घरिय दत द्वार शादध । 

नामि बदीर निज्जुरि , फरिय पहुरि एुस राण्य ॥ 

उड़ि हंस नसंहू मुहर पुहरति सा दत्तिय एुहर। 

जग्गपौ नाग तब नागपुर, होम दुरग परामंण पर ॥ए ८१२४४ 7 


भरत गौदग है गामिस्यों की ४ 
राज चाराते छू शाकबा 7: 5». 


अप 
गई । 


फाशी नरेश का अपूर्व रण फकौधल देय कर बोर 
एक बार यह सन्देह होने लगा, कि वह दिल्‍ली सकूघल प 


ष्र्ः 


तय 


रे ५ 
भी सम मे हघदा हा । 


4. * 
| 


गा 


4, ८ 


कुम्मा जी--'पृष्वीराज रासो' के बनुसार दुग्भा जी खिज्नोरपति राइस गशाशश शा 
जेपष्ठ पुत्र था। रावल समरप्तिह द्वारा छोटे पुप्र रतमसिह्ट हो राजमहो शव दरार 7 
घनाने के परिणाम स्वरूप यह रूठ कर दक्षिण को घता गया रोपा यह मुगगिशार इगदा है 
का मुसाहिब होकर वीदरनगर का जागीरदार दन गया- 
समर सिप निज पदुट। पृत्पि शाएण रहने वा 
दोहितो सोमेत । लए भरि एस एर्नवा 


१. पृष्वोराज रासो, नागरो प्रचारिषी सना, राशो, एंए २०३२, मर ५८ ॥ 
२. यही, छं० २०३८, छ० ६११ 
४६. पही, छं० २०४२, छ० ६१॥ 





' [ एण्ड ] 


दस्पिन दिसि संकृम्रिय। सिछि यह वसीपति साहे । 

दिदुर नयर दिय पर्दे । रहिय अनुचरि तिहि ठाहूं 

बीराधि यीर बज्जाय पग्र | हुनिय बन्न तन फरि उतने वा 

हू खुपन रयनि लहि. चन्द फहि। चछि पुमान गढ़फ ॥छ ० ६ ।' 


किन्तु “रासो के उपयुक्त कवन को असत्य एवं अप्रमाणिक सिद्ध करते हुए रायबहादुर 
गौरीशंकर हाराचन्द आता ने लिखा है कि "शहाबुद्दीव के साथ की पृथ्वीराज की लड़ाई तक 
न तो समरसिह का जन्म हुआ था भौर न दक्षिण में मुसलमानों का अवेश हुआ था । मुसल- 
मानों का प्रयम प्रवेश दक्षिण में अलाउद्दीन खिलजी के समय वि» सं० १३५९ में हथा ! 
मनी चुलतान अलाउद्दीन हसन ने दिल्‍ली के सुलतान से विद्रोह कर बहमनी राज्य 
स्थापना की थी । इस वंश का दसवां सुलतान महमदशाह वली ईं० सं० १४३० (वि० सं० 
१४८०) में वीदर बसा कर गृलवबर्ग से अपनी राजधानी वहां ले आया । अतएवं ऊपर लिखा 
हुआ कूम्भा का बृतान्त वि० सं० १४८७ से पीछे लिखा जा सकता है, जिससे पूर्व बीदर का 
पृथक राज्य भी स्थापित नहीं हुआ था ।”' अतः इस प्रकार कुम्भा जी की ऐतिहासिकता 
संदिग्ध हो जाती है । 


फुमोदसनि--'पृथ्वी राज रासो' के मतानुसार कुंमाऊगढ़ के अधिपति का नाम कुमोद- 
मनि था । 
सवाल्प्प उत्तर, सयबलूू, फम्ऊगढ़ टूरग । 
राजत राज कुमोदमनि, हय गय द्विब्ब अभंग ॥ छं० २६ ।' 


समुद्रशिखर गढ़ के राजा विजयपाल ने अपना पुरोहित भज कर अपनी एक मात्र पुत्री 
पद्मावती का सम्बन्ध राजा कुमोदमन्ति से पक्का कर दिया । राजा कुमोद्रमनि बथा समय 
अपने इृष्ड-मित्रों सहिल बारात लेकर समरद्रशिखर गढ़ पहुंचा किन्तु दिल्‍ली-अजमेर का 
कन्तिम हिंदू शासक प्रथ्वीराज चौहान पद्मावति का अपहरण करके दिल्‍ली ले गया । राजा 
कफमोदमनि ने पृथ्वीराज का जम कर सामना किया किन्तु पराह्त हो, विवश होकर कमाऊ गढ़ 
लौटना पड़ा । कवि ने ऋूनोदमति का उल्लेख फिर समस्त प्रृथ्वीराज रासो में कहीं भी नहीं 


पृथ्यीराज रासो, मागरी प्रचारिणी सभा काझी, छं० ६, स० ६६ | 
रापवह्टाडुर कषेप्ता, प्रब्वीराज रासों का निर्माण फाल, फोझोत्सव स्मारक संग्रह, पृ० ५९ । 
पृस्वोराज रासो, नागरो प्रचारिणो समा काशी, छ० २६, स० २० । 

वही, छूं० २०, स० २० । 

यही, छं० २४-३१, स० २० । 

धही, छं० ४२-५१, स० २०१। 


है] + 


बरी. क#ए 8 बण दुए 2०७ 


[ १४७५ |] 


किया है । 'रासो! के अन्य समस्त संस्करण इसके विपय में मौन? | दिवस भी दश माझ हे 
किसी राजा का समन नहीं करता है । 

फ्रंभराय-पृथ्वी राज रासो' के बनुमार कूरंमराय पृश्वीराह हे प्रनिद गाश+ 
में से एक था। क्रम्भराय पल्हन राय का भाई था। 
वीर कूरम्भ शहाबुद्दीन गीरी के सामस्त खुरासान एरां के साथ दुद बारह हृदा दिद:: 
देता है । रास्तोकार ने लिखा है कि- दुर्जनो छो सालन वाले पच्यन हे शुषा धारण ने 7 ई़ 
लगाई । ख॒रासान खां ने उसका सामना किया तथा अपनी खम्दी हाहयार हाप्र पटाई रे 
उसका टोप टूट कर विखर गया तथा करबंध से सिर दूृद गया | बदे :४ लिए से भारोन्ग 
की ध्वनि उच्चरित होती रही तथा कटा हुआ घड़ ताल पर नृत्य हरणा सा । था नीपण 
युद्ध देखकर रुद्र ने भयंकर बटटहास किया तथा नंधी ह्रामनाय हारमे ठगा। घर शेड 

हते हैं कि शैल पुत्री यह नया महाभारत देख कर घव्त रह गई -- 


न तन कोच कक 
द्‌ छा “मै ह ७ ० 


दुज्नन सल॒ फ्रंभ। बंध पल्हन हवशारिय । 

सम्हो पां पुरक्तांन । ठेग रूम्बी उपनारिय ॥ 

टोप दुष्टि चर फरिय | सीस पर तुट्टि परम । 

सार मार उच्चार । तार तठ॑ं नद्ि कम 0 

तहें देषि रुद्र रह हुस्पो। हप-हुय-हुप.. नंदी एणो। 

फवि चन्द सयल पुत्री चकित । पिप्पि दीर भारघ नयों ॥ छ०१०६। 


उपयुषत छन्द क्ष पक प्रतीत होता है, बयोकि बीर फ्रम्भराय रंदागद मेएस्यीगल 
त्तथा शहाबुद्दीन गोरी फे मध्य होने वाले सप्राम में मृत्यु को प्राप्त की दशा पा. शा 
संयोगिता अपहरण सम्बन्धी युद्ध में कूरम्म नामक योद्धा यो पुर सुद्ध हार एृश पा है । 
पृथ्वीराज रासो 'कृप्तवतज समय ६९ का कूरम्भ भी पत्ट्न राय हा भाई ह। ससी स्थिह $ 
दोनों को अलग नहीं माना जा सकता है । 'कप्तवज समय ६१९ मे परपुपार छाए मार्ट 
के घराशायी होने पर वीर क्रम्भ ने युद्ध क्षेत्र में ददकर मियलियों वा गम हिएा, २३० 
भूमि में पंगदल के सामन्त वाघराज से उसका सामना बा, परिद्ठ स्याए पोचा मारा गुर 
फरते हुए वीर गति को प्राप्त हुए-- 


परत राह पुंडोर | गटहिय झूरम एस णाशे। 
घाघ राह चष्पेष्ठ। उहित क्षतियर पहि साष्टोग ॥ 
निर्म निम्भे मिस्‍्मरिंग । तेश... घधारिय टेट्रर पर। 
हर 


कल्‍्क 


सनुह देद दुजहोन । पिट्टि छह्तरि सा 





१. पृष्वीराज राष्तो, नागरो प्रदारिणी ८छमा एायी, ए० ६०१४. रन ४२२! 


[ १७६ ] 


गल बांद ऊूग्जि गदठों पिमुन । भीत नेट महा विच्छुरिय । 
उर चंपि दोइ कट्टारि कर । मुगति मग्ग रम्मी घरिय ॥ छं० १४८९ ।* 
स्पष्ट है धीर क्रम्म रेवा नदी के तट पर प्थ्वोराज तथा मोहम्मद गोरी फे मध्य होने 
वाले संग्राम में खुरासान खां के हायों नहीं मारा गया था वरन्‌ 'कनवज्ज समय! के अन्तर्गत 
धाघराय वघ्चेल से यूद्ध करता हुआ मोक्ष-मार्ग को प्राप्त हुआ । 
फेहरि कप्ठीर--कवि चन्द वरदायी वथित पंगराज के दरवार के अदृश्य वर्णन में 
केहरि कप्ठीर का भी नामो उल्लेख हुआ है-“फेहरी ब्रह्म चालुबक यीर” ॥" जयचन्द गाहड़- 
वाल का यह सामनन्‍्त महान योद्धा था । 'कनवज्ज समय ६१ के अंतर्गत संयोगिता भपहरण 
सम्बन्धी पृथ्योराज चौहान तथा पंगराज के मध्य घोर संग्राम में पंगराज की दुविधामय 
स्थिति देखकर पंगराज के मंत्रों सुमंत ने जयचन्द को केहरि कण्ठीर को युद्धादेश देने का 
परामर्ण दिया था- 


केहरि कण्ठीर पठी सुनरुप इन समान छित्रीन छित्ति। 
अड॒डी सुधरो विवस्मार घन, रावन रिन सिव ईय पत्ति ॥१४२४ ॥' 


केहरि कण्ठीर अत्वन्त विवेकशील था, सेनाघ्यक्ष रावन के समान वह भी जानता था 
कि चौहान पृथ्वीराज को पकड़ने में सभी पंगदल का नाश होगा किन्तु फिर भी वहु रण 
प्रहारों को वीरता से प्तहन करने को प्र८तुत रहा--- 
भंजी जुबीर चहुआनल, इह दुबह्‌ सम्हों भिरे। 
भारथ्य वीर मंटन सहै, अरी जीत फायर घुरं ॥छ० १४२६ । 
सामन्‍्त केहरि कण्ठीर स्वामि की आज्ञा शिरोधाये कर युद्ध हेतु रण प्रांगण की भोर 
झ्ग्रतर हुआ-- 
फेहरि कण्ड सुगत्त मी, करि जुहार नृूप भार। 
हस्ति काछ जय जाल ले, चलि कअग्ग कुटवार ॥ छं० १९१७ ।" 
रफक्षेत्र में केहरि कप्ठीर का सामना दिल्‍लीपति चौहान पृथ्वीराज से हुआ । दोनों में 
घोर संग्राम हुआ तथा इस चतुर सामन्‍्त ने उचित अवसर पाकर अपनी कमान चौहान के गले 
में टाल दी-- 





पृथ्वी राज रासो, नागरी प्रचारिणी सना फाशो, छं० १४८९, स० ६१। 
वही, छं० ५२३२, स० ६१॥ 

घट्टी, छं० १४२४, स० ६११। 

यहा, 8० १४२६, स० ६१ । 

यही, छ॑ १९१७, स० ६१। 


लय नर >चछ 


की 


[ १४७. ] 


केहरि रा फण्ठीर स्वामि सिगिनि गई घफ्चिय । 
बदन पास निय चंद कोझे पाठ्हू पति मतक्तिय ।॥ 
हंसि हलकिक हुववारि पंग प्ृत्तिय ज्ञानन घन ! 
तात गग्य सवरिय, राज राजत बानी एम ॥ 
चहुनान रव्य सथ्य चढ़िय, नधि दबघ्य दइुमपन्ण घर। 
अब देपि बाल छालन नुपर, सुचन हाल पिरदौ मुणर के एं5 १९५६ १ 
वह समय दूर नहीं था जब पृष्वीराज घौहान के साथ कोई भीषण इदर्नत्सा है का त। 
किन्तु चौहान के घोड़े पर बेंठी हुई वीरांगना समोगिता ने टीदा सझेय धर शशल 
प्रत्यञज्चा काट कर पृथ्वीराज की प्राण रक्षा की तथा पृथ्वीराज ने बबसर परदार योर है 7 


कण्ठीर पर असि-प्रहार किया-- 


हज 


गरुन फटिटय रमनी सुदर उसनहू पंग फुझ्कारि 
असि बर प्तर प्रधिराज